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CLASS 10 GEOGRAPHY NOTES IN HINDI CHAPTER - 1

संसाधन और विकास / Resources and Development

TextbookNCERT
ClassClass 10
SubjectGeography
ChapterChapter 1
Chapter Nameसंसाधन और विकास
MediumHindi

1.1 संसाधनों के प्रकार

संसाधन:-

वे सभी वस्तुएँ या पदार्थ जो हमें प्रकृति में उपलब्ध होते हैं और हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में उपयोग किए जा सकते हैं। किसी वस्तु को संसाधन तभी माना जाता है, जब उसे इस्तेमाल करने के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी उपलब्ध हो, उसका उपयोग आर्थिक रूप से लाभकारी हो, और समाज में उसका उपयोग सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य हो।

  1. संसाधन प्राकृतिक, मानव या मानव-निर्मित हो सकते हैं।
  2. यह हमारी जरूरतों को पूरा करने में सहायक होते हैं।
  3. किसी वस्तु के संसाधन बनने के लिए तकनीक और उपयोगिता आवश्यक होती है।
  4. संसाधनों का समझदारी से Fउपयोग भविष्य के लिए जरूरी है।
उदाहरण:- पानी एक प्राकृतिक संसाधन है क्योंकि यह जीवन, खेती, उद्योग व घरेलू कार्यों में उपयोग किया जाता है तथा इसे उपयोग करने की तकनीक हमारे पास उपलब्ध है।

संसाधनों का वर्गीकरण — चार आधार:-

  1. उत्पत्ति के आधार पर — जैव संसाधन, अजैव संसाधन
  2. समाप्यता के आधार पर — नवीकरणयोग्य संसाधन, अनवीकरणयोग्य संसाधन
  3. स्वामित्व के आधार पर — व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय संसाधन
  4. विकास के स्तर के आधार पर — संभावित, विकसित, भंडार, संचित कोष

1.1.1 उत्पत्ति के आधार पर वर्गीकरण

जैव संसाधन (Biotic Resources):-

वे संसाधन जो हमें जीवमंडल से प्राप्त होते हैं और जिनमें जीवन मौजूद होता है। इनमें सभी जीवित प्राणी शामिल होते हैं।

उदाहरण:- मनुष्य, पशु, पक्षी, पेड़-पौधे, प्राणिजात आदि।

अजैव संसाधन (Abiotic Resources):-

वे सभी संसाधन जो निर्जीव वस्तुओं से बने होते हैं। इनमें भौतिक और रासायनिक तत्व शामिल होते हैं।

उदाहरण:- चट्टानें, धातुएँ, जल, हवा, खनिज आदि।

1.1.2 समाप्यता के आधार पर वर्गीकरण

नवीकरणीय संसाधन (Renewable Resources):-

वे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा दोबारा उपयोगी बनाया जा सकता है। ये समय के साथ पुनः भर जाते हैं और इनका समाप्त होना मुश्किल होता है।

उदाहरण:- वायु, जल, सूर्य का प्रकाश, वनस्पति आदि।

अनवीकरणीय संसाधन (Non-Renewable Resources):-

वे संसाधन जिन्हें एक बार उपयोग करने पर दोबारा उपयोग में नहीं लाया जा सकता। इनका निर्माण बहुत लंबे भूवैज्ञानिक समय में होता है और ये सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं।

उदाहरण:- कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, धात्विक खनिज आदि।

1.1.3 स्वामित्व के आधार पर वर्गीकरण

व्यक्तिगत संसाधन (Individual Resources):-

वे संसाधन जिनका स्वामित्व किसी एक व्यक्ति के पास होता है। इनका उपयोग और नियंत्रण निजी होता है।

उदाहरण:- किसी की निजी जमीन, मकान, वाहन आदि।

सामुदायिक संसाधन (Community Owned Resources):-

वे संसाधन जिनका उपयोग किसी समुदाय के सभी लोग मिलकर करते हैं। इनका स्वामित्व पूरे समुदाय का होता है।

उदाहरण:- गाँव का तालाब, सामुदायिक कुआँ, सार्वजनिक पार्क।

राष्ट्रीय संसाधन (National Resources):-

वे सभी संसाधन जो देश की भौगोलिक सीमा के भीतर पाए जाते हैं। इनका स्वामित्व सरकार के पास होता है और इन्हें देश की संपत्ति माना जाता है।

