Class 10 geography Notes in hindI Chapter - 2
Chapter 2: वन और वन्य जीव संसाधन / Forest and Wildlife Resources
Chapter Introduction:
इस अध्याय में आप भारत की जैव विविधता, वनों और वन्य जीवों के महत्व को समझेंगे। साथ ही वनों के संरक्षण, वन्य जीवों की सुरक्षा, पारिस्थितिक संतुलन तथा समुदायों की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण विषयों को सरल भाषा में पढ़ेंगे।
नीचे अध्याय 2 वन और वन्य जीव संसाधन के सभी महत्वपूर्ण topics को सरल भाषा में विस्तार से समझाया गया है जो NCERT syllabus पर आधारित हैं, तथा बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
CLASS 10 GEOGRAPHY NOTES IN HINDI
CHAPTER 2 : वन एवं वन्य जीव संसाधन
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DETAILS |
INFORMATION |
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Textbook |
NCERT |
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Class |
Class 10 |
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Subject |
Geography |
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Chapter |
Chapter 2 |
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Chapter Name |
वन और वन्य जीव संसाधन |
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Medium |
Hindi |
क्या आप Class 10 Geography Chapter 2 Notes in Hindi ढूँढ रहे हैं?
यहाँ आपको वन और वन्य जीव संसाधन अध्याय के आसान और सरल नोट्स मिलेंगे। इस अध्याय में आप जैव विविधता, वन संरक्षण, वन्य जीवों की सुरक्षा तथा पारिस्थितिक संतुलन के महत्व के बारे में विस्तार से समझेंगे।
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
2.1 भारत में वनस्पतिजात और प्राणिजात क्या हैं?
2.2 वे प्रतिकूल कारक कौन से हैं जिनसे वनस्पतिजात और प्राणिजात का इतना भयानक ह्रास हुआ है?
2.3 भारत में वन और वन्य जीवन का संरक्षण कैसे किया जाता है?
2.4 वन और वन्य जीव संसाधनों के प्रकार और वितरण क्या हैं?
2.5 समुदाय और वन संरक्षण में क्या संबंध है?
Chapter Summary
इस अध्याय में आप भारत की समृद्ध जैव विविधता तथा वन और वन्य जीव संसाधनों के महत्व के बारे में समझेंगे। आप जानेंगे कि वनस्पतियाँ और प्राणी प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं तथा पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आप उन कारणों के बारे में भी पढ़ेंगे जिनके कारण वनस्पतिजात और प्राणिजात का तेजी से ह्रास हुआ है। वनों की कटाई, कृषि विस्तार, औद्योगीकरण, शहरीकरण, खनन तथा अवैध शिकार जैसी मानवीय गतिविधियाँ जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा बन गई हैं।
इस अध्याय में आप भारत में वन और वन्य जीव संरक्षण के विभिन्न उपायों को समझेंगे। राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र तथा विभिन्न संरक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।
आप वन और वन्य जीव संसाधनों के प्रकार तथा उनके वितरण के बारे में भी जानेंगे। साथ ही यह समझेंगे कि विभिन्न क्षेत्रों में जैव विविधता की स्थिति अलग-अलग क्यों होती है और उनके संरक्षण की आवश्यकता क्यों है।
अंत में आप समुदायों की भूमिका के बारे में पढ़ेंगे। स्थानीय समुदायों, ग्राम सभाओं तथा जनभागीदारी आधारित संरक्षण कार्यक्रमों ने वन संरक्षण और जैव विविधता बचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह अध्याय हमें प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा सतत विकास के महत्व को समझने में सहायता करता है।
2.1 भारत में वनस्पतिजात और प्राणिजात क्या हैं?
