Class 10 geography Notes in hindI Chapter - 6
Chapter 6: विनिर्माण उद्योग / Manufacturing Industries
Chapter Introduction:
इस अध्याय में आप विनिर्माण उद्योगों के महत्व तथा भारत के औद्योगिक विकास के बारे में समझेंगे। साथ ही विभिन्न प्रकार के उद्योगों, उनकी अवस्थिति, औद्योगिक प्रदूषण तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी महत्वपूर्ण अवधारणाओं को सरल भाषा में पढ़ेंगे।
नीचे अध्याय 6 विनिर्माण उद्योग के सभी महत्वपूर्ण topics को सरल भाषा में विस्तार से समझाया गया है जो NCERT syllabus पर आधारित हैं, तथा बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
CLASS 10 GEOGRAPHY NOTES IN HINDI
CHAPTER 6 : विनिर्माण उद्योग
DETAILS | INFORMATION |
Textbook | NCERT |
Class | Class 10 |
Subject | Geography |
Chapter | Chapter 6 |
Chapter Name | विनिर्माण उद्योग |
Medium | Hindi |
क्या आप Class 10 Geography Chapter 6 Notes in Hindi ढूँढ रहे हैं?
यहाँ आपको विनिर्माण उद्योग अध्याय के आसान और सरल नोट्स मिलेंगे। इस अध्याय में आप औद्योगिक विकास, उद्योगों के प्रकार, औद्योगिक अवस्थिति तथा भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों के योगदान के बारे में विस्तार से समझेंगे।
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
6.1 विनिर्माण का महत्व क्या है?
6.2 राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों का क्या योगदान है?
6.3 औद्योगिक अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं?
6.4 कृषि आधारित उद्योग क्या हैं?
6.5 खनिज आधारित उद्योग क्या हैं?
6.5.1 लोहा तथा इस्पात उद्योग क्या है?
6.5.2 एल्यूमिनियम प्रगलन (Smelting) उद्योग क्या है?
6.6 रसायन उद्योग क्या है?
6.7 उर्वरक उद्योग क्या है?
6.8 सीमेंट उद्योग क्या है?
6.9 मोटरगाड़ी उद्योग क्या है?
6.10 सूचना प्रौद्योगिकी तथा इलेक्ट्रॉनिक उद्योग क्या हैं?
6.11 औद्योगिक प्रदूषण तथा पर्यावरण निम्नीकरण क्या है?
6.12 पर्यावरणीय निम्नीकरण की रोकथाम कैसे की जा सकती है?
Chapter Summary
इस अध्याय में आप विनिर्माण उद्योगों के महत्व तथा उनके आर्थिक विकास में योगदान के बारे में समझेंगे। आप जानेंगे कि विनिर्माण उद्योग कच्चे माल को उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करते हैं और किसी भी देश की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आप राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों के योगदान के बारे में पढ़ेंगे। उद्योग रोजगार के अवसर प्रदान करते हैं, कृषि के विकास में सहायता करते हैं तथा देश की आय और निर्यात को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इस अध्याय में आप औद्योगिक अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारकों जैसे कच्चा माल, श्रम, पूँजी, ऊर्जा, परिवहन तथा बाजार के महत्व को समझेंगे। उद्योगों का स्थान इन कारकों के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
आप विभिन्न प्रकार के उद्योगों के बारे में भी जानेंगे, जिनमें कृषि आधारित उद्योग, खनिज आधारित उद्योग, लोहा एवं इस्पात उद्योग, एल्यूमिनियम प्रगलन उद्योग, रसायन उद्योग, उर्वरक उद्योग, सीमेंट उद्योग तथा मोटरगाड़ी उद्योग शामिल हैं।
अध्याय में सूचना प्रौद्योगिकी तथा इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों के बढ़ते महत्व को भी समझाया गया है। ये उद्योग आधुनिक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं और भारत के सेवा क्षेत्र के विकास में योगदान देते हैं।
आप औद्योगिक प्रदूषण तथा पर्यावरण निम्नीकरण के कारणों और प्रभावों के बारे में भी पढ़ेंगे। उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट वायु, जल, भूमि तथा ध्वनि प्रदूषण का कारण बन सकते हैं।
अंत में आप पर्यावरण संरक्षण के उपायों के बारे में समझेंगे। स्वच्छ तकनीकों का उपयोग, अपशिष्ट प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण तथा पर्यावरण-अनुकूल औद्योगिक विकास सतत विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
6.1 विनिर्माण का महत्व क्या है?
विनिर्माण क्या है :-
विनिर्माण :- मशीनों की सहायता से किया जाने वाला उत्पादन विनिर्माण कहलाता है। इसमें कच्चे माल को बदलकर अधिक मूल्यवान वस्तुएँ तैयार की जाती हैं। विनिर्माण प्रक्रिया बड़े पैमाने पर की जाती है।
उदाहरण :-
कपास से कपड़ा बनाना और लौह अयस्क से इस्पात बनाना विनिर्माण के उदाहरण हैं।
विनिर्माण उद्योगों का महत्व क्या है :-
विनिर्माण उद्योगों का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होता है :-
1. यह कृषि के आधुनिकीकरण में सहायता करता है।
2. लोगों की आजीविका के लिए कृषि पर निर्भरता कम होती है।
3. प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।
4. बेरोजगारी और गरीबी को कम करने में मदद मिलती है।
5. निर्मित वस्तुओं के निर्यात से व्यापार बढ़ता है और विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
6. बड़े पैमाने पर विनिर्माण से देश की आर्थिक समृद्धि बढ़ती है।
उदाहरण :-
भारत में कपड़ा, इस्पात और ऑटोमोबाइल उद्योगों के विकास से रोजगार बढ़ा है और निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई है।
6.2 राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों का क्या योगदान है?
