Class 10 geography Notes in hindI Chapter - 1
Chapter 1: Resources and Development
Chapter Introduction:
This chapter explains different types of resources, their classification, and the importance of resource planning. It helps students understand sustainable development and proper utilization of natural resources.
FAQ
Ques. Why is resource planning important?
Ans. Resource planning ensures proper use and conservation of resources for future generations.
CLASS 10 GEOGRAPHY NOTES IN HINDI
CHAPTER 1 : संसाधन एवं विकास
प्रश्न :- संसाधन क्या होते हैं? संसाधन की परिभाषा लिखिए।
उत्तर :- संसाधन :- वे सभी वस्तुएँ या पदार्थ होते हैं जो हमें प्रकृति में उपलब्ध होते हैं और हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में उपयोग किए जा सकते हैं। किसी वस्तु को संसाधन तभी माना जाता है, जब हमारे पास उसे इस्तेमाल करने के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी उपलब्ध हो, उसका उपयोग आर्थिक रूप से लाभकारी हो, और समाज में उसका उपयोग स्वीकार्य (सांस्कृतिक रूप से मान्य) हो।संसाधन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. संसाधन प्रकृति, मानव या मानव-निर्मित हो सकते हैं।
2. यह हमारी जरूरतों को पूरा करने में सहायक होते हैं।
3. किसी वस्तु के संसाधन बनने के लिए तकनीक और उपयोगिता आवश्यक होती है।
4. संसाधनों का समझदारी से उपयोग भविष्य के लिए जरूरी है।
उदाहरण :-
पानी एक प्राकृतिक संसाधन है क्योंकि यह जीवन, खेती, उद्योग और घरेलू कार्यों में उपयोग किया जाता है तथा इसे उपयोग करने की तकनीक हमारे पास उपलब्ध है।
प्रश्न :- संसाधनों का वर्गीकरण किन-किन आधारों पर किया जाता है?
उत्तर :- संसाधनों का वर्गीकरण निम्नलिखित चार मुख्य आधारों पर किया जाता है :-
1. उत्पत्ति के आधार पर
(i) जैव संसाधन (Biotic Resources)
(ii) अजैव संसाधन (Abiotic Resources)
2. समाप्यता (उपयोग की क्षमता) के आधार पर
(i) नवीकरण योग्य संसाधन (Renewable Resources)
(ii) अनवीकरण योग्य संसाधन (Non-Renewable Resources)
3. स्वामित्व के आधार पर
(i) व्यक्तिगत संसाधन (Individual Resources)
(ii) सामुदायिक संसाधन (Community Resources)
(iii) राष्ट्रीय संसाधन (National Resources)
(iv) अंतर्राष्ट्रीय संसाधन (International Resources)
4. विकास के स्तर के आधार पर
(i) संभावित संसाधन (Potential Resources)
(ii) विकसित संसाधन (Developed Resources)
(iii) भंडार (Stock)
(iv) संचित कोष (Reserves)
प्रश्न :- उत्पत्ति के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण समझाइए।
उत्तर :- उत्पत्ति के आधार पर संसाधनों को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है :-
1. जैव संसाधन (Biotic Resources) :- वे संसाधन जो हमें जीवमंडल से प्राप्त होते हैं और जिनमें जीवन मौजूद होता है, जैव संसाधन कहलाते हैं। इनमें सभी जीवित प्राणी शामिल होते हैं।
उदाहरण :-
मनुष्य, पशु, पक्षी, पेड़-पौधे, प्राणिजात आदि।
2. अजैव संसाधन (Abiotic Resources) :- वे सभी संसाधन जो निर्जीव वस्तुओं से बने होते हैं, अजैव संसाधन कहलाते हैं। इनमें भौतिक और रासायनिक तत्व शामिल होते हैं।
उदाहरण :-
चट्टानें, धातुएँ, जल, हवा, खनिज आदि।
प्रश्न :- समाप्यता के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण समझाइए।
उत्तर :- समाप्यता (उपयोग की क्षमता) के आधार पर संसाधनों को दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है :-
1. नवीकरणीय संसाधन (Renewable Resources) :- वे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा दोबारा उपयोगी बनाया जा सकता है। ये समय के साथ पुनः भर जाते हैं और इनका समाप्त होना मुश्किल होता है।
उदाहरण :-
वायु, जल, सूर्य का प्रकाश, वनस्पति आदि।
2. अनवीकरणीय संसाधन (Non-Renewable Resources) :- वे संसाधन जिन्हें एक बार उपयोग करने पर दोबारा उपयोग में नहीं लाया जा सकता। इनका निर्माण बहुत लंबे भूवैज्ञानिक समय में होता है और ये सीमित मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
उदाहरण :-
कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, धात्विक खनिज आदि।
प्रश्न :- स्वामित्व के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण समझाइए।
उत्तर :- स्वामित्व के आधार पर संसाधनों को चार मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है :-
1. व्यक्तिगत संसाधन (Individual Resources) :- वे संसाधन जिनका स्वामित्व किसी एक व्यक्ति के पास होता है, व्यक्तिगत संसाधन कहलाते हैं। इनका उपयोग और नियंत्रण निजी होता है।
उदाहरण :-
किसान की निजी जमीन, मकान, वाहन आदि।
2. सामुदायिक संसाधन (Community Owned Resources) :- वे संसाधन जिनका उपयोग किसी समुदाय के सभी लोग मिलकर करते हैं, सामुदायिक संसाधन कहलाते हैं। इनका स्वामित्व पूरे समुदाय का होता है।
उदाहरण :-
गाँव का तालाब, सामुदायिक कुआँ, सार्वजनिक पार्क।
3. राष्ट्रीय संसाधन (National Resources) :- वे सभी संसाधन जो देश की भौगोलिक सीमा के भीतर पाए जाते हैं, राष्ट्रीय संसाधन कहलाते हैं। इनका स्वामित्व सरकार के पास होता है और इन्हें देश की संपत्ति माना जाता है।
उदाहरण :-
सड़कें, नदियाँ, जंगल, खनिज, रेलवे आदि।
