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CLASS IX SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 5

मिश्रण एवं उनके पृथक्करण का अन्वेषण

TextbookNCERT (अन्वेषण)
ClassClass IX
SubjectScience
ChapterChapter 5
Chapter Nameमिश्रण एवं उनके पृथक्करण का अन्वेषण
MediumHindi

5.1 हम मिश्रणों का वर्गीकरण किस प्रकार कर सकते हैं?

समांगी मिश्रण (Homogeneous mixture):-

जिस मिश्रण का संघटन पूर्णतया एकसमान होता है, उसे समांगी मिश्रण अथवा विलयन कहते हैं (जैसे चीनी और जल का मिश्रण)। एक विलयन सदैव समांगी होता है। सिरका, वातित पेय (सोडा जल) समांगी मिश्रणों के अन्य उदाहरण हैं।

विषमांगी मिश्रण (Heterogeneous mixture):-

जिस मिश्रण का संघटन एकरूप नहीं होता, उसे विषमांगी मिश्रण कहते हैं (जैसे जल और रेत का विलोडित मिश्रण — रेत के कण स्पष्ट दिखाई देते हैं और कुछ समय पश्चात तली पर बैठ जाते हैं)।

5.2 विलयन

विलेय और विलायक:-

विलयन तब बनता है जब कोई विलेय (वह पदार्थ जो घुलता है) किसी विलायक (वह पदार्थ जिसमें विलेय घुलता है) में मिश्रित किया जाता है। चीनी और जल के मिश्रण में चीनी विलेय है और जल विलायक है।

5.2.1 विलयन की सांद्रता

सांद्रता (Concentration):-

विलेय की वह मात्रा जो किसी विलायक अथवा विलयन की मात्रा में घुली होती है, विलयन की सांद्रता कहलाती है। विलयन तैयार करने के लिए पदार्थों को सदैव सही अनुपात में लेना आवश्यक होता है — जैसे ORS (ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन) बनाने के लिए नमक और चीनी की नियत मात्राएँ जल की निश्चित मात्रा में मिश्रित करनी होती हैं।

नोट:- घर पर तैयार किए गए अथवा बाजार में उपलब्ध सभी मीठे पेय पदार्थ ओ.आर.एस. नहीं होते। पीड़कनाशी के छिड़काव में भी निश्चित मात्रा जल में मिश्रित करनी चाहिए — कम मात्रा से फसल की रक्षा नहीं होगी जबकि अधिक मात्रा से फसलों, मृदा और पर्यावरण को हानि हो सकती है।

5.2.2 हम सांद्रता को किस प्रकार व्यक्त करते हैं?

क. द्रव्यमान-द्रव्यमान प्रतिशत (% m/m अथवा % w/w):-

यह विधि समांगी मिश्रणों की सांद्रता व्यक्त करने हेतु प्रयुक्त होती है — बताती है कि 100 g विलयन में विलेय के कितने ग्राम विद्यमान हैं। इसका प्रयोग दुग्ध पाउडर, मसालों तथा डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों के संघटन को व्यक्त करने के लिए किया जाता है।

द्रव्यमान-द्रव्यमान प्रतिशत = (विलेय का द्रव्यमान ÷ विलयन का द्रव्यमान) × 100   (5.1)

उदाहरण 5.1

90 g जल में 10 g नमक मिश्रित — विलयन का कुल द्रव्यमान = 100 g। द्रव्यमान-द्रव्यमान प्रतिशत = (10/100) × 100 = 10% m/m

ख. द्रव्यमान-आयतन प्रतिशत (% m/v अथवा % w/v):-

इस विधि का उपयोग तब किया जाता है जब द्रव को तोलने की तुलना में उसका आयतन मापना अधिक सुगम होता है, जैसे दवाइयों और प्रयोगशालाओं में। यह बताता है कि 100 mL विलयन में विलेय की कितनी मात्रा (ग्राम) विद्यमान है।

द्रव्यमान-आयतन प्रतिशत = (विलेय का द्रव्यमान ÷ विलयन का आयतन) × 100   (5.2)
नोट:- चिकित्सालयों में प्रयुक्त लवणीय विलयन प्रायः सोडियम क्लोराइड का जल में 0.9% m/v विलयन होता है — यह रुधिर के लिए सुरक्षित होता है तथा शरीर से निकले तरल की क्षतिपूर्ति करता है।

उदाहरण 5.2

5 g ग्लूकोस को जल में घोलकर 100 mL विलयन — द्रव्यमान-आयतन प्रतिशत = (5/100) × 100 = 5% m/v