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों (विशेषकर विनिर्माण उद्योग) का क्या योगदान है :-
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों का योगदान निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होता है :-
1. पिछले दो दशकों में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में उद्योगों का कुल योगदान लगभग 27% रहा है।
2. इसमें से केवल 17% योगदान विनिर्माण उद्योगों का है।
3. शेष 10% योगदान खनन, गैस और विद्युत ऊर्जा क्षेत्र से प्राप्त होता है।
4. भारत की तुलना में पूर्वी एशियाई देशों में विनिर्माण उद्योग का योगदान GDP का 25% से 35% तक है।
5. पिछले एक दशक में भारत के विनिर्माण क्षेत्र में लगभग 7% प्रतिवर्ष की दर से वृद्धि हुई है।
6. आने वाले दशक में इस वृद्धि दर के 12% तक पहुँचने की संभावना है।
7. वर्ष 2003 के बाद से विनिर्माण क्षेत्र का विकास 9–10% प्रतिवर्ष की दर से हुआ है।
उदाहरण :-
चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में विनिर्माण उद्योग का GDP में अधिक योगदान होने के कारण उनकी अर्थव्यवस्था भारत की तुलना में अधिक मजबूत मानी जाती है।
विदेशी विनिमय क्या है :-
विदेशी विनिमय : – जब किसी एक देश की मुद्रा को दूसरे देश की मुद्रा के बदले विनिमय किया जाता है, तो इस प्रक्रिया को विदेशी विनिमय कहा जाता है।
विदेशी विनिमय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. इसमें विभिन्न देशों की मुद्राओं का आपसी आदान-प्रदान होता है।
2. यह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और लेन-देन के लिए आवश्यक है।
3. आयात और निर्यात को सुचारु रूप से संचालित करता है।
4. देशों के आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ बनाता है।
उदाहरण :-
यदि भारत में अमेरिकी डॉलर को भारतीय रुपये में बदला जाए, तो यह विदेशी विनिमय का उदाहरण है।
विदेशी मुद्रा क्या है :-
विदेशी मुद्रा :- विदेशी मुद्रा वह माध्यम है जिसके द्वारा कोई देश या उसकी सरकार अन्य देशों से वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय करती है।
विदेशी मुद्रा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. यह दूसरे देशों द्वारा जारी की गई मुद्रा होती है।
2. इसका उपयोग अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में किया जाता है।
3. आयात और निर्यात के भुगतान में सहायक होती है।
4. किसी देश की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती है।
उदाहरण :-
अमेरिकी डॉलर, यूरो और पाउंड स्टर्लिंग भारत के लिए विदेशी मुद्रा के उदाहरण हैं।
उद्योग क्या है :-
उद्योग :- विनिर्माण की प्रक्रिया जब बड़े पैमाने पर और व्यवस्थित रूप से की जाती है, तो उसका विस्तृत रूप उद्योग कहलाता है।
उद्योग की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. इसमें कच्चे माल को मशीनों द्वारा उपयोगी वस्तुओं में बदला जाता है।
2. उत्पादन बड़े स्तर पर किया जाता है।
3. इसमें पूँजी, श्रम और तकनीक का संयुक्त उपयोग होता है।
4. यह देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उदाहरण :-
कपड़ा उद्योग, इस्पात उद्योग और सीमेंट उद्योग उद्योग के प्रमुख उदाहरण हैं।
6.3 औद्योगिक अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं?
उद्योग की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले दो मुख्य कारक कौन-से हैं :-
उद्योग की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले दो प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं :-
1. भौतिक कारक (Physical Factors)
2. मानवीय कारक (Human Factors)
उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले भौतिक कारक कौन-कौन से हैं :-
भौतिक कारक :- ये प्राकृतिक या भौतिक परिस्थितियाँ हैं जो किसी उद्योग को किसी विशेष स्थान पर स्थापित करने में सहायता करती हैं।
उद्योगों की अवस्थिति के प्रमुख भौतिक कारक निम्नलिखित हैं :-
1. अनुकूल जलवायु :- ऐसी जलवायु जहाँ अत्यधिक गर्मी या ठंड न हो, वहाँ श्रमिकों की कार्यक्षमता बढ़ती है और उत्पादन सुचारु रहता है।
2. शक्ति के साधन :- उद्योगों के संचालन के लिए कोयला, विद्युत, पेट्रोलियम आदि ऊर्जा स्रोतों की उपलब्धता आवश्यक होती है।
3. कच्चे माल की उपलब्धता :- जहाँ कच्चा माल आसानी से और सस्ते में उपलब्ध हो, वहाँ उद्योग स्थापित करना अधिक लाभकारी होता है।
उदाहरण :-
झारखंड और ओडिशा में लौह अयस्क और कोयले की उपलब्धता के कारण वहाँ इस्पात उद्योग विकसित हुआ है।
उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले मानवीय कारक कौन-कौन से हैं :-
मानवीय कारक :- ये कारक मानव गतिविधियों और सुविधाओं से संबंधित हैं।
उद्योगों की अवस्थिति के प्रमुख मानवीय कारक निम्नलिखित हैं :-
1. श्रम – कुशल व अकुशल श्रमिकों की उपलब्धता उद्योगों की स्थापना को प्रभावित करती है।
2. पूँजी – उद्योग लगाने के लिए धन की आवश्यकता होती है।
3. बाज़ार – उत्पादित वस्तुओं की बिक्री के लिए उपयुक्त बाज़ार का होना आवश्यक है।
4. परिवहन और संचार – कच्चा माल लाने और तैयार माल भेजने में सहायक होते हैं।
5. बैंकिंग और बीमा सुविधाएँ – उद्योगों को वित्तीय सुरक्षा और ऋण प्रदान करती हैं।
6. आधारिक संरचना – बिजली, जल, सड़क और औद्योगिक क्षेत्र जैसी सुविधाएँ।
7. उद्यमी – उद्योग स्थापित करने की पहल और जोखिम उठाने वाला व्यक्ति।
