Notes Mine

CLASS 9 SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 11

जनन — जीवन की निरंतरता / Reproduction — Continuity of Life

TextbookNCERT
ClassClass 9
SubjectScience
ChapterChapter 11
Chapter Nameजनन — जीवन की निरंतरता
MediumHindi

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?

  1. 11.1 अलैंगिक जनन
    1. 11.1.1 पौधों का कायिक प्रवर्धन कृषि में किस प्रकार उपयोगी है?
  2. 11.2 लैंगिक जनन
    1. 11.2.1 लैंगिक जनन में अर्धसूत्री विभाजन किस प्रकार विभिन्नताएँ उत्पन्न करता है?
    2. 11.2.2 पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन
    3. 11.2.3 पुष्पों में परागण की प्रक्रिया किस प्रकार होती है?
    4. 11.2.4 परागण की युक्तियाँ और जननीय सफलता
    5. 11.2.5 निषेचन एवं बीज निर्माण
  3. 11.3 जंतुओं में लैंगिक जनन
  4. 11.4 जंतुओं में जनन संबंधी विभिन्नताएँ
  5. 11.5 मानव में जनन
    1. 11.5.1 जनन परिपक्वता
    2. 11.5.2 नर जनन तंत्र में कौन-कौन से अंग हैं?
    3. 11.5.3 मादा जनन तंत्र के अंग कौन-कौन से हैं?
    4. 11.5.4 जनन कोशिकाएँ कैसे बनती हैं?
    5. 11.5.5 जब शुक्राणु-अंडाणु युग्मित होता है तब क्या होता है?
    6. 11.5.6 यदि अंडाणु निषेचित न हो तो क्या होता है?
    7. 11.5.7 गर्भावस्था और प्रसव
    8. 11.5.8 गर्भावस्था के दौरान माँ का स्वास्थ्य
    9. 11.5.9 लैंगिक परिपक्वता से क्या अभिप्राय है?
    10. 11.5.10 अवांछित गर्भावस्था और संक्रमण की रोकथाम

11.1 अलैंगिक जनन

अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction):-

अलैंगिक जनन अधिकांश एककोशिकीय जीवों, जैसे जीवाणु, अमीबा, यीस्ट तथा सरल बहुकोशिकीय जीवों (हाइड्रा, स्पंज) में देखा जाता है। यह अनेक पौधों में भी देखा जाता है। अधिकांश पौधे अपने विद्यमान भागों से नए प्ररोह और जड़ें अंकुरित करते हैं — जैसे आलू और अदरक से बिना बीज उत्पन्न हुए नए पौधे अंकुरित होते हैं, मनीप्लांट के तने और गन्ने के तने की कर्तन नए पौधे में विकसित हो जाती हैं एवं ब्रायोफिलम की पत्तियों पर छोटे-छोटे पादपक निकलते हैं जो अंततः नए पौधों में विकसित हो जाते हैं।

नोट:- ये सभी कायिक प्रवर्धन के उदाहरण हैं। इस प्रकार के जनन की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें केवल एक ही जनक होता है और इसीलिए इसमें आनुवंशिक रूप से समान पौधे उत्पन्न होते हैं।

11.1.1 पौधों का कायिक प्रवर्धन कृषि में किस प्रकार उपयोगी है?