उदाहरण:- सड़कें, नदियाँ, जंगल, खनिज, रेलवे आदि।

अंतर्राष्ट्रीय संसाधन (International Resources):-

तटरेखा से 200 समुद्री मील से आगे के महासागरीय क्षेत्र पर किसी एक देश का अधिकार नहीं होता। ऐसे संसाधन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की निगरानी में आते हैं और सभी देशों के लिए उपलब्ध होते हैं।

उदाहरण:- खुले समुद्र में पाए जाने वाले मत्स्य संसाधन, समुद्री खनिज आदि।

1.1.4 विकास के स्तर के आधार पर वर्गीकरण

संभावी संसाधन (Potential Resources):-

वे संसाधन जो किसी क्षेत्र में उपलब्ध तो हैं, परंतु जिनका उपयोग अभी तक शुरू नहीं हुआ। इनका भविष्य में उपयोग किया जा सकता है।

उदाहरण:- राजस्थान में पवन ऊर्जा की संभावना, गुजरात में सौर ऊर्जा की अपार क्षमता।

विकसित संसाधन (Developed Resources):-

वे संसाधन जिनकी मात्रा, गुणवत्ता और उपयोग पूरी तरह से ज्ञात हो तथा इनका प्रयोग किया जा रहा हो। इन पर तकनीक और प्रबंधन पूरी तरह कार्यरत होते हैं।

उदाहरण:- कोयला खदानें, तेल कुएँ, सिंचाई परियोजनाएँ।

भंडारित संसाधन (Stock):-

वे संसाधन जो पर्यावरण में उपलब्ध हैं, लेकिन उपयोग की तकनीक विकसित न होने के कारण इंसान की पहुँच से बाहर हैं।

उदाहरण:- धरती के अंदर मौजूद भूतापीय ऊर्जा (लावा), समुद्र के गहरे तल की खनिज संपदा।

संचित संसाधन / संचित कोष (Reserves):-

वे संसाधन जिन्हें उपयोग करने की तकनीक मौजूद है, लेकिन इन्हें अभी भविष्य के लिए सुरक्षित रखा गया है। देश की आवश्यकता के अनुसार इन्हें बाद में उपयोग में लाया जाता है।

उदाहरण:- डैम में संग्रहित जल, जंगलों के वे क्षेत्र जिनका उपयोग सीमित किया गया हो।

1.2 संसाधनों का विकास

अंधाधुंध उपयोग से उत्पन्न समस्याएँ:-

लंबे समय तक यह माना गया कि संसाधन प्रकृति की असीम देन हैं। इसी विश्वास के कारण मानव ने इनका अंधाधुंध उपयोग किया, जिससे कई गंभीर समस्याएँ पैदा हुईं।

  1. लालच के कारण संसाधनों का ह्रास — अत्यधिक लाभ के लिए तीव्र दोहन।
  2. संसाधनों का असमान वितरण — समाज संसाधन-संपन्न और संसाधन-हीन वर्गों में बँट गया।
  3. वैश्विक पारिस्थितिकी संकट — भूमंडलीय तापन, ओजोन परत का अवक्षय, वायु-जल-मृदा प्रदूषण, भूमि निम्नीकरण।
  4. संसाधनों के न्यायसंगत वितरण की आवश्यकता बढ़ी।

सतत् पोषणीय विकास:-

संसाधनों का ऐसा विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग, जिससे वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताएँ भी पूरी हों और भावी पीढ़ियाँ भी इन संसाधनों का लाभ उठा सकें।

  1. संसाधनों का सोच-समझकर और सीमित उपयोग।
  2. पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना विकास करना।
  3. वर्तमान और भविष्य — दोनों पीढ़ियों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना।
  4. नवीकरणीय संसाधनों का संरक्षण और पुनः उपयोग।
उदाहरण:- जितने पेड़ काटे जाएँ, उससे अधिक पेड़ लगाना सतत् पोषणीय विकास का उदाहरण है।

एजेंडा 21:-

एक वैश्विक कार्य-योजना, जिसे वर्ष 1992 में रियो डी जेनेरो (ब्राज़ील) में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (UNCED) के दौरान पारित किया गया। इसमें विश्व के राष्ट्राध्यक्षों ने पर्यावरण संरक्षण और सतत् विकास के लिए संयुक्त प्रयास करने का संकल्प लिया।