ग. आयतन-आयतन प्रतिशत (% v/v):-

यह विधि दो मिश्रणीय द्रवों को मिश्रित करते समय प्रयुक्त की जाती है (जैसे इत्र, सौंदर्य प्रसाधन, सिरका)। यह बताता है कि 100 mL विलयन में विलेय के कितने mL उपस्थित हैं।

आयतन-आयतन प्रतिशत = (विलेय का आयतन ÷ विलयन का आयतन) × 100   (5.3)
नोट:- उद्योगों में सामान्यतः भार-भार प्रतिशत (% w/w) का उपयोग प्रचलित है क्योंकि भार तथा द्रव्यमान का सामान्यतः एक-दूसरे के स्थान पर उपयोग किया जाता है — आंकिक रूप से % m/m तथा % w/w दोनों समान होते हैं।

उदाहरण 5.3

पीड़कनाशी द्रव के 1 mL को जल में मिश्रित करके 100 mL छिड़काव बनाया गया — आयतन-आयतन प्रतिशत = (1/100) × 100 = 1% v/v

5.2.3 पदार्थों की विलेयता

विलेयता (Solubility):-

विलेय की वह अधिकतम मात्रा जो किसी निश्चित तापमान पर विलायक की एक निश्चित मात्रा (100 mL अथवा 100 g) में घुलती है, उसकी विलेयता कहलाती है। वह विलयन जो उस तापमान पर और अधिक विलेय नहीं घोल सकता, संतृप्त विलयन कहलाता है।

नोट:- ठोस विलेयों की द्रव विलायक में विलेयता प्रायः तापमान में वृद्धि के साथ बढ़ती है, जबकि गैसों को द्रवों में घोलने पर उनकी विलेयता प्रायः तापमान में वृद्धि के साथ घटती है। तापमान के सापेक्ष विलेयता के ग्राफ को विलेयता वक्र कहते हैं।

5.3 समांगी मिश्रणों के पृथक्करण की विधियाँ

5.3.1 क्रिस्टलीकरण

क्रिस्टलीकरण (Crystallisation):-

प्रयोगशालाओं में किसी संतृप्त विलयन से क्रिस्टल बनाने की प्रक्रिया को क्रिस्टलीकरण कहा जाता है। इस विधि का उपयोग उन घुलनशील ठोस पदार्थों के पृथक्करण के लिए किया जाता है जिनमें से एक पदार्थ की विलेयता एक निश्चित तापमान पर दूसरे पदार्थ की विलेयता से कम होती है। इसका उपयोग ठोस पदार्थों के शुद्धिकरण के लिए भी किया जा सकता है (विभिन्न तापमानों पर विलेयता में भिन्नता के सिद्धांत पर आधारित)।

उदाहरण:- सेंधा नमक, चीनी के क्रिस्टल (मिश्री), हिमकण और तुषार (पाला) प्राकृतिक क्रिस्टलों के उदाहरण हैं। समुद्री जल से नमक के क्रिस्टल संतृप्त विलयन बनाकर प्राप्त किए जाते हैं — भारत में 'पांगा' नमक समुद्र के सांद्र खारे जल को उबालकर तथा 'करकच' नमक समुद्री जल के वाष्पीकरण द्वारा तैयार किया जाता था।

5.3.2 आसवन

आसवन (Distillation):-

दो मिश्रणीय द्रवों के समांगी मिश्रण को गर्म करने पर कम क्वथनांक वाला द्रव वाष्पित हो जाता है। उत्पन्न वाष्प को संघनित्र (condenser) से प्रवाहित कर ठंडा किया जाता है जिससे वह पुनः द्रव में परिवर्तित हो जाती है — इस प्रक्रिया को आसवन कहते हैं। इस विधि द्वारा विलायक पुनः प्राप्त किया जा सकता है अथवा ऐसे द्रवों को पृथक किया जा सकता है जिनके क्वथनांकों में कम-से-कम 25°C का अंतर हो। इसका उपयोग किसी विलयन से द्रव प्राप्त करने के लिए भी किया जा सकता है जिसमें ठोस घुलनशील पदार्थ हों।

उदाहरण:- ऐसीटोन (क्वथनांक 56°C) और जल (क्वथनांक 100°C) के मिश्रण को आसवन द्वारा पृथक किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के कन्नौज शहर (भारत की इत्र राजधानी) में 'देग भापका विधि' नामक पारंपरिक आसवन विधि द्वारा मिट्टी की सोंधी सुगंध वाला इत्र बनाया जाता है।
उदाहरण:- पेट्रोलियम परिशोधनशाला में अपरिष्कृत पेट्रोलियम को प्रभाजी आसवन (fractional distillation) द्वारा विभिन्न प्रभाजों (पेट्रोलियम गैस, पेट्रोल, किरोसिन, डीजल आदि) में पृथक किया जाता है — यह उन घटकों को पृथक करती है जिनके क्वथनांकों में अपेक्षाकृत कम अंतर (25°C से कम) होता है।