कायिक प्रवर्धन की विधियाँ:-

  1. कर्तन (Cutting):- किसी पौधे की टहनी को खाद मिली मिट्टी की सतह से लगभग 45°–60° के कोण पर अंतर्विष्ट किया जाता है, जिससे नियमित पानी देने पर वह जड़ें विकसित कर नया पौधा बन जाती है।
  2. कलम बाँधना (Grafting):- एक स्वस्थ बद्धमूल पौधे (पौधा A) पर किसी अन्य किस्म के पौधे (पौधा B) के तने की कलम को चीरा लगाए स्थान में अंतर्विष्ट किया जाता है, जिससे दोनों की विशेषताओं वाला पौधा प्राप्त होता है।
  3. परतन (Layering):- किसी पेड़ या झाड़ी की लचीली, पतली टहनी के बीच के भाग को मिट्टी की सतह के नीचे दबाया जाता है, 10–15 दिनों में उस भाग में जड़ें विकसित हो जाती हैं जिसके बाद टहनी को जनक पौधे से काट दिया जाता है।
  4. ऊतक संवर्धन (Tissue Culture):- पौधों के प्ररोह शीर्ष (शीर्षस्थ विभज्योतक) से व्यापक स्तर पर स्वस्थ पादपक तैयार किए जाते हैं जो विषाणु संक्रमित पौधों को हटाने में सहायक हैं और उच्च उपज सुनिश्चित करते हैं।
नोट:- अलैंगिक जनन से उत्पन्न जीव आनुवंशिक रूप से समान प्रकार के होते हैं। इन विधियों के उपयोग से कृषि एवं बागवानी की कार्यपद्धतियों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और कृषक व्यापक स्तर पर वांछित फसलें उगा सकते हैं।

मुकुलन (Budding):-

यीस्ट की जनक कोशिकाओं से छोटे गोलाकार मुकुल (उद्वर्ध) निकलते हैं जो द्विगुणित होने के संकेत देते हैं। हाइड्रा जैसे बहुकोशिकीय जीवों में जनक काय पर एक विशिष्ट स्थल पर बार-बार कोशिका विभाजन होने से एक छोटा उभार उत्पन्न होता है जिसे मुकुल कहते हैं। मुकुल वृद्धि करके जनक पादप से अलग होकर स्वतंत्र रूप से जीवित रहता है — इस प्रक्रिया को मुकुलन कहते हैं।

बीजाणु निर्माण (Spore Formation):-

खाद्य पदार्थों को सड़ाने वाले सूक्ष्मजीव (कवक) अपने चारों ओर पहले से उपस्थित बीजाणुओं से उगते हैं। बीजाणु थैली जैसी संरचना (जिसे कोश कहते हैं) अथवा कवक तंतुओं की एक लंबी पट्टी पर एक फूली हुई पुटिका पर बनते हैं। बीजाणु बड़ी संख्या में (एक फफूँद कॉलोनी से लाखों) बनते हैं, हल्के होते हैं, सामान्यतः एककोशिकीय होते हैं और वायु-धाराओं के माध्यम से सरलता से तैरते रहते हैं।

नोट:- लुई पाश्चर के प्रयोगों ने सिद्ध किया कि नव जीवन सदैव पहले से विद्यमान जीवन से ही उत्पन्न होता है। इस अध्याय में अध्ययन किए गए सभी जीवों में अलैंगिक जनन की मुख्य प्रक्रिया समसूत्री विभाजन है — इसमें दो संतति कोशिकाएँ उत्पन्न होती हैं जिनमें जनक कोशिका के समान संख्या में गुणसूत्र होते हैं, इसीलिए उत्पन्न संतान आनुवंशिक रूप से जनक के समरूपी होती है और इन्हें क्लोन कहा जाता है।

11.2 लैंगिक जनन

लैंगिक जनन (Sexual Reproduction):-

लैंगिक जनन में नए जीव के निर्माण में दो जनक भाग लेते हैं। इसका अर्थ है कि संतति के आनुवंशिक पदार्थ में दोनों जनक योगदान करते हैं। इस जैविक समस्या का समाधान — कि प्रत्येक पीढ़ी में गुणसूत्रों की संख्या दोगुनी न हो जाए — एक विशेष प्रकार के कोशिका विभाजन द्वारा होता है जिसे अर्धसूत्री विभाजन कहते हैं।

11.2.1 लैंगिक जनन में अर्धसूत्री विभाजन किस प्रकार विभिन्नताएँ उत्पन्न करता है?

अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis):-

प्रत्येक प्रजाति की कोशिकाओं में गुणसूत्रों की एक निश्चित संख्या होती है। मनुष्यों में गुणसूत्र के 23 जोड़े होते हैं, अतः कुल संख्या 46 होती है। अर्धसूत्री विभाजन से युग्मक उत्पन्न होते हैं जिनमें गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका (द्विगुणित) की तुलना में आधी (अगुणित) हो जाती है।

नोट:- जंतुओं में नर युग्मकों को शुक्राणु (sperm) और मादा युग्मकों को अंडाणु (egg) कहते हैं। पौधों में नर युग्मक परागकण (pollen grain) में होते हैं और वे उन्हें बीजांड (ovule) तक पहुँचाते हैं जिसमें मादा युग्मक (अंडकोशिका) होते हैं। प्रत्येक युग्मक में 23 गुणसूत्र होते हैं और गुणसूत्रों के 23 जोड़ों के यादृच्छिक मिश्रण से अनेक संयोजन संभव हैं, जिसके कारण बच्चे अपने माता-पिता और सगे भाई-बहनों से आनुवंशिक रूप से भिन्न हो जाते हैं।

विभिन्नता का महत्व:-

परिणामस्वरूप व्यक्तियों में विभिन्नता उत्पन्न होती है जो किसी जाति की उत्तरजीविता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह विभिन्नता कुछ व्यक्तियों को परिवर्तित होते हुए परिवेश के प्रति श्रेष्ठ अनुकूलन में सहायता करती है और यह प्रक्रिया समय के साथ विकास में योगदान करती है — जैसे कुछ व्यक्ति अधिक ऊँचाई पर ऑक्सीजन के कम स्तर को सहन कर सकते हैं।

11.2.2 पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन

पुष्प की संरचना:-

पुष्पी पादप (आवृतबीजी, angiosperms) पृथ्वी पर पौधों का सबसे विविधतापूर्ण समूह है। एक संपूर्ण पुष्प के चार भाग होते हैं — बाह्यदल, दल, पुंकेसर और स्त्रीकेसर।

  1. बाह्यदल (Sepal):- कली अवस्था में सभी भागों को घेरे हुए एक हरा आवरण, जो पुष्प का सबसे बाहरी चक्र बनाता है और अन्य भागों की रक्षा करता है।
  2. दल (Petal):- पुष्पों के रंगीन प्रवर्ध, जो परागणकारियों को आकर्षित करने में सहायक होते हैं।
  3. पुंकेसर:- पुष्प का नर भाग, जिसमें एक तंतु और एक परागकोश होता है जो परागकण उत्पन्न करता है जिसमें नर युग्मक होते हैं।
  4. स्त्रीकेसर:- पुष्प का मादा भाग, जिसके तीन उपभाग वर्तिकाग्र, वर्तिका और अंडाशय होते हैं। वर्तिकाग्र शीर्ष पर स्थित होता है; वर्तिका एक पतली लंबी नली है जो वर्तिकाग्र को अंडाशय से जोड़ती है; अंडाशय में बीजांड होते हैं और प्रत्येक बीजांड में एक अंडकोशिका (मादा युग्मक) होती है।

11.2.3 पुष्पों में परागण की प्रक्रिया किस प्रकार होती है?

परागण (Pollination):-

परागकोश से पुष्प के वर्तिकाग्र तक परागकणों के स्थानांतरण को परागण कहते हैं। फल निर्माण के लिए परागकोश से वर्तिकाग्र तक परागकणों का स्थानांतरण आवश्यक है।

नोट:- जब परागकणों का स्थानांतरण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर अथवा उस पौधे के किसी अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र पर होता है तो इसे स्व-परागण (self-pollination) कहते हैं। यदि परागकण एक पौधे के पुष्प के परागकोश से उसी प्रकार के किसी दूसरे पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरित होते हैं तो इसे पर-परागण (cross-pollination) कहते हैं।

