CLASS 10 GEOGRAPHY NOTES IN HINDI CHAPTER - 1
संसाधन और विकास / Resources and Development
| Textbook | NCERT |
|---|---|
| Class | Class 10 |
| Subject | Geography |
| Chapter | Chapter 1 |
| Chapter Name | संसाधन और विकास |
| Medium | Hindi |
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
1.1 संसाधनों के प्रकार
संसाधन:-
वे सभी वस्तुएँ या पदार्थ जो हमें प्रकृति में उपलब्ध होते हैं और हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में उपयोग किए जा सकते हैं। किसी वस्तु को संसाधन तभी माना जाता है, जब उसे इस्तेमाल करने के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी उपलब्ध हो, उसका उपयोग आर्थिक रूप से लाभकारी हो, और समाज में उसका उपयोग सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य हो।
- संसाधन प्राकृतिक, मानव या मानव-निर्मित हो सकते हैं।
- यह हमारी जरूरतों को पूरा करने में सहायक होते हैं।
- किसी वस्तु के संसाधन बनने के लिए तकनीक और उपयोगिता आवश्यक होती है।
- संसाधनों का समझदारी से Fउपयोग भविष्य के लिए जरूरी है।
संसाधनों का वर्गीकरण — चार आधार:-
- उत्पत्ति के आधार पर — जैव संसाधन, अजैव संसाधन
- समाप्यता के आधार पर — नवीकरणयोग्य संसाधन, अनवीकरणयोग्य संसाधन
- स्वामित्व के आधार पर — व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय संसाधन
- विकास के स्तर के आधार पर — संभावित, विकसित, भंडार, संचित कोष
1.1.1 उत्पत्ति के आधार पर वर्गीकरण
जैव संसाधन (Biotic Resources):-
वे संसाधन जो हमें जीवमंडल से प्राप्त होते हैं और जिनमें जीवन मौजूद होता है। इनमें सभी जीवित प्राणी शामिल होते हैं।
अजैव संसाधन (Abiotic Resources):-
वे सभी संसाधन जो निर्जीव वस्तुओं से बने होते हैं। इनमें भौतिक और रासायनिक तत्व शामिल होते हैं।
1.1.2 समाप्यता के आधार पर वर्गीकरण
नवीकरणीय संसाधन (Renewable Resources):-
वे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा दोबारा उपयोगी बनाया जा सकता है। ये समय के साथ पुनः भर जाते हैं और इनका समाप्त होना मुश्किल होता है।
अनवीकरणीय संसाधन (Non-Renewable Resources):-
वे संसाधन जिन्हें एक बार उपयोग करने पर दोबारा उपयोग में नहीं लाया जा सकता। इनका निर्माण बहुत लंबे भूवैज्ञानिक समय में होता है और ये सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं।
1.1.3 स्वामित्व के आधार पर वर्गीकरण
व्यक्तिगत संसाधन (Individual Resources):-
वे संसाधन जिनका स्वामित्व किसी एक व्यक्ति के पास होता है। इनका उपयोग और नियंत्रण निजी होता है।
सामुदायिक संसाधन (Community Owned Resources):-
वे संसाधन जिनका उपयोग किसी समुदाय के सभी लोग मिलकर करते हैं। इनका स्वामित्व पूरे समुदाय का होता है।
राष्ट्रीय संसाधन (National Resources):-
वे सभी संसाधन जो देश की भौगोलिक सीमा के भीतर पाए जाते हैं। इनका स्वामित्व सरकार के पास होता है और इन्हें देश की संपत्ति माना जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय संसाधन (International Resources):-
तटरेखा से 200 समुद्री मील से आगे के महासागरीय क्षेत्र पर किसी एक देश का अधिकार नहीं होता। ऐसे संसाधन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की निगरानी में आते हैं और सभी देशों के लिए उपलब्ध होते हैं।