जैव विविधता क्या होती है? समझाइए :-
जैव विविधता :- पादपों (पेड़-पौधों) और जंतुओं (जीव-जंतुओं) के वे विविध प्रकार, जो आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए होते हैं और एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। यह पृथ्वी पर जीवन को संतुलित और सुचारु रूप से चलाने में सहायक होती है।
जैव विविधता की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. इसमें विभिन्न प्रकार के पौधे, पशु और सूक्ष्म जीव शामिल होते हैं।
2. सभी जीव एक-दूसरे पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर होते हैं।
3. पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में जैव विविधता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
4. यह मानव जीवन के लिए भोजन, औषधि और कच्चा माल प्रदान करती है।
उदाहरण :-
वनों में पाए जाने वाले पेड़, हिरण, शेर, पक्षी और कीट-पतंगे मिलकर एक जैव विविध पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं, जहाँ सभी जीव एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।
प्राकृतिक वनस्पति क्या होती है? समझाइए :-
प्राकृतिक वनस्पति :- वह वनस्पति है जो बिना मानवीय हस्तक्षेप के प्राकृतिक रूप से स्वयं उगती और विकसित होती है। इसमें वन, घासभूमि और झाड़ियाँ शामिल होती हैं। इसे अक्षत वनस्पति भी कहा जाता है।
प्राकृतिक वनस्पति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. यह प्राकृतिक जलवायु और मृदा पर निर्भर करती है।
2. मानव द्वारा रोपी नहीं जाती।
3. यह वन्य जीवन को आवास प्रदान करती है।
4. पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायक है।
उदाहरण :-
हिमालय क्षेत्र के प्राकृतिक वन और घासभूमियाँ प्राकृतिक वनस्पति के उदाहरण हैं।
स्वदेशी वनस्पति प्रजातियाँ क्या होती हैं :-
स्वदेशी वनस्पति प्रजातियाँ :- वे पादप प्रजातियाँ होती हैं जो किसी देश या क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से पाई जाती हैं और उसी क्षेत्र की मूल वनस्पति होती हैं।
इन्हें स्थानिक पादप या अक्षत (प्राकृतिक) वनस्पति भी कहा जाता है। ये मानव द्वारा बाहर से लाई गई नहीं होतीं, बल्कि उसी देश में विकसित हुई होती हैं।
स्वदेशी वनस्पति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. ये किसी विशेष देश या क्षेत्र की मूल वनस्पति होती हैं।
2. प्राकृतिक रूप से उगती और विकसित होती हैं।
3. स्थानीय जलवायु और पर्यावरण के अनुकूल होती हैं।
4. जैव विविधता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
उदाहरण :-
नीम और पीपल भारत की स्वदेशी वनस्पति प्रजातियाँ हैं, क्योंकि ये प्राकृतिक रूप से भारत में पाई जाती हैं।
पारितंत्र (पारिस्थितिकी तंत्र) क्या होता है? समझाइए :-
पारितंत्र या पारिस्थितिकी तंत्र :- वह व्यवस्था है जिसमें किसी क्षेत्र के पादप (पेड़-पौधे) और जंतु (जीव-जन्तु) अपने भौतिक पर्यावरण (जैसे—मिट्टी, जल, वायु, तापमान) के साथ परस्पर जुड़े और एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। इस तंत्र में सभी जीव मिलकर संतुलन बनाए रखते हैं। मानव भी पारितंत्र का एक महत्वपूर्ण भाग है।
पारितंत्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. इसमें जीवित और निर्जीव दोनों घटक शामिल होते हैं।
2. सभी घटक एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।
3. ऊर्जा और पोषक तत्वों का आदान-प्रदान होता रहता है।
4. पारितंत्र में संतुलन बनाए रखना आवश्यक होता है।
उदाहरण :-
