Class 10 Science Notes in hindI Chapter - 10
Chapter 10: The Human Eye and the Colourful World
Chapter Introduction:
This chapter explains the structure of the human eye and various phenomena related to light and colours. The concepts are explained in a simple question–answer style.
FAQ
Ques. Is diagram practice important for this chapter?
Ans. Yes, diagram-based questions are important for this chapter.
CLASS 10 SCIENCE NOTES IN HINDI
CHAPTER 10 : मानव नेत्र तथा रंग-बिरंगा संसार
प्रश्न :- मानव नेत्र क्या है और यह कैसे काम करता है?
उत्तर :- मानव नेत्र :- यह एक अत्यधिक महत्वपूर्ण और संवेदनशील ज्ञानेंद्रिय है। मानव नेत्र कैमरे के समान काम करता है, जिससे हम अपने चारों ओर के रंग-बिरंगे दृश्य को देख पाते हैं। नेत्र का कार्य दृष्टिपटल पर वास्तविक छवि का उल्टा प्रतिबिंब बनाना होता है। ये नेत्र गोलक में स्थित होते हैं, जिनका व्यास लगभग 2.3 सेंटीमीटर होता है।
प्रश्न :- मानव नेत्र के प्रमुख भाग कौन कौन से है, तथा उनके क्या कार्य है?
उत्तर :- मानव नेत्र के प्रमुख भाग तथा उनके कार्य निम्नलिखित है :-
1. दृढ़ पटल :- मनुष्य का नेत्र एक खोखले गोले जैसा होता है। इसका बाहरी पर्त कठोर, अपारदर्शी और सफेद रंग का होता है, जिसे दृढ़ पटल कहा जाता है। यह पटल नेत्र के अंदरूनी हिस्सों की रक्षा करता है और उसे बाहरी क्षति से बचाता है।
2. रक्तक पटल :- दृढ़ पटल के अंदरूनी भाग में एक काली रंग की परत (झिल्ली) होती है, जिसे रक्तक पटल कहते हैं। यह झिल्ली नेत्र के अंदरूनी हिस्सों में प्रकाश के परावर्तन को रोकने का कार्य करती है।
3. श्वेत मंडल / कॉर्निया :- नेत्र के सामने की ओर एक पारदर्शी परत (झिल्ली) स्थित होती है, जिसे श्वेत मंडल या कॉर्निया कहा जाता है। यह परत नेत्र में प्रवेश करने वाली प्रकाश किरणों का अधिकतर अपवर्तन अपनी बाहरी सतह पर करती है।
4. नेत्र गोलक :- नेत्र गोलक की आकृति लगभग गोल होती है और इसका व्यास लगभग 2.3 सेंटीमीटर होता है।
5.लेंस :- लेंस एक उत्तल आकार का लेंस होता है, जो प्रकाश को रेटिना पर एकत्रित करता है। यह एक रेशेदार, जेल जैसे पदार्थ से बना होता है। लेंस का कार्य वस्तुओं की दूरी के अनुसार रेटिना पर उन्हें सही रूप से केन्द्रित करने के लिए सूक्ष्म समायोजन करना है।
6. परितारिका :- कॉर्निया के पीछे एक पेशीय परत स्थित होती है, जो पुतली के आकार को नियंत्रित करने का कार्य करती है। इसे परितारिका कहा जाता है।
7. पुतली :- पुतली एक गतिशील छिद्र (परिवर्ती द्धारक) के रूप में कार्य करती है, जिसका आकार परितारिका द्वारा नियंत्रित किया जाता है। यह आंख में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा को समायोजित/नियंत्रित करने का कार्य करती है।
8. अभिनेत्र लेंस :- अभिनेत्र लेंस एक उत्तल प्रकार अभिनेत्र लेंस है, जो प्रकाश को रेटिना पर एकत्रित करता है और वस्तु का उल्टा और वास्तविक प्रतिबिंब उत्पन्न करता है। यह एक रेशेदार, जेली जैसे पदार्थ से बना होता है।
9. पक्ष्भामी पेशियां :- पक्ष्भामी पेशियां अभिनेत्र लेंस की वक्रता को नियंत्रित करने का कार्य करती हैं। जब लेंस की वक्रता में परिवर्तन होता है, तो इसकी फोकस दूरी भी बदल जाती है, जिससे हम वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिंब देख सकते हैं।
10. रेटीना :- रेटीना एक कोमल और सूक्ष्म झिल्ली होती है, जिसमें प्रकाश को संवेदी बनाने वाली कोशिकाएं पाई जाती हैं। जब इन कोशिकाओं पर प्रकाश पड़ता है, तो वे सक्रिय होकर विद्युत संकेत उत्पन्न करती हैं। ये संकेत दृष्टि तंत्रिका के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचते हैं, जहां पर मस्तिष्क इन संकेतों की व्याख्या करता है, और इस तरह हम वस्तुओं को देख पाते हैं।
प्रश्न :- दूर बिंदु और निकट बिंदु में क्या अंतर है?