1.1.4 विकास के स्तर के आधार पर वर्गीकरण
संभावी संसाधन (Potential Resources):-
वे संसाधन जो किसी क्षेत्र में उपलब्ध तो हैं, परंतु जिनका उपयोग अभी तक शुरू नहीं हुआ। इनका भविष्य में उपयोग किया जा सकता है।
विकसित संसाधन (Developed Resources):-
वे संसाधन जिनकी मात्रा, गुणवत्ता और उपयोग पूरी तरह से ज्ञात हो तथा इनका प्रयोग किया जा रहा हो। इन पर तकनीक और प्रबंधन पूरी तरह कार्यरत होते हैं।
भंडारित संसाधन (Stock):-
वे संसाधन जो पर्यावरण में उपलब्ध हैं, लेकिन उपयोग की तकनीक विकसित न होने के कारण इंसान की पहुँच से बाहर हैं।
संचित संसाधन / संचित कोष (Reserves):-
वे संसाधन जिन्हें उपयोग करने की तकनीक मौजूद है, लेकिन इन्हें अभी भविष्य के लिए सुरक्षित रखा गया है। देश की आवश्यकता के अनुसार इन्हें बाद में उपयोग में लाया जाता है।
1.2 संसाधनों का विकास
अंधाधुंध उपयोग से उत्पन्न समस्याएँ:-
लंबे समय तक यह माना गया कि संसाधन प्रकृति की असीम देन हैं। इसी विश्वास के कारण मानव ने इनका अंधाधुंध उपयोग किया, जिससे कई गंभीर समस्याएँ पैदा हुईं।
- लालच के कारण संसाधनों का ह्रास — अत्यधिक लाभ के लिए तीव्र दोहन।
- संसाधनों का असमान वितरण — समाज संसाधन-संपन्न और संसाधन-हीन वर्गों में बँट गया।
- वैश्विक पारिस्थितिकी संकट — भूमंडलीय तापन, ओजोन परत का अवक्षय, वायु-जल-मृदा प्रदूषण, भूमि निम्नीकरण।
- संसाधनों के न्यायसंगत वितरण की आवश्यकता बढ़ी।
सतत् पोषणीय विकास:-
संसाधनों का ऐसा विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग, जिससे वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताएँ भी पूरी हों और भावी पीढ़ियाँ भी इन संसाधनों का लाभ उठा सकें।
- संसाधनों का सोच-समझकर और सीमित उपयोग।
- पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना विकास करना।
- वर्तमान और भविष्य — दोनों पीढ़ियों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना।
- नवीकरणीय संसाधनों का संरक्षण और पुनः उपयोग।
एजेंडा 21:-
एक वैश्विक कार्य-योजना, जिसे वर्ष 1992 में रियो डी जेनेरो (ब्राज़ील) में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (UNCED) के दौरान पारित किया गया। इसमें विश्व के राष्ट्राध्यक्षों ने पर्यावरण संरक्षण और सतत् विकास के लिए संयुक्त प्रयास करने का संकल्प लिया।
- वैश्विक स्तर पर सहयोग बढ़ाना।
- पर्यावरणीय क्षति को रोकना और प्रकृति का संतुलन बनाए रखना।
- गरीबी में कमी लाना।
- समान अधिकारों और पारस्परिक जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए सतत् विकास की दिशा में विश्व को आगे बढ़ाना।
1.3 संसाधन नियोजन
संसाधन नियोजन:-
ऐसे उपायों, तकनीकों और योजनाओं का निर्माण, जिनकी मदद से संसाधनों का उचित, संतुलित और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
- संसाधनों की पहचान और उनका विस्तृत सर्वेक्षण।
- संसाधनों के उपयोग की प्राथमिकताएँ तय करना।
- संसाधनों का संतुलित और विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना।
- वर्तमान व भविष्य दोनों के लिए संसाधनों का संरक्षण।
- क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने में मदद करना।
1.4 भारत में संसाधन नियोजन
भारत में संसाधन नियोजन के मुख्य बिंदु:-
