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CLASS 9 SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 10

ध्वनि तरंगें — अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग / Sound Waves — Characteristics and Applications

TextbookNCERT
ClassClass 9
SubjectScience
ChapterChapter 10
Chapter Nameध्वनि तरंगें — अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
MediumHindi

10.1 ध्वनि का उत्पादन

कंपन (Vibration):-

जब तक रबड़ बैंड तना हुआ है और कंपन कर रहा है इससे ध्वनि उत्पन्न होती है। जैसे ही कंपन रुक जाते हैं ध्वनि भी बंद हो जाती है। इस क्रियाकलाप से यह निष्कर्ष निकलता है कि ध्वनि कंपनों द्वारा उत्पन्न होती है। कंपन (vibration) से तात्पर्य है किसी वस्तु की आगे-पीछे की आवर्ती गति (दोलन)।

नोट:- किसी तनी हुई डोरी को खींच कर छोड़ने अथवा किसी धात्विक वस्तु पर प्रहार करने से उनमें कंपन होते हैं जिनसे ध्वनि उत्पन्न होती है। ध्वनि कंपन करने वाले तारों, पतले पटलों, वायु स्तंभों एवं अन्य अनेक कंपन करने वाली वस्तुओं द्वारा उत्पन्न की जा सकती है। ऐसी वस्तु जो ध्वनि उत्पन्न करती है ध्वनि का ‘स्रोत’ कहलाती है।

मानव एवं जंतु में ध्वनि उत्पादन:-

मनुष्यों और कुछ जंतुओं में ध्वनि वाक्तंतु (vocal cords) के कंपन से उत्पन्न होती है जो गले में वाक् यंत्र (voice box) अथवा कंठ (Larynx) में कसकर खिंची हुई पेशीय पट्टियों जैसी होती हैं। मनुष्यों में उनके अंग, जैसे जीभ, होंठ, मुँह और नासा-गुहा ध्वनि को वाणी अथवा संगीत में रूपांतरित करने में सहायता करते हैं।

कुछ जानवर अपने शरीर के कुछ अंगों को परस्पर टकराकर अथवा रगड़कर ध्वनि उत्पन्न करते हैं, उदाहरण के लिए — टिड्डे और झींगुर अपने पंखों अथवा टाँगों को रगड़कर ध्वनि उत्पन्न करते हैं।

10.1.1 स्वरित्र द्विभुज

स्वरित्र द्विभुज (Tuning Fork):-

स्वरित्र द्विभुज एक आधार स्तंभ युक्त U आकृति की धात्विक छड़ होती है, जो सामान्यतः स्टील या एल्युमिनियम से निर्मित होती है। U निर्मित करने वाले दोनों पार्श्व के भाग या शाखाएँ स्वरित्र द्विभुज की भुजाएँ कहलाती हैं। इन्हें कंपन कराने हेतु रबड़ के पैड से टकराया जाता है।

नोट:- जब कंपन करते हुए स्वरित्र द्विभुज को कान के समीप लाया जाता है तब उससे उत्पन्न ध्वनि सुनी जा सकती है। जब स्वरित्र द्विभुज की भुजा जल की सतह को स्पर्श करती है तब जल की सतह पर तरंगें निर्मित होती हैं जो यह दर्शाता है कि स्वरित्र द्विभुज की भुजाएँ वास्तव में कंपन कर रही हैं — यह इस विचार का समर्थन करता है कि ध्वनि कंपन करने वाली वस्तुओं द्वारा उत्पन्न होती है।

10.2 ध्वनि का संचरण

माध्यम (Medium):-

ध्वनि ठोसों, द्रवों और गैसों से होकर गमन अथवा संचरण कर सकती है। वह पदार्थ जिससे होकर ध्वनि संचरित होती है माध्यम (medium) कहलाता है। ऐसा स्थान जहाँ कोई माध्यम (द्रव्य) नहीं होता उसे निर्वात (vacuum) कहा जाता है।