वन पारितंत्र में पेड़-पौधे, जानवर, मिट्टी, जल और वायु मिलकर एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं, जिससे पूरा पारितंत्र सुचारु रूप से कार्य करता है।
वन्यजीवन क्या होता है? समझाइए :-
वन्यजीवन :- से तात्पर्य उन जीव-जंतुओं से है जो अपने प्राकृतिक पर्यावरण जैसे वन, घास के मैदान, पर्वत, मरुस्थल आदि में रहते हैं और जिनका पालन-पोषण मनुष्य द्वारा नहीं किया जाता। वन्यजीवन प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वन्यजीवन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. ये जीव प्राकृतिक आवास में स्वतंत्र रूप से रहते हैं।
2. भोजन, आश्रय और सुरक्षा के लिए प्रकृति पर निर्भर होते हैं।
3. खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखते हैं।
4. जैव विविधता को समृद्ध करते हैं।
उदाहरण :-
शेर, हाथी, बाघ, हिरण और पक्षी जैसे मोर वन्यजीवन के उदाहरण हैं।
फ्लोरा और फौना क्या होते हैं? समझाइए :-
फ्लोरा और फौना :- किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले पौधों और जीव-जंतुओं को क्रमशः फ्लोरा और फौना कहा जाता है। ये दोनों मिलकर उस क्षेत्र की जैव विविधता को दर्शाते हैं।
1. फ्लोरा (Flora) :- किसी विशेष क्षेत्र या काल में पाए जाने वाले पादपों (पेड़-पौधों) को फ्लोरा कहते हैं।
2. फौना (Fauna) :- किसी विशेष क्षेत्र में पाई जाने वाली जंतुओं की प्रजातियों को फौना कहते हैं।
उदाहरण :-
भारत में नीम, पीपल और बरगद फ्लोरा के उदाहरण हैं, जबकि शेर, हाथी और हिरण फौना के उदाहरण हैं।
भारत में वनस्पतिजात (फ्लोरा) और प्राणिजात (फौना) की स्थिति समझाइए :-
भारत जैव विविधता की दृष्टि से एक अत्यंत समृद्ध देश है। यहाँ पादपों (फ्लोरा) और जंतुओं (फौना) की बहुत अधिक विविधता पाई जाती है।
भारत में वनस्पतिजात (Flora) :-
1. भारत में लगभग 47,000 पादप प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
2. इनमें से लगभग 15,000 पुष्पीय पादप प्रजातियाँ स्थानिक (स्वदेशी) हैं।
3. विभिन्न जलवायु और भू-आकृतियों के कारण वनस्पति में विविधता देखने को मिलती है।
भारत में प्राणिजात (Fauna) :-
1. भारत में 81,000 से अधिक जंतु प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
2. यहाँ 1,200 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
3. लगभग 2,500 से अधिक मछलियों की प्रजातियाँ उपलब्ध हैं।
4. इसके अतिरिक्त भारत में लगभग 60,000 कीट-पतंगों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
उदाहरण :-
भारत में साल और सागौन जैसे वृक्ष वनस्पतिजात के उदाहरण हैं, जबकि बाघ, हाथी और मोर प्राणिजात के प्रमुख उदाहरण हैं।
भारत में लुप्तप्राय (नाजुक अवस्था में) प्रजातियाँ कौन-सी हैं :-
लुप्तप्राय प्रजातियाँ :- वे जीव-जंतु और पौधे होते हैं जिनकी संख्या बहुत तेजी से घट रही है और यदि समय रहते संरक्षण नहीं किया गया, तो इनके पूर्ण रूप से समाप्त होने का खतरा होता है। भारत में कई ऐसी प्रजातियाँ हैं जो नाजुक अवस्था में हैं।
भारत में प्रमुख लुप्तप्राय प्रजातियाँ निम्नलिखित है :-
1. चीता – अत्यधिक शिकार और आवास नष्ट होने के कारण।
2. गुलाबी सिर वाली बत्तख – जल क्षेत्रों के नष्ट होने से।
3. पहाड़ी कोयल – वनों की कटाई के कारण।
4. जंगली चित्तीदार उल्लू – प्राकृतिक आवास में कमी के कारण।
5. मधुका इनसिगनिस – महुआ की एक जंगली किस्म, जो अत्यंत दुर्लभ है।
6. हुबरड़िया हेप्टान्यूरोन – घास की एक दुर्लभ प्रजाति।
उदाहरण :-
चीता भारत की एक प्रसिद्ध लुप्तप्राय प्रजाति रही है, जिसे संरक्षण प्रयासों द्वारा पुनः बसाने का प्रयास किया जा रहा है।