भारत में संसाधनों के संतुलित विकास और उपयोग के लिए संसाधन नियोजन को प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही प्रमुख लक्ष्य के रूप में अपनाया गया।
- संसाधनों की पहचान और सूची बनाना — विभिन्न राज्यों व क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों का सर्वेक्षण।
- कौशल, तकनीक और संस्थागत ढाँचे का उपयोग — विशेषज्ञों के कौशल और सरकारी संस्थाओं के सहयोग से नियोजन ढाँचा तैयार करना।
- संसाधन नियोजन और विकास योजना में तालमेल — वर्तमान व भविष्य दोनों की आवश्यकताओं के अनुरूप संसाधनों का उपयोग।
संसाधन संरक्षण:-
जल, भूमि, वनस्पति, मृदा तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रबंधन और समझदारी से उपयोग, ताकि इनका उपयोग आज भी हो सके और भावी पीढ़ियों की आवश्यकताएँ भी बिना किसी कमी के पूरी होती रहें।
- प्राकृतिक संसाधनों का सीमित और विवेकपूर्ण उपयोग।
- जल, भूमि और मृदा की गुणवत्ता को बनाए रखना।
- वनों, वन्यजीवों और नवीकरणीय संसाधनों का संरक्षण।
- भावी पीढ़ियों के लिए संसाधनों का सुरक्षित भंडारण।
1.5 भू-संसाधन
भू-संसाधन:-
भूमि से प्राप्त होने वाले सभी प्राकृतिक लाभ। प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीव, मानव जीवन, कृषि कार्य, उद्योग, परिवहन और संचार जैसी सभी व्यवस्थाएँ भूमि के सहारे ही चलती हैं। चूँकि भूमि एक सीमित संसाधन है, इसलिए इसका उपयोग सावधानीपूर्वक व योजनाबद्ध ढंग से करना आवश्यक है।
भारत में भू-संसाधनों का वर्गीकरण:-
- मैदानी क्षेत्र (लगभग 43%) — समतल और उपजाऊ; कृषि व औद्योगिक विकास के लिए अनुकूल; परिवहन-संचार नेटवर्क विकसित करना आसान।
- पर्वतीय क्षेत्र (लगभग 30%) — हिमालय जैसी पर्वत शृंखलाएँ; बारहमासी नदियों के उद्गम स्थल; पर्यटन व पारिस्थितिकी संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण।
- पठारी क्षेत्र (लगभग 27%) — खनिज पदार्थ, जीवाश्म ईंधन व वन संसाधनों का विशाल भंडार; उद्योगों व खनन कार्यों के लिए उपयोगी।
1.6 भू-उपयोग
भू-उपयोग:-
वह प्रक्रिया जिसके तहत भूमि का उपयोग विभिन्न आर्थिक गतिविधियों जैसे कृषि, वानिकी, निर्माण, उद्योग, परिवहन आदि के लिए किया जाता है। भू-उपयोग को कई प्राकृतिक और मानव-निर्मित कारक प्रभावित करते हैं।
भू-उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्व:-
- वन क्षेत्र — घने पेड़ों व प्राकृतिक वनस्पति से ढकी भूमि; पारिस्थितिकी संतुलन के लिए आवश्यक।
- कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि — बंजर भूमि, अथवा गैर-कृषि उपयोग जैसे उद्योग, सड़कें, इमारतें।
- परती भूमि — वर्तमान परती (1 वर्ष या कम से खेती नहीं) और अन्य परती (1 से 5 वर्ष तक खेती नहीं)।
- अन्य कृषि योग्य भूमि — स्थायी चरागाह, गोचर भूमि, बाग-बगीचे, वृक्ष फसलें; 5 वर्ष या अधिक समय से खाली।
- शुद्ध बोया गया क्षेत्र — जिस भूमि पर एक कृषि वर्ष में केवल एक बार फसल बोई जाती है।
1.7 भारत में भू-उपयोग प्ररूप
भू-उपयोग प्ररूप को निर्धारित करने वाले तत्त्व:-
भूमि का उपयोग किस प्रकार होगा, यह कई भौतिक और मानवीय तत्त्वों पर निर्भर करता है।
- भौतिक तत्त्व — भू-आकृति (समतल भूमि में खेती व बस्तियाँ आसान), मृदा (उपजाऊ मिट्टी वाले क्षेत्र कृषि के अनुकूल), जलवायु (वर्षा-तापमान फसल चयन तय करते हैं), जल उपलब्धता (सिंचाई पर निर्भर भू-उपयोग)।
