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Class 10 geography Notes in hindI Chapter - 3

Chapter 3: जल संसाधन  / Water Resources
Chapter Introduction: 
इस अध्याय में आप जल संसाधनों के महत्व तथा उनके संरक्षण की आवश्यकता को समझेंगे। साथ ही जल दुर्लभता, जल प्रबंधन, बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ तथा वर्षा जल संचयन जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाओं को सरल भाषा में पढ़ेंगे।
नीचे अध्याय 3 जल संसाधन  के सभी महत्वपूर्ण topics को सरल भाषा में विस्तार से समझाया गया है जो NCERT syllabus पर आधारित हैं, तथा बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

CLASS 10 GEOGRAPHY NOTES IN HINDI
CHAPTER 3 : जल संसाधन

DETAILS

INFORMATION

Textbook

NCERT

Class

Class 10

Subject

Geography

Chapter

Chapter 3

Chapter Name

जल संसाधन

Medium

Hindi

 

क्या आप Class 10 Geography Chapter 3 Notes in Hindi ढूँढ रहे हैं?
यहाँ आपको जल संसाधन अध्याय के आसान और सरल नोट्स मिलेंगे। इस अध्याय में आप जल के महत्व, जल दुर्लभता, जल संरक्षण, बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं तथा वर्षा जल संचयन जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाओं के बारे में विस्तार से समझेंगे।

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
3.1 जल दुर्लभता और जल संरक्षण एवं प्रबंधन की आवश्यकता क्या है?
3.2 बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ और समन्वित जल संसाधन प्रबंधन क्या है?
3.3 वर्षा जल संचयन क्या है?

Chapter Summary
इस अध्याय में आप जल संसाधनों के महत्व तथा उनके संरक्षण की आवश्यकता के बारे में समझेंगे। आप जानेंगे कि जल जीवन, कृषि, उद्योग तथा मानव गतिविधियों के लिए अत्यंत आवश्यक प्राकृतिक संसाधन है।
आप जल दुर्लभता के कारणों के बारे में भी पढ़ेंगे। बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण, औद्योगीकरण, कृषि में अधिक जल उपयोग तथा जल प्रदूषण के कारण कई क्षेत्रों में जल संकट उत्पन्न हो रहा है।
इस अध्याय में आप जल संरक्षण और जल प्रबंधन की अवधारणाओं को समझेंगे। जल का संतुलित उपयोग, पुनर्चक्रण, संरक्षण तथा समुचित प्रबंधन सतत विकास के लिए आवश्यक हैं।
आप बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं के बारे में भी जानेंगे, जिनका उपयोग सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण तथा पेयजल उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है। साथ ही समन्वित जल संसाधन प्रबंधन की आवश्यकता को भी समझेंगे।
अंत में आप वर्षा जल संचयन के महत्व और उसकी विधियों के बारे में पढ़ेंगे। वर्षा के जल को एकत्र कर भविष्य में उपयोग के लिए सुरक्षित रखना भूजल स्तर बढ़ाने तथा जल संकट को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

3.1 जल दुर्लभता और जल संरक्षण एवं प्रबंधन की आवश्यकता क्या है?

जल के कुछ रोचक तथ्य लिखिए :-

जल पृथ्वी पर जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक प्राकृतिक संसाधन है।

जल से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण और रोचक तथ्य निम्नलिखित हैं :- 

1. विश्व में उपलब्ध कुल जल का लगभग 96.5 प्रतिशत भाग समुद्रों में खारे पानी के रूप में पाया जाता है।

2. पृथ्वी पर केवल 2.5 प्रतिशत जल ही मीठा जल है, जो पीने, खेती और उद्योग के लिए उपयोगी है।

3. भारत को विश्व की कुल वर्षा का लगभग 4 प्रतिशत भाग प्राप्त होता है।

4. जल की प्रति व्यक्ति वार्षिक उपलब्धता के मामले में भारत का स्थान विश्व में लगभग 133वाँ है।

5. यह आशंका जताई जाती है कि 2025 तक भारत के बड़े हिस्से जल संकटग्रस्त क्षेत्रों में शामिल हो सकते हैं।

 उदाहरण :-
लगातार बढ़ती जनसंख्या और जल के अपव्यय के कारण कई भारतीय शहरों में गर्मियों के मौसम में पीने के पानी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाती है।

जल दुर्लभता क्या होती है? समझाइए :-

जल दुर्लभता :- जल दुर्लभता का अर्थ है पानी की कमी होना। 

जब किसी क्षेत्र में उपलब्ध जल की मात्रा लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होती, तब उस स्थिति को जल दुर्लभता कहते हैं।
यह समस्या बढ़ती जनसंख्या, जल का अति-दोहन, असमान वितरण और प्रदूषण के कारण उत्पन्न होती है।