लुप्त होने का खतरा झेल रही प्रजातियाँ क्या हैं? भारत में उनकी स्थिति बताइए :-
लुप्त होने का खतरा झेल रही प्रजातियाँ :- वे जीव और पादप प्रजातियाँ हैं जिनकी संख्या तेजी से घट रही है और यदि समय रहते संरक्षण नहीं किया गया तो वे पूरी तरह लुप्त हो सकती हैं। भारत में ऐसी कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो नाजुक अवस्था में हैं।
भारत में लुप्त होने का खतरा झेल रही प्रजातियाँ निम्नलिखित है :-
1. स्तनधारी (Mammals):- लगभग 79 प्रजातियाँ लुप्त होने के खतरे में हैं।
2. पक्षी (Birds) :- लगभग 44 प्रजातियाँ संकटग्रस्त हैं।
3. सरीसृप (Reptiles) :- लगभग 15 प्रजातियाँ खतरे की स्थिति में हैं।
4. जलस्थलचर (Amphibians) :- लगभग 3 प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर हैं।
5. पादप प्रजातियाँ (Plants) :- लगभग 1500 पादप प्रजातियाँ भी लुप्त होने के खतरे से जूझ रही हैं।
लुप्त होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित है :-
1. वनोन्मूलन
2. आवास का नष्ट होना
3. अवैध शिकार
4. पर्यावरण प्रदूषण
5. जलवायु परिवर्तन
उदाहरण :-
भारत में चीता और गुलाबी सिर वाली बत्तख जैसी प्रजातियाँ लुप्तप्राय हो चुकी हैं, जबकि कई अन्य प्रजातियाँ अभी भी संरक्षण के अभाव में खतरे की स्थिति में हैं।
प्रजातियों का वर्गीकरण क्या है? IUCN के अनुसार समझाइए :-
अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण एवं प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ (IUCN) के अनुसार प्रजातियों को उनकी संख्या, स्थिति और अस्तित्व के खतरे के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में बाँटा गया है।
IUCN के अनुसार प्रजातियों का वर्गीकरण निम्नलिखित है :-
1. सामान्य जातियाँ (Normal Species) :- वे जातियाँ जिनकी संख्या जीवित रहने के लिए पर्याप्त होती है। ये प्राकृतिक वातावरण में सामान्य रूप से पाई जाती हैं।
उदाहरण :-
साल, चीड़, कृन्तक (रोडेंट्स), सामान्य पशु-पक्षी।
2. लुप्त जातियाँ (Extinct Species) :- वे जातियाँ जो अपने प्राकृतिक आवास में खोज करने पर नहीं मिलतीं। माना जाता है कि ये पृथ्वी से पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं।
उदाहरण :-
एशियाई चीता, गुलाबी सिर वाली बत्तख।
3. सुभेद्य जातियाँ (Vulnerable Species) :- वे जातियाँ जिनकी संख्या घट रही है। यदि प्रतिकूल परिस्थितियाँ बनी रहीं तो ये संकटग्रस्त बन सकती हैं।
उदाहरण :-
नीली भेड़, एशियाई हाथी, गंगा डॉल्फिन।
4. संकटग्रस्त जातियाँ (Endangered Species) :- वे जातियाँ जिनके लुप्त होने का खतरा बहुत अधिक है। यदि संरक्षण न किया गया तो इनका अस्तित्व समाप्त हो सकता है।
उदाहरण :-
काला हिरण, मगरमच्छ, संगाई (मणिपुर का हिरण)।
5. दुर्लभ जातियाँ (Rare Species) :- वे जातियाँ जिनकी संख्या बहुत कम होती है। परिस्थितियाँ न बदलीं तो ये भी संकटग्रस्त बन सकती हैं।
उदाहरण :-
कुछ विशेष वन्य पौधों और जीवों की प्रजातियाँ।
6. स्थानिक जातियाँ (Endemic Species) :- वे जातियाँ जो केवल किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र में ही पाई जाती हैं। ये अन्य स्थानों पर प्राकृतिक रूप से नहीं मिलतीं।
उदाहरण :-
1. अंडमानी टील, निकोबारी कबूतर, अंडमानी जंगली सुअर, अरुणाचल का मिथुन।
2. काला हिरण एक संकटग्रस्त जाति है, जबकि अंडमानी टील एक स्थानिक जाति का उदाहरण है।
2.2 वे प्रतिकूल कारक कौन से हैं जिनसे वनस्पतिजात और प्राणिजात का इतना भयानक ह्रास हुआ है?