नोट:- दो चम्मचों को जल के भीतर टकराने पर भी ध्वनि सुनाई देती है, जो बताता है कि ध्वनि जल एवं वायु दोनों से होकर संचरित होती है। इसी प्रकार डेस्क पर आघात करने पर ध्वनि ठोस के माध्यम से भी संचरित होती है — यह दर्शाता है कि ध्वनि ठोसों, द्रवों और गैसों तीनों में संचरित हो सकती है।

10.2.1 ध्वनि संचरण हेतु माध्यम की आवश्यकता होती है

निर्वात बेलजार प्रयोग:-

एक बेलजार में रखी विद्युत घंटी का स्विच ऑन किया जाता है और ध्वनि की प्रबलता पर ध्यान दिया जाता है। जैसे-जैसे निर्वात पंप का उपयोग करके बेलजार से वायु बाहर निकाली जाती है ध्वनि धीमी होती जाती है। जार में लगभग निर्वात की स्थिति आने पर घंटी की ध्वनि सुनाई नहीं देती है जबकि घंटी को बजते हुए देखा जा सकता है।

नोट:- यह प्रयोग दर्शाता है कि ध्वनि निर्वात में संचरित नहीं हो सकती है। ध्वनि को संचरण हेतु माध्यम की आवश्यकता होती है, जो ठोस, द्रव अथवा गैस हो सकता है। बाह्य अंतरिक्ष लगभग निर्वातित है, अतः वहाँ ध्वनि संचरित नहीं हो सकती — इसीलिए अंतरिक्ष यात्री एक-दूसरे की बातचीत सुनने के लिए अपने अंतरिक्ष परिधान में लगी विशेष युक्तियों के माध्यम से संवाद करते हैं।

10.3 ध्वनि तरंगें

संपीडन और विरलन:-

जैसे ही पिस्टन आगे गति करता है यह अपने समीप के वायु के कणों को अग्र दिशा में धक्का देता है, परिणामस्वरूप वायु संपीडित हो जाती है और पिस्टन के समीप छोटे से क्षेत्र में इसके घनत्व में वृद्धि हो जाती है। उच्च घनत्व (औसत घनत्व की तुलना में) का यह वायु-क्षेत्र संपीडन (Compression) कहलाता है।

जैसे ही पिस्टन पीछे की ओर गति करता है, पिस्टन के समीप एक छोटे से क्षेत्र में वायु कम सघन हो जाती है। वायु के इस निम्न घनत्व वाले क्षेत्र को विरलन (Rarefaction) कहते हैं।

नोट:- किसी माध्यम में उसके कणों के वास्तविक संचरण के बिना क्रमिक रूप से संचरित होते संपीडनों और विरलनों की यह शृंखला ध्वनि तरंग (sound wave) कहलाती है। माध्यम के कण तरंग के साथ गमन नहीं करते हैं — ये केवल अपनी माध्य स्थिति के इधर-उधर कंपन करते हैं।

अनुदैर्घ्य तरंगें (Longitudinal Waves):-

ध्वनि तरंगों में माध्यम के कण विक्षोभ के संचरण की दिशा के समानांतर आगे-पीछे कंपन करते हैं। ऐसी तरंगें जिनमें माध्यम के कण तरंग संचरण की दिशा के समानांतर कंपन करते हैं, अनुदैर्घ्य तरंगें कहलाती हैं।

नोट:- किसी भौतिक माध्यम की अनुपस्थिति में ध्वनि तरंगें संचरित नहीं हो सकती हैं। ऐसी तरंगें जिन्हें संचरण हेतु भौतिक माध्यम की आवश्यकता होती है, यांत्रिक तरंगें (mechanical waves) कहलाती हैं। ध्वनि तरंग एक यांत्रिक तरंग है। यांत्रिक तरंगें दो प्रकार की होती हैं — अनुदैर्घ्य तरंगें एवं अनुप्रस्थ तरंगें (जिनमें माध्यम के कण तरंग संचरण की दिशा के लंबवत कंपन करते हैं)। सभी तरंगें यांत्रिक नहीं होतीं — प्रकाश एक अनुप्रस्थ तरंग है जो निर्वात में भी गमन कर सकता है।