जल दुर्लभता की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :- 

1. जल की उपलब्धता आवश्यकता से कम हो जाती है।

2. पेयजल, सिंचाई और उद्योग सभी प्रभावित होते हैं।

3. ग्रामीण और शहरी—दोनों क्षेत्रों में समस्या उत्पन्न होती है।

4. पर्यावरण और मानव जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

उदाहरण :-
राजस्थान और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में वर्षा कम होने और भूजल के अधिक दोहन के कारण जल दुर्लभता की स्थिति देखी जाती है।

जल दुर्लभता के कारण क्या हैं? समझाइए :-

जल दुर्लभता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-

1. बड़ी जनसंख्या :- जनसंख्या बढ़ने से पीने, खेती और उद्योग के लिए पानी की माँग बढ़ जाती है।

2. सिंचित क्षेत्रों का विस्तार :- कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है।

3. शहरीकरण और औद्योगीकरण :- शहरों और उद्योगों के विस्तार से पानी की खपत बहुत अधिक बढ़ गई है।

4. पानी की असमान पहुँच :- समाज के सभी वर्गों को पानी समान रूप से उपलब्ध नहीं होता।

5. उद्योगों द्वारा अत्यधिक जल उपयोग :- कई उद्योग बड़ी मात्रा में जल का उपयोग करते हैं, जिससे जल संकट गहराता है।

6. शहरी क्षेत्रों में पानी का अधिक दोहन :- भूजल का अत्यधिक उपयोग करने से जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।

उदाहरण :-
दिल्ली और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में बढ़ती आबादी और उद्योगों के कारण भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, जिससे जल दुर्लभता की समस्या उत्पन्न हो रही है।

औद्योगीकरण तथा शहरीकरण किस प्रकार जल-दुर्लभता के लिए उत्तरदायी हैं? समझाइए :-

औद्योगीकरण और शहरीकरण के तेज़ विस्तार के कारण जल की माँग बहुत बढ़ गई है, जिससे जल-दुर्लभता की समस्या उत्पन्न हुई है।

इस विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं :- 

1. तेज़ औद्योगीकरण :- स्वतंत्रता के बाद भारत में उद्योगों की संख्या तेजी से बढ़ी। उद्योगों में मशीनों, शीतलन (कूलिंग) और उत्पादन के लिए अलवणीय (मीठे) जल का अत्यधिक उपयोग होता है।

2. शहरीकरण और बढ़ती जनसंख्या :- शहरों की आबादी बढ़ने से घरेलू उपयोग के लिए पानी की माँग बहुत बढ़ गई। शहरी जीवन-शैली के कारण जल और ऊर्जा दोनों की खपत में वृद्धि हुई।

3. जल संसाधनों का अतिशोषण :- शहरों और गाँवों में भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है। इससे जलस्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। 

4. प्रबंधन की कमी :- औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों में जल का पुनः उपयोग और संरक्षण पर्याप्त नहीं है। इससे उपलब्ध जल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

उदाहरण :-
दिल्ली और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में बढ़ती आबादी और उद्योगों के कारण भू-जल स्तर तेजी से गिर रहा है, जिससे जल-दुर्लभता की समस्या गंभीर होती जा रही है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ क्या होती हैं? समझाइए :-

बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ :- वे कंपनियाँ होती हैं जिनके उद्योग या कार्यालय एक से अधिक देशों में कार्य करते हैं। ये कंपनियाँ विभिन्न देशों में पूँजी निवेश करती हैं और वहाँ उत्पादन, व्यापार व सेवाओं के माध्यम से अधिक लाभ अर्जित करती हैं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :- 

1. एक से अधिक देशों में इनके उद्योग या शाखाएँ होती हैं।

2. विभिन्न देशों में पूँजी निवेश करती हैं।

3. उत्पादन और व्यापार वैश्विक स्तर पर होता है।

4. आधुनिक तकनीक और प्रबंधन का उपयोग करती हैं।

5. अधिक लाभ कमाना इनका मुख्य उद्देश्य होता है।

उदाहरण :-
कोका-कोला, नेस्ले और सैमसंग जैसी कंपनियाँ कई देशों में अपने उद्योग चलाती हैं, इसलिए इन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कहा जाता है।

जल विद्युत क्या है? समझाइए :-

जल विद्युत :- वह विद्युत ऊर्जा है जो ऊँचे स्थानों से बहते या गिरते हुए जल की शक्ति से उत्पन्न की जाती है।