  1. वैश्विक स्तर पर सहयोग बढ़ाना।
  2. पर्यावरणीय क्षति को रोकना और प्रकृति का संतुलन बनाए रखना।
  3. गरीबी में कमी लाना।
  4. समान अधिकारों और पारस्परिक जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए सतत् विकास की दिशा में विश्व को आगे बढ़ाना।

1.3 संसाधन नियोजन

संसाधन नियोजन:-

ऐसे उपायों, तकनीकों और योजनाओं का निर्माण, जिनकी मदद से संसाधनों का उचित, संतुलित और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।

  1. संसाधनों की पहचान और उनका विस्तृत सर्वेक्षण।
  2. संसाधनों के उपयोग की प्राथमिकताएँ तय करना।
  3. संसाधनों का संतुलित और विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना।
  4. वर्तमान व भविष्य दोनों के लिए संसाधनों का संरक्षण।
  5. क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने में मदद करना।
उदाहरण:- किसी राज्य में उपलब्ध जल संसाधनों का सर्वेक्षण करके सिंचाई, पेयजल और उद्योगों के लिए योजनाएँ बनाना संसाधन नियोजन का उदाहरण है।

1.4 भारत में संसाधन नियोजन

भारत में संसाधन नियोजन के मुख्य बिंदु:-

भारत में संसाधनों के संतुलित विकास और उपयोग के लिए संसाधन नियोजन को प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही प्रमुख लक्ष्य के रूप में अपनाया गया।

  1. संसाधनों की पहचान और सूची बनाना — विभिन्न राज्यों व क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों का सर्वेक्षण।
  2. कौशल, तकनीक और संस्थागत ढाँचे का उपयोग — विशेषज्ञों के कौशल और सरकारी संस्थाओं के सहयोग से नियोजन ढाँचा तैयार करना।
  3. संसाधन नियोजन और विकास योजना में तालमेल — वर्तमान व भविष्य दोनों की आवश्यकताओं के अनुरूप संसाधनों का उपयोग।

संसाधन संरक्षण:-

जल, भूमि, वनस्पति, मृदा तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रबंधन और समझदारी से उपयोग, ताकि इनका उपयोग आज भी हो सके और भावी पीढ़ियों की आवश्यकताएँ भी बिना किसी कमी के पूरी होती रहें।

  1. प्राकृतिक संसाधनों का सीमित और विवेकपूर्ण उपयोग।
  2. जल, भूमि और मृदा की गुणवत्ता को बनाए रखना।
  3. वनों, वन्यजीवों और नवीकरणीय संसाधनों का संरक्षण।
  4. भावी पीढ़ियों के लिए संसाधनों का सुरक्षित भंडारण।
उदाहरण:- वर्षाजल को संग्रहित करके पुनः उपयोग में लाना (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) संसाधन संरक्षण का उदाहरण है।

1.5 भू-संसाधन

भू-संसाधन:-

भूमि से प्राप्त होने वाले सभी प्राकृतिक लाभ। प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीव, मानव जीवन, कृषि कार्य, उद्योग, परिवहन और संचार जैसी सभी व्यवस्थाएँ भूमि के सहारे ही चलती हैं। चूँकि भूमि एक सीमित संसाधन है, इसलिए इसका उपयोग सावधानीपूर्वक व योजनाबद्ध ढंग से करना आवश्यक है।

उदाहरण:- ढलानों पर सीढ़ीनुमा खेत (टैरेस फार्मिंग) बनाना भूमि के संरक्षण और सही उपयोग का उदाहरण है।

भारत में भू-संसाधनों का वर्गीकरण:-

  1. मैदानी क्षेत्र (लगभग 43%) — समतल और उपजाऊ; कृषि व औद्योगिक विकास के लिए अनुकूल; परिवहन-संचार नेटवर्क विकसित करना आसान।
  2. पर्वतीय क्षेत्र (लगभग 30%) — हिमालय जैसी पर्वत शृंखलाएँ; बारहमासी नदियों के उद्गम स्थल; पर्यटन व पारिस्थितिकी संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण।
  3. पठारी क्षेत्र (लगभग 27%) — खनिज पदार्थ, जीवाश्म ईंधन व वन संसाधनों का विशाल भंडार; उद्योगों व खनन कार्यों के लिए उपयोगी।
उदाहरण:- भारत का दक्कन का पठार खनिज संपदा से भरपूर है, जबकि गंगा का मैदान अत्यंत उपजाऊ होकर कृषि के लिए उपयुक्त माना जाता है।