उत्तर :- दूर बिंदु और निकट बिंदु में निम्नलिखित अंतर है :-
दूर बिंदु :- वह सबसे दूर स्थित बिंदु, जिस तक कोई व्यक्ति अपनी आँखों से वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देख सकता है, उसे नेत्र का दूर बिंदु कहा जाता है। सामान्य दृष्टि वाले व्यक्ति के लिए यह दूरी अनंत होती है।
निकट बिंदु :- वह सबसे कम दूरी, जिस पर कोई वस्तु बिना किसी तनाव के स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है, उसे नेत्र का निकट बिंदु कहा जाता है।
प्रश्न :- समंजन क्षमता का क्या मतलब होता है और यह कैसे काम करती है?
उत्तर :- समंजन क्षमता :- अभिनेत्र लेंस की वह क्षमता होती है, जिसके द्वारा वह अपनी फोकस दूरी को आवश्यकतानुसार समायोजित/नियंत्रित करता है, उसे समंजन क्षमता कहते हैं।
प्रश्न :- सुस्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी का क्या मतलब होता है और यह कितनी होती है?
उत्तर :- न्यूनतम दूरी :- सामान्य दृष्टि वाले वयस्क के लिए निकट बिंदु उसकी आँख से लगभग 25 सेंटीमीटर की दूरी पर होता है। इसे सुस्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी कहा जाता है।
प्रश्न :- मोतियाबिंद क्या है, इसके होने के क्या कारण है, और इसका इलाज क्या है?
उत्तर :- मोतियाबिंद और इसके होने के कारण :- जैसे-जैसे आयु बढ़ती है, कुछ लोगों के आँखों के क्रिस्टलीय लेंस में धुंधलापन आ जाता है, जो सफेद या दूधिया दिखाई देता है। इस स्थिति को मोतियाबिंद कहा जाता है। इससे दृष्टि में गिरावट हो सकती है, जो कभी-कभी पूरी तरह से दृष्टिहीनता का कारण बन सकती है।
मोतियाबिंद का इलाज :- मोतियाबिंद का इलाज शल्य चिकित्सा द्वारा किया जा सकता है, जिसके बाद दृष्टि को पुनः सामान्य किया जा सकता है।
प्रश्न :- दृष्टि दोष क्या होता है, और इसके प्रमुख दोष कौन-कौन से है?
उत्तर :- दृष्टि दोष :- वह स्थिति होती है, जब आंख की संरचना या कार्यप्रणाली में कोई समस्या होती है, जिसके कारण व्यक्ति को वस्तुओं को सही तरीके से देखने में कठिनाई होती है। दृष्टि दोष के कारण, आंखों में अनियंत्रित फोकस, धुंधला दृष्टि या अन्य दृश्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। प्रमुख दृष्टि दोषों में शामिल हैं :-
1. निकट दृष्टि दोष
2. दीर्घ – दृष्टि दोष
3. जरा – दूरदृष्टिता
प्रश्न :- निकट दृष्टि दोष क्या है, इसके होने के क्या कारण है, और इसका इलाज क्या है?
उत्तर :- निकट दृष्टि दोष :- इस दोष में व्यक्ति को निकट की वस्तुएं स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, लेकिन दूर की वस्तुएं धुंधली या अस्पष्ट दिखाई देती हैं। ऐसे व्यक्ति का दूर बिंदु अनंत की बजाय आंखों के पास स्थित होता है।
निकट दृष्टि दोष होने के कारण :-
1. यह दोष अभिनेत्र लेंस की वक्रता का अत्यधिक होने के कारण होता है।
2. यह दोष नेत्र गोलक के लंबा होने के कारण होता है।
निकट दृष्टि दोष का इलाज :- इस दोष को ठीक करने के लिए उपयुक्त क्षमता वाले अवतल लेंस (अपसारी लेंस) का उपयोग किया जा सकता है। यह लेंस वस्तु के प्रतिबिंब को सही स्थान पर, यानी दृष्टिपटल (रेटिना) पर, लाकर दृष्टि को सुधारता है और इस प्रकार दोष को दूर करता है।
प्रश्न :- दीर्घ-दृष्टि दोष क्या है, इसके होने के क्या कारण है, और इसका इलाज क्या है?
