CLASS 9 SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 8
एक यात्रा — परमाणु के भीतर / A Journey Inside the Atom
| Textbook | NCERT |
|---|---|
| Class | Class 9 |
| Subject | Science |
| Chapter | Chapter 8 |
| Chapter Name | एक यात्रा — परमाणु के भीतर |
| Medium | Hindi |
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
- 8.1 परमाणु सिद्धांत की उत्पत्ति का पुनः अन्वेषण
- 8.2 परमाणु मॉडलों की एक संक्षिप्त ऐतिहासिक यात्रा
- 8.3 परमाणु के द्रव्यमान में कौन-से घटक योगदान देते हैं?
- 8.4 तत्वों के प्रतीक
- 8.5 परमाणु क्रमांक
- 8.6 द्रव्यमान संख्या
- 8.7 विभिन्न ऊर्जा स्तरों में इलेक्ट्रॉन किस प्रकार वितरित होते हैं?
- 8.8 परमाणु की संयोजन क्षमता — संयोजकता
- 8.9 परमाणु संरचना का गहन अध्ययन
8.1 परमाणु सिद्धांत की उत्पत्ति का पुनः अन्वेषण
परमाणु (Atom):-
आचार्य कणाद ने यह सुझाव दिया कि यदि पदार्थ (द्रव्य) को निरंतर विभाजित किया जाए तो एक ऐसी स्थिति आएगी जिसमें इतने सूक्ष्म कण प्राप्त होंगे कि उन्हें और अधिक विभाजित नहीं किया जा सकेगा। इन्होंने इन कणों को परमाणु कहा। इनके विचार संस्कृत ग्रंथ वैशेषिक सूत्र में उल्लिखित हैं। परमाणु अत्यंत सूक्ष्म कण है और इसे हमारी इंद्रियाँ अनुभव नहीं कर सकती हैं।
ग्रीक दार्शनिक लियुसीपस एवं डेमोक्रिटस ने भी ऐसा ही विचार प्रस्तावित किया। इन्होंने इन अविभाज्य कणों को एटोमॉस (atomos) कहा (ग्रीक में एटोमॉस का अर्थ अविभाज्य है)।
डाल्टन का परमाणु सिद्धांत:-
अनेक शताब्दियों पश्चात वर्ष 1808 में जॉन डाल्टन ने अपना परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत किया। यह उस समय के वैज्ञानिक प्रयोगों पर आधारित था। इन्होंने प्रस्तावित किया कि सभी द्रव्य अविभाज्य सूक्ष्म कणों से बने हैं जिन्हें परमाणु कहा जाता है अर्थात परमाणु द्रव्य के वे निर्माण मूल खंड हैं जिन्हें और सूक्ष्म कणों में विभाजित नहीं किया जा सकता। डाल्टन का परमाणु सिद्धांत यह ज्ञात करने का प्रथम वैज्ञानिक विवरण था कि द्रव्य किस प्रकार बना है।
8.2 परमाणु मॉडलों की एक संक्षिप्त ऐतिहासिक यात्रा
कैथोड किरण एवं इलेक्ट्रॉन की खोज:-
वर्ष 1897 में जे. जे. टॉमसन ने अति निम्न दाब पर गैसों में विद्युत धारा के चालन का अध्ययन किया। उन्होंने देखा कि किरणें, कैथोड (ऋणावेशित इलेक्ट्रोड) से ऐनोड (धनावेशित इलेक्ट्रोड) की ओर गमन कर रही हैं — इन्हें कैथोड किरणें कहा गया। विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्र में इन कैथोड किरणों पर किए गए अध्ययन के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ये किरणें ऋणावेशित कणों की धाराएँ हैं जिनका द्रव्यमान परमाणु के द्रव्यमान से बहुत कम है। इन कणों को बाद में इलेक्ट्रॉन कहा गया।
8.2.1 टॉमसन का परमाणु मॉडल
टॉमसन का परमाणु मॉडल (प्लम पुडिंग मॉडल):-