8. सरकारी नीतियाँ – कर, सब्सिडी, लाइसेंस और औद्योगिक नीतियाँ उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करती हैं।
उदाहरण :-
मुंबई और अहमदाबाद में कपड़ा उद्योग की स्थापना वहाँ श्रम, पूँजी, परिवहन और बाज़ार की उपलब्धता के कारण हुई।
उद्योगों का वर्गीकरण कैसे किया जाता है :-
उद्योगों का वर्गीकरण :- उद्योगों को उनकी विशेषताओं और आधारों के अनुसार विभिन्न प्रकारों में बांटा जा सकता है।
उद्योगों के वर्गीकरण के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं :-
1. प्रयुक्त कच्चे माल के स्रोत के आधार पर – उद्योग इस बात पर आधारित होते हैं कि वे स्थानीय या आयातित कच्चा माल इस्तेमाल करते हैं।
2. प्रमुख भूमिका के आधार पर – उद्योग आवश्यक वस्तुएँ या विलासिता की वस्तुएँ बनाते हैं।
3. पूँजी निवेश के आधार पर – उद्योग का आकार और पूँजी निवेश उसके प्रकार को निर्धारित करता है (छोटे, मध्यम या बड़े उद्योग)।
4. स्वामित्व के आधार पर – उद्योग सरकारी, निजी या सहकारी स्वामित्व में हो सकते हैं।
5. कच्चे तथा तैयार माल की मात्रा व भार के आधार पर – उद्योग इस बात पर आधारित होते हैं कि कच्चा माल भारी है या हल्का, तैयार माल का वजन कितना है।
उदाहरण :-
1. स्टील उद्योग भारी कच्चे माल पर आधारित है।
2. कपड़ा उद्योग हल्के कच्चे माल (सूती कपास) पर आधारित है।
3. सरकारी स्वामित्व वाला रेल्वे इंजन निर्माण उद्योग।
प्रयुक्त कच्चे माल के स्रोत के आधार पर उद्योग कौन-कौन से होते हैं :-
प्रयुक्त कच्चे माल के आधार पर उद्योग :- उद्योगों को उनके कच्चे माल के स्रोत के आधार पर दो प्रमुख प्रकारों में बांटा जा सकता है।
1. कृषि आधारित उद्योग :- ये उद्योग कृषि उत्पादों से निर्मित होते हैं।
उदाहरण :-
सूती वस्त्र उद्योग, ऊनी वस्त्र उद्योग, रेशम वस्त्र उद्योग, पटसन उद्योग, चाय और काफी उद्योग, चीनी उद्योग, वनस्पति तेल उद्योग, रबर उद्योग
2. खनिज आधारित उद्योग – ये उद्योग खनिजों और खनिज-derived कच्चे माल पर आधारित होते हैं।
उदाहरण :-
लोहा तथा इस्पात उद्योग, सीमेंट उद्योग, एल्यूमिनियम उद्योग, मशीन उद्योग, औज़ार उद्योग, पेट्रो-रासायन उद्योग
उदाहरण :-
1. कोलकाता में सूती वस्त्र उद्योग कृषि आधारित है।
2. भिलाई का इस्पात उद्योग खनिज आधारित उद्योग है।
प्रमुख भूमिका के आधार पर उद्योग कौन-कौन से होते हैं :-
प्रमुख भूमिका के आधार पर उद्योग :- उद्योगों को उनकी देश की अर्थव्यवस्था और अन्य उद्योगों पर प्रभाव के आधार पर दो प्रकारों में बाँटा जा सकता है।
1. आधारभूत उद्योग :- ये उद्योग अन्य उद्योगों के लिए कच्चा माल या उत्पादन उपलब्ध कराते हैं।
उदाहरण :-
लोहा और इस्पात उद्योग, ताँबा प्रगलन उद्योग, एल्यूमिनियम प्रगलन उद्योग
2. उपभोक्ता उद्योग – ये उद्योग ऐसे उत्पाद तैयार करते हैं जो सीधे उपभोक्ताओं के उपयोग में आते हैं।
उदाहरण :-
चीनी उद्योग, दंतमंजन उद्योग, कागज उद्योग, पंखा उद्योग, सिलाई मशीन उद्योग
उदाहरण :-
1. भिलाई इस्पात उद्योग आधारभूत उद्योग का उदाहरण है।
2. पुणे का दंतमंजन उद्योग उपभोक्ता उद्योग का उदाहरण है।
पूँजी निवेश के आधार पर उद्योग कौन-कौन से होते हैं :-
पूँजी निवेश के आधार पर उद्योग :- उद्योगों को उनके पूँजी निवेश की मात्रा के आधार पर दो प्रकारों में बाँटा जा सकता है।
1. लघु उद्योग :- जिन उद्योगों में एक करोड़ रुपए तक की पूँजी का निवेश होता है, उन्हें लघु उद्योग कहा जाता है। ये उद्योग अक्सर स्थानीय मांग और कुटीर उद्योगों पर आधारित होते हैं।
2. बृहत उद्योग :- जिन उद्योगों में एक करोड़ रुपए से अधिक की पूँजी का निवेश होता है, उन्हें बृहत उद्योग कहा जाता है। ये उद्योग देश के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन करते हैं और भारी निवेश की मांग करते हैं।
उदाहरण :-
1. एक छोटे शहर में सिलाई मशीन निर्माण इकाई – लघु उद्योग।
2. भिलाई का इस्पात उद्योग – बृहत उद्योग।
स्वामित्व के आधार पर उद्योग कौन-कौन से होते हैं :-
स्वामित्व के आधार पर उद्योग :- उद्योगों को उनके स्वामित्व और संचालन के आधार पर चार प्रमुख प्रकारों में बांटा जा सकता है।
1. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग :- ये उद्योग सरकार के स्वामित्व और प्रत्यक्ष नियंत्रण में होते हैं।
उदाहरण :-
SAIL, BHEL, GAIL
2. निजी क्षेत्र के उद्योग :- ये उद्योग एक व्यक्ति या समूह के स्वामित्व में होते हैं और उनके द्वारा संचालित किए जाते हैं।
उदाहरण :-
TISCO, बजाज ऑटो लिमिटेड, डाबर उद्योग
3. संयुक्त उद्योग :- ये उद्योग राज्य सरकार और निजी क्षेत्र के संयुक्त प्रयास से चलाए जाते हैं।
उदाहरण :-
ऑयल इंडिया लिमिटेड
4. सहकारी उद्योग :- इनका स्वामित्व कच्चे माल के उत्पादक, श्रमिक या दोनों के हाथ में होता है। लाभ और हानि का वितरण अनुपातिक रूप से किया जाता है।
उदाहरण :-
कच्चे तथा तैयार माल की मात्रा व भार के आधार पर उद्योग कौन-कौन से होते हैं :-
कच्चे तथा तैयार माल की मात्रा व भार के आधार पर उद्योग :- उद्योगों को उनके कच्चे माल और तैयार माल के वजन व आकार के आधार पर दो प्रकारों में बांटा जा सकता है।
1. भारी उद्योग :- ये उद्योग अधिक स्थान घेरने वाले और भारी कच्चे माल का प्रयोग करते हैं।
उदाहरण :-
लोहा और इस्पात उद्योग, चीनी उद्योग, सीमेंट उद्योग
2. हल्के उद्योग :- ये उद्योग कम भार वाले कच्चे माल का प्रयोग करके हल्के तैयार माल का उत्पादन करते हैं।
उदाहरण :-
1. विद्युतीय उद्योग
2. सिलाई मशीन उद्योग
6.4 कृषि आधारित उद्योग क्या हैं?