4. अंतर्राष्ट्रीय संसाधन (International Resources) :- तटरेखा से 200 समुद्री मील से आगे के महासागरीय क्षेत्रों पर किसी एक देश का अधिकार नहीं होता। ऐसे संसाधन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की निगरानी में आते हैं और सभी देशों के लिए उपलब्ध होते हैं।
उदाहरण :-
खुले समुद्रों में पाए जाने वाले मछली संसाधन, समुद्री खनिज आदि।
प्रश्न :- विकास के स्तर के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण समझाइए।
उत्तर :- विकास के स्तर के आधार पर संसाधनों को चार भागों में विभाजित किया जाता है :-
1. संभावी संसाधन (Potential Resources) :- वे संसाधन जो किसी क्षेत्र में उपलब्ध तो हैं, परंतु जिनका उपयोग अभी तक शुरू नहीं हुआ, संभावी संसाधन कहलाते हैं। इनका भविष्य में उपयोग किया जा सकता है।
उदाहरण :-
राजस्थान में पवन ऊर्जा की संभावना, गुजरात में सौर ऊर्जा की अपार क्षमता।
2. विकसित संसाधन (Developed Resources) :- वे संसाधन जिनकी मात्रा, गुणवत्ता और उपयोग पूरी तरह से ज्ञात हो तथा इनका प्रयोग किया जा रहा हो, विकसित संसाधन कहलाते हैं। इन पर तकनीक और प्रबंधन पूरी तरह कार्यरत होते हैं।
उदाहरण :-
कोयला खदानें, तेल कुएँ, सिंचाई परियोजनाएँ।
3. भंडारित संसाधन (Stock) :- वे संसाधन जो पर्यावरण में उपलब्ध हैं, लेकिन उपयोग की तकनीक विकसित न होने के कारण इंसान उनकी पहुँच से बाहर है, भंडारित संसाधन कहलाते हैं।
उदाहरण :-
धरती के अंदर मौजूद गर्म लावा (जियोथर्मल ऊर्जा), समुद्र के गहरे तल की खनिज संपदा।
4. संचित संसाधन (Reserves) :- वे संसाधन जिन्हें उपयोग करने की तकनीक मौजूद है, लेकिन इन्हें अभी भविष्य के लिए सुरक्षित रखा गया है, संचित संसाधन कहलाते हैं। देश की आवश्यकता के अनुसार इन्हें बाद में उपयोग में लाया जाता है।
उदाहरण :-
डैम में संग्रहीत जल, जंगलों के कुछ क्षेत्र जिनका उपयोग सीमित किया गया हो।
प्रश्न :- संसाधनों के विकास से क्या समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं? समझाइए।
उत्तर :- संसाधन मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन लंबे समय तक यह माना गया कि संसाधन प्रकृति की असीम देन हैं। इसी विश्वास के कारण मानव ने इनका अंधाधुंध उपयोग किया। इससे कई गंभीर समस्याएँ पैदा हो गईं, जो समाज और पर्यावरण दोनों को प्रभावित करती हैं।
संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग से उत्पन्न मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं :-
1. लालच के कारण संसाधनों का ह्रास :- कुछ व्यक्तियों और उद्योगों ने अत्यधिक लाभ पाने के लिए संसाधनों का तेजी से दोहन किया। इससे कई महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन कम होते जा रहे हैं।
2. संसाधनों का असमान वितरण :- समाज के कुछ व्यक्तियों और कंपनियों ने अधिकांश संसाधनों पर नियंत्रण कर लिया। इसके कारण समाज दो वर्गों में बँट गया :-
(i) संसाधन-संपन्न (अमीर)
(ii) संसाधन-हीन (गरीब)
3. वैश्विक पारिस्थितिकी संकट :- संसाधनों के अत्यधिक दोहन से पर्यावरण संतुलन बिगड़ गया। इससे निम्नलिखित वैश्विक समस्याएँ पैदा हुईं :-
(i) भूमंडलीय तापन (Global Warming)
(ii) ओजोन परत का अवक्षय
(iii) वायु, जल, मिट्टी प्रदूषण
(iv) भूमि का निम्नीकरण (Land Degradation)
4. समाज में न्यायसंगत वितरण की आवश्यकता :- संसाधनों के असमान वितरण से सामाजिक तनाव बढ़ा है। मानव जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने और विश्व शांति के लिए संसाधनों का न्यायसंगत और समान बँटवारा आवश्यक हो गया है।
प्रश्न :- सतत् पोषणीय विकास क्या होता है? समझाइए।
उत्तर :- सतत् पोषणीय विकास :- सतत् पोषणीय विकास का अर्थ है संसाधनों का ऐसा विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग, जिससे आज की पीढ़ी की आवश्यकताएँ भी पूरी हों और भावी पीढ़ियाँ भी इन संसाधनों का लाभ उठा सकें। इसमें संसाधनों का संरक्षण, दोहन की सीमाएँ और पर्यावरण संतुलन को बनाए रखना आवश्यक माना जाता है।
सतत् पोषणीय विकास की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. संसाधनों का सोच-समझकर और सीमित उपयोग।
2. पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना विकास करना।
3. वर्तमान और भविष्य—दोनों पीढ़ियों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना।
4. नवीकरणीय संसाधनों का संरक्षण और पुनः उपयोग।
5. प्रदूषण को कम करना और प्रकृति का संतुलन बनाए रखना।
उदाहरण :-
पेड़ों की कटाई जितनी हो, उससे अधिक पेड़ लगाना एक सतत् पोषणीय विकास का उदाहरण है, क्योंकि इससे आज की जरूरतें भी पूरी होती हैं और भविष्य के लिए पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है।
प्रश्न :- एजेंडा 21 क्या है? इसका उद्देश्य समझाइए।
उत्तर :- एजेंडा 21 :- एक वैश्विक कार्य-योजना है, जिसे वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरो शहर में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (UNCED) के दौरान पारित किया गया था। इसमें विश्व के राष्ट्राध्यक्षों ने पर्यावरण संरक्षण और सतत् विकास के लिए संयुक्त प्रयास करने का संकल्प लिया।
एजेंडा 21 का मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं :-
1. वैश्विक स्तर पर सहयोग बढ़ाना ताकि सभी देश मिलकर पर्यावरणीय समस्याओं को हल कर सकें।
2. पर्यावरणीय क्षति को रोकना और प्रकृति का संतुलन बनाए रखना।
3. गरीबी में कमी लाना, क्योंकि गरीबी भी पर्यावरणीय समस्याओं का एक बड़ा कारण है।