जब जे. जे. टॉमसन ने इलेक्ट्रॉन की खोज की तो इनके सामने एक पहेली यह थी कि यदि परमाणु उदासीन होते हैं तो इनमें धनात्मक आवेश कहाँ विद्यमान होता है? इसके समाधान हेतु टॉमसन ने प्रस्तावित किया कि परमाणु धनात्मक आवेश का एक गोला होता है जिसमें इलेक्ट्रॉन समान रूप से वितरित होते हैं। इस मॉडल की तुलना पुडिंग में धँसे हुए प्लम्स (सूखा मेवा) से की गई जिसे ‘प्लम पुडिंग मॉडल’ कहा गया।
8.2.2 टॉमसन मॉडल का परीक्षण — स्वर्ण पर्णिका प्रयोग
स्वर्ण पर्णिका प्रयोग (Gold Foil Experiment):-
वर्ष 1911 में गाइगर एवं मार्सडेन जो अर्नेस्ट रदरफोर्ड के निर्देशन में कार्य कर रहे थे, ने टॉमसन के परमाणु मॉडल की जाँच की जो स्वर्ण पर्णिका (gold foil) प्रयोग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इन्होंने स्वर्ण पर्णिका पर अल्फा (α) कणों के संकीर्ण किरणपुंज की बौछार की। अल्फा कण धनावेशित सूक्ष्म कण होते हैं जो कुछ रेडियोधर्मी तत्वों से उत्सर्जित होते हैं (यह वास्तव में हीलियम परमाणु का नाभिक है जिसमें दो प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन उपस्थित होते हैं)।
टॉमसन मॉडल के अनुसार परमाणु में धनात्मक आवेश समान रूप से वितरित होता है, अतः अपेक्षा थी कि अल्फा कण स्वर्ण पर्णिका के आर-पार हो जाएँगे या बहुत कम विक्षेपित होंगे। परंतु आश्चर्यजनक रूप से जहाँ अधिकांश कण विक्षेपित हुए बिना पर्णिका से सीधे निकल गए, वहीं कुछ कण बहुत अधिक विक्षेपित हुए और कुछ कण तो पुनः लौट आए। इस प्रकार सीधे मार्ग से विक्षेपण को प्रकीर्णन (scattering) कहा गया।
क. रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल:-
स्वर्ण पर्णिका प्रयोग से रदरफोर्ड ने यह निष्कर्ष निकाला कि परमाणु का धनावेश पूरे क्षेत्र में वितरित नहीं होता अपितु एक अति सूक्ष्म क्षेत्र में केंद्रित होता है जिसे नाभिक कहते हैं।
- परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त है क्योंकि अधिकतर अल्फा कण बिना विक्षेपित हुए पर्णिका के पार निकल गए।
- नाभिक सघन है जिसमें संपूर्ण धनावेश और परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान विद्यमान होता है।
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर घूमते हैं जैसे ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं — इसीलिए इसे परमाणु का ग्रहीय मॉडल कहा जाता है।
(नाभिक, परमाणु से लगभग 10⁵ गुना छोटा होता है)
ख. रदरफोर्ड मॉडल की सीमाएँ:-
यद्यपि केंद्रीय नाभिक का विचार एक बड़ा अग्र चरण था परंतु रदरफोर्ड मॉडल परमाणु के स्थायित्व की व्याख्या नहीं कर सका। कोई कण जब वृत्ताकार मार्ग में गति करता है तो उसकी दिशा निरंतर परिवर्तित होती रहती है, अर्थात वह त्वरित हो रहा है। यदि ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर त्वरित होता रहता है तो इसकी ऊर्जा में निरंतर ह्रास होना चाहिए, जिससे वह धीरे-धीरे भीतर की ओर गति करते हुए अंत में धनावेशित नाभिक में गिर जाना चाहिए।
ग. प्रोटॉन की खोज:-
रदरफोर्ड ने दर्शाया कि नाभिक में उपस्थित कणों (जिन्हें प्रोटॉन कहते हैं) के कारण उस पर धनावेश होता है। प्रोटॉन का भार इलेक्ट्रॉन से बहुत अधिक होता है और इस पर इलेक्ट्रॉन के समान परंतु विपरीत आवेश होता है।