11.2.4 परागण की युक्तियाँ और जननीय सफलता

परागणकारी (Pollinators):-

  1. गेहूँ, मक्का और चावल जैसे पौधों में वायु द्वारा परागण होता है — परागकण हल्के और छोटे होते हैं, बड़ी संख्या में बनते हैं और वर्तिकाग्र लंबा व पंख के जैसा होता है।
  2. वैलिसनेरिया और हाइड्रिला जैसे जलीय पौधों में परागण जल द्वारा होता है।
  3. सूरजमुखी, गुड़हल और गेंदा जैसे अनेक पौधों में परागण मधुमक्खियों और तितलियों जैसे कीटों द्वारा होता है — इनके पुष्प चटकीले रंग के होते हैं, मकरंद उत्पन्न करते हैं और परागकण बड़े, चिपचिपे या काँटेदार होते हैं।
  4. कोरल ट्री और गुड़हल जैसे कुछ पुष्पों का परागण बबूना और शकरखोरा जैसे पक्षियों द्वारा होता है।
नोट:- वायु-परागित घास में प्रति पुष्प 5,00,000–10,00,000 परागकण मुक्त होते हैं जिनसे केवल 50–200 बीज बनते हैं, जबकि कीट-परागित पौधों में 20,000–40,000 परागकणों से 800–1,000 बीज बनते हैं। पुष्प द्वारा बहुत बड़ी संख्या में परागकणों को उत्पन्न करना अब भी एक प्रभावी परागण युक्ति है क्योंकि इससे परागण की संभावना बढ़ जाती है।

11.2.5 निषेचन एवं बीज निर्माण

निषेचन (Fertilisation):-

परागकण के संगत वर्तिकाग्र तक पहुँचने के पश्चात परागकण पराग नलिकाएँ उत्पन्न करते हैं जो वर्तिका से होते हुए नीचे की ओर अंडाशय में बढ़ती हैं। नर युग्मक इस नलिका से होकर बीजांड तक पहुँचता है, जहाँ वह अंडकोशिका के साथ युग्मित होता है। युग्मकों के इस युग्मन को निषेचन कहते हैं और इससे नए जीवन का आरंभ होता है।

नोट:- निषेचित अंडाणु को युग्मनज (Zygote) कहते हैं जो बाद में भ्रूण में विकसित होता है। इस प्रक्रिया के समय बीजांडों को घेरे हुए अंडाशय बड़ा होकर फल में विकसित हो जाता है जबकि उसके भीतर के बीजांड बीज में विकसित हो जाते हैं। जब जल, वायु और तापमान जैसी परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं तो बीज अंकुरित होकर नए पौधे में विकसित हो जाता है।

11.3 जंतुओं में लैंगिक जनन

बाह्य और आंतरिक निषेचन:-

जल में लैंगिक जनन करने वाले अनेक जंतुओं, जैसे मेंढक और अधिकांश मछलियों में निषेचन शरीर के बाहर होता है — मादा जल में अंडे देती है और नर निषेचन के लिए अंडों पर शुक्राणु छोड़ता है। इस निषेचन विधि को बाह्य निषेचन (external fertilisation) कहते हैं।

सरीसृपों, पक्षियों और स्तनधारियों में निषेचन मादा के शरीर के अंदर होता है, इसे आंतरिक निषेचन (internal fertilisation) कहते हैं।

नोट:- बाह्य निषेचन में अंडे बड़ी संख्या में दिए जाते हैं परंतु कई अंडे जल-धाराओं द्वारा नष्ट हो जाते हैं अथवा अन्य जंतुओं द्वारा खा लिए जाते हैं। आंतरिक निषेचन में बच्चों के जीवित रहने की संभावना सामान्यतः अधिक होती है क्योंकि निषेचित अंडे या भ्रूण अधिक सुरक्षित रहते हैं।

11.4 जंतुओं में जनन संबंधी विभिन्नताएँ

तालिका 11.4 — जंतुओं में जनन संबंधी विधियों में भिन्नताएँ:-

जंतुपर्यावासनिषेचन की विधिसंतति की उत्तरजीविता
मछलीजलबाह्यकम
मेंढकजल/भूमिबाह्यकम
छिपकलीभूमिआंतरिकमध्यम
पक्षीजल/भूमिआंतरिकमध्यम से उच्च

मछली, उभयचर और कीट एक बार में कई सौ से लेकर कई हजार पीतक (yolk) युक्त अंडे देते हैं। माँ का शरीर इतने अंडों के लिए पर्याप्त मात्रा में पीतक नहीं प्रदान कर सकता, अतः इतना ही पीतक होता है जितने से एक लार्वा बन सके। लार्वा सड़े हुए खाद्य पदार्थों का सेवन कर पोषण प्राप्त करता है और वृद्धि करता है, फिर रूपांतरण द्वारा वयस्क शरीर का निर्माण होता है — जैसे तितली और मेंढक।

