Class 10 Science Notes in hindI Chapter - 9
Chapter 9: Light – Reflection and Refraction
Chapter Introduction:
This chapter explains the laws of reflection and refraction of light along with their applications. Numerical problems are also included for better understanding.
FAQ
Ques. Are numerical questions asked from this chapter?
Ans. Yes, numerical problems are commonly asked in examinations.
CLASS 10 SCIENCE NOTES IN HINDI
CHAPTER 9 : प्रकाश - परावर्तन तथा अपवर्तन
प्रश्न :- प्रकाश क्या है?
उत्तर :- प्रकाश :- एक प्रकार की ऊर्जा है, जो हमें किसी वस्तु को देखने में सक्षम बनाती है। इसे हम प्रकाश ऊर्जा कहते हैं।
प्रश्न :- प्रकाश के गुणों के बारे में विस्तार से समझाइए।
उत्तर :- प्रकाश के निम्नलिखित गुण है :-
1. प्रकाश हमेशा सीधी रेखाओं में यात्रा करता है।
2. चूंकि प्रकाश विद्युत चुंबकीय तरंग है, इसे फैलने के लिए किसी भी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती।
3. प्रकाश अपारदर्शी वस्तुओं के पीछे स्पष्ट और तीव्र छाया उत्पन्न करता है।
4. प्रकाश की गति निर्वात में सबसे अधिक होती है, जो लगभग 3 × 108 मीटर प्रति सेकंड है।
प्रश्न :- प्रकाश के परावर्तन की प्रक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर :- प्रकाश के परावर्तन की प्रक्रिया :- जब प्रकाश किरण किसी माध्यम से गुजरते हुए किसी उज्जवल सतह से टकराती है, तो वह सतह से परावर्तित होकर उसी माध्यम में वापस लौट आती है। इस प्रक्रिया को प्रकाश का परावर्तन कहा जाता है।
उदाहरण :-
जब प्रकाश दर्पण की सतह से टकराकर वापिस लौटता है।
प्रश्न :- विभिन्नता का महत्व क्यों है और यह जैव विकास में किस प्रकार योगदान करती है?
उत्तर :- विभिन्नता का महत्व :- यदि कोई एक समूह (समष्टि) अपने पर्यावरण के अनुकूल है, परंतु यदि पर्यावरण में कुछ बड़े बदलाव (जैसे तापमान में बदलाव, जल स्तर में बदलाव, आदि) होते हैं, तो उस समूह का पूरी तरह से नष्ट होना संभव है। लेकिन उस समूह में कुछ जीवों में भिन्नताएँ होने पर, उन जीवों के समूह के लिए जीवित रहने की कुछ संभावनाएँ अवश्य बनी रहेंगी। इस प्रकार, विभिन्नताएँ किसी प्रजाति (समष्टि) की दीर्घकालिक उत्तरजीविता को सुनिश्चित करने में सहायक होती हैं। यह भी कहा जा सकता है कि विभिन्नता जैविक विकास का एक प्रमुख आधार है।
प्रश्न :- प्रकाश के परावर्तन के नियमों को उदाहरण सहित समझाइए ।
उत्तर :- प्रकाश के परावर्तन के निम्नलिखित दो नियम है :-
1. प्रथम नियम :- तल के ऊर्ध्वाधर (अभिलंब) रेखा और आपतित किरण के मध्य का कोण तथा परावर्तित किरण और तल के ऊर्ध्वाधर रेखा के मध्य का कोण एक समान होते हैं।
आपतन कोण (i) = परावर्तन कोण (r)
2. द्वितीय नियम :- आपतित किरण, तल के ऊर्ध्वाधर (अभिलंब) रेखा और परावर्तित किरण सभी एक ही तल आपतन तल में स्थित होते हैं।
प्रश्न :- प्रतिबिंब क्या होता है? इसे किस प्रकार देखा जा सकता है और यह कैसे बनता है?