- मानवीय तत्त्व — जनसंख्या घनत्व (अधिक घनत्व में आवास-सड़क हेतु अधिक उपयोग), प्रौद्योगिकी क्षमता (कठिन क्षेत्रों में भी खेती-खनन संभव), संस्कृति और परंपराएँ (स्थानीय रीति-रिवाज़ भू-उपयोग तय करते हैं)।
1.8 भूमि निम्नीकरण और संरक्षण उपाय
भूमि निम्नीकरण:-
भूमि की गुणवत्ता में गिरावट आना, जिससे भूमि अपनी उपजाऊ क्षमता खोने लगती है। यह समस्या मानवीय गतिविधियों और प्राकृतिक कारणों दोनों से उत्पन्न होती है।
- खनन — ऊपरी उपजाऊ परत हटने से मिट्टी की संरचना नष्ट होती है।
- अतिचारण (Overgrazing) — बार-बार चराई से घास-पौधे नष्ट होकर भूक्षरण बढ़ता है।
- अति-सिंचाई — मिट्टी में लवण जमा होने से भूमि क्षारीय/लवणीय बनती है।
- औद्योगिक प्रदूषण — रासायनिक अपशिष्ट से मिट्टी की उर्वरता घटती है।
- वनोन्मूलन (Deforestation) — पेड़ों की कटाई से मिट्टी बहकर भूमि क्षतिग्रस्त होती है।
भूमि संरक्षण के उपाय:-
- वनारोपण — पेड़ मिट्टी को बाँधे रखते हैं और वर्षाजल से होने वाले क्षरण को रोकते हैं।
- पशुचारण नियंत्रण — नियंत्रित व योजनाबद्ध चराई से भूमि की उर्वरता बनी रहती है।
- रक्षक मेखला (शेल्टर बेल्ट) — पेड़ों की कतारें तेज हवाओं से मिट्टी उड़ने से रोकती हैं; शुष्क क्षेत्रों में विशेष उपयोगी।
- खनन नियंत्रण — वैज्ञानिक व सुरक्षित खनन तकनीकों से भूमि को कम नुकसान होता है।
- औद्योगिक जल का परिष्करण — उपचारित (ट्रीटेड) जल छोड़ने से भूमि प्रदूषण कम होता है।
1.9 मृदा संसाधन
1.9.1 मृदाओं का वर्गीकरण
मृदा संसाधन:-
पृथ्वी की ऊपरी परत, जिसे मिट्टी कहते हैं। यह पौधों को सहारा देती है, उनमें पोषक तत्व पहुँचाती है और कृषि का आधार बनाती है। मिट्टी कई छोटे-बड़े जीवों का प्राकृतिक घर भी होती है।
- कृषि का आधार — फसलें मिट्टी में उगती हैं।
- प्राकृतिक आवास — केंचुए, कीट, सूक्ष्मजीव आदि।
- पोषक तत्वों का स्रोत — पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करती है।
- वनस्पति और पर्यावरण का आधार — जंगल, घासभूमि, खेत सब मिट्टी पर निर्भर।
मृदा का निर्माण:-
वह प्राकृतिक प्रक्रिया जिसके द्वारा कठोर चट्टानें टूटकर धीरे-धीरे बारीक कणों में बदल जाती हैं और मिट्टी का रूप ले लेती हैं। यह प्रक्रिया बहुत धीमी होती है — 1 सेमी मिट्टी बनने में भी हजारों वर्ष लग जाते हैं।
- प्राकृतिक कारकों का प्रभाव — तापमान परिवर्तन, जल का बहाव, हवा।
- भौतिक परिवर्तन — चट्टानों का छोटे टुकड़ों में टूटना।
- रासायनिक परिवर्तन — खनिजों का पानी-हवा से रासायनिक रूप से बदलना।
भारत में मृदा के प्रमुख प्रकार:-
- लाल एवं पीली मृदा
- जलोढ़ मृदा
- काली मृदा
- वन मृदा
- मरुस्थलीय मृदा
- लेटराइट मृदा
1.9.2 जलोढ़ मृदा
जलोढ़ मृदा:-
वह मिट्टी जो नदियाँ अपने साथ लाई हुई बारीक कणों — जैसे रेत, सिल्ट और मृत्तिका — को जमा करके बनाती हैं। यह मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है और भारत में कृषि का सबसे बड़ा आधार है।
- भारत के लगभग 45% क्षेत्र में पाई जाती है — देश की सबसे अधिक फैली हुई मिट्टी।
- सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी तंत्रों द्वारा निर्मित।
- रेत, सिल्ट और मृत्तिका अलग-अलग अनुपात में मिलते हैं, जिससे यह अत्यंत उपजाऊ बनती है।
- आयु के आधार पर दो प्रकार — बांगर (पुरानी जलोढ़) और खादर (नई जलोढ़, अधिक उपजाऊ)।
- गन्ना, चावल, गेहूँ, दालें आदि फसलों के लिए विशेष उपयोगी।
1.9.3 काली मृदा