10.4 ध्वनि तरंगों की ऊर्जा

ध्वनि ऊर्जा का एक रूप है:-

जब धातु की प्लेट पर डंडे से चोट मारकर प्रबल ध्वनि उत्पन्न की जाती है तो शीट पर बिखरे अनाज के दाने गति करते या उछलते हुए देखे जा सकते हैं, यद्यपि ध्वनि स्रोत शीट या पात्र को छूता भी नहीं है। जैसे ही ध्वनि वायु से संचरित होती है यह शीट तक पहुँचती है और इसको कंपन कराती है, जो अनाज के दानों की गति का कारण बनते हैं।

नोट:- यह दर्शाता है कि ध्वनि ऊर्जा का एक रूप है। जब ध्वनि स्रोत कंपन करता है तब यह आस-पास के माध्यम में ऊर्जा को स्थानांतरित करता है — किसी माध्यम में ध्वनि संचरण की प्रक्रिया में माध्यम के कण कंपन करते हैं और अन्य कणों से संघट्ट के परिणामस्वरूप ऊर्जा का स्थानांतरण होता है, माध्यम के कणों का नहीं।

10.5 ध्वनि तरंग का आलेखीय निरूपण

शृंग और गर्त (Crest and Trough):-

संपीडन (C) के क्षेत्र में माध्यम का घनत्व, औसत घनत्व से अधिक हो जाता है और उच्चतम बिंदु अधिकतम घनत्व को निरूपित करता है। इसके पश्चात घनत्व कम हो जाता है और विरलन (R) के क्षेत्र में माध्यम का घनत्व औसत घनत्व से कम हो जाता है, जहाँ निम्नतम बिंदु न्यूनतम घनत्व को दर्शाता है।

नोट:- तरंग के उच्चतम बिंदु को शृंग (crest) और निम्नतम बिंदु को गर्त (trough) कहा जाता है। ध्वनि तरंग के आलेखीय निरूपण की एक अन्य विधि माध्यम के किसी विशेष स्थान पर समय के साथ घनत्व के परिवर्तन को आलेखित करना है।

10.6 ध्वनि तरंग के अभिलक्षण

10.6.1 तरंगदैर्घ्य, आवृत्ति और आवर्तकाल

तरंगदैर्घ्य (Wavelength):-

दो क्रमागत शृंगों अथवा दो क्रमागत गर्तों के मध्य की दूरी को तरंग का तरंगदैर्घ्य कहा जाता है। इसे सामान्यतः λ (ग्रीक अक्षर लैम्डा) द्वारा दर्शाया जाता है। इसका SI मात्रक मीटर (m) है।

आवृत्ति (Frequency) और आवर्तकाल (Time Period):-

किसी नियत बिंदु पर प्रति इकाई समय में घनत्व के दोलनों की संख्या, ध्वनि तरंग की आवृत्ति (frequency) कहलाती है। इसे सामान्यतः ν (ग्रीक अक्षर न्यू) द्वारा निरूपित किया जाता है। इसका SI मात्रक प्रति सेकंड है जिसे हर्ट्ज (Hz) भी कहा जाता है।

किसी निश्चित बिंदु पर घनत्व के एक पूर्ण दोलन में लगने वाले समय को तरंग का आवर्तकाल (time period, T) कहा जाता है। इसका SI मात्रक सेकंड (s) है।

ν = 1/T (आवर्तकाल और आवृत्ति एक-दूसरे के व्युत्क्रम होते हैं)

उदाहरण 10.1:-

यदि किसी दी गई स्थिति में 2 सेकंड में 10 घनत्व दोलन होते हैं तब (i) ध्वनि तरंग की आवृत्ति और (ii) आवर्तकाल का परिकलन कीजिए।