5.3.3 कागज वर्णलेखिकी

कागज वर्णलेखिकी (Paper chromatography):-

मिश्रण के घटकों को पृथक करने की इस विधि में घटकों को पृथक करने हेतु इन घटकों की विलायक तथा कागज के साथ अंतर्क्रिया में अंतर का उपयोग किया जाता है। द्रव (विलायक) पदार्थों को कागज पर ऊपर की ओर ले जाता है और उनकी गति में अंतर के आधार पर इन्हें पृथक कर देता है।

नोट:- 'वर्णलेखिकी' (Chromatography) शब्द दो ग्रीक शब्दों क्रोमा (रंग) तथा ग्रेफीन (लिखना) से बना है। इसका उपयोग रंजकों व स्याहियों जैसे रंगीन पदार्थों के पृथक्करण के लिए किया जाता है — जैसे स्याही के घटक रंगों को अथवा पालक की पत्तियों के हरे सत्व में उपस्थित विभिन्न वर्णकों को पृथक करना।

5.4 विषमांगी मिश्रणों के घटकों को पृथक करना

5.4.1 दो अमिश्रणीय द्रवों का पृथक्करण

अमिश्रणीय द्रव और पृथक्कारी कीप:-

तेल और जल जैसे द्रव जो परस्पर मिश्रित नहीं होते, अमिश्रणीय द्रव कहलाते हैं और पृथक परतें बनाते हैं। इन्हें पृथक्कारी कीप (separating funnel) का उपयोग करके पृथक किया जाता है — भारी (अधिक घनत्व वाला) द्रव नीचे और हल्का द्रव ऊपर रहता है, स्टॉपकॉक खोलकर निचली परत को अलग एकत्रित किया जाता है।

5.4.2 ऊर्ध्वपातन

ऊर्ध्वपातन (Sublimation):-

जब कोई ठोस पदार्थ गर्म करने पर (गलनांक से निम्न ताप पर) द्रव अवस्था में परिवर्तित हुए बिना सीधे ठोस अवस्था से वाष्प अवस्था में परिवर्तित हो जाता है, इस प्रक्रिया को ऊर्ध्वपातन कहते हैं। शीतलन पर वाष्प बिना द्रव बने पुनः ठोस में संघनित हो जाती है, इसे निक्षेपण (deposition) कहते हैं। यह विधि उन मिश्रणों को पृथक करने के लिए उपयोगी है जिनमें एक घटक ऊर्ध्वपातित होता है और दूसरा नहीं (जैसे कर्पूर और रेत)।

उदाहरण:- नैफ्थलीन भी ऊर्ध्वपातित होने वाला पदार्थ है। ठोस कार्बन डाइऑक्साइड (शुष्क बर्फ/dry ice) भी ऊर्ध्वपातित होती है और इसका उपयोग आइसक्रीम के भंडारण में किया जाता है।

मिश्रधातु (Alloy):-

दो अथवा दो से अधिक धातुओं का अथवा एक धातु और एक अधातु का समांगी मिश्रण मिश्रधातु कहलाता है। भौतिक विधियों द्वारा मिश्रधातु के घटकों को पृथक नहीं किया जा सकता। उदाहरण — पीतल (80% कॉपर, 20% जिंक), कांसा (80% ताँबा, 20% टिन), स्टेनलेस स्टील (आयरन, कार्बन, क्रोमियम, निकैल, मोलिब्डेनम)।

5.4.3 निलंबन — अपकेंद्रण और स्कंदन

निलंबन (Suspension):-

ऐसे विषमांगी मिश्रण जिनमें ठोस कण घुलते नहीं हैं अपितु संपूर्ण माध्यम में निलंबित रहते हैं, निलंबन कहलाते हैं। निलंबन में अघुलनशील पदार्थ के कणों का आकार विलयन के कणों की अपेक्षा बड़ा होता है और नग्न आँखों से दिखाई देता है (जैसे जल में लकड़ी का बुरादा, जल में चाय की पत्तियाँ)।