उत्तर :- प्रतिबिंब :- उस स्थान पर बनता है जहाँ दो या दो से अधिक परावर्तित किरणें आपस में प्रतिच्छेदित अथवा मिलती हैं या मिलती हुई प्रतीत होती हैं।
प्रश्न :- प्रतिबिंब कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर :- प्रतिबिंब मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं :-
1. वास्तविक प्रतिबिंब (Real Image)
2. आभासी प्रतिबिंब (Virtual Image)
प्रश्न :- वास्तविक प्रतिबिंब और आभासी प्रतिबिंब कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर :- वास्तविक प्रतिबिंब और आभासी प्रतिबिंब में निम्नलिखित अंतर होता है :-
प्रकार | वास्तविक प्रतिबिंब | आभासी प्रतिबिंब |
निर्माण | जब प्रकाश की किरणें वास्तविक रूप से प्रतिच्छेदित होती हैं, तब वास्तविक प्रतिबिंब बनता है। | जब प्रकाश की किरणें प्रतिच्छेदित होती हुई प्रतीत होती हैं, तब आभासी प्रतिबिंब बनता है। |
परदे पर प्राप्ति | इसे परदे पर प्राप्त किया जा सकता है। | इसे परदे पर प्राप्त नहीं किया जा सकता। |
चित्र की दिशा | वास्तविक प्रतिबिंब उल्टा होता है। | आभासी प्रतिबिंब सीधा होता है। |
प्रश्न :- समतल दर्पण द्वारा प्राप्त प्रतिबिंब कैसा होता है?
उत्तर :- समतल दर्पण द्वारा प्राप्त प्रतिबिंब निम्नलिखित होता है :-
1. प्रतिबिंब सीधा और आभासी होता है।
2. वस्तु के आकार के समान ही प्रतिबिंब का आकार होता है।
3. प्रतिबिंब, वस्तु से दर्पण की समान दूरी पर दर्पण के पीछे बनता है।
4. प्रतिबिंब का पार्श्व परिवर्तित हो जाता है।
प्रश्न :- समतल दर्पण द्वारा प्राप्त प्रतिबिंब कैसा होता है?
उत्तर :- समतल दर्पण द्वारा प्राप्त प्रतिबिंब निम्नलिखित होता है :-
1. प्रतिबिंब सीधा और आभासी होता है।
2. वस्तु के आकार के समान ही प्रतिबिंब का आकार होता है।
3. प्रतिबिंब, वस्तु से दर्पण की समान दूरी पर दर्पण के पीछे बनता है।
4. प्रतिबिंब का पार्श्व परिवर्तित हो जाता है।
प्रश्न :- पार्श्व उत्क्रमण क्या होता है? इसे समझाइए।
उत्तर :- पार्श्व उत्क्रमण :- जब हम समतल दर्पण में अपना प्रतिबिंब देखते हैं, तो हमें अपने दाएँ हाथ का प्रतिबिंब बाएँ हाथ के रूप में और बाएँ हाथ का प्रतिबिंब दाएँ हाथ के रूप में दिखाई देता है। अर्थात प्रतिबिंब में वस्तु के पार्श्व (साइड) आपस में बदल जाते हैं। इसे पार्श्व उत्क्रमण कहा जाता है।
नोट :-
प्रश्न :- गोलीय दर्पण क्या होते हैं और ये कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर :- गोलीय दर्पण :- वे दर्पण जिनका परावर्तक (reflecting) पृष्ठ गोलाकार (spherical) होता है, गोलीय दर्पण कहलाते हैं।
गोलीय दर्पण मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं :-
1. अवतल दर्पण (Concave Mirror)
2. उत्तल दर्पण (Convex Mirror)
प्रश्न :- अवतल दर्पण क्या है?
उत्तर :- अवतल दर्पण :- वह गोलीय दर्पण होता है, जिसका परावर्तक (reflecting) पृष्ठ अंदर की तरफ, यानि गोले के केंद्र की तरफ वक्रित होता है।
प्रश्न :- उत्तल दर्पण क्या है?