जब जलधारा को बाँध या जलाशय में एकत्र कर नीचे की ओर छोड़ा जाता है, तो उसकी गति से टरबाइन घूमती है और विद्युत उत्पन्न होती है।

जल विद्युत की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :- 

1. यह एक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है। 

2. जल के प्रवाह से बिजली उत्पन्न की जाती है।

3. इससे प्रदूषण नहीं होता, इसलिए यह पर्यावरण के अनुकूल है।

4. बड़े बाँध और जलाशय जल विद्युत उत्पादन में सहायक होते हैं।

5. लंबे समय तक ऊर्जा उपलब्ध कराती है।

उदाहरण :-
भाखड़ा नांगल बाँध से उत्पन्न बिजली जल विद्युत का एक प्रमुख उदाहरण है।

एक नवीकरणीय संसाधन होते हुए भी जल के संरक्षण तथा प्रबंधन की आवश्यकता क्यों है :-

जल एक नवीकरणीय संसाधन है, फिर भी इसका संरक्षण और उचित प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि जल की उपलब्धता सीमित है और इसका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। यदि जल का सही ढंग से संरक्षण नहीं किया गया तो भविष्य में गंभीर जल संकट उत्पन्न हो सकता है।

जल संरक्षण एवं प्रबंधन की आवश्यकता के कारण निम्नलिखित हैं :- 

1. ताजे जल की सीमित मात्रा :- विश्व के कुल जल का केवल 2.5 प्रतिशत ही मीठा (ताजा) जल है, जो उपयोग के लिए उपलब्ध है।

2. जल संसाधनों का अति-दोहन :- सिंचाई, उद्योग और घरेलू उपयोग के लिए जल का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है।

3. बढ़ती जनसंख्या और बढ़ती माँग :- जनसंख्या वृद्धि के साथ पीने, खेती और उद्योग के लिए जल की माँग लगातार बढ़ रही है।

4. जल की असमान पहुँच :- कुछ क्षेत्रों और सामाजिक वर्गों को पर्याप्त जल मिलता है, जबकि अन्य क्षेत्रों में जल की भारी कमी है।

5. तेजी से बढ़ता शहरीकरण :- शहरों के विस्तार से भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है।

6. औद्योगीकरण :- उद्योगों में जल का भारी मात्रा में उपयोग और प्रदूषण जल संकट को और गहरा कर रहा है।

उदाहरण :-
वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) द्वारा वर्षा के पानी को संग्रहित कर भविष्य के लिए सुरक्षित किया जा सकता है, जिससे जल संरक्षण और प्रबंधन दोनों संभव होते हैं।

3.2 बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ और समन्वित जल संसाधन प्रबंधन क्या है?

बहुउद्देशीय परियोजनाएँ क्या होती हैं? समझाइए :-

बहुउद्देशीय परियोजनाएँ :- वे परियोजनाएँ होती हैं, जिनमें नदियों पर बाँध बनाकर एक साथ कई उद्देश्यों को प्राप्त  करने का प्रयास किया जाता है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य जल संसाधनों का समुचित उपयोग और क्षेत्र का समग्र विकास करना होता है।

बहुउद्देशीय परियोजनाओं की मुख्य विशेषताएँ क्या होती है? समझाइए :-

बहुउद्देशीय परियोजनाओं की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. नदियों पर बड़े बाँध बनाए जाते हैं।

2. एक ही परियोजना से कई लाभ प्राप्त होते हैं।

3. जल का संग्रह और नियंत्रित उपयोग किया जाता है।

4. कृषि, उद्योग और ऊर्जा उत्पादन में सहायता मिलती है।

5. क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिलता है।

बहुउद्देशीय परियोजनाओं के प्रमुख उद्देश्य कौन-कौन से हैं :-

बहुउद्देशीय परियोजनाओं के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं :-

1. सिंचाई की सुविधा

2. जल विद्युत उत्पादन

3. बाढ़ नियंत्रण

4. पेयजल की आपूर्ति

5. मत्स्य पालन

6. पर्यटन का विकास

उदाहरण :-
भाखड़ा–नांगल परियोजना 

बाँध क्या होता है? समझाइए :-

बाँध :- वह कृत्रिम संरचना है, जिसे नदी या बहते जल के मार्ग में बनाया जाता है ताकि जल के बहाव को रोका, नियंत्रित किया या दिशा दी जा सके। बाँध के कारण जल एक स्थान पर एकत्र होकर जलाशय या झील का निर्माण करता है, जिसका उपयोग विभिन्न कार्यों के लिए किया जाता है।