वनस्पतिजात और प्राणिजात के ह्रास (क्षय) के क्या कारण हैं? समझाइए :-
भारत में वनस्पतिजात (फ्लोरा) और प्राणिजात (फौना) के ह्रास के पीछे अनेक मानवीय गतिविधियाँ जिम्मेदार हैं।
वनस्पतिजात और प्राणिजात के ह्रास के मुख्य कारण निम्नलिखित है :-
1. कृषि का विस्तार :- बढ़ती जनसंख्या के कारण कृषि भूमि की आवश्यकता बढ़ी। 1951 से 1980 के बीच लगभग 2,62,000 वर्ग किमी वन क्षेत्र को कृषि भूमि में बदल दिया गया। पूर्वोत्तर और मध्य भारत में झूम (स्थानांतरी) खेती से वनों का अत्यधिक विनाश हुआ।
2. संवर्धन वृक्षारोपण (Monoculture Plantation) :- व्यावसायिक लाभ के लिए एक ही प्रजाति के पेड़ लगाए गए। इससे अन्य पादप प्रजातियाँ नष्ट हो गईं और जैव विविधता घट गई।
3. विकास परियोजनाएँ :- बाँध, सड़क, उद्योग और नदी घाटी परियोजनाओं से वनों को भारी नुकसान पहुँचा। 1952 से अब तक 5000 वर्ग किमी से अधिक वन क्षेत्र नष्ट हो चुका है।
4. खनन गतिविधियाँ :- खनन से प्राकृतिक आवास नष्ट होते हैं। इससे वन्य जीवों और वनस्पति पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
उदाहरण :-
बक्सा टाइगर रिजर्व (पश्चिम बंगाल) में डोलोमाइट खनन।
5. संसाधनों का असमान बँटवारा :- अमीर वर्ग द्वारा संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया जाता है। गरीब वर्ग संसाधनों से वंचित रह जाता है, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ता है।
उदाहरण :-
बाँध निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे जाते हैं, जिससे वन्य जीवों का आवास नष्ट होता है और कई प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर पहुँच जाती हैं।
हिमालयन यव क्या है? इसके उपयोग और हानि बताइए :-
हिमालयन यव :- एक सदाबहार औषधीय वृक्ष है, जो चीड़ की एक प्रजाति मानी जाती है। यह मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है। यह अपने औषधीय गुणों के कारण बहुत महत्वपूर्ण है।
हिमालयन यव के उपयोग निम्नलिखित है :-
1. इसके छाल, पत्तियों, टहनियों और जड़ों से टकसोल नामक रसायन प्राप्त किया जाता है।
2. टकसोल का उपयोग कैंसर रोग के उपचार में किया जाता है।
3. यह आधुनिक चिकित्सा में एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है।
हिमालयन यव से होने वाला नुकसान निम्नलिखित है :-
1. अत्यधिक और अवैज्ञानिक दोहन के कारण इसके पेड़ों को भारी क्षति पहुँची है।
2. हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश के कई क्षेत्रों में हजारों यव के पेड़ सूख चुके हैं।
3. इससे इस प्रजाति के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया है।
नोट :-
कैंसर की दवाइयों में उपयोग होने के कारण हिमालयन यव का अत्यधिक कटाव हुआ, जिससे कई पर्वतीय क्षेत्रों में यह वृक्ष तेजी से समाप्त होने लगा।
कम होते संसाधनों के सामाजिक प्रभाव क्या हैं? समझाइए :-
संसाधनों की कमी का समाज पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसका असर विशेष रूप से गरीब वर्ग और महिलाओं पर अधिक पड़ता है। जब प्राकृतिक संसाधन कम होते हैं, तो लोगों का दैनिक जीवन कठिन हो जाता है।
कम होते संसाधनों के मुख्य सामाजिक प्रभाव निम्नलिखित है :-
1. महिलाओं पर कार्यभार में वृद्धि :- ईंधन, चारा, पेयजल और अन्य आवश्यक वस्तुएँ जुटाने का भार अधिकतर महिलाओं पर होता है। संसाधनों की कमी होने पर उन्हें अधिक समय और मेहनत करनी पड़ती है।
2. पेयजल की समस्या :- कई ग्रामीण क्षेत्रों में पानी के स्रोत दूर हो जाते हैं। महिलाओं को पीने का पानी लाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।
3. गरीब वर्ग पर अधिक प्रभाव :- वनों की कटाई से बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ती हैं। इन आपदाओं का सबसे अधिक नुकसान गरीब लोगों को उठाना पड़ता है।
4. जीवन की गुणवत्ता में गिरावट :- संसाधनों की कमी से स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। सामाजिक असमानता और बढ़ जाती है।
उदाहरण :-
कई ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्रोत सूख जाने के कारण महिलाओं को रोज़ाना दूर-दराज़ से पानी लाना पड़ता है, जिससे उनका समय, स्वास्थ्य और शिक्षा प्रभावित होती है।
2.3 भारत में वन और वन्य जीवन का संरक्षण कैसे किया जाता है?