8.2.3 बोर का परमाणु मॉडल
बोर का परमाणु मॉडल:-
परमाणुओं के स्थायित्व को समझाने के लिए नील्स बोर ने वर्ष 1913 में एक नया परमाणु मॉडल प्रतिपादित किया।
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर यादृच्छिक रूप से गति नहीं करते, अपितु वे निश्चित वृत्ताकार पथ में गति करते हैं जिन्हें स्थायी अवस्थाएँ, कक्षाएँ अथवा कोश (shell) कहा जाता है।
- इन कोशों को K, L, M, N, ..... अक्षरों से अथवा n = 1, 2, 3, 4, ..... संख्याओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
- इलेक्ट्रॉन मात्र इन्हीं अनुमत कोशों में गति कर सकते हैं, इन कोशों के मध्य में नहीं। इस निश्चित कोश में गति करते हुए इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का क्षय नहीं करता है।
- प्रथम ऊर्जा स्तर K (n=1) नाभिक के निकटतम होता है और इसकी ऊर्जा सबसे कम होती है। जैसे-जैसे हम नाभिक से दूर जाते हैं, स्तरों की ऊर्जा में वृद्धि होती जाती है।
- दो कोशों की ऊर्जा के अंतर के बराबर निश्चित मात्रा में ऊर्जा अवशोषित अथवा उत्सर्जित कर इलेक्ट्रॉन एक कोश से दूसरे कोश में जा सकता है।
- प्रत्येक कोश में इलेक्ट्रॉनों की एक निश्चित संख्या ही हो सकती है।
8.3 परमाणु के द्रव्यमान में कौन-से घटक योगदान देते हैं?
परमाणु द्रव्यमान की समस्या:-
रदरफोर्ड का मॉडल दर्शाता है कि परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान उसके नाभिक में केंद्रित होता है। नाभिक के चारों ओर गति करते हुए इलेक्ट्रॉन इतने हल्के होते हैं कि उनके द्रव्यमान की लगभग उपेक्षा की जा सकती है।
परंतु 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में एक समस्या सामने आई — जैसे कि एक हाइड्रोजन परमाणु में एक प्रोटॉन और हीलियम परमाणु में दो प्रोटॉन होते हैं तथापि हीलियम परमाणु का द्रव्यमान, हाइड्रोजन परमाणु के द्रव्यमान से चार गुना अधिक है, दोगुना नहीं। इसने वैज्ञानिकों को यह विचार करने के लिए प्रेरित किया कि क्या नाभिक में प्रोटॉन के अतिरिक्त कोई और भी कण है?
8.3.1 न्यूट्रॉन की खोज
न्यूट्रॉन (Neutron):-
वर्ष 1932 में इस समस्या का समाधान जेम्स चैडविक ने किया (वे अर्नेस्ट रदरफोर्ड के छात्र थे)। इन्होंने एक नए अवपरमाणुक कण की खोज की जिसका द्रव्यमान लगभग प्रोटॉन के बराबर था परंतु इस पर कोई आवेश नहीं था। इस उदासीन कण को न्यूट्रॉन कहा गया और इसे ‘n’ से दर्शाया गया।
तालिका 8.1 — अवपरमाणुक कणों के प्रतीक एवं आपेक्षिक आवेश:-
| अवपरमाणुक कण | प्रतीक | आपेक्षिक आवेश |
|---|---|---|
| इलेक्ट्रॉन | e⁻ | −1 |
| प्रोटॉन | p⁺ | +1 |
| न्यूट्रॉन | n⁰ | 0 |
8.4 तत्वों के प्रतीक
तत्वों के प्रतीक (Symbols of Elements):-
जॉन डाल्टन ने यह अनुभव किया कि रसायन विज्ञान को सरल बनाने के लिए तत्वों एवं यौगिकों को निरूपित करने की एक मानक विधि होनी चाहिए। इन्होंने ज्ञात तत्वों को दर्शाने के लिए वर्ष 1803 में प्रथम चित्रात्मक प्रतीक बनाए। बर्जेलियस ने वर्ष 1813 में यह सुझाव दिया कि तत्वों के प्रतीक उनके लैटिन नामों से लिए जाने चाहिए, जिससे अक्षरों वाले रासायनिक प्रतीकों का आरंभ हुआ।