उदाहरण :-
भाखड़ा-नांगल बाँध एक प्रसिद्ध बाँध है, जिसका उपयोग सिंचाई, बिजली उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण के लिए किया जाता है।

बाँधों से होने वाले लाभ क्या हैं? समझाइए :-

बाँध बहते हुए जल को नियंत्रित करके मानव की अनेक आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। इसलिए बाँधों को बहुउद्देशीय परियोजनाएँ भी कहा जाता है।

बाँधों से होने वाले प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं :- 

1. सिंचाई सुविधा :- बाँधों में संचित जल से खेतों की सिंचाई की जाती है। इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है।

2. विद्युत उत्पादन :- जल को ऊँचाई से गिराकर जल-विद्युत उत्पन्न की जाती है। यह ऊर्जा का नवीकरणीय स्रोत है।

3. घरेलू एवं औद्योगिक जल आपूर्ति :- शहरों और उद्योगों को पीने व अन्य कार्यों के लिए जल उपलब्ध कराया जाता है।

4. बाढ़ नियंत्रण :- अधिक वर्षा के समय जल को रोककर बाढ़ की तीव्रता कम की जाती है। इससे जान-माल की सुरक्षा होती है।

5. मनोरंजन और पर्यटन :- बाँधों और जलाशयों के आसपास पर्यटन स्थल विकसित होते हैं। इससे स्थानीय रोजगार बढ़ता है।

6. मत्स्य पालन :- जलाशयों में मछली पालन किया जाता है। यह लोगों की आजीविका का साधन बनता है।

बाँधों को अब बहुउद्देशीय परियोजना क्यों कहा जाता है :-

बाँधों को बहुउद्देशीय परियोजना इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनसे एक ही समय में कई उद्देश्यों की पूर्ति की जाती है। बाँध से एकत्र किया गया जल विभिन्न कार्यों में आपस में जुड़ा हुआ होता है।

बाँधों को बहुउद्देशीय परियोजना कहने के कारण निम्नलिखित हैं :- 

1. बाँध से प्राप्त जल का उपयोग सिंचाई, बिजली उत्पादन और जल आपूर्ति में किया जाता है।

2. बाँधों का निर्माण बाढ़ नियंत्रण के लिए किया जाता है जिससे निचले क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा कम होता है।

3. जल विद्युत परियोजनाओं के माध्यम से विद्युत उत्पादन किया जाता है।

4. बाँध जल, वनस्पति और मिट्टी के संरक्षण में सहायक होते हैं।

5. बाँधों के आसपास के क्षेत्र पर्यटन और मनोरंजन को बढ़ावा देते हैं।

उदाहरण :-
भाखड़ा नांगल बाँध 

जवाहरलाल नेहरू ने बाँधों को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ क्यों कहा :-

जवाहरलाल नेहरू ने बाँधों को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ इसलिए कहा क्योंकि वे देश के आर्थिक विकास, औद्योगीकरण और आत्मनिर्भरता का आधार माने जाते थे। जैसे प्राचीन काल में मंदिर समाज के विकास का केंद्र होते थे, वैसे ही आधुनिक भारत में बाँध विकास के प्रतीक बने। 

मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :- 

1. बाँधों से सिंचाई की सुविधा बढ़ती है, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है।

2. बाँधों से जल विद्युत का उत्पादन होता है, जो उद्योगों और घरों के लिए आवश्यक है।

4. ये बाढ़ नियंत्रण में सहायक होते हैं।

5. घरेलू और औद्योगिक उपयोग के लिए जल आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं।

6. मत्स्य पालन, पर्यटन और रोजगार के नए अवसर प्रदान करते हैं।

7. देश के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उदाहरण :-
भाखड़ा-नांगल बाँध से पंजाब और हरियाणा में सिंचाई, बिजली उत्पादन और कृषि विकास को बढ़ावा मिला, इसलिए ऐसे बाँधों को नेहरू जी ने आधुनिक भारत के मंदिर कहा।

भारत में बहुउद्देशीय परियोजनाएँ क्या हैं? समझाइए :-

भारत में बहुउद्देशीय परियोजनाएँ :- वे योजनाएँ हैं, जिन्हें स्वतंत्रता के बाद एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन की सोच के साथ प्रारंभ किया गया। इनका उद्देश्य जल संसाधनों का उपयोग एक साथ कई कार्यों के लिए करना है। ये योजनाएँ औद्योगिकीकरण और शहरी अर्थव्यवस्था के विकास में सहायक हैं।

जवाहरलाल नेहरू ने इन परियोजनाओं को “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा, क्योंकि ये देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना के उद्देश्य क्या हैं? समझाइए :-

बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं का उद्देश्य नदियों के जल का अधिकतम और संतुलित उपयोग करना होता है ताकि समाज और देश को अनेक लाभ मिल सकें।

बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं :- 

1. जल विद्युत उत्पादन :- नदी के बहाव से बिजली उत्पन्न की जाती है। यह ऊर्जा का नवीकरणीय स्रोत है।

2. सिंचाई सुविधा :-  परियोजना से प्राप्त जल से खेतों की सिंचाई की जाती है। इससे कृषि उत्पादन बढ़ता है।

3. घरेलू एवं औद्योगिक जल आपूर्ति :- नगरों और उद्योगों को पीने व अन्य कार्यों के लिए जल मिलता है। 

4. नौचालन एवं पर्यटन :- जलाशयों में नाव चलाने की सुविधा विकसित होती है। पर्यटन को बढ़ावा मिलता है।

5. बाढ़ नियंत्रण :- अधिक वर्षा के समय जल को नियंत्रित कर बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम किया जाता है।

6. मछली पालन :- जलाशयों में मछली पालन से रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।

उदाहरण :-
हिराकुंड बाँध (ओडिशा) से जल विद्युत उत्पादन, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और मत्स्य पालन जैसे अनेक उद्देश्य पूरे किए जाते हैं।

बहु-उद्देशीय नदी परियोजनाओं के लाभ क्या हैं? समझाइए :-

बहु-उद्देशीय नदी परियोजनाएँ नदियों पर बाँध बनाकर जल का विभिन्न कार्यों के लिए उपयोग करती हैं। इनसे एक साथ कई लाभ प्राप्त होते हैं।

बहु-उद्देशीय नदी परियोजनाओं के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं :- 

1. सिंचाई :- संचित जल से खेतों की सिंचाई की जाती है। कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है।

2. विद्युत उत्पादन :- ऊँचाई से गिरते जल से जल-विद्युत उत्पन्न की जाती है। यह ऊर्जा का नवीकरणीय स्रोत है।

3. बाढ़ नियंत्रण :- अधिक वर्षा के समय जल को रोककर बाढ़ की तीव्रता कम की जाती है। जान-माल की सुरक्षा होती है।

4. मत्स्य प्रजनन :- जलाशयों में मछली पालन किया जाता है। लोगों को रोजगार मिलता है।

5. अंतर्देशीय नौवहन :- नदियों व जलाशयों में नावों द्वारा परिवहन संभव होता है। व्यापार को बढ़ावा मिलता है।

6. घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग :- शहरों और उद्योगों को पीने व अन्य कार्यों के लिए जल उपलब्ध होता है।

उदाहरण :-
दामोदर घाटी परियोजना से सिंचाई, जल-विद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण और औद्योगिक जल आपूर्ति जैसे अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।

बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं की आलोचना क्यों की जाती है :-

बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं से कई लाभ होते हैं, लेकिन इनके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी हैं। इन्हीं कारणों से इनकी आलोचना की जाती है।

बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं की प्रमुख आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं :- 

1. नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर प्रभाव :- बाँध नदी के स्वाभाविक बहाव को रोकते हैं, जिससे नदी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है।

2. जलाशयों में अवसादन की समस्या :- जलाशयों में अधिक मात्रा में गाद जमा हो जाती है, जिससे उनकी जल-भंडारण क्षमता कम हो जाती है।

3. जलीय जीवन पर नकारात्मक प्रभाव :- मछलियों और अन्य जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाते हैं, जिससे उनकी संख्या घटती है।

4. स्थानीय लोगों का विस्थापन :- बाँध निर्माण के कारण गाँव और कृषि भूमि डूब जाती हैं, जिससे बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ता है।

5. वनस्पति का नाश और मृदा क्षरण :- बाढ़ मैदानों में बने जलाशय वन क्षेत्रों को डुबो देते हैं और समय के साथ मिट्टी का क्षरण बढ़ता है।

उदाहरण :-
टिहरी बाँध परियोजना में बड़ी संख्या में लोगों का विस्थापन हुआ और नदी के प्राकृतिक पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

नर्मदा बचाओ आंदोलन क्या था? समझाइए :-

नर्मदा बचाओ आंदोलन नर्मदा नदी पर बनाए जा रहे सरदार सरोवर बाँध के विरोध में चलाया गया एक जनआंदोलन था। इसका उद्देश्य पर्यावरण, आदिवासियों और विस्थापित लोगों के अधिकारों की रक्षा करना था।