आवृत्ति = 10/2s = 5 Hz
एकल घनत्व दोलन में लगा समय = 2s/10 = 0.2 s

10.6.2 ध्वनि तरंगों का आयाम और तीव्रता

आयाम (Amplitude):-

ध्वनि तरंग का आयाम औसत घनत्व की तुलना में संपीडन (अथवा विरलन) में वायु के घनत्व में होने वाला अधिकतम परिवर्तन है। घनत्व में परिवर्तन अधिक होता है तो तरंग का आयाम भी बड़ा होता है।

नोट:- किसी तरंग का आयाम और उसके द्वारा वाहित ऊर्जा में आपस में संबंध होता है। अधिक आयाम वाली तरंग कम आयाम वाली तरंग की तुलना में अधिक ऊर्जा वहन करती है। जब धातु की प्लेट पर अधिक शक्ति से प्रहार किया जाता है तो कणों को अधिक ऊर्जा स्थानांतरित होती है जिसके कारण कंपनों का आयाम बढ़ जाता है और अनाज के दाने अधिक ऊँचाई तक उछलते हैं।

तीव्रता (Intensity):-

ध्वनि संचरण की दिशा के लंबवत एकांक क्षेत्रफल से एकांक समय में संचरित होने वाली ध्वनि ऊर्जा की मात्रा को ध्वनि की तीव्रता कहते हैं।

नोट:- जैसे-जैसे कोई ध्वनि तरंग अपने स्रोत से दूर जाती है तो यह वृहत्तर क्षेत्रफल में फैलती जाती है, क्योंकि ऊर्जा संरक्षित रहनी चाहिए इसलिए ऊर्जा की समान मात्रा एक वृहत्तर क्षेत्रफल में फैल जाती है। अतः स्रोत से दूरी बढ़ने पर ध्वनि की तीव्रता में कमी होती है।

10.6.3 ध्वनि की चाल

ध्वनि की चाल (Speed of Sound):-

ध्वनि की चाल को उस दूरी के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो तरंग का कोई बिंदु, जैसे शृंग (अथवा गर्त), एकांक समय में तय करता है।

चाल = दूरी/समय ⟹ v = λ/T
चूँकि ν = 1/T, अतः v = λ × ν
चाल = तरंगदैर्घ्य × आवृत्ति
नोट:- ध्वनि की चाल उस माध्यम पर निर्भर करती है जिसमें यह गमन करती है। यह ठोसों में सबसे अधिक तीव्र गति से, द्रवों में उससे धीमी गति से और गैसों में सबसे धीमी गति से गमन करती है। जल में ध्वनि की चाल, वायु में ध्वनि की चाल से 4 से 5 गुना अधिक होती है; ठोसों में यह वायु से 15 से 20 गुना अधिक होती है। वायु में ध्वनि की चाल ताप और आर्द्रता पर भी निर्भर करती है — 0°C पर शुष्क वायु में लगभग 331 m/s और 22°C पर लगभग 344 m/s रहती है।

तालिका 10.1 — 15°C पर विभिन्न माध्यमों में ध्वनि की चाल:-

अवस्थापदार्थ/माध्यमलगभग चाल
ठोसस्टील5000 m/s
द्रवजल1500 m/s
गैसवायु340 m/s

उदाहरण 10.3:-

मेघों की गड़गड़ाहट के समय गर्जन की ध्वनि से पूर्व तड़ित की चमक दिखाई देती है क्योंकि प्रकाश की तुलना में ध्वनि बहुत धीमी गति से गमन करती है। यदि समयांतराल 5 s मापा जाता है तो तड़ित गिरने की दूरी ज्ञात कीजिए (वायु में ध्वनि की चाल 340 m/s)।

दूरी = v × t = 340 × 5 = 1700 m (लगभग 1.7 km)