कृषि आधारित उद्योग क्या हैं :-
कृषि आधारित उद्योग :- कृषि उत्पादों को उपयोगी औद्योगिक वस्तुओं में परिवर्तित करने वाले उद्योगों को कृषि आधारित उद्योग कहा जाता है।
कृषि आधारित उद्योग की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. ये उद्योग कृषि उत्पादों पर निर्भर होते हैं।
2. उत्पादन के लिए मुख्य रूप से कच्चा माल कृषि से प्राप्त होता है।
3. ये उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों के लिए रोजगार प्रदान करते हैं।
उदाहरण :-
सूती वस्त्र उद्योग, पटसन उद्योग, रेशम और ऊनी वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योग, वनस्पति तेल उद्योग
वस्त्र उद्योग का भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्त्व क्या है :-
वस्त्र उद्योग :- भारतीय अर्थव्यवस्था में वस्त्र उद्योग का विशेष स्थान है क्योंकि यह औद्योगिक उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
वस्त्र उद्योग की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. यह कच्चे माल से उच्चतम मूल्य वाले उत्पाद तक की पूरी श्रृंखला में सक्षम है।
2. यह आत्मनिर्भर उद्योग है और देश की आर्थिक मजबूती में योगदान करता है।
3. उत्पादन और रोजगार के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण है।
4. यह कृषि और उद्योग दोनों को जोड़ता है, क्योंकि सूती और ऊनी कच्चा माल किसानों से आता है।
उदाहरण :-
भारत का सूती वस्त्र उद्योग और रेशम उद्योग वस्त्र उद्योग के प्रमुख उदाहरण हैं।
सूती कपड़ा उद्योग का इतिहास और अवस्थिति क्यों हुई :-
सूती कपड़ा उद्योग :- सूती कपड़ा उद्योग भारत का प्रमुख औद्योगिक उद्योग है, जिसका विकास और अवस्थिति कई कारकों पर निर्भर है।
सूती कपड़ा उद्योग प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. पहला सूती वस्त्र उद्योग 1854 में मुंबई में स्थापित हुआ।
2. महात्मा गांधी ने चरखा और खादी पहनावे को बढ़ावा दिया, जिससे बुनकरों को रोजगार मिला।
3. आरंभिक वर्षों में उद्योग महाराष्ट्र और गुजरात के कपास केन्द्रों तक सीमित था।
उद्योग की अवस्थिति में कारक :- कपास की उपलब्धता, बाज़ार की निकटता, परिवहन की सुविधा, पत्तन और बंदरगाहों की समीपता, कुशल श्रमिकों की उपलब्धता, नमीयुक्त जलवायु
1. कताई कार्य मुख्यतः महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु में केंद्रित है।
2. सूती, रेशम, ज़री, कशीदाकारी में बुनाई का परंपरागत कौशल और डिज़ाइन बनाए रखने के लिए बुनाई अत्यधिक विकेन्द्रीकृत है।
उदाहरण :-
1. मुंबई का प्रथम सूती कपड़ा मिल
2. तमिलनाडु के कांचीपुरम रेशम और ज़री उद्योग
भारत में सूती वस्त्र उद्योग के सामने मुख्य समस्याएँ क्या हैं :-
सूती वस्त्र उद्योग की समस्याएँ :- भारत में सूती वस्त्र उद्योग को कई अवरोधों और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
सूती वस्त्र उद्योग की मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं :-
1. पुरानी और परंपरागत तकनीक – आधुनिक मशीनों का अभाव होने से उत्पादन धीमा और कम गुणवत्ता वाला होता है।
2. लंबे रेशे वाली कपास की कम पैदावार – उच्च गुणवत्ता वाले सूती वस्त्र बनाने में बाधा।
3. नई मशीनरी का अभाव – उत्पादन बढ़ाने और लागत घटाने में कठिनाई।
4. कृत्रिम वस्त्र उद्योग से प्रतिस्पर्धा – नई फैब्रिक और सस्ते वस्त्र बाजार में चुनौती बनते हैं।
5. अनियमित बिजली की आपूर्ति – मशीनों के सुचारू संचालन में बाधा।
उदाहरण :-
महाराष्ट्र और गुजरात के सूती वस्त्र उद्योग पुरानी तकनीक और बिजली की समस्या के कारण वैश्विक बाजार में पिछड़ रहे हैं।
कपास उद्योग की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं :-
कपास उद्योग की समस्याएँ :- कपास उद्योग को उत्पादन और प्रतिस्पर्धा के दृष्टिकोण से कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
कपास उद्योग की मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं :-
1. बिजली की अनियमित आपूर्ति – मशीनों के सुचारू संचालन में बाधा।
2. मशीनरी को उन्नत करने की आवश्यकता – उत्पादन क्षमता बढ़ाने और गुणवत्ता सुधारने के लिए आधुनिक तकनीक की जरूरत।
3. श्रम का कम निष्पादन – कार्य की उत्पादकता कम होने से लागत बढ़ती है।
4. सिंथेटिक फाइबर उद्योग से कड़ी प्रतिस्पर्धा – कृत्रिम वस्त्र सस्ते और टिकाऊ होने के कारण बाजार पर प्रभाव डालते हैं।
उदाहरण :-
महाराष्ट्र और गुजरात के कपास उद्योग पुरानी मशीनों और सिंथेटिक वस्त्र उद्योग से प्रतिस्पर्धा के कारण दबाव में हैं।
पटसन (जूट) उद्योग का भारत में महत्त्व और अवस्थिति क्या है :-
पटसन (जूट) उद्योग :- पटसन या जूट उद्योग भारत का प्रमुख कृषि आधारित उद्योग है और यह निर्यात में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।
पटसन (जूट) उद्योग की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. भारत जूट और जूट उत्पादों का सबसे बड़ा उत्पादक है।
2. बांग्लादेश दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है।
3. उद्योग की अवस्थिति मुख्यतः हुगली नदी के तट पर केंद्रित है।
4. यह उद्योग आर्थिक और निर्यात गतिविधियों में योगदान देता है।
उदाहरण :-
हुगली नदी तट के कोलकाता और हावड़ा क्षेत्र में जूट उद्योग केंद्रित हैं।
भारत में अधिकांश जूट मिलें पश्चिम बंगाल में क्यों स्थित हैं :-
जूट मिलों की अवस्थिति के कारण :- भारत में अधिकांश जूट मिलें पश्चिम बंगाल में केन्द्रित हैं,
जिसके पीछे निम्नलिखित कारण हैं।
1. उच्च उत्पादन क्षेत्र – पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक पटसन का उत्पादन होता है।
2. पानी की आवश्यकता – उद्योग को कच्चे पटसन को संसाधित करने के लिए बहुत पानी चाहिए, जो हुगली नदी से पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है।
3. सस्ते मजदूर – पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा से आसानी से सस्ते और कुशल श्रमिक मिल जाते हैं।
4. निर्यात सुविधा – कोलकाता का बंदरगाह उत्पादों के निर्यात के लिए सहायक है।
5. सुविधाजनक परिवहन – रेलवे, रोडवेज और जलमार्ग से कच्चे माल का उद्योग तक परिवहन आसान है।