4. स्वास्थ्य समस्याओं और रोगों से निपटने के लिए वैश्विक कार्ययोजना बनाना।
5. समान हितों और पारस्परिक जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए सतत् विकास की दिशा में विश्व को आगे बढ़ाना।
उदाहरण :-
एजेंडा 21 के तहत कई देशों ने प्रदूषण कम करने और नवीकरणीय ऊर्जा (जैसे—सौर ऊर्जा) को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त प्रयास किए, ताकि पृथ्वी का भविष्य सुरक्षित रह सके।
प्रश्न :- संसाधन नियोजन क्या होता है? समझाइए।
उत्तर :- संसाधन नियोजन :- संसाधन नियोजन का अर्थ है ऐसे उपायों, तकनीकों और योजनाओं का निर्माण, जिनकी मदद से संसाधनों का उचित, संतुलित और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
इसका उद्देश्य संसाधनों की उपलब्धता और आवश्यकताओं के अनुसार उनका सही वितरण और संरक्षण करना है।
संसाधन नियोजन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. संसाधनों की पहचान और उनका विस्तृत सर्वेक्षण।
2. संसाधनों के उपयोग की प्राथमिकताएँ तय करना।
3. संसाधनों का संतुलित और विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना।
4. वर्तमान व भविष्य दोनों के लिए संसाधनों का संरक्षण।
5. क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने में मदद करना।
उदाहरण :-
किसी राज्य में उपलब्ध जल संसाधनों का सर्वेक्षण करके सिंचाई, पेयजल और उद्योगों के लिए योजनाएँ बनाना संसाधन नियोजन का उदाहरण है।
प्रश्न :- भारत में संसाधन नियोजन कैसे किया जाता है? समझाइए।
उत्तर :- भारत में संसाधन नियोजन :- भारत में संसाधनों के संतुलित विकास और उपयोग के लिए संसाधन नियोजन अत्यंत आवश्यक माना गया है। देश में प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही संसाधन नियोजन को प्रमुख लक्ष्य के रूप में अपनाया गया।
नियोजन करते समय टेक्नोलॉजी, कौशल और संस्थागत संरचना का विशेष ध्यान रखा जाता है ताकि संसाधनों का अधिकतम और उचित उपयोग हो सके।
भारत में संसाधन नियोजन के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं :-
1. संसाधनों की पहचान और सूची बनाना :- देश के विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों का सर्वेक्षण किया जाता है। इसके बाद सभी संसाधनों की विस्तृत तालिका तैयार की जाती है।
2. कौशल, टेक्नोलॉजी और संस्थागत ढाँचे का उपयोग :- उपलब्ध तकनीक, विशेषज्ञों के कौशल और सरकारी संस्थाओं के सहयोग से एक मजबूत नियोजन ढाँचा तैयार किया जाता है। इसका उद्देश्य संसाधनों का सही, संतुलित और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करना है।
3. संसाधन नियोजन और विकास नियोजन में तालमेल :- संसाधनों के उपयोग की योजना और विकास की जरूरतों को एक-दूसरे के साथ समन्वयित किया जाता है। इससे संसाधनों का उपयोग न केवल वर्तमान विकास के लिए, बल्कि भविष्य की आवश्यकताओं के लिए भी उपयुक्त रहता है।
उदाहरण :-
किसी राज्य में जल संसाधनों का सर्वेक्षण करके उनके आधार पर सिंचाई परियोजनाएँ और पेयजल योजनाएँ बनाना, भारत में किए जाने वाले संसाधन नियोजन का एक उदाहरण है।
प्रश्न :- संसाधन संरक्षण क्या होता है? समझाइए।
उत्तर :- संसाधन संरक्षण :- संसाधन संरक्षण का अर्थ है जल, भूमि, वनस्पति, मृदा तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रबंधन और समझदारी से उपयोग। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इन संसाधनों का उपयोग आज भी हो सके और भावी पीढ़ियों की आवश्यकताएँ भी बिना किसी कमी के पूरी होती रहें।
संसाधन संरक्षण में बर्बादी रोकना, पुनः उपयोग करना और पर्यावरण संतुलन बनाए रखना शामिल है।
संसाधन संरक्षण की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. प्राकृतिक संसाधनों का सीमित और विवेकपूर्ण उपयोग।
2. जल, भूमि और मृदा की गुणवत्ता को बनाए रखना।
3. पर्यावरण संतुलन को बिगाड़े बिना विकास करना।
4. वनों, वन्य जीवों और नवीकरणीय संसाधनों का संरक्षण।
5. भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों का सुरक्षित भंडारण।
उदाहरण :-
वर्षा जल को संग्रहित करके पुनः उपयोग में लाना (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) संसाधन संरक्षण का एक अच्छा उदाहरण है, क्योंकि इससे पानी की बर्बादी कम होती है और भविष्य के लिए पानी सुरक्षित रहता है।
प्रश्न :- भू-संसाधन क्या होते हैं? समझाइए।
उत्तर :- भू-संसाधन :- भू-संसाधन से तात्पर्य भूमि से प्राप्त होने वाले सभी प्राकृतिक लाभों से है। भूमि एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है क्योंकि हमारे जीवन की लगभग सभी गतिविधियाँ भूमि पर ही निर्भर करती हैं। प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीव, मानव जीवन, कृषि कार्य, उद्योग, परिवहन और संचार जैसी सभी व्यवस्थाएँ भूमि के सहारे ही चलती हैं। चूँकि भूमि एक सीमित संसाधन है, इसलिए इसका उपयोग सावधानीपूर्वक और योजनाबद्ध ढंग से करना आवश्यक है।
भू-संसाधनों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. भूमि का उपयोग खेती, आवास, उद्योग और परिवहन जैसी अनेक गतिविधियों में होता है।
2. प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवन का आधार भूमि ही है।
3. भूमि सीमित मात्रा में उपलब्ध है, इसलिए इसका संरक्षण बहुत ज़रूरी है।
4. भूमि के संतुलित उपयोग से पर्यावरणीय स्थिरता बनी रहती है।
उदाहरण :-
ढलानों पर सीढ़ीनुमा खेत (टैरेस फार्मिंग) बनाना भूमि के संरक्षण और सही उपयोग का एक उत्तम उदाहरण है।