नोट:- इसके विपरीत सरीसृप और पक्षी अंडे देते हैं और प्रत्येक अंडे में विकासशील भ्रूण को पोषण देने के लिए पर्याप्त पीतक उपलब्ध होता है जो तब तक पोषण करता है जब तक अंडे का स्फुटन होकर बच्चा बाहर नहीं निकल आता। स्तनधारियों में युग्मनज मादा के शरीर के भीतर वृद्धि करता और विकसित होता है, और जन्म पश्चात कुछ समय तक स्तनपान कराया जाता है।

11.5 मानव में जनन

11.5.1 जनन परिपक्वता

जनन परिपक्वता:-

जब एक बच्चा वयस्क के रूप में बड़ा होता है तो जनन अंग परिपक्व हो जाते हैं और युग्मक (नर में शुक्राणु और मादा में अंडाणु) उत्पन्न करने लगते हैं। जब मादा के शरीर के भीतर एक शुक्राणु किसी अंडाणु से युग्मित होता है तो वे एक युग्मनज का निर्माण करते हैं जो भ्रूण के रूप में विकसित हो जाता है।

11.5.2 नर जनन तंत्र में कौन-कौन से अंग हैं?

नर जनन तंत्र (Male Reproductive System):-

इसमें वह अंग होते हैं जो नर जनन कोशिकाएँ (शुक्राणु) उत्पन्न करते हैं। शुक्राणु दो अंडाकार अंगों में बनते हैं जिन्हें वृषण (testes) कहा जाता है, जो वृषणकोश नामक त्वचा की थैली में स्थित होते हैं। वृषणकोश, वृषणों को शरीर के सामान्य तापमान से थोड़ा ठंडा रखता है जो शुक्राणु निर्माण के लिए आवश्यक है।

नोट:- वृषण से शुक्राणु, शुक्रवाहिनी नामक एक लंबी नली से होकर गुजरते हैं जो अंततः मूत्रमार्ग में खुलती है। शुक्राशय और प्रोस्टेट जैसी ग्रंथियाँ शुक्राणुओं को पोषण देने के लिए तरल स्रावित करती हैं। प्रत्येक शुक्राणु में एक शीर्ष होता है जिसमें आनुवंशिक पदार्थ होता है और एक लंबी पूँछ होती है जो उसे तैरने में सहायता करती है।

11.5.3 मादा जनन तंत्र के अंग कौन-कौन से हैं?

मादा जनन तंत्र (Female Reproductive System):-

मादा जनन तंत्र में एक जोड़ी अंडाशय, अंडवाहिनियाँ (डिंबवाहिनी नलिका), एक गर्भाशय और एक योनि होती है। अंडाशय मादा जनन कोशिकाएँ (अंडाणु) उत्पन्न करते हैं और हार्मोन भी स्रावित करते हैं। डिंबवाहिनियाँ प्रत्येक अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ती हैं।

नोट:- गर्भाशय एक थैले जैसी संरचना है जहाँ गर्भस्थ शिशु विकसित होता है। गर्भाशय ग्रीवा (cervix) नामक एक संकरे मार्ग द्वारा गर्भाशय योनि में खुलता है।

11.5.4 जनन कोशिकाएँ कैसे बनती हैं?

युग्मकजनन (Gametogenesis):-

युग्मकों के निर्माण की प्रक्रिया को युग्मकजनन कहा जाता है, जो वृषणों और अंडाशयों में होती है। युग्मक अर्धसूत्री विभाजन द्वारा निर्मित होते हैं जिनमें गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है — मनुष्यों की कोशिकाओं में 46 गुणसूत्र होते हैं किंतु शुक्राणु और अंडाणु में इनकी संख्या केवल 23 होती है।

विशेषताशुक्राणुअंडाणु
आमापअति सूक्ष्मबड़ा
उत्पादित संख्यालाखोंकम
संग्रहीत पोषक तत्वअनुपस्थितउपस्थित
गतिशीलतासक्रिय रूप से गतिशीलअचल
नोट:- नरों में युग्मकजनन के परिणामस्वरूप असंख्य सूक्ष्म, गतिशील, सक्रिय शुक्राणु निर्मित होते हैं। मादाओं में युग्मकजनन के परिणामस्वरूप एक बड़े अंडाणु का निर्माण होता है।

11.5.5 जब शुक्राणु-अंडाणु युग्मित होता है तब क्या होता है?