6. सांस्कृतिक और वित्तीय सुविधाएँ – कोलकाता जैसे बड़े शहर में बैंकिंग, बीमा और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
उदाहरण :-
हुगली नदी के तट पर कोलकाता और हावड़ा क्षेत्र में जूट मिलें केन्द्रित हैं।
भारत के जूट उद्योग के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं :-
जूट उद्योग की चुनौतियाँ :- भारत के जूट उद्योग को अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू स्तर पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
जूट उद्योग की मुख्य चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं :-
1. कृत्रिम रेशों का प्रचलन – अब वस्तुएँ कृत्रिम रेशों से भी बनने लगी हैं।
2. सस्ती वस्तुएँ – कृत्रिम रेशे से बनी चीजें सस्ती होने के कारण जूट उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करती हैं।
3. उच्च उत्पादन लागत – जूट की खेती और उत्पादन पर अधिक व्यय आता है।
4. विदेशी स्पर्धा – अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अन्य देशों की सस्ती वस्तुओं से मुकाबला करना चुनौतीपूर्ण।
5. बांग्लादेश का प्रभाव – बांग्लादेश भी जूट उत्पादों का बड़ा उत्पादक और निर्यातक है, जिससे भारत के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है।
उदाहरण :-
पश्चिम बंगाल के जूट उद्योग को सस्ते कृत्रिम रेशों और बांग्लादेश के निर्यात के कारण दबाव का सामना करना पड़ता है।
भारत में चीनी उद्योग का महत्त्व और अवस्थिति क्या है :-
चीनी उद्योग :- भारत का चीनी उद्योग देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और यह विश्व स्तर पर भी प्रमुख है।
चीनी उद्योग की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. भारत चीनी उत्पादन में विश्व में दूसरा स्थान रखता है।
2. गुड़ और खांडसारी के उत्पादन में भारत का प्रथम स्थान है।
3. चीनी मिलें मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश में फैली हैं।
4. पिछले कुछ वर्षों में दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों, विशेषकर महाराष्ट्र, में मिलों की संख्या बढ़ी है।
उदाहरण :-
1. उत्तर प्रदेश और बिहार में कई बड़े चीनी उद्योग केंद्र स्थित हैं।
2. महाराष्ट्र में नई चीनी मिलों का विकास देखा गया है।
दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में चीनी मिलों की संख्या बढ़ने के कारण क्या हैं :-
दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों, विशेषकर महाराष्ट्र और कर्नाटक, में चीनी मिलों की संख्या बढ़ने के पीछे निम्नलिखित कारण हैं :-
1. गन्ने में उच्च सूक्रोस मात्रा – गन्ने का शर्करा (सुक्रोस) अधिक होने से उत्पादन बढ़ता है।
2. ठंडी जलवायु – ठंडी जलवायु गन्ने की पैदावार और गुणवत्ता के लिए अनुकूल है।
3. सहकारी समितियों की सफलता – सहकारी समितियों के माध्यम से उद्योग की स्थापना और संचालन सफल रहा।
उदाहरण :-
महाराष्ट्र में सहकारी चीनी मिलें जैसे शाहू नगर और कोल्हापुर क्षेत्र में अधिक सफल हुई हैं।
भारत में चीनी उद्योग के सामने मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं :-
उत्तर :- भारत में चीनी उद्योग के सामने मुख्य चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं :-
1. मौसमी प्रकृति – यह उद्योग छोटी अवधि के लिए संचालित होता है और साल भर निरंतर उत्पादन संभव नहीं।
2. कम उत्पादन क्षमता – गन्ने का प्रति हैक्टेयर उत्पादन कम है।
3. पुरानी मशीनरी – उत्पादन बढ़ाने और गुणवत्ता सुधारने के लिए आधुनिक मशीनों की कमी।
4. खोई का अधिकतम इस्तेमाल न कर पाना – गन्ने से अधिकतम उत्पाद प्राप्त न होना।
5. परिवहन की कमी – परिवहन साधनों के अभाव में गन्ना समय पर मिलों तक नहीं पहुँच पाता, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है।
उदाहरण :-
उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की कुछ मिलें पुरानी मशीनों और परिवहन समस्याओं के कारण उत्पादन कम कर रही हैं।
6.5 खनिज आधारित उद्योग क्या हैं?
खनिज आधारित उद्योग क्या हैं :-
खनिज आधारित उद्योग :- वे उद्योग जो अपने उत्पादन में खनिज और धातुओं को कच्चे माल के रूप में उपयोग करते हैं, उन्हें खनिज आधारित उद्योग कहा जाता है।
खनिज आधारित उद्योग की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. उत्पादन के लिए खनिज और धातुएँ मुख्य कच्चा माल होती हैं।
2. ये उद्योग औद्योगिक और आधारभूत उद्योगों के लिए आवश्यक हैं।
3. उत्पादन स्थायी और भारी निवेश पर आधारित होता है।
उदाहरण :-
लोहा और इस्पात उद्योग, सीमेंट उद्योग, एल्यूमिनियम उद्योग, मशीन और औज़ार उद्योग
6.5.1 लोहा तथा इस्पात उद्योग क्या है?
लौह तथा इस्पात उद्योग का महत्त्व और अवस्थिति क्या है :-
लौह तथा इस्पात उद्योग :- लौह और इस्पात उद्योग भारत का आधारभूत और प्रमुख खनिज आधारित उद्योग है।
लौह तथा इस्पात उद्योग की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. आधारभूत उद्योग – अन्य सभी भारी, हल्के और मध्य उद्योग इनसे बनी मशीनरी पर निर्भर हैं।
2. कच्चे माल का अनुपात – लौह अयस्क : कोकिंग कोल : चूना पत्थर = लगभग 4:2:1।
3. उत्पादन में स्थिति – वर्ष 2016 में भारत ने 956 लाख टन इस्पात का उत्पादन किया और यह विश्व में तीसरे स्थान पर था।
4. विशेष उपलब्धि – भारत स्पंज लौह का सबसे बड़ा उत्पादक है।
5. विपणन प्रणाली – अधिकांश सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम अपने इस्पात को स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया के माध्यम से बेचते हैं।
6. अवस्थित क्षेत्र – भारत के छोटा नागपुर पठारी क्षेत्र में अधिकांश लोहा और इस्पात उद्योग केन्द्रित हैं।
उदाहरण :-
भिलाई, दुर्गापुर, राउरकेला और बोकARO इस्पात उद्योग केंद्र।
छोटा नागपुर पठारी क्षेत्र में लौह और इस्पात उद्योग की अधिकतम सांद्रता होने के कारण क्या हैं :-
छोटा नागपुर पठारी क्षेत्र में लौह और इस्पात उद्योग की अधिकतम सांद्रता होने के मुख्य कारण कारण निम्नलिखित हैं :-
1. लौह अयस्क की कम लागत – कच्चा माल सस्ता होने से उत्पादन लागत कम रहती है।