प्रश्न :- भारत में भूमि-संसाधनों का वर्गीकरण समझाइए।
उत्तर :- भारत में भूमि-संसाधन :- भौगोलिक संरचना के आधार पर तीन मुख्य भागों में विभाजित हैं—मैदान, पर्वत और पठार। प्रत्येक प्रकार की भूमि अपनी विशेषताओं के कारण अलग-अलग उपयोगों के लिए उपयुक्त होती है।
भारत में भूमि-संसाधनों के मुख्य वर्ग निम्नलिखित हैं :-
1. मैदानी क्षेत्र (लगभग 43%) :- (i) यह हिस्सा समतल और उपजाऊ है।
(ii) कृषि उत्पादन और औद्योगिक विकास के लिए अत्यंत अनुकूल।
(iii) परिवहन और संचार नेटवर्क विकसित करने में भी आसान।
2. पर्वतीय क्षेत्र (लगभग 30%) :- (i) यहाँ ऊँचे पर्वत और हिमालय जैसी पर्वत श्रृंखलाएँ स्थित हैं।
(ii) यह क्षेत्र बारहमासी नदियों के उद्गम स्थल प्रदान करता है।
(iii) पर्यटन, प्राकृतिक सौंदर्य और पारिस्थितिकी संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण।
3. पठारी क्षेत्र (लगभग 27%) :- (i) इस भाग में खनिज पदार्थ, जीवाश्म ईंधन और वन संसाधनों का विशाल भंडार है।
(ii) उद्योगों के विकास और खनन कार्यों के लिए अत्यंत उपयोगी।
उदाहरण :-
भारत का दक्कन का पठार खनिज संपदा से भरपूर है, जबकि गंगा का मैदान अत्यंत उपजाऊ होकर कृषि के लिए उपयुक्त माना जाता है।
प्रश्न :- भू-उपयोग क्या है? समझाइए।
उत्तर :- भू-उपयोग :- वह प्रक्रिया है जिसके तहत भूमि का उपयोग विभिन्न आर्थिक गतिविधियों जैसे कृषि, वानिकी, निर्माण, उद्योग, परिवहन आदि के लिए किया जाता है। भूमि के उपयोग को कई प्राकृतिक और मानव-निर्मित कारक प्रभावित करते हैं।
भू-उपयोग को निर्धारण करने वाले मुख्य तत्व निम्नलिखित हैं :-
1. वन क्षेत्र :- (i) वह भूमि जो घने पेड़ों और प्राकृतिक वनस्पति से ढकी हो।
(ii) पारिस्थितिकी संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक।
2. कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि :- (i) बंजर भूमि, जिस पर खेती संभव नहीं।
(ii) गैर-कृषि उपयोग, उद्योग, सड़कें, इमारतें आदि।
3. परती भूमि :- (i) वर्तमान परती: जहाँ पिछले 1 वर्ष या उससे कम समय से खेती नहीं हुई।
(ii) अन्य परती: जहाँ 1 से 5 वर्षों तक खेती नहीं की गई।
4. अन्य कृषि योग्य भूमि :- (i) स्थायी चरागाह, गोचर भूमि, बाग-बगीचे, वृक्ष फसलें।
(ii) वह भूमि जो खेती के योग्य है पर 5 वर्ष या अधिक समय से खाली पड़ी हो।
5. शुद्ध बोया गया क्षेत्र :- वह भूमि जिस पर एक कृषि वर्ष में केवल एक बार फसल बोई जाती है।
उदाहरण :-
किसी गाँव की चरागाह भूमि, जिस पर लंबे समय से खेती नहीं हुई, “अन्य कृषि योग्य भूमि” मानी जाती है, जबकि घर और सड़क निर्माण के लिए उपयोग की गई भूमि “गैर-कृषि भूमि” कहलाती है।
प्रश्न :- भारत में भू-उपयोग प्रारूप को निर्धारित करने वाले तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर :- भारत में किसी भी क्षेत्र में भूमि का उपयोग किस प्रकार होगा, यह कई भौतिक और मानवीय तत्त्वों पर निर्भर करता है। ये तत्त्व यह तय करते हैं कि भूमि का उपयोग कृषि, वन, चरागाह, उद्योग, सड़क, आवास या अन्य गतिविधियों के लिए कैसे किया जाएगा।
भारत में भू-उपयोग प्रारूप को निर्धारित करने वाले तत्त्व निम्नलिखित हैं :-
1. भौतिक (Physical) तत्त्व :-
(i) भू-आकृति (Relief) :- समतल भूमि पर खेती और बस्तियाँ आसानी से बसाई जा सकती हैं, जबकि पर्वतीय क्षेत्र वनों और पर्यटन के लिए उपयुक्त होते हैं।
(ii) मृदा (Soil) :- उपजाऊ मिट्टी वाले क्षेत्र कृषि के लिए अनुकूल होते हैं, जैसे—गंगा का मैदान।
(iii) जलवायु (Climate) :- वर्षा, तापमान और मौसम की स्थिति यह तय करते हैं कि किस क्षेत्र में कौन-सी फसल उगाई जा सकती है।
(iv) जल उपलब्धता (Water Availability) :- सिंचाई के साधनों के आधार पर भूमि का उपयोग खेती या अन्य उपयोगों के लिए किया जाता है।
2. मानवीय (Human) तत्त्व
(i) जनसंख्या घनत्व (Population Density) :- अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों में भूमि का उपयोग आवास, सड़क और अन्य संरचनाओं के लिए अधिक होता है।
(ii) प्रौद्योगिक क्षमता (Technological Capability) :- आधुनिक तकनीक से कठिन क्षेत्रों में भी खेती, खनन और निर्माण संभव हो जाता है।
(iii) संस्कृति और परंपराएँ (Culture and Traditions) :- स्थानीय रीति-रिवाज़ और जीवनशैली यह निर्धारित करती हैं कि भूमि का उपयोग किस प्रकार होगा।
उदाहरण :-
राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में कम वर्षा के कारण खेती सीमित होती है, जबकि पंजाब में उन्नत सिंचाई और उपजाऊ मिट्टी के कारण भूमि का अधिक उपयोग कृषि के लिए किया जाता है।
प्रश्न :- भू-निम्नीकरण के कारण क्या हैं? समझाइए।
उत्तर :- भू-निम्नीकरण :- भू-निम्नीकरण का अर्थ है भूमि की गुणवत्ता में गिरावट आना, जिससे भूमि अपनी उपजाऊ क्षमता खोने लगती है। यह समस्या मानव गतिविधियों और प्राकृतिक कारणों दोनों से उत्पन्न होती है।
भू-निम्नीकरण के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-
1. खनन :- अत्यधिक खनन से भूमि की ऊपरी उपजाऊ परत हट जाती है। इससे मिट्टी की संरचना नष्ट होती है और भूमि बंजर हो जाती है।
2. अतिचारण (Overgrazing) :- पशुओं द्वारा बार-बार चराई से घास और पौधे नष्ट हो जाते हैं। मिट्टी ढीली होकर बहने लगती है, जिससे भूमि क्षरण बढ़ता है।
3. अतिसिंचाई (Over-Irrigation) :- बहुत अधिक सिंचाई से भूमि में लवण (नमक) जमा हो जाते हैं। इससे भूमि क्षारीय या लवणीय बनकर खेती के लायक नहीं रहती।