उत्तर :- उत्तल दर्पण :- वह गोलीय दर्पण होता है, जिसका परावर्तक (reflecting) पृष्ठ बाहर की तरफ वक्रित होता है।
प्रश्न :- अवतल दर्पण के उपयोगों के बारे में बताइए।
उत्तर :- अवतल दर्पण के निम्नलिखित मुख्य उपयोग है :-
1. दाढ़ी बनाने में :- बड़े फोकस दूरी और बड़े द्वारक वाले अवतल दर्पण का उपयोग दाढ़ी बनाने में किया जाता है। इसमे व्यक्ति अपना चेहरा दर्पण के ध्रुव और फोकस के बीच रखता है, जिससे चेहरा बड़ा, सीधा और स्पष्ट आभासी रूप में दर्पण में दिखाई देता है।
2. चिकित्सा उपयोग :- डॉक्टर छोटे अवतल दर्पण का उपयोग आंखों, दांतों, नाक, कान, गले आदि अंगों को प्रकाशित करने के लिए करते हैं, ताकि इन अंगों को अच्छी तरह से देखा जा सके।
3. टेबल लैंप्स में :- टेबल लैंप के शेड्स में भी अवतल दर्पणों का उपयोग किया जाता है, ताकि प्रकाश दर्पण से परावर्तित होकर अभिसारी किरणों के रूप में अधिक क्षेत्र में फैल सके और प्रकाश की तीव्रता बढ़ सके।
4. सर्चलाइट्स, मोटरकारों और रेलवे इंजनों में :- सर्चलाइट्स के लैंपों, मोटरकारों और रेलवे इंजनों में अवतल दर्पण का उपयोग परावर्तक के रूप में किया जाता है। इन लैंपों का फोकस मुख्य रूप से दर्पण के केंद्र पर होता है, जिससे परावर्तित प्रकाश समांतर किरणों के रूप में आगे बढ़ता है।
प्रश्न :- उत्तल दर्पण के उपयोगों के बारे में बताइए।
उत्तर :- उत्तल दर्पण के निम्नलिखित मुख्य उपयोग है :-
1. गली और बाजारों में लाइट्स के लिए :- उत्तल दर्पण का प्रयोग गली और बाजारों में लगे लाइट्स के ऊपर किया जाता है। इसमें प्रकाश दर्पण से परावर्तित होकर अपसारी (diverging) किरणों के रूप में फैलता है, जिससे प्रकाश अधिक क्षेत्र में वितरित हो जाता है।
2. मोटरकारों में :- उत्तल दर्पण मोटरकारों में ड्राइवर की सीट के पास भी लगाए जाते हैं। इन दर्पणों के माध्यम से ड्राइवर पीछे आ रहे वाहनों और व्यक्तियों के प्रतिबिंब को देख पाता है। उत्तल दर्पण द्वारा प्रतिबिंब छोटे और सीधे आकार में दिखाई देते हैं, इस कारण ये बड़े क्षेत्रों में फैली हुई वस्तुओं को दर्शाने में सक्षम होते हैं।
प्रश्न :- गोलीय दर्पण (Spherical Mirror) में सामान्यतः प्रयोग होने वाले शब्दो को लिखिए तथा उन्हें परिभाषित भी करें।
उत्तर :- गोलीय दर्पण (Spherical Mirror) में सामान्यतः प्रयोग होने वाले शब्द निम्नलिखित है :-
1. ध्रुव
2. वक्रता केंद्र
3. वक्रता त्रिज्या
4. मुख्य अक्ष
5. मुख्य फोकस
6. अवतल दर्पण का मुख्य फोकस
7. उत्तल दर्पण का मुख्य फोकस
8. फोकस दूरी
9. द्वारक
इन्हे निम्नलिखित तरीके से परिभाषित किया जाता है।
क्रमांक | शब्द | परिभाषा |
1. | ध्रुव (P) | गोलीय दर्पण का परावर्तक पृष्ठ का मध्य बिंदु ही दर्पण का ध्रुव होता है। यह दर्पण के पृष्ठ पर स्थित होता है। |
2. | वक्रता केंद्र (C) | गोलीय दर्पण का मध्य बिंदु, जहाँ से दर्पण की वक्रता उत्पन्न होती है, वक्रता केंद्र कहलाता है। |
3. | वक्रता त्रिज्या (R) | यह त्रिज्या उस वक्रता के केंद्र से दर्पण के ध्रुव तक की दूरी होती है। |
4. | मुख्य अक्ष | यह दर्पण का एक प्रमुख रेखा है जो ध्रुव से होकर वक्रता केंद्र से गुजरती है और दर्पण के केंद्र से भी जुड़ी होती है। यह दर्पण के पृष्ठ पर लंबवत होती है। |
5. | मुख्य फोकस | दर्पण का वह बिंदु जहाँ सभी परावर्तित रेखाएँ एक दूसरे से मिलती हैं। |
6. | अवतल दर्पण का मुख्य फोकस | अवतल दर्पण का मुख्य फोकस वह बिंदु होता है जहाँ परावर्तित रेखाएँ मुख्य अक्ष के परे एक दूसरे से मिलती हैं। |
7. | उत्तल दर्पण का मुख्य फोकस | उत्तल दर्पण का मुख्य फोकस वह बिंदु होता है जहाँ परावर्तित रेखाएँ मुख्य अक्ष पर एक बिंदु से मिलती हैं। |