2. कच्चे माल की निकटता – उच्च श्रेणी के लौह अयस्क और अन्य कच्चे माल उद्योग के पास उपलब्ध हैं।
3. सस्ते श्रमिकों की उपलब्धता – उत्पादन लागत घटाने में मदद मिलती है।
4. घरेलू बाजार की विशाल क्षमता – उत्पादन के लिए पर्याप्त बाजार और मांग मौजूद है।
उदाहरण :-
राउरकेला, भिलाई और दुरगापुर उद्योग केंद्र छोटा नागपुर पठारी क्षेत्र में स्थित हैं।
भारत में लौह तथा इस्पात उद्योग पूर्ण विकास न कर पाने के कारण क्या हैं :-
भारत में लौह तथा इस्पात उद्योग पूर्ण विकास न कर पाने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-
1. कोकिंग कोल की उच्च लागत और सीमित उपलब्धता – कच्चा माल महँगा और पर्याप्त मात्रा में न होना।
2. श्रम की कम उत्पादकता – कुशल और उत्पादक श्रमिकों की कमी।
3. ऊर्जा की अनियमित आपूर्ति – बिजली और ऊर्जा की अस्थिरता उत्पादन को प्रभावित करती है।
4. कमजोर बुनियादी ढांचा – परिवहन, जल और संचार की अधूरी सुविधाएँ।
उदाहरण :-
भिलाई और राउरकेला इस्पात उद्योग ऊर्जा और कोकिंग कोल की कमी के कारण कभी-कभी उत्पादन घटाते हैं।
लोहा और इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग क्यों कहा जाता है :-
लोहा और इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह देश के अन्य उद्योगों और औद्योगिक विकास का आधार है।
इसका मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-
1. अन्य उद्योगों पर निर्भरता – कई भारी, हल्के और मध्य उद्योग लोहे और इस्पात पर निर्भर हैं।
2. मशीनरी की आपूर्ति – यह उद्योग चीनी, सीमेंट और अन्य उद्योगों को आवश्यक मशीनरी प्रदान करता है।
3. औद्योगिक प्रगति – देश की औद्योगिक विकास दर इस उद्योग पर निर्भर करती है।
4. रोजगार का स्रोत – बड़ी संख्या में लोगों को स्थायी रोजगार प्रदान करता है।
उदाहरण :-
भिलाई और राउरकेला इस्पात उद्योग ने अन्य उद्योगों को मशीनरी और कच्चा माल उपलब्ध कराया।
लोहा और इस्पात उद्योग को भारी उद्योग क्यों कहा जाता है :-
लोहा और इस्पात उद्योग को भारी उद्योग इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके कच्चे माल और तैयार उत्पाद का वजन और परिवहन की विशेषताएँ इसे भारी उद्योग बनाती हैं।
लोहा और इस्पात उद्योग को भारी उद्योग कहे जाने का मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-
1. भारी कच्चे माल – लौह अयस्क, कोयला और चूना पत्थर जैसे कच्चे माल का भार अधिक होता है।
2. उच्च परिवहन लागत – तैयार उत्पादों को बाजार या उद्योगों तक पहुँचाने में अधिक खर्च आता है।
उदाहरण :-
राउरकेला और भिलाई इस्पात उद्योग के लोहे और इस्पात के उत्पाद भारी होने के कारण ट्रक और रेल द्वारा परिवहन महँगा पड़ता है।
6.5.2 एल्यूमिनियम प्रगलन (Smelting) उद्योग क्या है?
एल्यूमिनियम प्रगलन उद्योग का महत्त्व, अवस्थिति और आवश्यकताएँ क्या हैं :-
एल्यूमिनियम प्रगलन उद्योग :- एल्यूमिनियम प्रगलन भारत का दूसरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण धातु शोधन उद्योग है।
इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. उद्योग का महत्त्व ;- एल्यूमिनियम हल्का, जंग अवरोधी, ऊष्मा का सुचालक, लचीला और अन्य धातुओं के मिश्रण से अधिक कठोर बनाया जा सकता है।
2. उद्योग की अवस्थिति :- भारत में यह संयंत्र ओडिशा, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में स्थित हैं।
उदाहरण :-
ओडिशा का नाल्को एल्यूमिनियम संयंत्र भारत में प्रमुख एल्यूमिनियम उत्पादन केंद्र है।
एल्यूमिनियम प्रगलन उद्योग स्थापना की आवश्यकताएँ क्या हैं :-
एल्यूमिनियम प्रगलन की उद्योग स्थापना की आवश्यकताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. नियमित ऊर्जा की उपलब्धता – उत्पादन के लिए बिजली और ऊर्जा का निरंतर स्रोत आवश्यक।
2. कम कीमत पर कच्चे माल की उपलब्धता – बौक्साइट और अन्य आवश्यक कच्चा माल आसानी से और सस्ते में मिलना चाहिए।
6.6 रसायन उद्योग क्या है?
रसायन उद्योग का भारत में महत्त्व क्या है :-
रसायन उद्योग :- भारत में रसायन उद्योग अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
रसायन उद्योग की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. सकल घरेलू उत्पाद में योगदान – भारत के सकल घरेलू उत्पाद में रसायन उद्योग की भागीदारी लगभग 3 प्रतिशत है।
2. आकार और स्थिति – एशिया में तीसरा सबसे बड़ा और विश्व में आकार के हिसाब से 12वें स्थान पर है।
3. उत्पाद का प्रकार – भारत में कार्बनिक और अकाबर्निक दोनों प्रकार के रसायनों का उत्पादन होता है।
उदाहरण :-
1. एशियाई बाजार में इंडियन रसायन उद्योग का महत्त्वपूर्ण योगदान।
2. कार्बनिक रसायन: दवा और खाद्य उद्योग में उपयोग।
3. अकाबर्निक रसायन: उर्वरक और उद्योगों में उपयोग।
कार्बनिक रसायन क्या हैं और इसका उपयोग कहाँ होता है :-
कार्बनिक रसायन :- कार्बनिक रसायन वे रसायन हैं जो पेट्रो रसायन पर आधारित होते हैं और विभिन्न उद्योगों में उपयोगी हैं।
कार्बनिक रसायन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. पेट्रो रसायन शामिल – यह पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस से प्राप्त रसायनों से बनता है।
2. उपयोग क्षेत्र – कृत्रिम वस्त्र, रबर, प्लास्टिक, दवाइयाँ और अन्य उत्पाद बनाने में प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण :-
प्लास्टिक बैग, सिंथेटिक कपड़े, रबर के उपकरण और दवाइयाँ।
अकार्बनिक रसायन क्या हैं और इसमें कौन-कौन से पदार्थ शामिल हैं :-
अकार्बनिक रसायन :- अकार्बनिक रसायन वे रसायन हैं जो जैविक स्रोतों पर आधारित नहीं होते और विभिन्न उद्योगों में उपयोगी हैं।
अकार्बनिक रसायन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. मुख्य पदार्थ – इसमें सल्फ्यूरिक अम्ल, नाइट्रिक अम्ल, क्षार आदि शामिल हैं।
2. उपयोग क्षेत्र – उर्वरक, धातु शोधन और अन्य रासायनिक उद्योगों में प्रयोग किए जाते हैं।
उदाहरण :-
1. सल्फ्यूरिक अम्ल – उर्वरक और रसायन उद्योग में।
2. नाइट्रिक अम्ल – विस्फोटक और उर्वरक निर्माण में।
3. क्षार – कागज, साबुन और धातु उद्योग में।
6.7 उर्वरक उद्योग क्या है?