4. औद्योगिक प्रदूषण :- कारखानों के रासायनिक अपशिष्ट मिट्टी में मिलकर उसे प्रदूषित कर देते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है।
5. वनोन्मूलन (Deforestation) :- जंगल काटने से मिट्टी बँधकर रखने वाले पेड़-पौधे नष्ट हो जाते हैं। परिणामस्वरूप मिट्टी बह जाती है और भूमि क्षरित होने लगती है।
उदाहरण :-
राजस्थान और गुजरात के कई क्षेत्रों में अतिचारण और अतिसिंचाई के कारण भूमि लवणीय हो गई है, जिससे वहाँ की खेती की उत्पादकता काफी कम हो गई है।
प्रश्न :- भूमि संरक्षण के उपाए बताइए।
उत्तर :- भूमि संरक्षण :- भूमि को क्षरण, प्रदूषण और उपयोग की गलत तरीकों से बचाना, ताकि यह वर्तमान और भविष्य दोनों पीढ़ियों के लिए उपयोगी बनी रहे। भूमि एक सीमित संसाधन है, इसलिए इसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
भूमि संरक्षण के मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं :-
1. वनारोपण :- बड़े पैमाने पर पेड़ लगाना भूमि को कटाव से बचाता है। पेड़ मिट्टी को बांधे रखते हैं और वर्षा जल से होने वाले क्षरण को रोकते हैं।
2. पशुचारण नियंत्रण :- किसी क्षेत्र में अधिक मात्रा में पशुओं को चराने से भूमि का क्षरण होता है। नियंत्रित और योजनाबद्ध चराई से भूमि की उर्वरता बनी रहती है।
3. रक्षक मेखला (शेल्टर बेल्ट) :- खेतों के चारों ओर पेड़ों की कतारें लगाकर तेज हवाओं से मिट्टी उड़ने से रोकी जाती है। यह विशेष रूप से शुष्क क्षेत्रों में उपयोगी है।
4. खनन नियंत्रण :- अनियंत्रित खनन से भूमि खोखली और असुरक्षित हो जाती है। वैज्ञानिक और सुरक्षित खनन तकनीकों के प्रयोग से भूमि को नुकसान कम होता है।
5. औद्योगिक जल का परिष्करण :- उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषित रसायन मृदा की उर्वरता को कम करते हैं। उपचारित (ट्रीटेड) जल छोड़ने से भूमि प्रदूषण कम होता है।
उदाहरण :-
किसी गाँव में खेती का क्षेत्र बारिश में तेजी से कटने लगा, तो वहाँ के किसानों ने खेतों के किनारों पर पेड़ों की मेखला (शेल्टर बेल्ट) लगाई और पशुचारण को नियंत्रित किया। इससे मिट्टी कटाव रुक गया और भूमि की गुणवत्ता दोबारा अच्छी हो गई।
प्रश्न :- मृदा संसाधन क्या होता है? समझाइए।
उत्तर :- मृदा संसाधन :- पृथ्वी की ऊपरी परत जिसे हम मिट्टी कहते हैं। यही मिट्टी पौधों को सहारा देती है, उनमें पोषक तत्व पहुँचाती है और कृषि का आधार बनाती है। मिट्टी कई छोटे-बड़े जीवों का प्राकृतिक घर भी होती है, इसलिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है।
मृदा संसाधन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. कृषि का आधार – फसलें मिट्टी में उगती हैं, इसलिए भोजन उत्पादन मिट्टी पर निर्भर करता है।
2. प्राकृतिक आवास – मिट्टी के भीतर केंचुए, कीट, सूक्ष्मजीव आदि रहते हैं।
3. पोषक तत्वों का स्रोत – मिट्टी पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करती है।
4. वनस्पति और पर्यावरण का आधार – जंगल, घासभूमि, खेत — सब मिट्टी पर निर्भर होते हैं।
5. मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण – खाद्य उत्पादन, निर्माण गतिविधियों और पारिस्थितिकी संतुलन में मिट्टी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
उदाहरण :-
काली मिट्टी में कपास की खेती अच्छी होती है। यह दर्शाता है कि मिट्टी का प्रकार फसलों के उत्पादन को सीधे प्रभावित करता है।
प्रश्न :- मृदा का निर्माण क्या है? समझाइए।
उत्तर :- मृदा का निर्माण :- वह प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा कठोर चट्टानें टूटकर धीरे–धीरे बारीक कणों में बदल जाती हैं और मिट्टी का रूप ले लेती हैं। यह प्रक्रिया बहुत धीमी होती है और 1 सेमी मिट्टी बनने में भी हजारों वर्ष लग जाते हैं।
मृदा निर्माण की मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं :-
1. शैलों का अपघटन :- मिट्टी बनने की प्रक्रिया चट्टानों के टूटने (अपघटन) से शुरू होती है।
2. प्राकृतिक कारकों का प्रभाव :- तापमान में बदलाव (गर्मी–सर्दी से चट्टानों का टूटना), पानी का बहाव (चट्टानों को घिसकर छोटे कण बनाना), हवा (कणों को उड़ाकर अलग-अलग स्थानों पर जमा करना)
3. भौतिक परिवर्तन :- चट्टानों का छोटे–छोटे टुकड़ों में टूट जाना।
4. रासायनिक परिवर्तन :- चट्टानों के खनिजों का पानी और हवा से रासायनिक रूप से बदल जाना।
5. यह एक अत्यंत धीमी प्रक्रिया है :- मिट्टी बनने में हजारों साल लगते हैं, इसलिए इसका संरक्षण बहुत जरूरी है।
उदाहरण :-
पहाड़ों में बारिश का पानी चट्टानों को लगातार काटता और घिसता है। समय के साथ ये चट्टानें बारीक कणों में बदलकर मिट्टी का रूप ले लेती हैं — यही मृदा निर्माण का उदाहरण है।
प्रश्न :- भारत में मृदा के प्रमुख प्रकार कौन-कौन से हैं? समझाइए।
उत्तर :- भारत में मृदा (मिट्टी) के कई प्रकार पाए जाते हैं। प्रत्येक मृदा का रंग, बनावट, गुण और उपयोग अलग-अलग होता है।
देश में पाई जाने वाली मुख्य मृदाएँ निम्नलिखित हैं :-
1. लाल एवं पीली मृदा
2. जलोढ़ मृदा
3. काली मृदा
4. वन मृदा
5. मरूस्थलीय मृदा
6. लेटराइट मृदा
उदाहरण :-
उत्तर भारत की गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी में जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है, इसलिए यहाँ धान और गेहूँ की खेती बड़े पैमाने पर होती है।