1.6 भू-उपयोग

भू-उपयोग:-

वह प्रक्रिया जिसके तहत भूमि का उपयोग विभिन्न आर्थिक गतिविधियों जैसे कृषि, वानिकी, निर्माण, उद्योग, परिवहन आदि के लिए किया जाता है। भू-उपयोग को कई प्राकृतिक और मानव-निर्मित कारक प्रभावित करते हैं।

भू-उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्व:-

  1. वन क्षेत्र — घने पेड़ों व प्राकृतिक वनस्पति से ढकी भूमि; पारिस्थितिकी संतुलन के लिए आवश्यक।
  2. कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि — बंजर भूमि, अथवा गैर-कृषि उपयोग जैसे उद्योग, सड़कें, इमारतें।
  3. परती भूमि — वर्तमान परती (1 वर्ष या कम से खेती नहीं) और अन्य परती (1 से 5 वर्ष तक खेती नहीं)।
  4. अन्य कृषि योग्य भूमि — स्थायी चरागाह, गोचर भूमि, बाग-बगीचे, वृक्ष फसलें; 5 वर्ष या अधिक समय से खाली।
  5. शुद्ध बोया गया क्षेत्र — जिस भूमि पर एक कृषि वर्ष में केवल एक बार फसल बोई जाती है।
उदाहरण:- किसी गाँव की चरागाह भूमि, जिस पर लंबे समय से खेती नहीं हुई, "अन्य कृषि योग्य भूमि" मानी जाती है, जबकि घर व सड़क निर्माण में उपयोग की गई भूमि "गैर-कृषि भूमि" कहलाती है।

1.7 भारत में भू-उपयोग प्ररूप

भू-उपयोग प्ररूप को निर्धारित करने वाले तत्त्व:-

भूमि का उपयोग किस प्रकार होगा, यह कई भौतिक और मानवीय तत्त्वों पर निर्भर करता है।

  1. भौतिक तत्त्व — भू-आकृति (समतल भूमि में खेती व बस्तियाँ आसान), मृदा (उपजाऊ मिट्टी वाले क्षेत्र कृषि के अनुकूल), जलवायु (वर्षा-तापमान फसल चयन तय करते हैं), जल उपलब्धता (सिंचाई पर निर्भर भू-उपयोग)।
  2. मानवीय तत्त्व — जनसंख्या घनत्व (अधिक घनत्व में आवास-सड़क हेतु अधिक उपयोग), प्रौद्योगिकी क्षमता (कठिन क्षेत्रों में भी खेती-खनन संभव), संस्कृति और परंपराएँ (स्थानीय रीति-रिवाज़ भू-उपयोग तय करते हैं)।
उदाहरण:- राजस्थान के शुष्क क्षेत्र में कम वर्षा के कारण खेती सीमित होती है, जबकि पंजाब में उन्नत सिंचाई और उपजाऊ मिट्टी के कारण भूमि का अधिक उपयोग कृषि के लिए किया जाता है।

1.8 भूमि निम्नीकरण और संरक्षण उपाय

भूमि निम्नीकरण:-

भूमि की गुणवत्ता में गिरावट आना, जिससे भूमि अपनी उपजाऊ क्षमता खोने लगती है। यह समस्या मानवीय गतिविधियों और प्राकृतिक कारणों दोनों से उत्पन्न होती है।

  1. खनन — ऊपरी उपजाऊ परत हटने से मिट्टी की संरचना नष्ट होती है।
  2. अतिचारण (Overgrazing) — बार-बार चराई से घास-पौधे नष्ट होकर भूक्षरण बढ़ता है।
  3. अति-सिंचाई — मिट्टी में लवण जमा होने से भूमि क्षारीय/लवणीय बनती है।
  4. औद्योगिक प्रदूषण — रासायनिक अपशिष्ट से मिट्टी की उर्वरता घटती है।
  5. वनोन्मूलन (Deforestation) — पेड़ों की कटाई से मिट्टी बहकर भूमि क्षतिग्रस्त होती है।
उदाहरण:- राजस्थान और गुजरात के कई क्षेत्रों में अतिचारण और अति-सिंचाई के कारण भूमि लवणीय हो गई है, जिससे वहाँ की खेती की उत्पादकता काफी कम हो गई है।