भारतीय वन्यजीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 क्या है? समझाइए :-
भारतीय वन्यजीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 भारत सरकार द्वारा वन्य जीवों और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा के लिए बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून है।
1960 और 1970 के दशकों में वन्य जीवों की संख्या तेजी से घटने लगी थी। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों की माँग पर सरकार ने इस अधिनियम को लागू किया।
भारतीय वन्यजीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. वन्य जीवों के शिकार पर प्रतिबंध लगाया गया।
2. राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य और जैव आरक्षित क्षेत्र स्थापित करने की व्यवस्था की गई।
3. लुप्तप्राय और संकटग्रस्त प्रजातियों को विशेष कानूनी संरक्षण दिया गया।
4. वन्य जीवों के अवैध व्यापार पर रोक लगाई गई।
5. उल्लंघन करने वालों के लिए कठोर दंड और जुर्माने का प्रावधान किया गया।
उदाहरण :-
इस अधिनियम के तहत काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में एक सींग वाले गैंडे और गिर राष्ट्रीय उद्यान में एशियाई शेर को कानूनी संरक्षण प्रदान किया गया है।
भारतीय वन्यजीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के उद्देश्य क्या है? लिखिए :-
इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य वन्यजीवों की रक्षा करना और उनकी प्रजातियों को लुप्त होने से बचाना है।
भारतीय वन्यजीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित है :-
1. संरक्षित वन्य प्रजातियों की अखिल भारतीय सूची तैयार करना।
2. संकटग्रस्त प्रजातियों के शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना।
3. वन्यजीवों के व्यापार और तस्करी पर रोक लगाना।
4. वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना।
5. केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य स्थापित करना।
6. विशेष प्रजातियों की सुरक्षा के लिए विशेष परियोजनाएँ शुरू करना।
उदाहरण :-
प्रोजेक्ट टाइगर इसी अधिनियम के अंतर्गत शुरू किया गया, जिससे भारत में बाघों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण सफलता मिली।
2.4 वन और वन्य जीव संसाधनों के प्रकार और वितरण क्या हैं?
वन विभाग द्वारा वनों का वर्गीकरण समझाइए :-
भारत में वनों के संरक्षण और प्रबंधन के उद्देश्य से वन विभाग द्वारा वनों को तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। यह वर्गीकरण वनों के उपयोग और सुरक्षा के स्तर के आधार पर किया गया है।
वनों के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित है :-
1. आरक्षित वन (Reserved Forests) :- देश के कुल वन क्षेत्र का आधे से अधिक भाग आरक्षित वन के अंतर्गत आता है। इन वनों को सबसे अधिक सुरक्षित माना जाता है। यहाँ वन संसाधनों के उपयोग पर कड़े प्रतिबंध होते हैं। वन और वन्य जीवों के संरक्षण की दृष्टि से ये सबसे मूल्यवान होते हैं।
2. रक्षित वन (Protected Forests) :- देश के लगभग एक-तिहाई वन क्षेत्र को रक्षित वन घोषित किया गया है। इन वनों को पूरी तरह नष्ट होने से बचाने के लिए सुरक्षा प्रदान की जाती है। सीमित रूप से स्थानीय लोगों को संसाधनों के उपयोग की अनुमति होती है।
3. अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests) :- ये वे वन और बंजर भूमि हैं जो आरक्षित या रक्षित श्रेणी में शामिल नहीं हैं। इनका स्वामित्व सरकार, समुदाय या निजी व्यक्तियों के पास हो सकता है। इन वनों पर संरक्षण के नियम अपेक्षाकृत कम होते हैं।
उदाहरण :-
किसी राष्ट्रीय उद्यान का क्षेत्र आरक्षित वन, राज्य सरकार द्वारा संरक्षित जंगल रक्षित वन, जबकि ग्राम पंचायत की भूमि पर स्थित जंगल अवर्गीकृत वन की श्रेणी में आते हैं।
2.5 समुदाय और वन संरक्षण में क्या संबंध है?