8. | फोकस दूरी (F) | यह वह दूरी है जो मुख्य फोकस और दर्पण के ध्रुव के बीच होती है। इसे फोकल लेंथ भी कहते हैं। |
9. | द्वारक (MN) | यह एक स्थानिक रेखा है, जो किसी विशेष बिंदु से वस्तु की स्थिति का निर्धारण करती है। |
प्रश्न :- गोलीय दर्पणों में प्रतिबिंब निर्माण करने के नियमों को विस्तार से लिखिए।
उत्तर :- गोलीय दर्पणों में प्रतिबिंब निर्माण के निम्नलिखित नियम है :-
1. प्रकाश किरण का मुख्य अक्ष के समानांतर आना :- जब प्रकाश की किरण मुख्य अक्ष के समांतर गोलीय दर्पण पर पड़ती है, तो वह परावर्तित होकर मुख्य फोकस से होकर निकलती है ऐसा अवतल दर्पण में होता है, या मुख्य फोकस से आती हुई प्रतीत होती है ऐसा उत्तल दर्पण में होता है।
2. मुख्य फोकस से गुजरने वाली किरण :- यदि एक प्रकाश किरण मुख्य फोकस से दर्पण की ओर आती है जो कि अवतल दर्पण में होता है, या मुख्य फोकस की दिशा में जा रही होती है जो कि उत्तल दर्पण में होता है, तो वह परावर्तित होकर मुख्य अक्ष के ही समानांतर हो जाती है।
3. वक्रता केंद्र से गुजरने वाली किरण :- जब एक प्रकाश किरण वक्रता केंद्र से होकर जाती है अर्थात अवतल दर्पण में से, या वक्रता केंद्र की ओर आती है अर्थात उत्तल दर्पण में, तो वह परावर्तित होकर उसी मार्ग पर वापस लौट जाती है।
4. तिर्यक दिशा में आपतित किरण :- यदि प्रकाश की किरण मुख्य अक्ष से तिर्यक दिशा में दर्पण पर पड़ती है, तो वह उसी तिर्यक दिशा में परावर्तित हो जाती है। आपतन और परावर्तन की किरणें आपतन बिंदु पर मुख्य अक्ष के समान कोण का निर्माण करती हैं।
प्रश्न :- उत्तल दर्पण में प्रतिबिंब निर्माण करने के नियमों/विशेषताओं को लिखिए।
उत्तर :- उत्तल दर्पण में प्रतिबिंब निर्माण के निम्नलिखित नियम/विशेषताएँ है :-
1. प्रतिबिंब का निर्माण हमेशा दर्पण के पीछे होता है।
2. इसके प्रतिबिंब का निर्माण दर्पण के ध्रुव और फोकस के मध्य होता है।
3. इसका प्रतिबिंब सीधा और आभासी होता है।
4. उत्तल दर्पण का प्रतिबिंब वस्तु के आकार से छोटा होता है।
प्रश्न :- दर्पण के लिए चिन्ह परिपाटी के नियमों को समझाइए।
उत्तर :- दर्पण के लिए चिन्ह परिपाटी के निम्लिखित नियम है :-
तत्व | विवरण |
चिह्न परिपाटी | प्रकाश में दर्पण से वस्तु की दूरी (u), प्रतिबिंब की दूरी को (v) तथा फोकस दूरी को (f) चिह्न दिए जाते हैं। |
बिंब का स्थान | बिंब को हमेशा दर्पण के बाईं तरफ ही रखा जाता है। इसका मतलब है कि बिंब पर प्रकाश बाईं तरफ से आपतित होता है। |
दूरी मापने की विधि | सभी दूरी दर्पण के ध्रुव से मापी जाती हैं, जो मुख्य अक्ष के समांतर होती हैं। |
+x अक्ष (दाईं ओर) | यदि दूरी मूल बिंदु के दाईं ओर मापी जाती है तो उसे धनात्मक माना जाता है। |
-x अक्ष (बाईं ओर) | यदि दूरी मूल बिंदु के बाईं ओर मापी जाती है तो उसे ऋणात्मक माना जाता है। |
+y अक्ष (ऊपर की ओर) | यदि दूरी मुख्य अक्ष के लंबवत ऊपर की ओर मापी जाती है तो उसे धनात्मक माना जाता है। |
-y अक्ष (नीचे की ओर) | यदि दूरी मुख्य अक्ष के लंबवत नीचे की ओर मापी जाती है तो उसे ऋणात्मक माना जाता है। |
निष्कर्ष :-
नियम | विवरण |
बिंब की दूरी (u) | हमेशा ऋणात्मक होती है। |
अवतल दर्पण की फोकस दूरी | हमेशा ऋणात्मक होती है। |
उत्तल दर्पण की फोकस दूरी | हमेशा धनात्मक होती है। |
प्रश्न :- दर्पण का सूत्र लिखिए।
उत्तर :- दर्पण का सूत्र :- 1/f = 1/v + 1/u
यहाँ :-
f = दर्पण की फोकस लंबाई/दूरी (focal length)
v = प्रतिबिंब की दूरी (image distance)
u = वस्तु की दूरी (object distance)
प्रश्न :- गोलीय दर्पण द्वारा उत्पन्न आवर्धन क्या है, और इसे किस रूप में व्यक्त किया जाता है?