भूमि संरक्षण के उपाय:-

  1. वनारोपण — पेड़ मिट्टी को बाँधे रखते हैं और वर्षाजल से होने वाले क्षरण को रोकते हैं।
  2. पशुचारण नियंत्रण — नियंत्रित व योजनाबद्ध चराई से भूमि की उर्वरता बनी रहती है।
  3. रक्षक मेखला (शेल्टर बेल्ट) — पेड़ों की कतारें तेज हवाओं से मिट्टी उड़ने से रोकती हैं; शुष्क क्षेत्रों में विशेष उपयोगी।
  4. खनन नियंत्रण — वैज्ञानिक व सुरक्षित खनन तकनीकों से भूमि को कम नुकसान होता है।
  5. औद्योगिक जल का परिष्करण — उपचारित (ट्रीटेड) जल छोड़ने से भूमि प्रदूषण कम होता है।

1.9 मृदा संसाधन

1.9.1 मृदाओं का वर्गीकरण

मृदा संसाधन:-

पृथ्वी की ऊपरी परत, जिसे मिट्टी कहते हैं। यह पौधों को सहारा देती है, उनमें पोषक तत्व पहुँचाती है और कृषि का आधार बनाती है। मिट्टी कई छोटे-बड़े जीवों का प्राकृतिक घर भी होती है।

  1. कृषि का आधार — फसलें मिट्टी में उगती हैं।
  2. प्राकृतिक आवास — केंचुए, कीट, सूक्ष्मजीव आदि।
  3. पोषक तत्वों का स्रोत — पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करती है।
  4. वनस्पति और पर्यावरण का आधार — जंगल, घासभूमि, खेत सब मिट्टी पर निर्भर।
उदाहरण:- काली मिट्टी में कपास की खेती अच्छी होती है, जो दर्शाता है कि मिट्टी का प्रकार फसलों के उत्पादन को सीधे प्रभावित करता है।

मृदा का निर्माण:-

वह प्राकृतिक प्रक्रिया जिसके द्वारा कठोर चट्टानें टूटकर धीरे-धीरे बारीक कणों में बदल जाती हैं और मिट्टी का रूप ले लेती हैं। यह प्रक्रिया बहुत धीमी होती है — 1 सेमी मिट्टी बनने में भी हजारों वर्ष लग जाते हैं।

  1. प्राकृतिक कारकों का प्रभाव — तापमान परिवर्तन, जल का बहाव, हवा।
  2. भौतिक परिवर्तन — चट्टानों का छोटे टुकड़ों में टूटना।
  3. रासायनिक परिवर्तन — खनिजों का पानी-हवा से रासायनिक रूप से बदलना।
उदाहरण:- पहाड़ों में बारिश का पानी चट्टानों को लगातार काटता और घिसता है, जिससे वे बारीक कणों में बदलकर मिट्टी का रूप ले लेती हैं।

भारत में मृदा के प्रमुख प्रकार:-

  1. लाल एवं पीली मृदा
  2. जलोढ़ मृदा
  3. काली मृदा
  4. वन मृदा
  5. मरुस्थलीय मृदा
  6. लेटराइट मृदा
उदाहरण:- उत्तर भारत की गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी में जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है, इसलिए यहाँ धान और गेहूँ की खेती बड़े पैमाने पर होती है।

1.9.2 जलोढ़ मृदा

जलोढ़ मृदा:-

वह मिट्टी जो नदियाँ अपने साथ लाई हुई बारीक कणों — जैसे रेत, सिल्ट और मृत्तिका — को जमा करके बनाती हैं। यह मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है और भारत में कृषि का सबसे बड़ा आधार है।