उत्तर :- दीर्घ-दृष्टि दोष :- इस दोष में व्यक्ति दूर की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देख सकता है, लेकिन निकट की वस्तुएं उसे धुंधली दिखाई देती है। ऐसे व्यक्ति का निकट बिंदु 25 से.मी. की सामान्य दूरी से अधिक दूर हो जाता है।
दीर्घ-दृष्टि दोष होने के कारण :-
1. नेत्र लेंस की फोकस दूरी के अत्यधिक बढ़ जाने के कारण यह दोष होता है।
2. नेत्र गोलक के छोटा हो जाने के कारण यह दोष होता है।
दीर्घ-दृष्टि दोष का इलाज :- इस दोष को उपयुक्त क्षमता वाले उत्तल लेंस (अभिसारी लेंस) का प्रयोग करके सुधारा जा सकता है। उत्तल लेंस वाले चश्मे दृष्टिपटल पर वस्तु के स्पष्ट प्रतिबिंब को प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त क्षमता प्रदान करते हैं।
प्रश्न :- जरा – दूरदृष्टिता क्या है, इसके होने के क्या कारण है, और इसका इलाज क्या है?
उत्तर :- जरा – दूरदृष्टिता :- उम्र बढ़ने के कारण, इंसान की आंखों की समंजन क्षमता (focusing ability) कम हो जाती है। ज्यादातर व्यक्तियों का निकट दृष्टि बिंदु दूर हो जाता है, जिसे वृद्धावस्था में दूरदृष्टि अथवा जरा – दूरदृष्टिता कहा जाता है।
जरा – दूरदृष्टिता होने के कारण :-
1. यह समस्या आंखों की पक्ष्भामी पेशियाें में धीरे-धीरे कमजोरी होने के कारण उत्पन्न होती है।
2. यह समस्या आंख के क्रिस्टलीय लेंस (lens) के लचीलेपन में कमी के कारण उत्पन्न होती है।
जरा – दूरदृष्टिता का इलाज :-
1. उत्तल लेंस का उपयोग करने से इस समस्या को सुधारा जा सकता है।
2. कुछ व्यक्तियों को दोनों प्रकार के दृष्टि दोष होते हैं, यानी निकट दृष्टि और दूर दृष्टि दोष। ऐसे व्यक्तियों को द्वि-फोकल लेंस (bifocal lenses) की आवश्यकता पड़ती है। इसमें ऊपरी हिस्सा अवतल लेंस और निचला हिस्सा उत्तल लेंस होता है।
3. वर्तमान समय में संस्पर्श लेंस (Contact lenses) और सर्जरी के द्वारा भी दृष्टि दोषों को सुधारा जा सकता है।
प्रश्न :- दोनों आंखों का सिर के ऊपर सामने की ओर स्थित होने से हमें क्या लाभ होते हैं?
उत्तर :- दोनों आंखों का सिर के ऊपर सामने की ओर स्थित होने से हमें निम्नलिखित लाभ होते हैं:-
1. इस स्थिति के कारण हमें त्रिविम दृष्टि (3D vision) का अनुभव होता है।
2. यह हमें एक विस्तृत दृष्टि क्षेत्र प्रदान करता है।
3. इसके कारण, हम धुंधली और दूर की वस्तुओं को भी स्पष्ट रूप से देख सकते हैं।
प्रश्न :- प्रिज्म के आकार और संरचना के बारे में बताइए। इसमें कितने आधार और पार्श्व पृष्ठ होते हैं?
उत्तर :- प्रिज्म एक ठोस वस्तु होती है, जिसमें दो त्रिकोणीय आधार होते हैं और तीन आयताकार पार्श्व (साइड) पृष्ठ होते हैं।
प्रश्न :- प्रिज्म द्वारा प्रकाश के अपवर्तन की प्रक्रिया को संक्षेप में समझाइए और इसके परिणामस्वरूप किस प्रकार का दृश्य उत्पन्न होता है?
