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Class 9 SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER 12

Chapter 12: Improvement in Food Resources
Chapter Introduction: 
This chapter focuses on agriculture, crop production, animal husbandry, and food resource management. It helps students understand applied science in daily life.

FAQ
Ques. Is this chapter important for short-answer questions?
Ans. Yes, many short-answer questions are asked from this chapter.

CLASS 9 SCIENCE NOTES IN HINDI
CHAPTER 12 : खाद्य संसाधनों में सुधार

प्रश्न :- फसलों के प्रकार और उनसे प्राप्त पोषक तत्व बताइए।

उत्तर :- 1. अनाज (Cereals) :- मुख्य पोषक तत्व: कार्बोहाइड्रेट

उदाहरण :-  गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा

2. बीज (Seeds) :- मुख्य पोषक तत्व: वसा

उदाहरण :- सरसों, सोयाबीन, तिल, मूँगफली

नोट :- सभी बीज खाने योग्य नहीं होते, जैसे — सेब का बीज, चेरी का बीज।

3. दालें (Pulses) :- मुख्य पोषक तत्व: प्रोटीन

उदाहरण :- चना, मटर, मसूर

4. सब्जियाँ, फल और मसाले :- मुख्य पोषक तत्व: विटामिन और खनिज लवण

उदाहरण :- 1. सब्जियाँ: पालक, मूली, पत्तीदार सब्जियाँ

2. फल: सेब, आम, चेरी, केला, तरबूज
3. मसाले: मिर्च, काली मिर्च

5. चारा फसलें (Fodder Crops) :- उपयोग :-  पशुधन के चारे के रूप में

उदाहरण :- जई, सूडान घास

प्रश्न :- फसल चक्र क्या है?

उत्तर :- फसल चक्र (Crop Season) :- अलग-अलग फसलों को बढ़ने और अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए अलग तापमान, नमी और सूरज की रोशनी (दीप्तिकाल) की आवश्यकता होती है। इसे ही हम फसल चक्र के रूप मेें जानते हैं। इसे ही हम फसल चक्र के रूप मेें जानते हैं।

प्रश्न :- फसलों के मौसम के प्रकार खरीफ और रबी फसलों में अंतर बताइए।

उत्तर :- खरीफ और रबी फसलों में निम्नलिखित अंतर होता है :-

फसल का प्रकार

मौसम

अवधि

विशेषताएँ

उदाहरण

खरीफ फसल

बरसात का मौसम

जून से अक्टूबर

अधिक वर्षा और गर्म मौसम में उगती हैं

काला चना, हरा चना, चावल, सोयाबीन, धान

रबी फसल

सर्दी का मौसम

नवंबर से अप्रैल

ठंडे मौसम और कम पानी में उगती हैं

गेहूँ, चना, मटर, सरसों, अलसी

प्रश्न :- फसल उत्पादन में सुधार की प्रक्रिया के प्रमुख वर्ग कौन-कौन से हैं?

उत्तर :- फसल उत्पादन में सुधार की प्रक्रिया में निम्नलिखित तीन प्रमुख वर्ग शामिल हैं :- 

 

1. फसल की किस्मों में सुधार :- (i) नई और उच्च गुणवत्ता वाली किस्मों का विकास करना।
(ii) अधिक उत्पादन देने वाली, रोग प्रतिरोधी और बेहतर पोषण वाली किस्मों का चयन करना।

2. फसल उत्पादन प्रबंधन :- (i) खेत की तैयारी, बीज बुआई, सिंचाई, खाद और उर्वरक का सही उपयोग।

(ii) फसल के लिए उचित समय और विधियों का पालन।

3. फसल सुरक्षा प्रबंधन :- (i) फसलों को कीट, रोग और खरपतवार से बचाना।

(ii) रासायनिक, जैविक या यांत्रिक उपायों से सुरक्षा प्रदान करना।
उदाहरण :-

गेहूँ की अधिक पैदावार के लिए उन्नत किस्म का चयन (किस्म सुधार), समय पर सिंचाई और खाद डालना (उत्पादन प्रबंधन), तथा कीटनाशक का प्रयोग करके फसल को कीटों से बचाना (सुरक्षा प्रबंधन)।

 

प्रश्न :- संकरण किसे कहते हैं?