उर्वरक उद्योग का भारत में महत्त्व और विशेषताएँ क्या हैं :-
उर्वरक उद्योग :- भारत में उर्वरक उद्योग कृषि उत्पादन और हरित क्रांति के लिए महत्वपूर्ण है।
उर्वरक उद्योग की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. मुख्य उत्पाद – नाइट्रोजनी उर्वरक (मुख्यतः यूरिया), फास्फेटिक उर्वरक, अमोनिया फास्फेट और मिश्रित उर्वरक।
2. पोटेशियम की कमी – भारत में पोटेशियम यौगिकों के भंडार नहीं हैं, इसलिए पोटाश का आयात किया जाता है।
3. उद्योग का विस्तार – हरित क्रांति के बाद देश के कई हिस्सों में उर्वरक उद्योग का विकास हुआ।
उदाहरण :-
1. उत्तर प्रदेश और राजस्थान में यूरिया और फास्फेटिक उर्वरक मिलें स्थापित हैं।
2. पोटाश की आवश्यकता विदेश से आयात कर पूरी की जाती है।
6.8 सीमेंट उद्योग क्या है?
सीमेंट उद्योग का महत्त्व और अवस्थिति क्या है :-
सीमेंट उद्योग :- सीमेंट उद्योग निर्माण और आधारभूत ढांचे के लिए आवश्यक उद्योग है।
सीमेंट उद्योग की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. कच्चे माल की आवश्यकता – चूना पत्थर, सिलिका और जिप्सम जैसे भारी और स्थूल कच्चे माल।
2. ऊर्जा और परिवहन – रेल परिवहन, कोयला और विद्युत की उपलब्धता आवश्यक।
3. उपयोग क्षेत्र – निर्माण कार्यों में इसका व्यापक प्रयोग।
4. उद्योग की अवस्थिति – गुजरात में सीमेंट इकाइयाँ स्थापित हैं क्योंकि यहाँ से खाड़ी देशों के लिए व्यापार सुविधा उपलब्ध है।
उदाहरण :-
गुजरात की अमूल और सूरत क्षेत्र की सीमेंट मिलें खाड़ी देशों में निर्यात के लिए उपयुक्त हैं।
हमारे देश के लिए सीमेंट उद्योग का विकास अति महत्वपूर्ण क्यों है :-
सीमेंट उद्योग का भारत में विकास आर्थिक और आधारभूत ढांचे के लिए अत्यंत आवश्यक है।
इसका मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-
1. निर्माण कार्यों के लिए आवश्यक – भवन, फैक्टरियाँ, सड़कें, पुल, बाँध और घर आदि के निर्माण में उपयोग।
2. उत्तम गुणवत्ता – भारत का सीमेंट उद्योग उच्च गुणवत्ता वाला सीमेंट उत्पादन करता है।
3. आवश्यक निर्यात – अफ्रीका और अन्य देशों में भारत के सीमेंट की मांग रहती है।
उदाहरण :-
1. सड़क निर्माण परियोजनाओं और बाँध निर्माण में भारत का सीमेंट उद्योग मुख्य स्रोत है।
2. गुजरात और तमिलनाडु के सीमेंट उद्योग अफ्रीका निर्यात में सक्रिय हैं।
6.9 मोटरगाड़ी उद्योग क्या है?
मोटरगाड़ी उद्योग का महत्त्व और अवस्थिति क्या है :-
मोटरगाड़ी उद्योग :- मोटरगाड़ी उद्योग यात्रियों और सामान के तीव्र परिवहन के लिए आवश्यक है।
इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. उद्योग का महत्त्व – यातायात और सामान के परिवहन के लिए मुख्य साधन।
2. उदारीकरण के बाद विकास – नए और आधुनिक मॉडल के वाहनों की बड़ी मांग बाजार में बढ़ी है।
3. उद्योग की अवस्थिति – प्रमुख शहरों के आस-पास: दिल्ली, गुड़गाँव, मुंबई, पुणे, चेन्नई।
उदाहरण :-
1. गुड़गाँव में हुंडई और मारुति के कार उद्योग।
2. पुणे और चेन्नई में फॉक्सवैगन और फोर्ड की वाहन फैक्ट्रियाँ।
भारत में उदारीकरण एवं प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ने मोटरगाड़ी उद्योग में वृद्धि क्यों की :-
उदारीकरण और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) ने भारत में मोटरगाड़ी उद्योग को विशाल वृद्धि और आधुनिक स्तर पर पहुँचाने में मदद की।
इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-
1. नए और आधुनिक मॉडल – उदारीकरण के पश्चात नए वाहन मॉडल का बाजार बढ़ा।
2. वाहनों की बढ़ती माँग – कार, स्कूटर, स्कूटी, बाईक और ऑटो रिक्शा की संख्या में अपार वृद्धि।
3. नई प्रौद्योगिकी का उपयोग – FDI के कारण उद्योग विश्वस्तरीय तकनीक अपनाने में सक्षम हुआ।
4. इकाइयों की संख्या – आज 15 कार इकाइयाँ और 14 स्कूटर/मोटरसाइकिल/ऑटो रिक्शा इकाइयाँ उत्पादन करती हैं।
उदाहरण :-
गुड़गाँव और चेन्नई में स्थापित नई वाहन फैक्ट्रियाँ FDI और आधुनिक तकनीक के कारण बड़े पैमाने पर उत्पादन करती हैं।
6.10 सूचना प्रौद्योगिकी तथा इलेक्ट्रॉनिक उद्योग क्या हैं?
सूचना प्रौद्योगिकी तथा इलेक्ट्रॉनिक उद्योग का महत्त्व और अवस्थिति क्या है :-
सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग :- भारत में सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग तेजी से विकसित हो रहे हैं और देश की अर्थव्यवस्था में योगदान कर रहे हैं।
सूचना प्रौद्योगिकी तथा इलेक्ट्रॉनिक उद्योग की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. उत्पादों का प्रकार – ट्रांजिस्टर, टेलीविजन, टेलीफोन एक्सचेंज, राडार, कंप्यूटर और दूरसंचार उपकरण।
2. उद्योग की अवस्थिति – भारत की इलैक्ट्रोनिक राजधानी के रूप में बेंगलूरू विकसित हुआ।
3. सूचना प्रौद्योगिकी में योगदान – IT उद्योग के सफल होने के कारण हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का निरंतर विकास हुआ।
उदाहरण :-
1. बेंगलूरू में इन्फोसिस, विप्रो और टेक महिंद्रा जैसी IT कंपनियाँ।
2. इलेक्ट्रॉनिक उपकरण उत्पादन में टेलीफोन एक्सचेंज और कंप्यूटर हार्डवेयर का निर्माण।
भारत के सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग का आर्थिक विकास में योगदान क्या है :-
सूचना प्रौद्योगिकी (IT) उद्योग भारत की आर्थिक और सामाजिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-
1. रोज़गार उपलब्धता – देश में बड़ी संख्या में लोगों को स्थायी रोजगार मिलता है।
2. विदेशी मुद्रा अर्जन – IT निर्यात से भारत को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
3. महिलाओं की भागीदारी – कार्यरत महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है।
4. हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर विकास – तकनीकी प्रगति निरंतर बढ़ रही है।
5. सुविधाएँ और पार्क – सॉफ्टवेयर प्रौद्योगिकी पार्क, विशेषज्ञों को एकल विंडो सेवा और उच्च आंकड़े संचार सुविधा प्रदान करते हैं।
उदाहरण :-
1. बेंगलूरू और हैदराबाद के IT पार्कों में सॉफ्टवेयर निर्यात और रोजगार में वृद्धि।
2. विप्रो, इंफोसिस और टेक महिंद्रा जैसी कंपनियाँ वैश्विक बाजार में भारत की विदेशी मुद्रा अर्जित करती हैं।
6.11 औद्योगिक प्रदूषण तथा पर्यावरण निम्नीकरण क्या है?