उत्तर :- गोलीय दर्पण द्वारा उत्पन्न आवर्धन :- वह माप है जो यह दर्शाता है कि गोलीय दर्पण द्वारा उत्पन्न प्रतिबिंब उसके बिंब के मुकाबले कितना गुना बड़ा होता है। इसे प्रतिबिंब और बिंब की ऊँचाई के अनुपात के रूप में दर्शाया जाता है।
आवर्धन (m) | अर्थ/व्याख्या |
m = h’/h | जहां, h’ = प्रतिबिंब की ऊँचाई, h = बिंब की ऊँचाई |
m > 1 | यदि h′ > h, तो प्रतिबिंब बिंब से बड़ा होता है |
m = 1 | यदि h′ = h, तो प्रतिबिंब का आकार बिंब के बराबर होता है |
m < 1 | यदि h′ < h, तो प्रतिबिंब बिंब से छोटा होता है |
m > 0 | यदि m धनात्मक है, तो प्रतिबिंब आभासी होता है |
m < 0 | यदि m ऋणात्मक है, तो प्रतिबिंब वास्तविक होता है |
नोट :-
1. समतल दर्पण :- इसका आवर्धन हमेशा +1 होता है। इसका मतलब है कि प्रतिबिंब का आकार बिंब के बराबर होता है और प्रतिबिंब आभासी होता है।
2. आवर्धन का संकेत :-
I. धनात्मक संकेत (m > 0) आभासी प्रतिबिंब को दर्शाता है।
II. ऋणात्मक संकेत (m < 0) वास्तविक प्रतिबिंब को दर्शाता है।
प्रश्न :- प्रकाश का अपवर्तन क्या है और यह कब होता है?
उत्तर :- प्रकाश का अपवर्तन :- वह प्रक्रिया है, जब प्रकाश एक माध्यम से तिरछा होकर दूसरे माध्यम में प्रवेश करता है, जिससे प्रकाश की दिशा में बदलाव हो जाता है। इसे प्रकाश अपवर्तन कहते हैं।
उदाहरण :-
1. स्विमिंग पूल का तल वास्तविक रूप से नीचे होता है, लेकिन अपवर्तन के कारण वह ऊपर दिखाई देता है।
2. जब पेंसिल पानी में कुछ हिस्से तक डूबी होती है, तो वह पानी और हवा के अंतरफलक पर मुड़ी हुई दिखाई देती है।
3. काँच के गिलास में रखा नीबू, असल आकार से बड़ा प्रतीत होता है।
4. जब हम कागज पर लिखे शब्दों को गिलास स्लैब से देखते हैं, तो वे ऊपर उठे हुए दिखाई देते हैं।
प्रश्न :- प्रकाश के अपवर्तन के दो नियम कौन कौन से है।
उत्तर :- प्रकाश के अपवर्तन के दो नियम निम्नलिखित है :-
1. जब प्रकाश की किरण एक माध्यम से दूसरे में प्रवेश करती है, तो आपतित किरण, अपवर्तित किरण, और दोनों माध्यमों को अलग करने वाला पृष्ठ, इन तीनों का मिलन बिंदु एक ही तल में स्थित होता है।
2. किसी विशिष्ट रंग के प्रकाश और एक निश्चित माध्यम के संयोजन के लिए, आपतन कोण और अपवर्तन कोण के ज्या (sine) का अनुपात हमेशा स्थिर रहता है। इसे स्नेल के नियम के नाम से भी जाना जाता है।
प्रश्न :- अपवर्तनांक का क्या अर्थ है, और इसे कैसे व्यक्त किया जाता है?