उत्तर :- जब प्रकाश प्रिज्म से गुजरता है, तो प्रकाश का मार्ग बदल जाता है। यह घटना अपवर्तन कहलाती है। प्रिज्म में प्रकाश के विभिन्न रंगों (वर्णमाला) का अलग-अलग अपवर्तन होता है, जिससे सफेद प्रकाश विभाजित होकर रंगों के रूप में दिखता है। इस प्रक्रिया को प्रिज्म का अपवर्तन कहा जाता है, जो रेनबो (इंद्रधनुष) के रूप में दिखाई देती है।
प्रश्न :- प्रिज्म कोण क्या होता है?
उत्तर :- प्रिज्म के दो पार्श्व पृष्ठों के बीच बनने वाला कोण प्रिज्म कोण कहलाता है।
प्रश्न :- विचलन कोण को कैसे परिभाषित किया जा सकता है और यह किन किरणों के बीच होता है?
उत्तर :- विचलन कोण वह कोण होता है जो आपतित किरण और निर्गत किरण के बीच में बनता है।
प्रश्न :- काँच के प्रिज्म द्वारा श्वेत प्रकाश के विक्षेपण की प्रक्रिया को विस्तार से समझाइए।
उत्तर :- काँच के प्रिज्म द्वारा श्वेत प्रकाश का विक्षेपण :- सूर्य के श्वेत प्रकाश का काँच के प्रिज्म से गुजरने पर यह प्रिज्म सूर्य के श्वेत प्रकाश को विभिन्न सात रंगों में बाँट देता है। वे रंग होते हैं: लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी, और बैंगनी। इन रंगों को मिलाकर एक रंगीन पट्टी यानि बैंड बनती है, जिसे स्पेक्ट्रम (वर्णक्रम) कहा जाता है। इसमें श्वेत प्रकाश के अवयव रंगों में विभाजित होते हैं, जिसे विक्षेपण कहा जाता है।
प्रश्न :- इंद्रधनुष कैसे उत्पन्न होता है और जल की बूँदों के प्रकाश के साथ क्या क्रियाएँ होती हैं, जो इसके विभिन्न रंगों को उत्पन्न करती हैं?
उत्तर :- इंद्रधनुष की निर्माण प्रक्रिया :- इंद्रधनुष एक प्राकृतिक दृश्य (स्पेक्ट्रम) है, जो वर्षा के बाद आकाश में जल की छोटी-छोटी बूँदों में दिखाई देता है। यह वायुमंडल में मौजूद जल के कणों द्वारा सूर्य के प्रकाश के परिक्षेपन के कारण उत्पन्न होता है। इंद्रधनुष हमेशा सूर्य की विपरीत दिशा में दिखाई देता है।
जल की बूँदों के प्रकाश के साथ क्या क्रियाएँ :- जल की सूक्ष्म कणें प्रिज्म के समान कार्य करती हैं। सूर्य का प्रकाश इन कणों पर गिरता है, जहाँ यह अपवर्तित और विक्षेपित होता है, फिर आंतरिक परावर्तन के बाद यह प्रकाश जल की बूँद से बाहर निकलते वक्त पुनः अपवर्तित होता है। इसके कारण विभिन्न रंग प्रेक्षक की आँखों तक पहुँचते हैं।
नोट :-
जब प्रकाश किसी प्रिज्म से होकर गुजरता है, तो विभिन्न रंग अलग-अलग कोणों पर झुकते हैं।
लाल रंग सबसे कम झुकता है, जबकि बैंगनी रंग सबसे ज्यादा झुकता है।
प्रश्न :- आइजक न्यूटन ने श्वेत प्रकाश के स्पेक्ट्रम को कैसे पाया और उन्होंने इस प्रक्रिया से क्या निष्कर्ष निकाला?
उत्तर :- आइजक न्यूटन ने सबसे पहले सूर्य के स्पेक्ट्रम को प्राप्त करने के लिए काँच के प्रिज्म का प्रयोग किया। एक और समान प्रिज्म का प्रयोग करके उन्होंने श्वेत प्रकाश के विभाजन को और अधिक विस्तार से देखने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें नए रंग नहीं मिले।
इसके बाद उन्होंने दूसरे समान प्रिज्म को पहले वाले प्रिज्म के विपरीत दिशा में रखा। इस प्रयोग में उन्होंने देखा कि दूसरे प्रिज्म से श्वेत प्रकाश का एक किरण पुंज बाहर निकल रहा है। जिससे न्यूटन ने यह निष्कर्ष निकाला कि सूर्य का प्रकाश सात अलग-अलग रंगों से मिलकर बना होता है।
प्रश्न :- वायुमंडलीय अपवर्तन क्या है और इसके प्रभाव के उदाहरण क्या हैं?