काली मृदा (रेगर मृदा):-
एक महत्वपूर्ण भारतीय मिट्टी, जो मुख्यतः कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध है। इसका रंग काला होता है और यह बेसाल्ट चट्टानों के विघटन से बनती है।
- टिटैनीफेरस मैग्नेटाइट व जीवांश की उपस्थिति के कारण रंग गहरा होता है।
- इसमें आयरन, चूना, एल्युमीनियम और मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
- यह नमी को लंबे समय तक अपने अंदर बनाए रखती है।
- महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठारी भागों में अधिक पाई जाती है।
1.9.4 लाल और पीली मृदा
लाल एवं पीली मृदा:-
भारत की प्रमुख मिट्टियों में से एक, जिसका रंग लोहे की अधिकता के कारण लाल होता है और जहाँ नमी अधिक होती है वहाँ यह पीली दिखाई देती है। यह मिट्टी थोड़ी अम्लीय होती है, लेकिन चूना मिलाने से इसकी उर्वरता बढ़ाई जा सकती है।
- लोहे के कणों की अधिकता।
- अम्लीय प्रकृति; नाइट्रोजन-फॉस्फोरस की कमी।
- भौगोलिक क्षेत्र — उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा का मैदान, मेघालय की पहाड़ियाँ, दक्षिण भारत के कुछ हिस्से।
- उपयुक्त फसलें — बाजरा, दालें, मूंगफली, कुछ स्थानों पर कपास व आलू।
1.9.5 लेटराइट मृदा
लेटराइट मृदा:-
वह मिट्टी जो उच्च तापमान और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में निक्षालन (leaching) के कारण बनती है, जिससे खनिज धुल जाते हैं और यह अपेक्षाकृत कम उर्वर हो जाती है।
- अत्यधिक निक्षालन का परिणाम — बार-बार वर्षा से खनिज धुल जाते हैं।
- लोहे-एल्युमीनियम की अधिकता के कारण लाल-भूरा रंग।
- चाय, काजू और कॉफी जैसी फसलों के लिए उपयुक्त।
- उर्वरक व खाद के प्रयोग से उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
- कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।
1.9.6 मरुस्थलीय मृदा
मरुस्थलीय मृदा:-
वह मिट्टी जो शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है। यह अधिकतर रेतीली होती है और वर्षा की कमी के कारण इसकी उर्वरता कम होती है।
- रंग सामान्यतः लाल या भूरा; मिट्टी रेतीली एवं लवणीय।
- शुष्क जलवायु व उच्च तापमान के कारण जल का वाष्पन अधिक।
- ह्यूमस और नमी की मात्रा बहुत कम।
- उचित सिंचाई व जल प्रबंधन से इसे उपजाऊ बनाया जा सकता है।
पहाड़ी पद (पीडमॉन्ट ज़ोन):-
वह क्षेत्र जो किसी पर्वत या पर्वत शृंखला के ठीक तल में स्थित होता है। यह पर्वतों से नीचे की ओर फैला होता है और यहाँ पर्वतों से बहकर आई मिट्टी व अवसाद जमा हो जाते हैं। भू-आकृतिक दृष्टि से यह एक संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone) कहलाता है।
दक्कन पट (लावा पठार):-
भारत के प्रायद्वीपीय पठार का वह भाग, जहाँ काली मिट्टी पाई जाती है। इसका निर्माण प्राचीन काल में हुए ज्वालामुखीय लावा के फैलाव से हुआ है।
- ज्वालामुखीय लावा से निर्मित।
- यहाँ रेगर मिट्टी (काली मिट्टी) पाई जाती है, जो अत्यंत उपजाऊ है।
- कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त क्षेत्र माना जाता है।
1.9.7 वन मृदा
वन मृदा:-
वह मृदा जो मुख्यतः पर्वतीय और वन क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका निर्माण वहाँ की जलवायु, ऊँचाई, ढाल और वनस्पति के अनुसार होता है, जिस कारण अलग-अलग स्थानों पर इसकी संरचना में भिन्नता पाई जाती है।