उत्तर :- संकरण :- वह प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न अनुवांशिक गुणों वाले पौधों के बीच प्रजनन कराकर उन्नत गुणों वाले पौधे तैयार किए जाते हैं। इसका उद्देश्य बेहतर उत्पादन, रोग प्रतिरोधक क्षमता, और गुणवत्तापूर्ण फसल प्राप्त करना होता है।

उदाहरण :-

उच्च उत्पादन देने वाले धान के पौधे और रोग-प्रतिरोधी धान के पौधे का संकरण करके नई किस्म तैयार करना।

प्रश्न :- फसल की किस्मों में सुधार के प्रमुख कारक कौन-कौन से हैं?

उत्तर :- फसल की किस्मों में सुधार के निम्नलिखित प्रमुख कारक हैं :-

 

क्रमांक

कारक

विवरण

1.

अच्छे और स्वस्थ बीज

उच्च गुणवत्ता और रोग-मुक्त बीज का प्रयोग फसल की गुणवत्ता व उत्पादन बढ़ाता है।

2.

संकरण

विभिन्न गुणों वाले पौधों को क्रॉस करके उन्नत पौधों का निर्माण।

3.

उच्च उत्पादन

प्रति एकड़ अधिक उत्पादकता देने वाली किस्मों का चयन।

4.

उन्नत किस्में

दाल में प्रोटीन की गुणवत्ता, तिलहन में तेल की गुणवत्ता, फल व सब्जियों में संरक्षण क्षमता बढ़ाना।

5.

जैविक व अजैविक प्रतिरोधकता

रोग, कीट, निमेटोड, सूखा, क्षारता, जलभराव, गर्मी, ठंड व पाला सहन करने की क्षमता।

6.

व्यापक अनुकूलता

ऐसी किस्में जो विभिन्न जलवायु और क्षेत्रों में समान रूप से अच्छी फसल दें।

7.

ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण

जैसे चारे वाली फसलों में लंबी व सघन शाखाएँ, जिससे अधिक उत्पादन हो सके।

प्रश्न :- किसानों द्वारा फसल उत्पादन में सुधार कैसे किया जाता है?

उत्तर :- किसानों द्वारा फसल के उत्पादन को बढ़ाने के लिए विभिन्न तकनीकों का प्रयोग किया जाता है, मुख्य तकनीकें निम्नलिखित हैं :- 

1. पोषक प्रबन्धन :- (i) मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति करना।

(ii) जैविक खाद, रासायनिक उर्वरक और हरी खाद का सही प्रयोग।

2. सिंचाई :- (i) उचित समय पर और पर्याप्त मात्रा में पानी देना।

(ii) आधुनिक सिंचाई विधियाँ जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर का उपयोग।

3. फसल को उगाने के तरीके या फसल पैटर्न :- (i) फसल चक्र, मिश्रित खेती और अंतःफसल जैसी तकनीकों का प्रयोग।

(ii) भूमि के अनुसार उपयुक्त फसल का चयन।
उदाहरण :-

यदि किसान गेहूँ की फसल में सही समय पर सिंचाई करे, संतुलित मात्रा में यूरिया और डीएपी दे और फसल चक्र अपनाए, तो उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।

प्रश्न :- पोषक प्रबन्धन क्या है और पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्व कौन-कौन से हैं?

उत्तर :- पोषक प्रबन्धन :- पोषक प्रबन्धन का अर्थ है पौधों की वृद्धि और उत्पादन के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की सही मात्रा में एवं उचित समय पर पूर्ति करना।

पौधों को पोषण निम्नलिखित तीन मुख्य स्रोतों से मिलता है :- हवा, पानी और मिट्टी।

1. हवा से प्राप्त तत्व :- कार्बन (C) – प्रकाश संश्लेषण के लिए।
2. पानी से प्राप्त तत्व :- हाइड्रोजन (H) और ऑक्सीजन (O) – कोशिकाओं की संरचना व चयापचय में सहायक।
3. मिट्टी से प्राप्त 13 पोषक तत्व :- (i) वृहत (Macronutrients) – अधिक मात्रा में आवश्यक :- नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटैशियम (K), कैल्शियम (Ca), मैग्नीशियम (Mg), सल्फर (S)