उत्तर :- अपवर्तनांक :- किसी विशेष माध्यम के युग्म में प्रकाश की दिशा में परिवर्तन की मात्रा को अपवर्तनांक के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।
प्रश्न :- निरपेक्ष अपवर्तनांक क्या होता है, और इसे कैसे व्यक्त किया जाता है?
उत्तर :- निरपेक्ष अपवर्तनांक :- जब माध्यम-1 निर्वात अथवा वायु होता है, तब माध्यम-2 का अपवर्तनांक निर्वात के संदर्भ में मापा जाता है। इसे निरपेक्ष अपवर्तनांक कहा जाता है।
N = c/v
(जहां c निर्वात में प्रकाश की गति और v माध्यम में प्रकाश की गति है)
नोट :-
हीरे का अपवर्तनांक सबसे ज्यादा होता है, जो कि 2.42 है। इसका मतलब है कि हीरे में प्रकाश की गति, निर्वात की तुलना में 1/2.42 गुना कम होती है।
प्रश्न :- प्रकाशिक सघनता क्या होती है, और इसे किस प्रकार से मापा जाता है?
उत्तर :- प्रकाशिक सघनता :- जब दो माध्यमों की तुलना की जाती है, तो वह माध्यम जिसमें अधिक अपवर्तनांक होता है, वह दूसरे की तुलना में अधिक प्रकाशिक सघन माना जाता है।
उदाहरण :-
जब प्रकाश की किरण किसी विरल माध्यम से होते हुए सघन माध्यम में प्रवेश करती है, तो उसकी गति धीमी हो जाती है और वह अभिलंब की तरफ मुड़ जाती है।
प्रश्न :- प्रकाशिक विरल माध्यम क्या होता है, और इसे किस प्रकार पहचाना जाता है?
उत्तर :- प्रकाशिक विरल माध्यम :- जब दो माध्यमों की तुलना की जाती है, तो वह माध्यम जिसका अपवर्तनांक कम होता है, उसे प्रकाशिक विरल माध्यम कहा जाता है।
उदाहरण :-
जब प्रकाश की किरण किसी सघन माध्यम से होते हुए विरल माध्यम में प्रवेश करती है, तो उसकी गति तेज हो जाती है और वह अभिलंब से दूर हो जाती है।
प्रश्न :- लेंस क्या होता है, और लेंस कितने प्रकार के होते है?
उत्तर :- लेंस :- एक पारदर्शी माध्यम जो दो तलों से घिरा हुआ हो, और जिसमें से एक या दोनों तले गोलाकार हों उसे लेंस कहा जाता है।
लेंस दो प्रकार के होते है :-
1. उत्तल लेंस
2. अवतल लेंस
प्रश्न :- उत्तल लेंस क्या होता है,उत्तल लेंस प्रकाश की किरणों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करता है?
उत्तर :- उत्तल लेंस :- वह लेंस होता है, जिसका मध्य हिस्सा मोटा और किनारे पतले होते हैं, और इसके दोनों पृष्ठों की वक्रता की त्रिज्या समान होती है। यह लेंस प्रकाश की किरणों को एक बिंदु पर एकत्रित (अभिसारित) करता है, इसलिए इसे अभिसारी लेंस भी कहा जाता है।
प्रश्न :- अवतल लेंस क्या होता है, अवतल लेंस प्रकाश की किरणों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करता है?