10.6.4 मानव द्वारा ध्वनि-बोध

तारत्व (Pitch):-

ध्वनि की आवृत्ति का मानवीय बोध तारत्व कहलाता है। सामान्यतः तीक्ष्ण कर्णभेदी ध्वनियाँ, जैसे सीटी या सायरन की ध्वनि, उच्च तारत्व की कहलाती हैं। दूसरी ओर गंभीर ध्वनियाँ, जैसे मेघों की गड़गड़ाहट, का तारत्व कम होता है। उच्च तारत्व वाली ध्वनियों की आवृत्ति उच्च होती है और कम तारत्व वाली की कम।

श्रव्यता परिसर, अवश्रव्य और पराश्रव्य ध्वनियाँ:-

मनुष्य ध्वनियों को केवल एक सीमित परिसर में ही सुन सकते हैं — 20 Hz से 20000 Hz (20 kHz) तक। 20 Hz से कम आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को अवश्रव्य तरंगें (infrasonic waves) कहते हैं जबकि 20 kHz से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को पराश्रव्य तरंगें (ultrasonic waves) कहते हैं।

नोट:- कुत्ते, बिल्लियाँ, चमगादड़ और डॉलफिन पराश्रव्य तरंगों को सुन सकते हैं जबकि हाथी अवश्रव्य तरंगों को सुन सकते हैं।

प्रबलता (Loudness):-

मनुष्यों को ध्वनि तरंगों के आयाम का बोध ध्वनि की प्रबलता के रूप में होता है। अधिक आयाम वाली ध्वनियाँ अधिक प्रबल सुनाई देती हैं। ध्वनि की प्रबलता को सामान्यतः डेसिबेल (dB) में मापा जाता है।

नोट:- तीव्रता एक मापन योग्य राशि है जबकि प्रबलता श्रोता की श्रव्य क्षमता पर निर्भर करती है। अवांछित अथवा हानिकारक ध्वनि को शोर (noise) कहा जाता है, और दीर्घकाल तक प्रबल ध्वनि सुनने से श्रवण क्षमता कम हो सकती है।

ध्वनिगुणता (Timbre):-

जब पृथक-पृथक वाद्ययंत्र समान प्रबलता के समान स्वर बजाते हैं तब उनमें से प्रत्येक की ध्वनि पृथक और अद्वितीय होती है। इस गुण को ध्वनिगुणता (Timbre) कहा जाता है, जो वाद्ययंत्र के आकार, पदार्थ और रचना पर निर्भर करता है।

10.7 ध्वनि का परावर्तन

ध्वनि का परावर्तन (Reflection of Sound):-

ध्वनि तरंगें ठोस या द्रव जैसी बाधाओं से टकराकर वापस लौट सकती हैं। इसे ध्वनि का परावर्तन कहा जाता है। ध्वनि परावर्तन के उन्हीं नियमों का पालन करती है जो प्रकाश के लिए समझे थे — आपतन और परावर्तन की दिशाएँ अभिलंब के साथ समान कोण बनाती हैं और आपतित किरण, अभिलंब तथा परावर्तित किरण एक ही तल में स्थित होते हैं।

10.7.1 प्रतिध्वनि

प्रतिध्वनि (Echo):-

यह वह ध्वनि है जो किसी दूर स्थित वस्तु के कठोर पृष्ठ से परावर्तित होकर हमारे पास वापस आती है। यदि हमारे कानों तक पहुँचने वाली दो ध्वनियों के मध्य का समय अंतराल कम-से-कम 0.1 सेकंड हो तो हम उन्हें भिन्न-भिन्न ध्वनियों के रूप में सुन सकते हैं।