(ii) सूक्ष्म (Micronutrients) – कम मात्रा में आवश्यक :- लौह (Fe), मैंगनीज (Mn), बोरॉन (B), जिंक (Zn), कॉपर (Cu), मोलिब्डेनम (Mo), क्लोरीन (Cl)
उदाहरण :-

यदि गेहूँ की फसल में नाइट्रोजन की कमी हो जाए तो पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं। इसलिए किसान यूरिया या गोबर की खाद डालकर इसकी पूर्ति करता है।

प्रश्न :- खाद तथा उर्वरक क्या हैं और इनका उपयोग क्यों किया जाता है?

उत्तर :- खाद तथा उर्वरक :- ऐसे पदार्थ हैं जिन्हें मिट्टी में मिलाकर उसकी उर्वरता (Fertility) बढ़ाई जाती है, ताकि पौधों को पर्याप्त पोषक तत्व मिल सकें और फसल की उपज बढ़े।

1. खाद (Manure) :- (i) जैविक पदार्थों से बनी होती है (जैसे पशुओं का गोबर, सूखे पत्ते, हरी खाद)।

(ii) यह मिट्टी की संरचना और पानी धारण करने की क्षमता में सुधार करती है।

(iii) पोषक तत्व कम मात्रा में लेकिन लंबे समय तक उपलब्ध कराती है।

2. उर्वरक (Fertilizer) :- (i) रासायनिक रूप से तैयार किए गए पोषक पदार्थ।

(ii) इनमें एक या एक से अधिक आवश्यक पोषक तत्व (N, P, K) अधिक मात्रा में होते हैं।

(iii) ये पौधों को तुरंत पोषण प्रदान करते हैं।

3. उपयोग का उद्देश्य :- (i) मिट्टी की पोषक क्षमता बढ़ाना।

(ii) पौधों की तेज़ और स्वस्थ वृद्धि सुनिश्चित करना।

(iii) फसल की उपज और गुणवत्ता में सुधार करना।
उदाहरण :-

धान की फसल में यूरिया (नाइट्रोजन युक्त उर्वरक) डालने से पत्तियाँ हरी और चौड़ी होती हैं, जिससे अधिक दाने निकलते हैं।

प्रश्न :- अनुप्रस्थ तरंगें कैसे उत्पन्न होती हैं? इसे उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर :- अनुप्रस्थ तरंगें :- जब किसी माध्यम में तरंग की दिशा के लंबवत (सीधे ऊपर-नीचे) कणों का कंपन होता है, तो अनुप्रस्थ तरंगें (Transverse Waves) उत्पन्न होती हैं।

अनुप्रस्थ तरंगों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-

1. अनुप्रस्थ तरंगों में माध्यम के कण तरंग की दिशा के लंबवत कंपन करते हैं।

2. यह तरंगों की दिशा के ऊपर और नीचे की ओर दोलन करती है।

3. इसमें श्रृंग (crest) और गल (trough) बनते हैं।
उदाहरण :-

यदि स्लिंकी (spring) का एक सिरा किसी दीवार से बाँधकर दूसरे सिरे को ऊपर-नीचे हिलाया जाए, तो उत्पन्न तरंग अनुप्रस्थ तरंग होती है, क्योंकि कंपन तरंग की दिशा के लंबवत होता है।

प्रश्न :- खाद क्या है और यह कैसे बनती है?

उत्तर :- खाद :- एक कार्बनिक पदार्थ है जो मिट्टी को पोषक तत्व प्रदान करता है और उसकी उर्वरता बढ़ाता है।

स्रोत :- 1.  यह प्राणियों के उत्सर्जित पदार्थ (जैसे गोबर, मूत्र) से बनती है।

2. पौधों के अपशिष्ट (सूखे पत्ते, टहनियाँ, फसल के अवशेष) के अपघटन द्वारा तैयार होती है।

विशेषताएँ :- 1. इसमें पोषक तत्वों की मात्रा कम होती है लेकिन लंबे समय तक प्रभावी रहती है।

2. मिट्टी की संरचना, जल धारण क्षमता और सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाती है।

3. पर्यावरण के लिए सुरक्षित और प्रदूषण रहित होती है।

लाभ :- 1. मिट्टी को भुरभुरा और उपजाऊ बनाती है।

2. पौधों की जड़ों को पर्याप्त पोषण देती है।

उदाहरण :-

गोबर की खाद, हरी खाद (जैसे सन, ढैंचा), कम्पोस्ट खाद।

प्रश्न :- खाद के विभिन्न प्रकार कौन-कौन से होते हैं?