प्रदूषण के प्रकार कौन-कौन से हैं :-
प्रदूषण के प्रकार :- पर्यावरण में होने वाले हानिकारक प्रभावों के अनुसार प्रदूषण को विभिन्न प्रकारों में बाँटा जा सकता है।
प्रदूषण के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं :-
1. तापीय प्रदूषण
2. जल प्रदूषण
3. ध्वनि प्रदूषण
4. वायु प्रदूषण
वायु प्रदूषण क्या है और इसका मुख्य कारण क्या हैं :-
वायु प्रदूषण :- वायु प्रदूषण तब होता है जब हवा में हानिकारक गैसें और धूल मिल जाती हैं।
इसका मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-
1. उद्योगों का उत्सर्जन – सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसें।
2. विशेष उद्योगों से धुआँ – रासायनिक उद्योग, कागज उद्योग, ईंट भट्टे और रिफाइनरी से निकलने वाला धुआँ।
उदाहरण :-
1. कोयला जलाने वाले ताप विद्युत केंद्रों से सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन।
2. ईंट भट्टों से निकलता सघन धुआँ शहर के वायुमंडल को प्रदूषित करता है।
जल प्रदूषण के कारण क्या हैं :-
जल प्रदूषण :- जल प्रदूषण तब होता है जब नदियाँ, झीलें और समुद्र हानिकारक पदार्थों से दूषित हो जाते हैं।
जल प्रदूषण के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-
1. औद्योगिक अपशिष्ट – कार्बनिक और अकार्बनिक कचरे का जल में गिरना।
2. विशेष उद्योगों से प्रदूषण – पेपर, रासायनिक और वस्त्र उद्योगों द्वारा उत्पन्न अपशिष्ट।
उदाहरण :-
1. रासायनिक मिलों का रासायनिक अपशिष्ट नदी में मिलना।
2. वस्त्र उद्योग से निकलने वाला रंग और केमिकल पानी को दूषित करता है।
तापीय प्रदूषण के कारण क्या हैं :-
तापीय प्रदूषण :- तापीय प्रदूषण तब होता है जब जल या वातावरण का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है।
तापीय प्रदूषण का मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-
तापीय संयंत्र और कारखाने – गर्म जल या भाप को सीधे नदियों, झीलों या जलाशयों में छोड़ना।
उदाहरण :-
ताप विद्युत केंद्रों से गर्म जल का नदी में प्रवाह, जिससे जल जीवों का जीवन प्रभावित होता है।
ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव क्या हैं :-
ध्वनि प्रदूषण :- ध्वनि प्रदूषण तब होता है जब अत्यधिक और हानिकारक आवाज़ें मानव और पर्यावरण पर प्रभाव डालती हैं।
ध्वनि प्रदूषण के मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं :-
1. सुनने की क्षमता प्रभावित होना – लंबे समय तक तेज आवाज़ सुनने से कान की श्रवण शक्ति घटती है।
2. शारीरिक प्रभाव – हृदय गति और रक्तचाप में वृद्धि होना।
उदाहरण :-
1. शहरों में ट्रैफिक जाम और हॉर्न की लगातार आवाज़।
2. निर्माण स्थल या फैक्ट्री के भारी मशीनों का शोर।
6.12 पर्यावरणीय निम्नीकरण की रोकथाम कैसे की जा सकती है?
उद्योगों द्वारा पर्यावरणीय प्रदूषण को कम करने के लिए कौन-कौन से उपाय किए जा सकते हैं :-
उद्योग अपने संचालन के दौरान पर्यावरणीय प्रदूषण को कम करने के लिए कई कदम उठा सकते हैं।
इसके मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं :-
1. प्रदूषित जल का नियंत्रण – प्रदूषित जल को नदियों में सीधे नहीं बहाना।
2. जल शोधन – जल को साफ करके ही प्रवाहित करना।
3. ऊर्जा स्रोत का चयन – जल विद्युत का प्रयोग करना, जिससे तापीय और वायु प्रदूषण कम हो।
4. मशीनरी का सुधार – ऐसी मशीनें उपयोग में लाना जो कम ध्वनि उत्पन्न करें।
उदाहरण :-
1. फैक्ट्री से निकलने वाले रासायनिक जल को ट्रीटमेंट प्लांट से साफ करके नदियों में छोड़ा जाए।
2. शोर कम करने वाले साइलेंसर और आधुनिक मशीनरी का उपयोग।
भारत में पर्यटन के बढ़ते महत्त्व क्या हैं :-
पर्यटन का महत्त्व :- पर्यटन भारत का तेजी से बढ़ता हुआ तृतीयक क्षेत्र है और आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विकास में योगदान करता है।
भारत में पर्यटन के बढ़ते महत्त्व निम्नलिखित हैं :-
1. रोज़गार सृजन – कुल लगभग 2500 लाख नौकरियाँ प्रदान करता है।
2. आर्थिक योगदान – कुल राजस्व सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 40 प्रतिशत।
3. औद्योगिक और व्यापारिक विकास – उद्योगों व व्यापार में वृद्धि का कारक।
4. बुनियादी ढांचे में सुधार – सड़कों, परिवहन और आवास सुविधाओं का विकास।
5. अंतर्राष्ट्रीय संबंध – अंतर्राष्ट्रीय बंधुता और पर्यटन सहयोग बढ़ाने में सहायक।
6. नए पर्यटन स्वरूप – मेडिकल टूरिज्म, साहसिक पर्यटन और सांस्कृतिक पर्यटन का विकास।
उदाहरण :-
1. राजस्थान में सांस्कृतिक पर्यटन और जयपुर की हवामहल।
2. केरल में हाउसबोट और मेडिकल टूरिज्म।
3. उत्तराखंड में साहसिक पर्यटन जैसे ट्रैकिंग और पर्वतारोहण।