प्रश्न :- जलोढ़ मृदा क्या होती है? इसकी प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :- जलोढ़ मृदा :- वह मिट्टी है जो नदियाँ अपने साथ लाई हुई बारीक कणों—जैसे रेत, सिल्ट और मिट्टी—को जमा करके बनाती हैं। यह मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है और भारत में कृषि का सबसे बड़ा आधार है।
जलोढ़ मृदा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. भारत के लगभग 45% क्षेत्र में पाई जाती है। यानी यह देश की सबसे अधिक फैली हुई मिट्टी है।
2. नदियों द्वारा जमा की गई मिट्टी है। सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी तंत्रों ने इसे बनाया है।
3. इसमें रेत, सिल्ट और मिट्टी (क्ले) अलग-अलग अनुपात में मिलते हैं। इससे यह बहुत उपजाऊ बनती है।
4. पोटाश की मात्रा अधिक होती है। जो फसलों की बढ़वार के लिए अच्छा होता है।
5. आयु के आधार पर दो प्रकार— बांगर और खादर, बांगर – पुरानी जलोढ़ मिट्टी, खादर – नई जलोढ़ मिट्टी, ज्यादा उपजाऊ
6. अत्यंत उपजाऊ मिट्टी। गन्ना, चावल, गेहूँ, दालें आदि फसलों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।
उदाहरण :-
गंगा के मैदान की मिट्टी में गेहूँ और चावल की खेती बड़े पैमाने पर होती है—यह जलोढ़ मिट्टी की उच्च उपजाऊ क्षमता को दर्शाता है।
प्रश्न :- काली मृदा क्या है? इसकी विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :- काली मृदा :- एक महत्वपूर्ण प्रकार की भारतीय मिट्टी है, जिसे रेगर मिट्टी भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध है। इसका रंग काला होता है और यह बेसाल्ट चट्टानों के विघटन से बनती है।
काली मृदा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. रंग काला होता है, इसलिए इसे काली मृदा कहा जाता है।
2. इसे रेगर मिट्टी भी कहा जाता है।
3. टिटेनीफेरस मैग्नेटाइट तथा जीवांश की उपस्थिति के कारण रंग गहरा होता है।
4. यह बेसाल्ट चट्टानों के टूटने-फूटने से बनती है।
5. इसमें आयरन, चूना, एल्युमीनियम और मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
6. काली मिट्टी नमी को लंबे समय तक अपने अंदर बनाए रखती है।
7. यह कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है—इसी कारण इसे कॉटन सॉइल भी कहते हैं।
8. यह मिट्टी महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठारी भागों में अधिक पाई जाती है।
उदाहरण :-
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में कपास की खेती काली मिट्टी के कारण बहुत सफल होती है।
प्रश्न :- लाल एवं पीली मृदा क्या होती है? समझाइए।
उत्तर :- लाल एवं पीली मृदा :- भारत की प्रमुख मिट्टियों में से एक है। इस मिट्टी का रंग लोहे की अधिकता के कारण लाल होता है और जहाँ नमी अधिक होती है वहाँ यह पीली दिखाई देती है। यह मिट्टी थोड़ी अम्लीय होती है, लेकिन चूना मिलाने से इसकी उर्वरता बढ़ाई जा सकती है।
लाल एवं पीली मृदा की विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. मिट्टी का रंग लाल होता है तथा कुछ क्षेत्रों में पीला भी दिखाई देता है।
2. इसमें लोहे के कणों की अधिकता पाई जाती है।
3. यह मिट्टी अम्लीय प्रकृति की होती है।
4. चूना मिलाने से इसकी उर्वरता (fertility) बढ़ाई जा सकती है।
5. इस मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस की कमी पाई जाती है।
कहाँ पाई जाती है? (भौगोलिक क्षेत्र) :- उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा का मैदान, गारो, खासी और जयंतिया, पहाड़ियाँ (मेघालय), दक्षिण भारत के कुछ हिस्से
उपयुक्त फसलें :- बाजरा, दालें, मूंगफली, कुछ स्थानों पर कपास और आलू
उदाहरण :-
प्रश्न :- लेटराइट मृदा क्या होती है? इसके प्रमुख गुण समझाइए।
उत्तर :- लेटराइट मृदा :- वह मिट्टी है जो उच्च तापमान और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में बनती है। लगातार बारिश के कारण मिट्टी से खनिज धुल जाते हैं, जिससे यह मिट्टी अपेक्षाकृत कम उर्वर हो जाती है, परंतु कुछ विशिष्ट फसलों के लिए बहुत उपयोगी होती है।
लेटराइट मृदा की विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. उच्च तापमान और भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित गर्म एवं आर्द्र जलवायु में बनने वाली मिट्टी।
2. अत्यधिक निक्षालन (Leaching) का परिणाम बार-बार होने वाली वर्षा से खनिज धुल जाते हैं, इसलिए मिट्टी अपेक्षाकृत कमजोर हो जाती है।
3. लाल-भूरा रंग इसमें लोहे और एल्युमीनियम की अधिकता के कारण रंग लाल या भूरा दिखता है।
4. कुछ फसलों के लिए उपयुक्त चाय, काजू और कॉफी जैसी फसलों के लिए यह मृदा बहुत अच्छी मानी जाती है। 5. उर्वरता बढ़ाई जा सकती है, उर्वरक व खाद के प्रयोग से इसकी उत्पादकता बेहतर की जा सकती है।
6. जहाँ पाई जाती है, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, असम के पहाड़ी क्षेत्र
उदाहरण :-
केरल और कर्नाटक के पहाड़ी क्षेत्रों में चाय और काजू की खेती लेटराइट मिट्टी में बड़े पैमाने पर की जाती है।
प्रश्न :- मरूस्थलीय मृदा क्या होती है? इसकी मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :- मरूस्थलीय मृदा :- वह मिट्टी है जो शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है। यह मृदा अधिकतर रेतीली होती है और वर्षा की कमी के कारण इसकी उर्वरता कम होती है।
मरूस्थलीय मृदा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. इस मृदा का रंग सामान्यतः लाल या भूरा होता है।
2. मिट्टी रेतीली एवं लवणीय होती है।