उत्तर :- वायुमंडलीय अपवर्तन :- जब वायुमंडल में अस्थिरता के कारण प्रकाश किरणें अपनी दिशा बदलती हैं। तब इसे वायुमंडलीय अपवर्तन कहा जाता है।
वायुमंडलीय अपवर्तन के प्रभाव निम्नलिखित है :-
1. तारों का टिमटिमाना
2. सूर्योदय का पहले होना (अग्रिम सूर्योदय) और सूर्यास्त का विलंब से होना (विलम्बित सूर्यास्त)
3. तारों का वास्तविक स्थान से थोड़ी ऊँचाई पर दिखाई देना
4. गरम हवा के बीच से देखने पर वस्तु की आभासी स्थिति का बदलना
प्रश्न :- वायुमंडलीय अपवर्तन के प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :- वायुमंडलीय अपवर्तन के प्रभावों की व्याख्या निम्नलिखित है :-
1. तारों का टिमटिमाना :- जब हम आकाश में स्थित तारों को देखते हैं, तो वे हमें प्रकाश के छोटे-छोटे स्रोतों की तरह दिखाई देते हैं। क्योंकि इन तारों से आने वाली प्रकाश किरणों का मार्ग लगातार बदलता रहता है, इसलिए तारे की आभासी स्थिति में भी उतार-चढ़ाव होता है। इस कारण, आँखों में पहुँचने वाला तारे का प्रकाश भी निरंतर बदलता रहता है। कभी तारा अधिक चमकता है, तो कभी कम, जिससे हमें टिमटिमाहट का अनुभव होता है।
2. सूर्योदय का पहले होना (अग्रिम सूर्योदय) और सूर्यास्त का विलंब से होना (विलम्बित सूर्यास्त) :- अग्रिम सूर्योदय और विलम्बित सूर्यास्त: वायुमंडलीय अपवर्तन के प्रभाव के कारण सूर्य हमें असल सूर्योदय से लगभग 2 मिनट पहले और असल सूर्यास्त के लगभग 2 मिनट बाद तक दिखाई देता है। इसका कारण यह है कि प्रकाश किरणें वायुमंडल में मुड़ जाती हैं, जिससे सूर्य की स्थिति में कुछ बदलाव हो जाता है।
3. तारों का वास्तविक स्थान से थोड़ी ऊँचाई पर दिखाई देना :- जब तारे का प्रकाश पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है और पृथ्वी की सतह तक पहुँचता है, तो उसका प्रकाश निरंतर अपवर्तित होता रहता है। यह अपवर्तन वायुमंडल के अंदर क्रमिक रूप से होता है, जहाँ अपवर्तनांक बदलता रहता है। वायुमंडल तारे के प्रकाश को अभिलंब की ओर मोड़ता है, जिससे जब हम क्षितिज के पास तारे को देखते हैं, तो वह अपनी वास्तविक स्थिति से कुछ ऊँचाई पर दिखाई देता है।
4. गरम हवा के बीच से देखने पर वस्तु की आभासी स्थिति का बदलना :- आग के पास की वायु सामान्यत: उपर की वायु से ज्यादा गरम होती है। गरम वायु ठंडी वायु की तुलना में कम सघन होती है और इसका अपवर्तनांक भी ठंडी वायु से कम होता है। वायु के विभिन्न तापमानों के कारण अपवर्तक माध्यम की भौतिक स्थिति में असमानताएँ होती हैं। इस कारण, गरम वायु के माध्यम से वस्तु को देखने पर उसकी आभासी स्थिति में लगातार परिवर्तन होता रहता है।
प्रश्न :- प्रकाश का प्रकीर्णन-टिंडल प्रभाव क्या है और यह कैसे उत्पन्न होता है?