क. अपकेंद्रण (Centrifugation):-

मिश्रण को एक नलिका में तीव्र गति से घुमाया जाता है। अपकेंद्रीय बल (वृत्तीय गति में घूम रही वस्तु पर बाहर की ओर लगने वाला बल) भारी कणों को बाहर की ओर खींचता है जहाँ वे नलिका में तली पर बैठ जाते हैं जबकि हल्का द्रव ऊपर रह जाता है। प्रयोगशाला में रक्त के घटकों (लाल रक्त कोशिकाएँ, प्लाज्मा) को पृथक करने तथा अनेक रासायनिक उद्योगों में इसका व्यापक उपयोग होता है।

उदाहरण:- पेपरफ्यूज एक निम्न लागत का हस्तचालित उपकरण है जो बिना विद्युत के अपकेंद्रण प्रक्रिया का निष्पादन कर सकता है — यह दूरस्थ क्षेत्रों में मलेरिया और ऐनीमिया जैसे रोगों की जाँच में सहायता कर सकता है।

ख. स्कंदन (Coagulation):-

फिटकरी (alum) जैसा स्कंदक (coagulant) पदार्थ मिलाने पर सूक्ष्म निलंबित कण एकत्रित (गुच्छों के रूप में) हो जाते हैं — इसे स्कंदन कहते हैं। इस प्रकार बने बड़े गुच्छे गुरुत्वाकर्षण के कारण तली पर बैठ जाते हैं जिसे अवसादन (sedimentation) कहते हैं। इन्हें जल से निस्तारण (decantation) अथवा निस्यंदन (filtration) द्वारा पृथक किया जा सकता है। फिटकरी का उपयोग प्रायः जल शुद्धिकरण में किया जाता है।

उदाहरण:- दुग्ध से पनीर बनाने की प्रक्रिया भी स्कंदन कहलाती है, इसमें अम्ल (नींबू का रस अथवा सिरका) का उपयोग स्कंदक के रूप में किया जाता है।

5.4.4 कोलॉइड

कोलॉइड (Colloid):-

रक्त न तो एक विलयन है और न ही एक वास्तविक निलंबन — यह एक कोलॉइड है। विलयन, निलंबन और कोलॉइड मुख्यतः घुले हुए अथवा निलंबित कणों के आकार के आधार पर भिन्न होते हैं:

  • विलयन में कणों का आकार सबसे छोटा (1 nm से कम व्यास)
  • कोलॉइड में कणों का आकार अपेक्षाकृत बड़ा (1 से 1000 nm व्यास)
  • निलंबन में कण अधिक बड़े (1000 nm से अधिक व्यास)

निलंबन के विपरीत कोलॉइड में मिश्रण के कण समय के साथ तली पर नहीं बैठते — वे संपूर्ण मिश्रण में समान रूप से फैले रहते हैं। दुग्ध, टमाटर सॉस तथा आइसक्रीम कोलॉइडों के उदाहरण हैं।

नोट:- कोलॉइड में विलेय जैसे घटक अथवा परिक्षिप्त कणों को परिक्षिप्त प्रावस्था (dispersed phase) कहते हैं और जिस माध्यम में यह निलंबित रहती है, उसे परिक्षेपण माध्यम (dispersion medium) कहा जाता है। दोनों द्रव होने पर इसे पायस (इमल्शन) कहते हैं — जैसे दुग्ध, बॉडी लोशन (जल में तेल पायस) और मक्खन, कोल्ड क्रीम (तेल में जल पायस)।
नोट:- रक्तदान जीवनरक्षक है। दान किए गए रक्त का परीक्षण कर रक्त समूह की पहचान की जाती है और इसे प्लाज्मा, प्लेटलेट, श्वेत तथा लाल रक्त कणिकाओं में पृथक किया जाता है। शरीर कुछ ही सप्ताहों में दान किए गए रक्त की पूर्ति प्राकृतिक रूप से स्वयं कर लेता है।

5.5 टिंडल प्रभाव

टिंडल प्रभाव (Tyndall effect):-

कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन (बिखेरने) की घटना को टिंडल प्रभाव कहा जाता है — इसका नाम वैज्ञानिक जॉन टिंडल के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन का अध्ययन किया था। जब प्रकाश किसी कोलॉइड अथवा निलंबन से प्रसरित होता है तो उसका प्रकीर्णन होता है, परंतु जब वह पारदर्शी (सच्चे) विलयन से प्रसरित होता है तो ऐसा नहीं होता — क्योंकि विलयन के कण प्रकाश को प्रकीर्णित करने के लिए बहुत छोटे होते हैं।

उदाहरण:- अंधेरे कक्ष के छोटे छिद्र से प्रवेश करते प्रकाश में वायु के धूल कणों के कारण मार्ग दिखाई देना, तथा खेल स्टेडियम की फ्लड लाइट्स में यह परिघटना देखी जा सकती है।
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