  1. भारत के लगभग 45% क्षेत्र में पाई जाती है — देश की सबसे अधिक फैली हुई मिट्टी।
  2. सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी तंत्रों द्वारा निर्मित।
  3. रेत, सिल्ट और मृत्तिका अलग-अलग अनुपात में मिलते हैं, जिससे यह अत्यंत उपजाऊ बनती है।
  4. आयु के आधार पर दो प्रकार — बांगर (पुरानी जलोढ़) और खादर (नई जलोढ़, अधिक उपजाऊ)।
  5. गन्ना, चावल, गेहूँ, दालें आदि फसलों के लिए विशेष उपयोगी।
उदाहरण:- गंगा के मैदान की मिट्टी में गेहूँ और चावल की खेती बड़े पैमाने पर होती है — यह जलोढ़ मिट्टी की उच्च उपजाऊ क्षमता को दर्शाता है।

1.9.3 काली मृदा

काली मृदा (रेगर मृदा):-

एक महत्वपूर्ण भारतीय मिट्टी, जो मुख्यतः कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध है। इसका रंग काला होता है और यह बेसाल्ट चट्टानों के विघटन से बनती है।

  1. टिटैनीफेरस मैग्नेटाइट व जीवांश की उपस्थिति के कारण रंग गहरा होता है।
  2. इसमें आयरन, चूना, एल्युमीनियम और मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
  3. यह नमी को लंबे समय तक अपने अंदर बनाए रखती है।
  4. महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठारी भागों में अधिक पाई जाती है।
उदाहरण:- महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में कपास की खेती काली मिट्टी के कारण बहुत सफल होती है।

1.9.4 लाल और पीली मृदा

लाल एवं पीली मृदा:-

भारत की प्रमुख मिट्टियों में से एक, जिसका रंग लोहे की अधिकता के कारण लाल होता है और जहाँ नमी अधिक होती है वहाँ यह पीली दिखाई देती है। यह मिट्टी थोड़ी अम्लीय होती है, लेकिन चूना मिलाने से इसकी उर्वरता बढ़ाई जा सकती है।

  1. लोहे के कणों की अधिकता।
  2. अम्लीय प्रकृति; नाइट्रोजन-फॉस्फोरस की कमी।
  3. भौगोलिक क्षेत्र — उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा का मैदान, मेघालय की पहाड़ियाँ, दक्षिण भारत के कुछ हिस्से।
  4. उपयुक्त फसलें — बाजरा, दालें, मूंगफली, कुछ स्थानों पर कपास व आलू।
उदाहरण:- मेघालय की खासी पहाड़ियों की हल्की व जल-निकास वाली लाल मिट्टी में किसान दालें और मोटे अनाज उगाते हैं।

1.9.5 लेटराइट मृदा

लेटराइट मृदा:-

वह मिट्टी जो उच्च तापमान और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में निक्षालन (leaching) के कारण बनती है, जिससे खनिज धुल जाते हैं और यह अपेक्षाकृत कम उर्वर हो जाती है।

  1. अत्यधिक निक्षालन का परिणाम — बार-बार वर्षा से खनिज धुल जाते हैं।
  2. लोहे-एल्युमीनियम की अधिकता के कारण लाल-भूरा रंग।
  3. चाय, काजू और कॉफी जैसी फसलों के लिए उपयुक्त।
  4. उर्वरक व खाद के प्रयोग से उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
  5. कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।
उदाहरण:- केरल और कर्नाटक के पहाड़ी क्षेत्रों में चाय और काजू की खेती लेटराइट मिट्टी में बड़े पैमाने पर की जाती है।

1.9.6 मरुस्थलीय मृदा

मरुस्थलीय मृदा:-

वह मिट्टी जो शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है। यह अधिकतर रेतीली होती है और वर्षा की कमी के कारण इसकी उर्वरता कम होती है।

  1. रंग सामान्यतः लाल या भूरा; मिट्टी रेतीली एवं लवणीय।
  2. शुष्क जलवायु व उच्च तापमान के कारण जल का वाष्पन अधिक।
  3. ह्यूमस और नमी की मात्रा बहुत कम।
  4. उचित सिंचाई व जल प्रबंधन से इसे उपजाऊ बनाया जा सकता है।
उदाहरण:- राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र में नहरों द्वारा सिंचाई करने से मरुस्थलीय मिट्टी में गेहूँ और बाजरा जैसी फसलें उगाई जाती हैं।