उत्तर :- प्रकाश का प्रकीर्णन-टिंडल प्रभाव :- जब प्रकाश की किरणें वायुमंडल में उपस्थित सूक्ष्म कणों जैसे धुआँ, जल की बूँदें, धूल के कण या वायु के अणुओं से टकराती हैं, तो उस प्रकाश किरण का मार्ग स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है। यह घटना प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण होती है, जिसे टिंडल प्रभाव कहा जाता है, जो कोलॉइड कणों द्वारा उत्पन्न होती है।
उदाहरण :-
1. जब किसी धुएं से भरे कमरे में एक छोटा सा प्रकाश पुंज एक सूक्ष्म छेद से प्रवेश करता है, तो हमे टिंडल प्रभाव दिख सकता हैं।
2. जब सूर्य का प्रकाश घने जंगल की छाँव(वितान) से गुजरता है, तो भी हमें टिंडल प्रभाव दिख सकता है।
प्रश्न :- प्रकीर्णित प्रकाश का वर्णन कणों के आकार पर किस प्रकार निर्भर करता है?
उत्तर :- प्रकीर्णित प्रकाश का वर्णन कणों के आकार पर इस प्रकार निर्भर करता है :-
1. अत्यधिक सूक्ष्म कण नीले प्रकाश को प्रकीर्णित करते हैं।
2. बड़े साइज के कण अधिक तरंगदैर्ध्य (जैसे लाल) के प्रकाश को प्रकीर्णित करते हैं।
3. यदि प्रकीर्णन करने वाले कणों का आकार बहुत बड़ा होता है, तो प्रकीर्णित प्रकाश श्वेत दिखाई दे सकता है।
प्रश्न :- ग्रह क्यों नहीं टिमटिमाते हैं?
उत्तर :- ग्रह पृथ्वी से काफी निकट होते हैं, इसलिए इन्हे प्रकाश का एक बड़ा स्रोत मानते है। अगर ग्रह के प्रकाश को हम बिंदु स्रोतों के समूह के रूप में मानें, तो प्रत्येक स्रोत से हमारी आँखों में पहुँचने वाले प्रकाश की मात्रा में होने वाले परिवर्तन का औसत मान शून्य होता है, इस कारण ग्रह टिमटिमाते हुए दिखाई नहीं देते हैं।
प्रश्न :- खतरे के संकेत का रंग लाल क्यों होता है?
उत्तर :- खतरे के संकेत का रंग लाल होता है, क्योंकि लाल रंग वातावरण में धुंआ या कुहासा से कम प्रकीर्णित अथवा प्रभावित होता है, जिससे यह रंग दूर से भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
प्रश्न :- स्वच्छ आकाश का रंग नीला क्यों दिखाई देता है?
उत्तर :- स्वच्छ आकाश का रंग नीला दिखाई देता है, इसका कारण निम्नलिखित है :-
वायुमंडल में वायु के अणु और छोटे कणों का आकार दृश्य प्रकाश की तरंगदैर्ध्य से छोटा होता है। ये कण छोटे तरंगदैर्ध्य वाले प्रकाश को अधिक प्रभावी रूप से प्रकीर्णित करते हैं। लाल रंग के प्रकाश की तरंगदैर्ध्य नीले रंग की तुलना में लगभग 1.8 गुना बड़ी होती है। जब सूर्य का प्रकाश वायुमंडल से होकर गुजरता है, तो वायु के सूक्ष्म कण नीले रंग को लाल रंग के मुकाबले अधिक प्रभावी ढंग से प्रकीर्णित करते हैं। इस प्रकीर्णित नीले प्रकाश को हमारे नेत्रों द्वारा देखा जाता है। इस कारण ही स्वच्छ आकाश का रंग नीला दिखाई देता है।
प्रश्न :- ऊँचाई पर उड़ते हुए यात्रियों को आकाश काला क्यों प्रतीत होता है?
उत्तर :- ऊँचाई पर वायुमंडलीय प्रकीर्णन कम अथवा सुस्पष्ट नहीं होता है, जिसके कारण आकाश काले रंग का दिखाई देता है।
प्रश्न :- बादल सफेद रंग के क्यों दिखाई देते हैं?
उत्तर :- बादल छोटे-छोटे पानी की बूंदों से बने हुए होते हैं, जिनका आकार दृश्य प्रकाश की तरंगदैर्ध्य से बड़ा होता है। जब श्वेत प्रकाश इन बूंदों से टकराता है, तो यह सभी दिशा में फैल जाता है या प्रकीर्णित हो जाता है। श्वेत प्रकाश के सभी रंग एक जैसे परावर्तित होते हैं, जिससे हमें बादल सफेद रंग के दिखाई देते हैं।