अंडोत्सर्ग और निषेचन:-

यौवनारंभ के समय से ही सामान्यतः प्रत्येक माह एक परिपक्व अंडाणु किसी एक अंडाशय से निकलता है, इसे अंडोत्सर्ग (ovulation) कहा जाता है। मैथुन के समय लाखों शुक्राणु योनि के माध्यम से प्रवेश करते हैं और तैरते हुए डिंबवाहिनी में अंडाणु तक पहुँच जाते हैं। यदि एक शुक्राणु अंडाणु के साथ युग्मित होने में सफल हो जाता है तो युग्मनज (zygote) का निर्माण होता है।

नोट:- गर्भाशय की ओर जाते हुए युग्मनज में अनेक समसूत्री विभाजन होते हैं। यह पोषण प्राप्त करने के लिए गर्भाशय के आंतरिक आस्तर में अंतर्रोपित हो जाता है — यह अंतर्रोपण गर्भावस्था का आरंभ है।

11.5.6 यदि अंडाणु निषेचित न हो तो क्या होता है?

रजोधर्म (Menstruation):-

यदि अंडाणु का निषेचन नहीं होता है तब वह लगभग एक दिन तक जीवनक्षम रहता है और इसके पश्चात नष्ट हो जाता है। विकासशील युग्मनज को ग्रहण करने के लिए तैयार गर्भाशय का आंतरिक आस्तर अब आवश्यक नहीं रहता और निस्तारित होकर कुछ रक्त के साथ योनि के माध्यम से शरीर से बाहर निकल जाता है। इस प्रक्रिया को रजोधर्म या माहवारी कहते हैं जो सामान्यतः 3 से 7 दिनों तक चलती है।

नोट:- अंडोत्सर्ग, गर्भाशय की तैयारी और रजोधर्म का यह चक्र सामान्यतः प्रत्येक 21–35 दिनों (प्रायः लगभग 28 दिन) में दोहराया जाता है और सामान्यतः लड़कियों में यौवन काल में 10–14 वर्ष की आयु के बीच आरंभ होता है और रजोनिवृत्ति (लगभग 50 वर्ष की आयु) तक जारी रहता है। मादाओं में XX और नरों में XY लिंग गुणसूत्र होते हैं — माँ सदैव X गुणसूत्र प्रदान करती है जबकि पिता X अथवा Y गुणसूत्र प्रदान करता है, जो शिशु के लिंग का निर्धारण करता है।

11.5.7 गर्भावस्था और प्रसव

त्रिमास (Trimesters):-

मनुष्यों में गर्भावस्था लगभग नौ महीने तक चलती है और इसे तीन चरणों में विभाजित किया जाता है जिन्हें त्रिमास कहते हैं। पहले त्रिमास में निषेचित अंडाणु आरंभ के दो महीनों में भ्रूण में विकसित होता है और प्रमुख अंगों का निर्माण आरंभ होता है। दूसरे त्रिमास में गर्भ बड़ा और पुष्ट होता है। तीसरे त्रिमास में शिशु तीव्र गति से बढ़ता है और गर्भाशय के बाहर के जीवन के लिए तैयार होता है।

नोट:- प्रसव के समय गर्भाशय की मांसपेशियों में होने वाले तीव्र संकुचन गर्भस्थ शिशु को जनन मार्ग से बाहर धकेलने में सहायता करते हैं। जन्म के पश्चात स्तनपान अनिवार्य है क्योंकि माँ का दूध पूर्ण पोषण प्रदान करता है और शिशु को अनेक रोगों से बचाता है। नवजात शिशु के शरीर का उचित तापमान (97°F–100.3°F) बनाए रखना चाहिए।