- अनेक तत्वों के प्रतीक उनके आई.यू.पी.ए.सी. नाम के प्रथम अक्षर अथवा प्रथम दो अक्षरों से बने होते हैं।
- प्रतीक के नाम का प्रथम अक्षर सदैव बड़े अक्षर (capital letter) में तथा द्वितीय अक्षर छोटे अक्षर में लिखा जाता है — जैसे हाइड्रोजन (H), ऐलुमिनियम (Al)।
- कुछ तत्वों के प्रतीक उनके नाम के प्रथम व द्वितीय अक्षर को छोड़कर किसी अन्य अक्षर से बनते हैं — जैसे क्लोरीन Cl, जिंक Zn।
- कुछ तत्वों के प्रतीक उनके अंग्रेज़ी नाम से नहीं अपितु लैटिन, ग्रीक अथवा जर्मन नामों से लिए गए हैं — जैसे आयरन का प्रतीक Fe (लैटिन नाम फेरम), मर्करी का प्रतीक Hg (ग्रीक नाम हाइड्रेगेईरोस)।
8.5 परमाणु क्रमांक
परमाणु क्रमांक (Atomic Number):-
किसी एक तत्व के सभी परमाणु एक समान होते हैं परंतु वे दूसरे तत्वों के परमाणुओं से भिन्न होते हैं। यह भिन्नता इनमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों एवं प्रोटॉनों की संख्या के कारण होती है। किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या को उस तत्व का परमाणु क्रमांक कहते हैं। इसे Z द्वारा दर्शाया जाता है।
8.6 द्रव्यमान संख्या
द्रव्यमान संख्या (Mass Number):-
परमाणु नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों एवं न्यूट्रॉनों की कुल संख्या को द्रव्यमान संख्या कहते हैं और इसे A से दर्शाया जाता है। नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों एवं न्यूट्रॉनों को न्यूक्लिऑन कहा जाता है।
एक परमाणु के लिए मानक संकेतन में किसी तत्व के प्रतीक, परमाणु क्रमांक (Z) एवं द्रव्यमान संख्या (A) को निम्नलिखित रूप से लिखा जाता है — उदाहरणस्वरूप, कार्बन का प्रतीक C है, इसका परमाणु क्रमांक 6 और द्रव्यमान संख्या 12 है।
8.7 विभिन्न ऊर्जा स्तरों में इलेक्ट्रॉन किस प्रकार वितरित होते हैं?
बोर-बरी नियम:-
- किसी कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या 2n² सूत्र से दी जाती है, जहाँ ‘n’ कोश की संख्या है। अतः K-कोश (n=1) में 2, L-कोश (n=2) में 8, और M-कोश (n=3) में 18 इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं।
- सबसे बाह्यतम कोश में अधिकतम 8 इलेक्ट्रॉन समायोजित हो सकते हैं (प्रथम कोश में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन समायोजित हो सकते हैं)।
- इन कोशों में इलेक्ट्रॉन क्रमबद्ध रूप से भरे जाते हैं जो नाभिक के निकटतम कोश से आरंभ कर बाहर के कोशों की ओर जाते हैं अर्थात K, L, M, N, … क्रम में। L-कोश तब भरेगा जब K-कोश पूर्ण रूप से भर जाएगा।
8.7.1 परमाणुओं का निर्माण प्रक्रम
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration):-
विभिन्न कोशों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास कहा जाता है। जब भी परमाणु क्रमांक में 1 की वृद्धि हो तब उपयुक्त ऊर्जा स्तर में एक इलेक्ट्रॉन जोड़ा जाता है।
| तत्व | प्रतीक | परमाणु क्रमांक | K | L | M |
|---|---|---|---|---|---|
| हाइड्रोजन | H | 1 | 1 | - | - |
| हीलियम | He | 2 | 2 | - | - |