उत्तर :- अवतल लेंस :- वह लेंस होता है, जिसका मध्य हिस्सा पतला और किनारे मोटे होते हैं। आमतौर पर इसके दोनों पृष्ठों की वक्रता की त्रिज्याएँ समान होती हैं। यह लेंस प्रकाश की किरणों को एक दूसरे से दूर (अपसारित) करता है, इसलिए इसे अपसारी लेंस भी कहा जाता है।
प्रश्न :- लेंस में सामान्यतः प्रयोग होने वाले शब्दो को लिखिए तथा उन्हें परिभाषित भी करें।
उत्तर :- लेंस में सामान्यतः प्रयोग होने वाले शब्द निम्नलिखित है :-
1. ध्रुव
2. वक्रता केंद्र
3. वक्रता त्रिज्या
4. मुख्य अक्ष
5. मुख्य फोकस
6. अवतल दर्पण का मुख्य फोकस
7. उत्तल दर्पण का मुख्य फोकस
8. फोकस दूरी
9. द्वारक
इन्हे निम्नलिखित तरीके से परिभाषित किया जाता है।
क्रमांक | शब्द | परिभाषा |
1. | वक्रता केंद्र (C) | किसी लेंस में, चाहे वह उत्तल हो या अवतल, दोनों पृष्ठों के केंद्रों को वक्रता केंद्र कहते हैं। ये केंद्र उस गोले के केंद्र होते हैं जिससे लेंस का पृष्ठ बनता है। |
2. | मुख्य अक्ष | वह काल्पनिक तथा सीधी रेखा जो लेंस के दोनों वक्रता केंद्रों से गुजरती है, उसे लेंस की मुख्य अक्ष कहा जाता है। |
3. | प्रकाशिक केंद्र (O) | लेंस का केंद्रीय बिंदु को ही प्रकाशिक केंद्र कहते है। इस बिंदु से गुजरने वाली प्रकाश किरणें बिना किसी विचलन के निकलती हैं। इसे अक्सर अक्षर से निरूपित किया जाता है। |
4. | द्वारक | द्वारक, एक गोलीय लेंस की वृत्ताकार रूपरेखा के प्रभावी व्यास को कहते है। |
5. | पतले लेंस | वे लेंस जिनका द्वारक उनकी वक्रता त्रिज्या की अपेक्षा बहुत छोटा होता है तथा जिनमें दोनों वक्रता केंद्र प्रकाशिक केंद्र से एक समान दूरी पर स्थित होते हैं। ऐसे लेंस को छोटे द्वारक वाले पतले लेंस कहा जाता है। |
6. | उत्तल लेंस का मुख्य फोकस | उत्तल लेंस पर जब मुख्य अक्ष के समानांतर प्रकाश की कई किरणें लेंस पर आती हैं, तो अपवर्तन के बाद ये किरणें मुख्य अक्ष पर एक बिंदु पर एकत्रित (अभिसारित) हो जाती हैं। इस बिंदु को उत्तल लेंस का मुख्य फोकस कहा जाता है। |
7. | अवतल लेंस का मुख्य फोकस | अवतल लेंस पर जब मुख्य अक्ष के समांतर प्रकाश की कई किरणें गिरती हैं, तो लेंस से अपवर्तन के बाद ये किरणें मुख्य अक्ष के एक बिंदु से फैलती (अपसरित) हुई प्रतीत होती हैं। इस बिंदु को मुख्य अक्ष पर अवतल लेंस का मुख्य फोकस कहलाता है। |
8. | फोकस दूरी (f) | लेंस के मुख्य फोकस से प्रकाशिक केंद्र तक की दूरी को फोकस दूरी कहते है। |
प्रश्न :- लेंस में प्रतिबिंब निर्माण करने के नियमों को विस्तार से लिखिए।
उत्तर :- लेंस में प्रतिबिंब निर्माण के निम्नलिखित नियम है :-
1. उत्तल लेंस में वह किरण जो प्रथम फोकस से होकर जाती है, लेंस से निकलने के बाद मुख्य अक्ष के समानांतर हो जाती है। वहीं, अवतल लेंस में वह किरण जो प्रथम फोकस की ओर जाती हुई प्रतीत होती है, लेंस से निकलने के बाद मुख्य अक्ष के समानांतर हो जाती है।
2. जब लेंस के मुख्य अक्ष के समानांतर कोई किरण लेंस से निकलती है, तो उत्तल लेंस में वह द्वितीय फोकस से होकर जाती है, जबकि अवतल लेंस में वह द्वितीय फोकस से आती हुई प्रतीत होती है।
3. लेंस के प्रकाशीय केंद्र से गुजरने वाली किरण अपवर्तन के बाद बिना किसी विचलन के सीधी रेखा में आगे बढ़ जाती है।