नर्मदा बचाओ आंदोलन के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं :- 

1. यह आंदोलन सरदार सरोवर बाँध के निर्माण के विरोध में शुरू हुआ।

2. आंदोलन का संचालन मुख्य रूप से गैर-सरकारी संगठनों (NGO) द्वारा किया गया।

3. इसमें जनजातीय लोग, किसान, पर्यावरणविद और मानवाधिकार कार्यकर्ता शामिल थे।

4. शुरुआत में आंदोलन का मुख्य मुद्दा जंगलों और गाँवों के डूबने का था।

5. बाद में आंदोलन का लक्ष्य विस्थापित लोगों के पुनर्वास पर केंद्रित हो गया।

6. आंदोलन ने विकास के साथ-साथ सामाजिक और पर्यावरणीय न्याय पर जोर दिया।

उदाहरण :-
सरदार सरोवर बाँध के कारण नर्मदा घाटी के कई गाँव डूब क्षेत्र में आ गए, जिससे हजारों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा। उनके अधिकारों की रक्षा के लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन चलाया गया।

भूमिगत जल क्या है :-

भूमिगत जल वह जल है जो :- 

1. मृदा (मिट्टी) की सतह के नीचे पाया जाता है।

2. यह जल शैल आस्तरणों (चट्टानों) की दरारों, छिद्रों और परतों में एकत्र होता है।

3. वर्षा का कुछ जल भूमि में रिसकर नीचे चला जाता है और वहीं संचित हो जाता है।

4. इसी जल का उपयोग कुओं, हैंडपंप और ट्यूबवेल द्वारा किया जाता है।

 उदाहरण :-
कुएँ और हैंडपंप से प्राप्त होने वाला पानी भूमिगत जल का उदाहरण है।

3.3 वर्षा जल संचयन क्या है?

वर्षा जल संग्रहण क्या है? समझाइए :-

वर्षा जल संग्रहण :- एक ऐसी तकनीक है, जिसमें वर्षा के जल को एकत्र करके भविष्य में उपयोग के लिए सुरक्षित किया जाता है।

वर्षा जल संग्रहण के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं :- 

1. वर्षा के जल को खाली स्थानों, घरों के टैंकों या बेकार पड़े कुओं में इकट्ठा किया जाता है।

2. संग्रहित जल का उपयोग बाद में घरेलू कार्यों, सिंचाई या पेयजल के रूप में किया जाता है।

3. यह तकनीक जल संरक्षण में सहायक होती है।

4. इससे भूमिगत जल स्तर बढ़ाने में मदद मिलती है।

भारत में वर्षा जल संग्रहण के तरीके निम्नलिखित हैं :- 

1. पर्वतीय क्षेत्रों में ‘गुल’ और ‘कुल’ जैसी नालियों द्वारा नदी के जल को मोड़कर खेतों की सिंचाई की जाती है।

2. राजस्थान में पीने के पानी के लिए छत से वर्षा जल संग्रहण एक सामान्य तकनीक है।

उदाहरण :-
राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में घरों की छत पर गिरने वाले वर्षा जल को टंकी में संग्रहित कर वर्षभर उपयोग किया जाता है।

वर्षा जल संचयन की विधियाँ क्या हैं? समझाइए :-

वर्षा जल संचयन :- वर्षा के पानी को एकत्र करके भविष्य में उपयोग करने की विधि है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार इसकी अलग–अलग विधियाँ अपनाई जाती हैं।

वर्षा जल संचयन की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं :- 

1. गुल और कुल प्रणाली :- पहाड़ी क्षेत्रों, विशेषकर पश्चिमी हिमालय में, कृषि के लिए गुल और कुल नामक छोटी जल वाहिकाएँ बनाई जाती हैं।

2. बाढ़ जल वाहिकाएँ :- पश्चिम बंगाल में बाढ़ के समय अतिरिक्त जल को संग्रहित करने के लिए विशेष नालियाँ बनाई जाती हैं।

3. बरसाती भंडारण संरचनाएँ :- राजस्थान के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में खेतों को बरसाती जल भंडारण संरचनाओं में बदला जाता है।

4. गड्ढ़ों द्वारा जल संग्रहण :- शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल एकत्र करने के लिए गड्ढ़ों का निर्माण किया जाता है।

5. छत पर वर्षा जल संचयन :- घरों की छतों से वर्षा जल को पाइप द्वारा टैंक या कुएँ में एकत्र किया जाता है।

6. टाँका प्रणाली :- बीकानेर, फलौदी और बाड़मेर जैसे क्षेत्रों में पीने के पानी के लिए भूमिगत टैंक (टाँका) बनाए जाते हैं।