| लीथियम | Li | 3 | 2 | 1 | - |
| कार्बन | C | 6 | 2 | 4 | - |
| ऑक्सीजन | O | 8 | 2 | 6 | - |
| निऑन | Ne | 10 | 2 | 8 | - |
| सोडियम | Na | 11 | 2 | 8 | 1 |
| आर्गन | Ar | 18 | 2 | 8 | 8 |
8.8 परमाणु की संयोजन क्षमता — संयोजकता
संयोजकता (Valency):-
हाइड्रोजन अथवा क्लोरीन के परमाणुओं की वह संख्या जो किसी तत्व के एक परमाणु के साथ संयोजित होकर यौगिक बना सकती है, उसकी संयोजन क्षमता कहलाती है। परमाणु का बाह्यतम कोश जिसमें इलेक्ट्रॉन होते हैं उसका संयोजकता कोश (valence shell) कहलाता है, तथा इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉन संयोजकता इलेक्ट्रॉन कहलाते हैं।
संयोजकता का निर्धारण:-
अष्टक पूर्ण करने हेतु त्यागे गए, ग्रहण किए गए अथवा साझा किए गए इलेक्ट्रॉनों की संख्या को उस तत्व की ‘संयोजकता’ कहते हैं। सामान्यतः यदि किसी तत्व के संयोजकता कोश में चार से कम इलेक्ट्रॉन होते हैं तो वह अष्टक पूर्ण करने और स्थायित्व प्राप्त करने के लिए इलेक्ट्रॉनों का त्याग करता है। दूसरी ओर यदि संयोजकता इलेक्ट्रॉनों की संख्या चार से अधिक होती है तो वह अष्टक पूर्ण करने के लिए इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने का प्रयास करता है।
ऑक्सीजन (2, 6) → संयोजकता 2 (इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके)
कार्बन (2, 4) → संयोजकता 4 (इलेक्ट्रॉन साझा करके)
8.9 परमाणु संरचना का गहन अध्ययन
8.9.1 समस्थानिक
समस्थानिक (Isotopes):-
एक ही तत्व के ऐसे परमाणु जिनमें प्रोटॉनों की संख्या (परमाणु संख्या, Z) समान परंतु न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न-भिन्न हो सकती है, और इस कारण इनके द्रव्यमान भिन्न-भिन्न होते हैं — ये ‘युग्म परमाणु’ जिनके परमाणु क्रमांक समान परंतु द्रव्यमान संख्याएँ भिन्न होती हैं, समस्थानिक कहलाते हैं।
उदाहरण के लिए, प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला हाइड्रोजन तीन अलग-अलग समस्थानिकों — ¹₁H (प्रोटियम, ~99.98%), ²₁H (ड्यूटीरियम, ~0.015%), और ³₁H (ट्राइटियम, अल्प मात्रा में) — का मिश्रण होता है।
औसत परमाणु द्रव्यमान:-
यदि किसी प्राकृतिक तत्व के परमाणु द्रव्यमान को उसके सभी प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले समस्थानिकों के औसत द्रव्यमान के रूप में लिया जाए तो यह उसके समस्थानिकों के द्रव्यमानों का एक साधारण अंकगणितीय माध्य होगा। यथार्थ औसत परमाणु द्रव्यमान की गणना उनकी प्राकृतिक प्रचुरता को ध्यान में रखकर की जाती है, जिसे भारित औसत परमाणु द्रव्यमान कहा जाता है।
= (35×75/100) + (37×25/100) = 35.5 u
8.9.2 समभारिक
समभारिक (Isobar):-
जब विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की द्रव्यमान संख्या समान हो परंतु परमाणु क्रमांक भिन्न हो तो उन्हें समभारिक कहा जाता है। उदाहरण के लिए — कैल्सियम (परमाणु क्रमांक 20), पोटैशियम (परमाणु क्रमांक 19) और आर्गन (परमाणु क्रमांक 18) — इन तत्वों में प्रोटॉनों की संख्या भिन्न होती है परंतु इन सभी की द्रव्यमान संख्या 40 है।