- नदी घाटियों में यह मिट्टी अधिक उपजाऊ, सामान्यतः दोमट व सिल्टदार होती है।
- ऊँचे ढाल वाले क्षेत्रों में यह मिट्टी अपक्षालित (coarse) तथा ह्यूमस-रहित होती है।
- अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पोषक तत्वों के बहाव से उर्वरता कम हो जाती है।
खादर एवं बांगर में अंतर
| आधार | खादर | बांगर |
|---|---|---|
| मृदा का प्रकार | नवीन जलोढ़ मृदा | प्राचीन जलोढ़ मृदा |
| बनावट | अधिक बारीक व रेतीली | कंकड़ व कैल्शियम कार्बोनेट (कंकर) युक्त |
| नवीकरण | बाढ़ द्वारा बार-बार नवीकरण संभव | बार-बार नवीकरण नहीं होता |
| स्थिति | नदी के पास, डेल्टा व बाढ़-प्रभावित मैदानों में | नदी से दूर, अपेक्षाकृत ऊँचे क्षेत्र में |
| उपजाऊपन | अत्यधिक उपजाऊ | खादर की तुलना में कम उपजाऊ |
1.10 मृदा अपरदन और संरक्षण
मृदा अपरदन:-
मृदा की ऊपरी उपजाऊ परत के कटाव और उसके एक स्थान से दूसरे स्थान पर बह जाने की प्रक्रिया। यह मुख्यतः जल, वायु और मानवीय क्रियाओं के कारण होती है, जिससे भूमि की उर्वरता कम हो जाती है।
मृदा अपरदन के कारण
मुख्य कारण:-
- वनोन्मूलन — जड़ें नष्ट होने से मिट्टी आसानी से बहती है।
- अतिपशुचारण — घास नष्ट होकर मिट्टी खुली रह जाती है।
- निर्माण एवं खनन कार्य — भूमि की ऊपरी परत हट जाती है।
- प्राकृतिक तत्व — वर्षा, तेज नदियाँ, बहता जल और पवन।
- कृषि की गलत विधियाँ — ढालू भूमि पर गलत तरीके से जुताई।
- पवन क्रिया — शुष्क व खुले मैदानों में तेज हवा मिट्टी उड़ा ले जाती है।
मृदा संरक्षण के उपाय
प्रमुख समाधान:-
- समोच्च जुताई — ढाल वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाने से जल का बहाव कम होता है।
- सीढ़ीनुमा खेती (Terrace Farming) — पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ियाँ बनाकर खेती करने से जल का बहाव रुकता है।
- पट्टी कृषि (Strip Cropping) — फसलों के बीच घास की पट्टियाँ उगाने से कटाव कम होता है।
- रक्षक मेखला / वनरोपण — पेड़ों की कतारें पवन व जल अपरदन रोकती हैं।
- अतिपशुचारण पर नियंत्रण — चराई नियंत्रित करने से घास व मृदा दोनों का संरक्षण होता है।
अवनालिकाएँ (Gullies):-
जब बहता हुआ जल मृत्तिका (मिट्टी) से बनी भूमि को काटता हुआ आगे बढ़ता है, तो सतह पर गहरी और संकरी नालियाँ बन जाती हैं। इन्हें अवनालिकाएँ कहा जाता है — यह मृदा अपरदन का एक गंभीर रूप है, जिससे भूमि खेती के योग्य नहीं रह जाती।
उत्खात भूमि (Badland):-
वह भूमि जो मृदा अपरदन के कारण इतनी अधिक कट जाती है कि वह कृषि योग्य नहीं रह जाती। लगातार बहते जल द्वारा गहरी नालियाँ व खाइयाँ बन जाने से भूमि ऊबड़-खाबड़ हो जाती है।
खड्डू भूमि (बीहड़):-
वह भूमि जो अत्यधिक मृदा अपरदन के कारण गहरी नालियों व खाइयों में बदल जाती है और कृषि योग्य नहीं रहती। भारत में विशेष रूप से चंबल बेसिन क्षेत्र में ऐसी उत्खात भूमि को खड्डू भूमि कहा जाता है।
पवन अपरदन:-
वह प्रक्रिया जिसमें हवा के प्रभाव से मैदान या ढालू भूमि से मृदा (मिट्टी) उड़ाई जाती है। यह मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत को हटा देती है और भूमि की उर्वरता कम कर देती है।
- मुख्यतः शुष्क और रेतीले क्षेत्रों में होता है।
- मिट्टी की ऊपरी परत हवा के बहाव से हट जाती है।
- कृषि योग्य भूमि की उत्पादकता कम हो जाती है।
- ढालू और उजाड़ भूमि अधिक प्रभावित होती है।