3. शुष्क जलवायु और उच्च तापमान के कारण जल का वाष्पन अधिक होता है।
4. इसमें ह्यूमस और नमी की मात्रा बहुत कम होती है।
5. उचित सिंचाई और जल प्रबंधन द्वारा इस मृदा को उपजाऊ बनाया जा सकता है।
उदाहरण :-
राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में नहरों द्वारा सिंचाई करने से मरूस्थलीय मृदा में गेहूँ और बाजरा जैसी फसलें उगाई जाती हैं।
प्रश्न :- पहाड़ी पद (पीडमाऊँट जोन) क्या होता है? समझाइए।
उत्तर :- पहाड़ी पद (पीडमाऊँट जोन) :- वह क्षेत्र होता है जो किसी पर्वत या पर्वत श्रृंखला के ठीक तल में स्थित होता है। यह क्षेत्र पर्वतों से नीचे की ओर फैला हुआ होता है और यहाँ पर्वतों से बहकर आई हुई मिट्टी व अवसाद जमा हो जाते हैं।
पहाड़ी पद (पीडमाऊँट जोन) की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. यह क्षेत्र पर्वतों और मैदानी भागों के बीच पाया जाता है।
2. पर्वतों से आने वाली नदियाँ और धाराएँ यहाँ अवसाद जमा करती हैं।
3. इस क्षेत्र की भूमि सामान्यतः हल्की ढलानदार होती है।
4. कृषि और मानव बसावट के लिए यह क्षेत्र कई स्थानों पर उपयोगी होता है।
5. भू-आकृतिक दृष्टि से यह संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone) कहलाता है।
नोट :-
पश्चिमी घाट का पहाड़ी पद वह क्षेत्र है जो पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखला के तल पर स्थित है और जहाँ पर्वतों से बहकर आई मिट्टी का जमाव पाया जाता है।
प्रश्न :- दक्कन ट्रैप क्या है? समझाइए।
उत्तर :- दक्कन ट्रैप :- भारत के प्रायद्वीपीय पठार का वह भाग है, जहाँ काली मृदा पाई जाती है। इसका निर्माण प्राचीन काल में हुए ज्वालामुखीय लावा के फैलाव से हुआ है।
दक्कन ट्रैप की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. यह क्षेत्र ज्वालामुखीय लावा से बना है।
2. यहाँ काली मृदा पाई जाती है, जिसे रेगर मृदा भी कहते हैं।
3. मिट्टी अत्यंत उपजाऊ होती है।
4. कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त क्षेत्र माना जाता है।
उदाहरण :-
महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश का बड़ा भाग दक्कन ट्रैप क्षेत्र में आता है, जहाँ कपास की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।
प्रश्न :- वन मृदा क्या होती है? इसकी मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :- वन मृदा :- वह मृदा है जो मुख्य रूप से पर्वतीय और वन क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका निर्माण वहाँ की जलवायु, ऊँचाई, ढाल और वनस्पति के अनुसार होता है। इस कारण अलग-अलग स्थानों पर इसकी संरचना में भिन्नता पाई जाती है।
वन मृदा की की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. यह मृदा पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है।
2. इसका गठन पर्वतीय पर्यावरण के अनुसार बदलता रहता है।
3. नदी घाटियों में यह मृदा अधिक उपजाऊ होती है और सामान्यतः दोमट व सिल्टदार होती है।
4. ऊँचे ढाल वाले क्षेत्रों में यह मृदा अधिसिलक (coarse) तथा ह्यूमस रहित होती है।
5. अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पोषक तत्वों का बहाव हो जाने से इसकी उर्वरता कम हो जाती है।
उदाहरण :-
हिमालयी क्षेत्र की नदी घाटियों में पाई जाने वाली वन मृदा अपेक्षाकृत उपजाऊ होती है, जबकि ऊँचे पहाड़ी ढालों पर पाई जाने वाली वन मृदा कम उपजाऊ होती है।
प्रश्न :- खादर एवं बांगर में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :- खादर एवं बांगर में अंतर निम्नलिखित है :-
|
आधार |
खादर |
बांगर |
|
मृदा का प्रकार |
नवीन जलोढ़ मृदा |
प्राचीन जलोढ़ मृदा |
|
बनावट |
अधिक बारीक और रेतीली |
कंकड़ और कैल्शियम कार्बोनेट (कंकर) युक्त |
|
नवीकरण |
बाढ़ द्वारा बार-बार नवीकरण संभव |
बार-बार नवीकरण नहीं होता |
|
स्थिति |
नदी के पास, डेल्टा और बाढ़ निर्मित मैदानों में |
नदी से दूर, अपेक्षाकृत ऊँचे क्षेत्रों में |
|
उपजाऊपन |
अत्यधिक उपजाऊ |
खादर की तुलना में कम उपजाऊ |
उदाहरण :-
गंगा नदी के किनारे पाए जाने वाले नए बाढ़ मैदानों की मिट्टी खादर कहलाती है, जबकि उनसे दूर ऊँचे क्षेत्रों में स्थित पुरानी जलोढ़ मिट्टी बांगर कहलाती है।
प्रश्न :- मृदा अपरदन क्या होता है? समझाइए।
उत्तर :- मृदा अपरदन :- मृदा के ऊपरी उपजाऊ परत के कटाव और उसके एक स्थान से दूसरे स्थान पर बह जाने की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहते हैं।
यह प्रक्रिया मुख्य रूप से जल, वायु और मानवीय क्रियाओं के कारण होती है, जिससे भूमि की उर्वरता कम हो जाती है।
मृदा अपरदन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. इसमें मृदा की ऊपरी उपजाऊ परत नष्ट हो जाती है।
2. जल और वायु मृदा अपरदन के प्रमुख कारक हैं।
3. मृदा अपरदन से कृषि उत्पादन में कमी आती है।
4. यह भूमि को बंजर बनाने की प्रक्रिया को तेज करता है।
5. अधिक कटाव से बाढ़ और मरुस्थलीकरण की समस्या बढ़ती है।
उदाहरण :-
तेज़ वर्षा के समय खेतों की उपजाऊ मिट्टी का बह जाना मृदा अपरदन का स्पष्ट उदाहरण है।
प्रश्न :- मृदा अपरदन के क्या कारण है? लिखिए।
उत्तर :- मृदा अपरदन के प्रमुख कारण निम्नलिखित है :-
1. वनोन्मूलन :- पेड़ों की कटाई से मिट्टी को बाँधने वाली जड़ें नष्ट हो जाती हैं, जिससे मृदा आसानी से बह जाती है।
2. अति पशुचारण :- अधिक पशुओं के चरने से घास नष्ट हो जाती है और मिट्टी खुली रह जाती है।