संरक्षण से क्या लाभ होते हैं? समझाइए :-
संरक्षण :- संरक्षण का अर्थ है प्राकृतिक संसाधनों, वनस्पति और वन्यजीवन को सुरक्षित रखना। संरक्षण से पर्यावरण और मानव जीवन दोनों को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।
संरक्षण के मुख्य लाभ निम्नलिखित है :-
1. पारिस्थितिकी विविधता की रक्षा :- संरक्षण से विभिन्न पादप और जंतु प्रजातियाँ सुरक्षित रहती हैं। इससे प्रकृति का संतुलन बना रहता है।
2. मूलभूत संसाधनों का संरक्षण :- जल, वायु और मिट्टी जैसे जीवन के लिए आवश्यक संसाधन सुरक्षित रहते हैं। प्रदूषण कम होता है।
3. मानव जीवन की गुणवत्ता में सुधार :- स्वच्छ हवा, शुद्ध जल और उपजाऊ मिट्टी उपलब्ध होती है। स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ कम होती हैं।
4. भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षा :- संसाधनों का संरक्षण करने से आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकताएँ भी पूरी हो सकती हैं।
5. प्राकृतिक आपदाओं में कमी :- वनों के संरक्षण से बाढ़, सूखा और भूमि अपरदन जैसी समस्याएँ कम होती हैं।
उदाहरण :-
वनों के संरक्षण से वर्षा नियमित होती है और नदियों में जल बना रहता है, जिससे खेती और पेयजल दोनों को लाभ मिलता है।
वन्य जीवन को होने वाले अविवेकी ह्रास पर नियंत्रण के उपाय बताइए :-
वन्य जीवन को अविवेकी ह्रास से बचाने के लिए सरकार और समाज दोनों स्तरों पर कई महत्वपूर्ण उपाय किए गए हैं। इन उपायों का उद्देश्य वन्य प्राणियों और वनस्पतियों की रक्षा करना तथा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना है।
वन्य जीवन संरक्षण के प्रमुख उपाय निम्नलिखित है :-
1. प्रभावी कानूनों का निर्माण :- सरकार द्वारा वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम लागू किया गया है, जिससे शिकार और अवैध व्यापार पर रोक लगी है।
2. जैव निचय (जैव संरक्षण स्थल) की स्थापना :- भारत सरकार ने लगभग 14 जैव निचय बनाए हैं, जहाँ पादप और प्राणि प्रजातियों का संरक्षण किया जाता है।
3. वनस्पति उद्यानों को सहायता :- वर्ष 1992 से सरकार द्वारा कई वनस्पति उद्यानों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है।
4. विशेष संरक्षण परियोजनाएँ :- संकटग्रस्त जीवों की रक्षा के लिए अनेक परियोजनाएँ शुरू की गई हैं, जैसे— प्रोजेक्ट टाइगर, गैंडा परियोजना, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड परियोजना, अन्य ईको-विकासीय (पारिस्थितिक) परियोजनाएँ
5. संरक्षित क्षेत्रों का विकास :- देश में 89 राष्ट्रीय उद्यान, 490 वन्य जीव अभयारण्य तथा कई प्राणी उद्यान स्थापित किए गए हैं।
6. जन-जागरूकता की आवश्यकता :- वन्य जीवन और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के महत्व को समझना हमारी उत्तरजीविता के लिए अत्यंत आवश्यक है।
उदाहरण :-
प्रोजेक्ट टाइगर के कारण भारत में बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है, जो वन्य जीवन संरक्षण की सफलता का अच्छा उदाहरण है।
चिपको आंदोलन क्या था? समझाइए :-
चिपको आंदोलन :- एक पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा जन आंदोलन था। यह आंदोलन वृक्षों की अंधाधुंध कटाई का विरोध करने के लिए किया गया। इसमें ग्रामीण लोग, विशेषकर किसान और महिलाएँ, पेड़ों से चिपककर उन्हें काटने से रोकते थे, इसी कारण इसे चिपको आंदोलन कहा गया।
चिपको आंदोलन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. यह आंदोलन भारत के उत्तराखंड राज्य में शुरू हुआ।
2. आंदोलन का प्रारंभ सन 1970 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के चमोली जिले में हुआ।
3. किसानों और ग्रामीणों ने जंगलों की कटाई का शांतिपूर्ण विरोध किया।