पहाड़ी पद (पीडमॉन्ट ज़ोन):-

वह क्षेत्र जो किसी पर्वत या पर्वत शृंखला के ठीक तल में स्थित होता है। यह पर्वतों से नीचे की ओर फैला होता है और यहाँ पर्वतों से बहकर आई मिट्टी व अवसाद जमा हो जाते हैं। भू-आकृतिक दृष्टि से यह एक संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone) कहलाता है।

उदाहरण:- पश्चिमी घाट का पहाड़ी पद वह क्षेत्र है जो पश्चिमी घाट पर्वत शृंखला के तल पर स्थित है, जहाँ पर्वतों से बहकर आई मिट्टी का जमाव पाया जाता है।

दक्कन पट (लावा पठार):-

भारत के प्रायद्वीपीय पठार का वह भाग, जहाँ काली मिट्टी पाई जाती है। इसका निर्माण प्राचीन काल में हुए ज्वालामुखीय लावा के फैलाव से हुआ है।

  1. ज्वालामुखीय लावा से निर्मित।
  2. यहाँ रेगर मिट्टी (काली मिट्टी) पाई जाती है, जो अत्यंत उपजाऊ है।
  3. कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त क्षेत्र माना जाता है।
उदाहरण:- महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश का बड़ा भाग दक्कन पट क्षेत्र में आता है, जहाँ कपास की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।

1.9.7 वन मृदा

वन मृदा:-

वह मृदा जो मुख्यतः पर्वतीय और वन क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका निर्माण वहाँ की जलवायु, ऊँचाई, ढाल और वनस्पति के अनुसार होता है, जिस कारण अलग-अलग स्थानों पर इसकी संरचना में भिन्नता पाई जाती है।

  1. नदी घाटियों में यह मिट्टी अधिक उपजाऊ, सामान्यतः दोमट व सिल्टदार होती है।
  2. ऊँचे ढाल वाले क्षेत्रों में यह मिट्टी अपक्षालित (coarse) तथा ह्यूमस-रहित होती है।
  3. अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पोषक तत्वों के बहाव से उर्वरता कम हो जाती है।
उदाहरण:- हिमालयी क्षेत्र की नदी घाटियों में पाई जाने वाली वन मृदा अपेक्षाकृत उपजाऊ होती है, जबकि ऊँचे पहाड़ी ढालों पर पाई जाने वाली वन मृदा कम उपजाऊ होती है।

खादर एवं बांगर में अंतर

आधारखादरबांगर
मृदा का प्रकारनवीन जलोढ़ मृदाप्राचीन जलोढ़ मृदा
बनावटअधिक बारीक व रेतीलीकंकड़ व कैल्शियम कार्बोनेट (कंकर) युक्त
नवीकरणबाढ़ द्वारा बार-बार नवीकरण संभवबार-बार नवीकरण नहीं होता
स्थितिनदी के पास, डेल्टा व बाढ़-प्रभावित मैदानों मेंनदी से दूर, अपेक्षाकृत ऊँचे क्षेत्र में
उपजाऊपनअत्यधिक उपजाऊखादर की तुलना में कम उपजाऊ
उदाहरण:- गंगा नदी के किनारे पाए जाने वाले नए बाढ़ मैदानों की मिट्टी खादर कहलाती है, जबकि उनसे दूर ऊँचे क्षेत्र में स्थित पुरानी जलोढ़ मिट्टी बांगर कहलाती है।

1.10 मृदा अपरदन और संरक्षण

मृदा अपरदन:-

मृदा की ऊपरी उपजाऊ परत के कटाव और उसके एक स्थान से दूसरे स्थान पर बह जाने की प्रक्रिया। यह मुख्यतः जल, वायु और मानवीय क्रियाओं के कारण होती है, जिससे भूमि की उर्वरता कम हो जाती है।

उदाहरण:- तेज़ वर्षा के समय खेतों की उपजाऊ मिट्टी का बह जाना मृदा अपरदन का स्पष्ट उदाहरण है।