3. निर्माण एवं खनन कार्य :- सड़क, भवन निर्माण और खनन से भूमि की ऊपरी परत हट जाती है।
4. प्राकृतिक तत्व :- वर्षा, हिमनदियाँ, बहता जल और पवन मृदा अपरदन को तेज करते हैं।
5. कृषि की गलत विधियाँ :- ढालू भूमि पर गलत तरीके से जुताई करने से मिट्टी बह जाती है।
6. पवन क्रिया :- शुष्क और खुले मैदानों में तेज हवा मिट्टी को उड़ा ले जाती है।
उदाहरण :-
राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में तेज हवाओं द्वारा मिट्टी का उड़ जाना पवन अपरदन का उदाहरण है, जिससे भूमि की उर्वरता घट जाती है।
प्रश्न :- मृदा अपरदन के समाधान क्या हैं? समझाइए।
उत्तर :- मृदा अपरदन को रोकने के लिए भूमि का सही और वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करना आवश्यक है। विभिन्न संरक्षण उपाय अपनाकर मृदा के कटाव को काफी हद तक रोका जा सकता है।
मृदा अपरदन को रोकने के प्रमुख समाधान निम्नलिखित है :-
1. समोच्च जुताई :- ढाल वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाने से पानी की गति कम होती है और मृदा बहने से बचती है।
2. सीढ़ीनुमा खेती (Terrace Farming) :- पहाड़ी और ढालू क्षेत्रों में सीढ़ियाँ बनाकर खेती करने से जल का बहाव रुकता है और मृदा सुरक्षित रहती है।
3. पट्टी कृषि (Strip Cropping) :- बड़े खेतों को पट्टियों में बाँटकर फसलों के बीच घास की पट्टियाँ उगाने से मृदा का कटाव कम होता है।
4. रक्षक मेखला / वनोरोपण :- खेतों के चारों ओर पेड़ों की कतार लगाकर एक हरी मेखला बनाई जाती है, जिससे पवन और जल अपरदन रुकता है।
5. अतिपशुचारण पर नियंत्रण :- पशुओं की संख्या सीमित रखकर चराई नियंत्रित करने से घास और मृदा दोनों का संरक्षण होता है।
उदाहरण :-
पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेती अपनाने से वर्षा का पानी धीरे-धीरे बहता है, जिससे मृदा का कटाव रुकता है और फसल उत्पादन बढ़ता है।
प्रश्न :- अवनलिकाएँ क्या होती हैं? समझाइए।
उत्तर :- अवनलिकाएँ :- जब बहता हुआ जल मृत्तिका (मिट्टी) से बनी भूमि को काटता हुआ आगे बढ़ता है, तो भूमि की सतह पर गहरी और संकरी नालियाँ बन जाती हैं। इन गहरी नालियों या वाहिकाओं को अवनलिकाएँ कहा जाता है। अवनलिकाएँ मृदा अपरदन का एक गंभीर रूप होती हैं, जिससे भूमि खेती के योग्य नहीं रह जाती।
अवनलिकाओं की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. अवनलिकाएँ बहते हुए जल के कारण बनती हैं।
2. यह मृत्तिकायुक्त (नरम) मिट्टी वाले क्षेत्रों में अधिक पाई जाती हैं।
3. इनके बनने से भूमि गहरी नालियों में कट जाती है।
4. ऐसी भूमि कृषि के लिए अनुपयुक्त हो जाती है।
5. यह मृदा अपरदन का उग्र रूप माना जाता है।
उदाहरण :-
चंबल नदी घाटी क्षेत्र में बहते जल द्वारा बनी गहरी खाइयाँ अवनलिकाओं का प्रमुख उदाहरण हैं, जहाँ भूमि बड़े पैमाने पर कट चुकी है।
प्रश्न :- उत्खात भूमि क्या कहलाती है? समझाइए।
उत्तर :- उत्खात भूमि :- वह भूमि होती है जो मृदा अपरदन के कारण इतनी अधिक कट जाती है कि वह कृषि योग्य नहीं रह जाती।
लगातार बहते जल द्वारा मृदा के कटाव से भूमि में गहरी नालियाँ और खाइयाँ बन जाती हैं, जिससे भूमि ऊबड़-खाबड़ हो जाती है और उस पर खेती करना संभव नहीं रहता।
उत्खात भूमि की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. यह भूमि मृदा अपरदन का परिणाम होती है।
2. भूमि की उपजाऊ ऊपरी परत बह जाती है।
3. खेतों में गहरी नालियाँ और खाइयाँ बन जाती हैं।
4. यह भूमि खेती के लिए अनुपयुक्त हो जाती है।
5. प्रायः यह समस्या नदी घाटियों और ढाल वाले क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है।
उदाहरण :-
चंबल नदी के आसपास का क्षेत्र उत्खात भूमि का प्रसिद्ध उदाहरण है, जहाँ गहरी खाइयों के कारण खेती करना कठिन हो गया है।
प्रश्न :- खड्डू भूमि क्या कहलाती है? समझाइए।
उत्तर :- खड्डू भूमि :- वह भूमि होती है जो अत्यधिक मृदा अपरदन के कारण गहरी नालियों और खाइयों में बदल जाती है। इस प्रकार की भूमि कृषि योग्य नहीं रहती और उपयोग के लायक नहीं बचती।
भारत में विशेष रूप से चंबल बेसिन क्षेत्र में ऐसी उत्खात भूमि को खड्डू भूमि कहा जाता है।
खड्डू भूमि की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. यह भूमि मृदा अपरदन के कारण अत्यधिक कट चुकी होती है।
2. इसमें गहरी खाइयाँ और नालियाँ बन जाती हैं।
3. यह खेती के लिए अनुपयुक्त हो जाती है।
4. मुख्य रूप से चंबल नदी के आसपास के क्षेत्रों में पाई जाती है।
5. पर्यावरण और कृषि दोनों के लिए हानिकारक मानी जाती है।
उदाहरण :-
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के चंबल नदी घाटी क्षेत्र में पाई जाने वाली बीहड़ भूमि को खड्डू भूमि कहा जाता है।
प्रश्न :- पवन अपरदन क्या है? समझाइए।
उत्तर :- पवन अपरदन :- वह प्रक्रिया है जिसमें हवा के प्रभाव से मैदान या ढालू भूमि से मृदा (मिट्टी) उड़ाई जाती है। यह मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत को हटा देती है और भूमि की उर्वरता कम कर देती है।
पवन अपरदन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. मुख्य रूप से शुष्क और रेतीले क्षेत्रों में होता है।
2. मिट्टी की ऊपरी परत हवा के बहाव से हट जाती है।
3. कृषि योग्य भूमि की उत्पादकता कम हो जाती है।
4. ढालू और उजाड़ भूमि अधिक प्रभावित होती है।
उदाहरण :-
राजस्थान के थार मरुस्थल और गुजरात के रेतीले क्षेत्रों में हवा से मिट्टी उड़ने की प्रक्रिया पाई जाती है।