11.5.8 गर्भावस्था के दौरान माँ का स्वास्थ्य

माँ के स्वास्थ्य का महत्व:-

गर्भावस्था के दौरान महिला का स्वास्थ्य शिशु की वृद्धि और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उसे प्रोटीन, विटामिन और खनिजों से भरपूर संतुलित आहार लेना चाहिए, नियमित चिकित्सा जाँच करानी चाहिए और हल्के व्यायाम तथा विश्राम के संबंध में चिकित्सक की सलाह का पालन करना चाहिए।

नोट:- धूम्रपान और मद्यपान जैसी हानिकारक आदतों से बचना चाहिए। माँ का भावनात्मक रूप से स्वस्थ रहना भी महत्वपूर्ण होता है। संपूर्ण भारत में मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) मातृ देखभाल, सुरक्षित प्रसव और गर्भनिरोधक विधियों पर परामर्श देती हैं।

11.5.9 लैंगिक परिपक्वता से क्या अभिप्राय है?

लैंगिक परिपक्वता:-

जैसे-जैसे किशोरावस्था से गुजरते हैं शरीर में अनेक परिवर्तन होते हैं। इस वृद्धि का एक महत्वपूर्ण पहलू लैंगिक परिपक्वता है, जिसका अर्थ है कि शरीर जनन के योग्य हो रहा है। यह क्रमिक रूप से होता है किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वयस्क जीवन से संबंधित उत्तरदायित्वों के लिए पूर्णतः तैयार हैं।

नोट:- लैंगिक परिपक्वता (जैसे शुक्राणु उत्पादन और रजोधर्म का आरंभ) क्रमिक रूप से होती है परंतु भावनात्मक परिपक्वता में अधिक समय लगता है। भावनात्मक रूप से परिपक्व होने का अर्थ है भावनाओं पर नियंत्रण रखना, स्पष्ट रूप से संवाद करना और सुविचारित निर्णय लेना।

11.5.10 अवांछित गर्भावस्था और संक्रमण की रोकथाम

यौन संचारित संक्रमण (S.T.I.) और गर्भनिरोधक विधियाँ:-

यौन क्रिया में शारीरिक संपर्क स्थापित होता है इसलिए कुछ संक्रमण एक संक्रमित व्यक्ति से असंक्रमित व्यक्ति में संचारित हो सकते हैं। इन्हें यौन संचारित संक्रमण (S.T.I.) कहते हैं, जिनमें सुजाक, हर्पीज, सिफिलिस, जननिक मस्से और एच.आई.वी. (जिससे एड्स हो सकता है) सम्मिलित हैं।

  1. कंडोम का उपयोग यौन संचरित संक्रमण के प्रसार को रोक सकता है और गर्भावस्था को रोकने में भी सहायक होता है।
  2. मुँह से ली जाने वाली गोलियाँ हार्मोन में परिवर्तन करके अंडाणु के मोचन को प्रभावित करती हैं यद्यपि इनके कुछ दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं।
  3. अंतर्गर्भाशयी युक्ति, जैसे कॉपर-T, को गर्भधारण रोकने के लिए गर्भाशय में रखा जाता है।
  4. शल्य-चिकित्सा विधियों में पुरुषों में शुक्रवाहिनी या महिलाओं में डिंबवाहिनी को अवरुद्ध करना सम्मिलित है।
नोट:- गर्भावस्था के पहले त्रिमास में जब भ्रूण बहुत छोटा होता है तब उसे शल्य क्रिया द्वारा हटाया जा सकता है, इस प्रक्रिया को गर्भपात कहते हैं। स्वयं चयनित गर्भपात प्रायः किसी विशेष लिंग को वरीयता देने से प्रेरित होता है जिससे समाज में लिंगानुपात का गंभीर असंतुलन हो सकता है। अतः भारत में प्रसव-पूर्व लिंग का पता लगाना कानूनी रूप से पूर्णतः प्रतिबंधित है।
Scroll to Top