7. बाँस ड्रिप सिंचाई प्रणाली :- मेघालय में बाँस की नलियों से वर्षा जल को खेतों तक पहुँचाया जाता है।
उदाहरण :- 

राजस्थान में छत पर वर्षा जल संचयन द्वारा टाँकों में पानी इकट्ठा कर पूरे वर्ष पीने के लिए उपयोग किया जाता है।

ताजे पानी के स्रोत कौन-कौन से हैं? समझाइए :-

ताजा पानी :- वह जल होता है जिसका उपयोग पीने, कृषि और अन्य मानवीय कार्यों में किया जा सकता है। ताजे पानी के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं :- 

1. वर्षा जल :- वर्षा ताजे पानी का प्रमुख और प्राकृतिक स्रोत है। इससे नदियाँ, झीलें और भूजल पुनर्भरण होता है।

2. सतही जल :- इसमें नदियाँ, झीलें, तालाब और जलाशय शामिल हैं। इसका उपयोग सिंचाई, पेयजल और जल-विद्युत उत्पादन में होता है।

3. भूजल :- वर्षा का जल भूमि के अंदर रिसकर चट्टानों की दरारों में एकत्र हो जाता है। कुएँ, हैंडपंप और ट्यूबवेल से भूजल प्राप्त किया जाता है।

उदाहरण :-
गंगा नदी (सतही जल), वर्षा जल संचयन प्रणाली (वर्षा जल) और ट्यूबवेल से प्राप्त जल (भूजल) ताजे पानी के प्रमुख स्रोत हैं।

बाँस ड्रिप सिंचाई प्रणाली क्या है :-

बाँस ड्रिप सिंचाई प्रणाली :- एक पारंपरिक सिंचाई विधि है, जिसमें नदियों या झरनों के पानी को बाँस से बनी पाइपों की सहायता से खेतों तक पहुँचाया जाता है।

बाँस ड्रिप सिंचाई प्रणाली के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं :- 

1. इसमें बाँस के खोखले तनों को पाइप के रूप में प्रयोग किया जाता है।

2. पानी को धीरे-धीरे बूंदों के रूप में फसलों तक पहुँचाया जाता है।

3. यह विधि पानी की बर्बादी को कम करती है।

4. यह पर्यावरण-अनुकूल और कम खर्चीली तकनीक है।

5. विशेष रूप से पहाड़ी और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में उपयोगी है।

उदाहरण :-
मेघालय राज्य में बाँस ड्रिप सिंचाई प्रणाली का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।

प्राचीन भारत में जल संरक्षण के कौन-कौन से उदाहरण मिलते हैं? समझाइए :-

प्राचीन भारत में जल संरक्षण की परंपरा बहुत समृद्ध थी। लोगों ने जल को संचित करने और सही उपयोग के लिए अनेक वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक विधियाँ अपनाईं।

प्राचीन भारत में जल संरक्षण के प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं :- 

1. इलाहाबाद (प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व) :- गंगा नदी की बाढ़ के जल को सुरक्षित रखने के लिए उन्नत जल संचयन प्रणाली विकसित की गई थी।

2. चंद्रगुप्त मौर्य का काल :- इस समय बड़े पैमाने पर बाँध, झीलें और सिंचाई प्रणालियाँ बनाई गईं।

3. उत्कृष्ट सिंचाई तंत्र :- ओडिशा के कलिंग, आंध्र प्रदेश के नागार्जुनकोंडा, कर्नाटक के बेन्नूर और महाराष्ट्र के कोल्हापुर में विकसित सिंचाई प्रणालियों के प्रमाण मिलते हैं।

4. भोपाल झील (11वीं शताब्दी) :- यह अपने समय की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक थी, जो जल संरक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण है।

5. हौज खास, दिल्ली (14वीं शताब्दी) :- सुल्तान इल्तुतमिश ने सिरी किला क्षेत्र में जल आपूर्ति के लिए एक विशाल टैंक का निर्माण कराया।

टाँका क्या है :-

टाँका :- वर्षा जल संग्रहण की एक पारंपरिक विधि है, जिसका उपयोग विशेषकर शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में किया जाता है।

टाँका के विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं :- 

1. टाँका भूमिगत जल संग्रहण संरचना होती है।

2. इसमें वर्षा का जल एकत्र करके संग्रहित किया जाता है।

3. संग्रहित जल को अगली वर्षा ऋतु तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

4. यह ग्रीष्म ऋतु में पीने के पानी की कमी को दूर करने में सहायक होता है।

5. राजस्थान जैसे जल-अभाव वाले क्षेत्रों में टाँका बहुत उपयोगी है।

उदाहरण :-
राजस्थान के बीकानेर, फलौदी और बाड़मेर क्षेत्रों में टाँका बनाकर वर्षा जल संग्रह किया जाता है, जिससे गर्मियों में पीने का पानी उपलब्ध रहता है।