मृदा अपरदन के कारण

मुख्य कारण:-

  1. वनोन्मूलन — जड़ें नष्ट होने से मिट्टी आसानी से बहती है।
  2. अतिपशुचारण — घास नष्ट होकर मिट्टी खुली रह जाती है।
  3. निर्माण एवं खनन कार्य — भूमि की ऊपरी परत हट जाती है।
  4. प्राकृतिक तत्व — वर्षा, तेज नदियाँ, बहता जल और पवन।
  5. कृषि की गलत विधियाँ — ढालू भूमि पर गलत तरीके से जुताई।
  6. पवन क्रिया — शुष्क व खुले मैदानों में तेज हवा मिट्टी उड़ा ले जाती है।
उदाहरण:- राजस्थान के शुष्क क्षेत्र में तेज हवाओं द्वारा मिट्टी का उड़ जाना पवन अपरदन का उदाहरण है, जिससे भूमि की उर्वरता घट जाती है।

मृदा संरक्षण के उपाय

प्रमुख समाधान:-

  1. समोच्च जुताई — ढाल वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाने से जल का बहाव कम होता है।
  2. सीढ़ीनुमा खेती (Terrace Farming) — पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ियाँ बनाकर खेती करने से जल का बहाव रुकता है।
  3. पट्टी कृषि (Strip Cropping) — फसलों के बीच घास की पट्टियाँ उगाने से कटाव कम होता है।
  4. रक्षक मेखला / वनरोपण — पेड़ों की कतारें पवन व जल अपरदन रोकती हैं।
  5. अतिपशुचारण पर नियंत्रण — चराई नियंत्रित करने से घास व मृदा दोनों का संरक्षण होता है।
उदाहरण:- पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेती अपनाने से वर्षा का पानी धीरे-धीरे बहता है, जिससे मृदा का कटाव रुकता है और फसल उत्पादन बढ़ता है।

अवनालिकाएँ (Gullies):-

जब बहता हुआ जल मृत्तिका (मिट्टी) से बनी भूमि को काटता हुआ आगे बढ़ता है, तो सतह पर गहरी और संकरी नालियाँ बन जाती हैं। इन्हें अवनालिकाएँ कहा जाता है — यह मृदा अपरदन का एक गंभीर रूप है, जिससे भूमि खेती के योग्य नहीं रह जाती।

उदाहरण:- चंबल नदी घाटी क्षेत्र में बहते जल द्वारा बनी गहरी खाइयाँ अवनालिकाओं का प्रमुख उदाहरण हैं, जहाँ भूमि बड़े पैमाने पर कट चुकी है।

उत्खात भूमि (Badland):-

वह भूमि जो मृदा अपरदन के कारण इतनी अधिक कट जाती है कि वह कृषि योग्य नहीं रह जाती। लगातार बहते जल द्वारा गहरी नालियाँ व खाइयाँ बन जाने से भूमि ऊबड़-खाबड़ हो जाती है।

उदाहरण:- चंबल नदी के आसपास का क्षेत्र उत्खात भूमि का प्रसिद्ध उदाहरण है, जहाँ गहरी खाइयों के कारण खेती करना कठिन हो गया है।

खड्डू भूमि (बीहड़):-

वह भूमि जो अत्यधिक मृदा अपरदन के कारण गहरी नालियों व खाइयों में बदल जाती है और कृषि योग्य नहीं रहती। भारत में विशेष रूप से चंबल बेसिन क्षेत्र में ऐसी उत्खात भूमि को खड्डू भूमि कहा जाता है।

उदाहरण:- मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के चंबल नदी घाटी क्षेत्र में पाई जाने वाली बीहड़ भूमि को खड्डू भूमि कहा जाता है।

पवन अपरदन:-

वह प्रक्रिया जिसमें हवा के प्रभाव से मैदान या ढालू भूमि से मृदा (मिट्टी) उड़ाई जाती है। यह मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत को हटा देती है और भूमि की उर्वरता कम कर देती है।

  1. मुख्यतः शुष्क और रेतीले क्षेत्रों में होता है।
  2. मिट्टी की ऊपरी परत हवा के बहाव से हट जाती है।
  3. कृषि योग्य भूमि की उत्पादकता कम हो जाती है।
  4. ढालू और उजाड़ भूमि अधिक प्रभावित होती है।
उदाहरण:- राजस्थान के थार मरुस्थल और गुजरात के रेतीले क्षेत्रों में हवा से मिट्टी उड़ने की प्रक्रिया पाई जाती है।
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