0.1 s में ध्वनि द्वारा तय की गई दूरी = 340 m/s × 0.1 s = 34 m
प्रतिध्वनि सुनने के लिए न्यूनतम दूरी = 34/2 = 17 m
नोट:- कठोर और चिकनी सतहें ध्वनि को परावर्तित करती हैं इसलिए इनके कारण उत्पन्न प्रतिध्वनि अधिक स्पष्ट सुनाई देती है। कोमल सतहें (जैसे मोटे कपड़े के पर्दे) ध्वनि को अवशोषित कर लेती हैं, जबकि खुरदरी सतहें ध्वनि को विभिन्न दिशाओं में प्रकीर्णित कर देती हैं।

10.7.2 अनुरणन

अनुरणन (Reverberation):-

कभी-कभी किसी बड़े हॉल या सभागार में उत्पन्न ध्वनि दीवारों से अनेक बार परावर्तित होती रहती है। इन बहु परावर्तनों के कारण ध्वनि, स्रोत के बंद हो जाने के पश्चात भी कुछ समय तक सुनाई देती रहती है। इस घटना को अनुरणन कहते हैं — यह तब होता है जब विभिन्न सतहों से परावर्तित ध्वनियाँ 0.05 सेकंड से कम समयांतराल में कानों तक पहुँचती हैं।

नोट:- आधुनिक सभागारों और बड़े कॉन्सर्ट हॉलों को वास्तुकला के अनुसार इस प्रकार बनाया जाता है कि उनमें उपयुक्त प्रतिध्वनि स्थायित्व बनी रहे। ध्वनि-अवशोषक पैनल, गद्देदार कुर्सियाँ, पर्दे तथा अन्य मुलायम व छिद्रयुक्त सतहें अनावश्यक प्रतिध्वनि स्थायित्व को कम करती हैं।

10.8 पराश्रव्य तथा अवश्रव्य तरंगें और उनके अनुप्रयोग

अनुप्रयोग:-

  1. अवश्रव्य तरंगों का उपयोग भूकंप तथा ज्वालामुखी विस्फोट जैसी प्राकृतिक घटनाओं का पता लगाने में और तीव्र झंझावात का पता लगाने में किया जाता है।
  2. पराश्रव्य तरंगों का उपयोग बिना शल्यक्रिया के आंतरिक अंगों का प्रतिबिंब प्राप्त करने में (अल्ट्रासोनोग्राफी), गुर्दे की पथरी को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने में, उद्योगों में अल्ट्रासोनिक वेल्डिंग तथा संवेदनशील मशीन भागों की सफाई में, धातु खंडों के भीतर दोषों का पता लगाने में, तथा वस्तुओं का स्थान ज्ञात करने में किया जाता है।

10.8.1 प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण

प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण (Echolocation):-

चमगादड़ निशाचर जीव होते हैं जो अंधेरे में उड़ते हुए बिना किसी वस्तु से टकराए अपने शिकार की खोज कर लेते हैं। अधिकांश चमगादड़ पराश्रव्य तरंगों के छोटे-छोटे स्पंद उत्सर्जित करते हैं जो आस-पास की वस्तुओं से परावर्तित हो जाते हैं। प्रतिध्वनियों की अनुभूति कर चमगादड़ बाधाओं और शिकार की स्थिति का पता लगा लेते हैं। परावर्तित ध्वनि तरंगों की सहायता से वस्तुओं का स्थान ज्ञात करने की इस क्षमता को प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण कहते हैं।

नोट:- डॉल्फिन, व्हेल तथा कुछ पक्षी भी दिशा-निर्धारण और शिकार के लिए प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण का उपयोग करते हैं। मनुष्यों ने इसी सिद्धांत को जल के भीतर अन्वेषण के लिए सोनार (sonar — sound navigation and ranging) में अपनाया है।

उदाहरण 10.6:-

समुद्री जल में भेजा गया एक नौसैनिक सोनार संकेत 0.90 सेकंड के पश्चात वापस लौटता है। समुद्री जल में ध्वनि की चाल 1530 m/s है। वस्तु की दूरी बताइए।

वस्तु तक पहुँचने में लगा समय = 0.90/2 = 0.45 s
दूरी = 1530 × 0.45 = 688.5 m
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