4. इसका मुख्य उद्देश्य वनों का संरक्षण और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा करना था।
5. इस आंदोलन ने पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाई।
उदाहरण :-
जब ठेकेदार पेड़ काटने आए, तो गाँव की महिलाओं ने पेड़ों को गले लगाकर खड़े हो जाने का निर्णय लिया और कटाई रोक दी—यह चिपको आंदोलन का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
प्रोजेक्ट टाइगर क्या है? समझाइए :-
प्रोजेक्ट टाइगर :- भारत सरकार द्वारा बाघों को विलुप्त होने से बचाने के उद्देश्य से शुरू की गई एक महत्वपूर्ण संरक्षण योजना है। इसे वर्ष 1973 में लागू किया गया था। इस योजना का मुख्य लक्ष्य बाघों की घटती संख्या को रोकना और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना है।
प्रोजेक्ट टाइगर के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित है :-
1. यह योजना बाघों के संरक्षण और उनकी संख्या बढ़ाने के लिए शुरू की गई।
2. बीसवीं सदी की शुरुआत में भारत में बाघों की संख्या लगभग 55,000 थी।
3. निरंतर शिकार और वनों की कटाई के कारण वर्ष 1973 में बाघों की संख्या घटकर 1,827 रह गई।
4. प्रोजेक्ट टाइगर के अंतर्गत राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों में बाघों को विशेष सुरक्षा दी गई।
5. बाघों के प्राकृतिक आवास (वनों) को संरक्षित किया गया और शिकार पर सख्त प्रतिबंध लगाया गया।
उदाहरण :-
सुंदरबन, जिम कॉर्बेट और कान्हा राष्ट्रीय उद्यान जैसे क्षेत्रों को टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया, जिससे वहाँ बाघों की संख्या में वृद्धि देखने को मिली।
बाघ की आबादी के लिए खतरे कौन-कौन से हैं :-
बाघों की संख्या में कमी के पीछे कई मानवीय और पर्यावरणीय कारण जिम्मेदार हैं।
बाघ की आबादी के लिए प्रमुख खतरे निम्नलिखित हैं :-
1. व्यापार के लिए शिकार :- बाघ की खाल, हड्डियों और अन्य अंगों के अवैध व्यापार के कारण उनका शिकार किया जाता है।
2. आवास का सिमटना :- वनों की कटाई, कृषि विस्तार और विकास कार्यों से बाघों का प्राकृतिक आवास कम होता जा रहा है।
3. भोजन की कमी :- बाघ के भोजन के लिए आवश्यक जंगली शाकाहारी पशुओं की संख्या घटने से बाघों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता।
4. मानव-वन्यजीव संघर्ष :- मानव बस्तियों के पास आने पर बाघों को मारा जाता है, जिससे उनकी संख्या प्रभावित होती है।
उदाहरण :-
वन क्षेत्रों में शिकार और वनों की कटाई के कारण कई टाइगर रिज़र्व में बाघों की संख्या घट गई, इसी कारण प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया।
भारत में महत्वपूर्ण टाइगर रिज़र्व कौन-कौन से हैं? लिखिए :-
भारत में बाघ संरक्षण के लिए कई टाइगर रिज़र्व (बाघ अभयारण्य) स्थापित किए गए हैं। ये क्षेत्र बाघों के प्राकृतिक आवास की रक्षा करने और उनकी संख्या बढ़ाने में सहायक हैं।
भारत के प्रमुख टाइगर रिज़र्व निम्नलिखित हैं :-
1. कॉरबेट राष्ट्रीय उद्यान — उत्तराखण्ड
2. सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान — पश्चिम बंगाल
3. बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान — मध्य प्रदेश
4. सरिस्का टाइगर रिज़र्व — राजस्थान
5. मानस टाइगर रिज़र्व — असम
6. पेरियार टाइगर रिज़र्व — केरल
महत्त्व :-
1. ये रिज़र्व बाघों को सुरक्षित आवास प्रदान करते हैं।
2. अवैध शिकार पर नियंत्रण रखते हैं।
3. जैव विविधता और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।
उदाहरण :-
सुंदरबन टाइगर रिज़र्व दुनिया का एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ मैंग्रोव वनों में बाघ पाए जाते हैं।