पालर पानी क्या है :-

पालर पानी :- वह वर्षा जल होता है जो भूमिगत टैंकों या टाँकों में संग्रहित किया जाता है और पीने योग्य होता है।

पालर पानी के विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं :- 

1. यह वर्षा के पानी से प्राप्त होता है।

2. भूमिगत टैंकों में जमा किया जाता है।

3. स्वच्छ और पीने के लिए उपयुक्त होता है।

4. शुष्क व मरुस्थलीय क्षेत्रों में इसका विशेष महत्व है।

5. जल की कमी के समय यह उपयोगी जल स्रोत बनता है।

उदाहरण :-
राजस्थान के बीकानेर, बाड़मेर और फलौदी जैसे क्षेत्रों में टाँकों में संग्रहित वर्षा जल को पालर पानी कहा जाता है।

राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में टाँका / पालर पानी का क्या महत्व है? समझाइए :-

राजस्थान के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती है। ऐसे में टाँका और पालर पानी जल संरक्षण का महत्वपूर्ण साधन हैं।

राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में टाँका / पालर पानी का महत्व निम्नलिखित हैं :-

1. मुख्य पेयजल स्रोत :- जब कुएँ, तालाब और अन्य जल स्रोत सूख जाते हैं, तब टाँका/पालर पानी ही पीने के काम आता है।

2. शुद्ध पेयजल :- वर्षा जल सीधे संग्रहित होने के कारण इसे पेयजल का सबसे शुद्ध रूप माना जाता है।

3. गर्मी में सहायक :- भूमिगत टैंकों में जमा पानी आसपास के कमरों को ठंडा और स्वच्छ बनाए रखता है।

4. लंबे समय तक उपयोग :- एकत्र किया गया वर्षा जल अगली वर्षा ऋतु तक उपयोग किया जा सकता है।

उदाहरण :-
बीकानेर, फलौदी और बाड़मेर जैसे क्षेत्रों में घरों की छत से वर्षा जल को टाँकों में संग्रहित करके पूरे वर्ष पीने के लिए उपयोग किया जाता है।

भारत देश में जल का अभाव बढ़ने के क्या कारण हैं? समझाइए :-

भारत में जल का अभाव बढ़ने के पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय कारण जिम्मेदार हैं।

भारत में जल का अभाव बढ़ने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं :-

1. मानसूनी जलवायु पर निर्भरता :- भारत में वर्षा मुख्यतः मानसून पर निर्भर है। मानसून अनियमित होने पर जल की कमी हो जाती है।

2. मानसून की असफलता :- कई बार मानसून समय पर नहीं आता या कम वर्षा होती है, जिससे सूखा और जल संकट उत्पन्न होता है।

3. सिंचाई की बढ़ती माँग :- कृषि क्षेत्र के विस्तार के कारण सिंचाई के लिए अधिक जल की आवश्यकता होती है।

4. औद्योगिक गतिविधियाँ :- उद्योगों द्वारा भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन किया जाता है, जिससे जल स्तर नीचे चला जाता है।

5. तेज़ शहरीकरण :-  शहरों के फैलाव से जल संसाधनों पर दबाव बढ़ता है और जल की खपत अधिक होती है।

6. जनसंख्या में वृद्धि :- बढ़ती जनसंख्या की घरेलू, कृषि और औद्योगिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अधिक जल की जरूरत पड़ती है।

उदाहरण :-
दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में बढ़ती जनसंख्या और भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन के कारण जल संकट गंभीर होता जा रहा है।

अत्यधिक सिंचाई के नकारात्मक प्रभाव क्या हैं? समझाइए :-

अत्यधिक सिंचाई से पर्यावरण और कृषि दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं।

अत्यधिक सिंचाई के नकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं :-

1. मिट्टी का लवणीकरण :- अधिक पानी देने से मिट्टी में लवण (नमक) जमा हो जाते हैं, जिससे भूमि बंजर होने लगती है।

2. मिट्टी की उर्वरता में कमी :- पोषक तत्व बह जाने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति घट जाती है।

3. जल की कमी :- अत्यधिक सिंचाई से भूमिगत जल स्तर गिरता है, जिससे भविष्य में जल संकट उत्पन्न होता है।

उदाहरण :-
पंजाब और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक सिंचाई के कारण मिट्टी में लवणता बढ़ गई है और भूजल स्तर तेजी से नीचे चला गया है।

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