प्रश्न :- लेंस के लिए चिन्ह परिपाटी के नियमों को समझाइए।
उत्तर :- लेंस के लिए चिन्ह परिपाटी के नियम भी दर्पण की तरह होते हैं जो कि निम्नलिखित है :-
विषय | विवरण |
किरण आरेख (Ray Diagram) | लेंस पर प्रकाश की किरणें हमेशा बाईं ओर से आती हैं। |
दूरी माप (Distance Measurement) | सभी दूरियाँ प्रकाशिक केंद्र (Optical Center) से मुख्य अक्ष (Principal Axis) के साथ मापी जाती हैं। |
धनात्मक और ऋणात्मक दिशाएँ (Positive and Negative Directions) | आपतित किरण की दिशा में मापी गई दूरियाँ धनात्मक होती हैं और आपतित किरण के विपरीत दिशा में मापी गई दूरियाँ ऋणात्मक होती हैं। |
फोकस की दूरी (Focal Length) | – उत्तल लेंस (Convex Lens) की फोकस दूरी धनात्मक होती है। – अवतल लेंस (Concave Lens) की फोकस दूरी ऋणात्मक होती है। |
वस्तु और प्रतिबिंब की लंबाई (Object and Image Height) | – मुख्य अक्ष के ऊपर स्थित वस्तु और प्रतिबिंब की लंबाई धनात्मक होती है। – मुख्य अक्ष के नीचे स्थित वस्तु और प्रतिबिंब की लंबाई ऋणात्मक होती है। |
प्रश्न :- लेंस का सूत्र लिखिए।
उत्तर :- लेंस का सूत्र :- 1/f = 1/v – 1/u
यहाँ :-
f = लेंस की फोकस लंबाई/दूरी (focal length)
v = प्रतिबिंब की दूरी (image distance)
u = वस्तु की दूरी (object distance)
प्रश्न :- लेंस द्वारा उत्पन्न आवर्धन क्या है, और इसे किस रूप में व्यक्त किया जाता है?
उत्तर :- किसी लेंस के माध्यम से उत्पन्न आवर्धन को, गोलीय दर्पण के आवर्धन के समान ही, प्रतिबिंब की ऊँचाई और वस्तु की ऊँचाई के अनुपात के रूप में व्यक्त किया जाता है।
परिभाषा | सूत्र | विवरण |
आवर्धन (m) | m = h’/h | आवर्धन को लेंस द्वारा बनाए गए प्रतिबिंब की ऊँचाई (h’) और वस्तु की ऊँचाई (h) के अनुपात के रूप में व्यक्त किया जाता है। |
आवर्धन (m) | m = v/u | यहाँ v और u क्रमशः बिंब और वस्तु की दूरी हैं। |
अन्य रूप (m) | hi/ho = v/u | यह भी आवर्धन के परिभाषा का रूप है, जिसमें hi और ho बिंब और वस्तु की ऊँचाई का प्रतीक हैं। |
प्रश्न :- किसी लेंस की क्षमता को किस प्रकार परिभाषित किया जाता है और यह लेंस की फोकस दूरी से किस प्रकार संबंधित होती है?
उत्तर :- लेंस द्वारा प्रकाश की किरणों को एकत्रित (अभिसरण) या फैलाने (अपसरण) की क्षमता को उसकी क्षमता कहा जाता है। लेंस की क्षमता का मान उसकी फोकस दूरी के विपरीत (व्युत्क्रम) के रूप में व्यक्त किया जाता है।
सिद्धांत | विवरण |
लेंस की क्षमता का सूत्र | P = 1/f (यहां P लेंस की क्षमता और f लेंस की फोकस दूरी है) |
लेंस की क्षमता का मात्रक | डाइऑप्टर (D) |
डाइऑप्टर का अर्थ | 1 डाइऑप्टर (D) उस लेंस की क्षमता है जिसकी फोकस दूरी 1 मीटर हो। |
उत्तल लेंस की क्षमता | धनात्मक (Positive) |
अवतल लेंस की क्षमता | ऋणात्मक (Negative) |
नोट :-
कई प्रकाशिक यंत्रों में एक से अधिक लेंस लगे होते हैं, जिन्हें प्रतिबिंब को अधिक स्पष्ट और बड़ा दिखाने के लिए एक साथ जोड़ा जाता है। जब लेंस आपस में संपर्क में होते हैं, तो उनकी कुल क्षमता (P) उन सभी लेंसों की अलग-अलग क्षमताओं का बीजगणितीय योग होती है।
उदाहरण :- P = P₁ + P₂ + P₃ + …