उत्तर :- खाद को उनकी निर्माण और स्रोत के आधार पर निम्नलिखित प्रकारों में बाँटा जाता है :- 

1. कम्पोस्ट खाद निर्माण :- पौधों के अवशेष, कूड़ा-करकट, पशुओं का गोबर, मनुष्य का मल-मूत्र आदि कार्बनिक पदार्थों को जीवाणु और कवकों की क्रिया से सड़ाकर तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया को कम्पोस्टिंग कहते है।

2. वर्मी कम्पोस्ट खाद निर्माण :- कम्पोस्ट बनाने में केंचुओं का उपयोग किया जाता है। केंचुए को “किसानों का मित्र” और “भूमि की आंत” कहा जाता है क्योंकि यह मिट्टी को भुरभुरा और उपजाऊ बनाता है।

3. हरी खाद निर्माण :- फसल बोने से पहले खेत में कुछ विशेष पौधे (जैसे पटसन, मूँग, ग्वार) उगाकर फिर हल चलाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। ये पौधे सड़कर हरी खाद बन जाते हैं और मिट्टी को नाइट्रोजन व फॉस्फोरस से भरपूर कर देते हैं।
उदाहरण :-

1. कम्पोस्ट खाद: पत्तों, गोबर और रसोई के जैविक कचरे से बनी खाद।

2. वर्मी कम्पोस्ट: केंचुओं से बनी खाद।

3. हरी खाद: मूँग के पौधों को खेत में जोतकर तैयार की गई खाद।

प्रश्न :- उर्वरक क्या होते हैं?

उत्तर :- उर्वरक :-  उर्वरक कारखानों में रासायनिक पदार्थों के प्रयोग से तैयार किए जाते हैं। इनमें पौधों के लिए आवश्यक नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम की अधिक मात्रा होती है। ये पानी में आसानी से घुल जाते हैं। पौधे इन्हें जल्दी और आसानी से अवशोषित कर लेते हैं।

उदाहरण :-

1. नाइट्रोजन युक्त उर्वरक: यूरिया, अमोनियम सल्फेट।

2. फॉस्फोरस युक्त उर्वरक: सुपर फॉस्फेट।

3. पोटैशियम युक्त उर्वरक: म्यूरेट ऑफ पोटाश।

प्रश्न :- खाद और उर्वरक में क्या अंतर है?

उत्तर :- खाद और उर्वरक में अंतर निम्नलिखित है :- 

क्रमांक

खाद

उर्वरक

1.

मुख्य रूप से कार्बनिक पदार्थ होते हैं।

मुख्य रूप से अकार्बनिक पदार्थ होते हैं।

2.

प्राकृतिक पदार्थों से बनते हैं।

रासायनिक पदार्थों से बनते हैं।

3.

पोषक तत्व कम मात्रा में होते हैं।

पोषक तत्व अधिक मात्रा में होते हैं।

4.

सस्ते और घर/खेत में बनाए जा सकते हैं।

महंगे और फैक्ट्रियों में बनाए जाते हैं।

5.

धीरे-धीरे पौधों द्वारा अवशोषित होते हैं (पानी में अघुलनशील)।

जल्दी पौधों को उपलब्ध होते हैं (पानी में घुलनशील)।

6.

भंडारण व स्थानांतरण आसान होता है।

भंडारण व स्थानांतरण थोड़ा कठिन होता है।

7. 

उदाहरण :- खाद: गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद।

उदाहरण :- उर्वरक: यूरिया, अमोनियम सल्फेट, सुपर फॉस्फेट।

प्रश्न :- सिंचाई किसे कहते हैं?

उत्तर :- सिंचाई :- फसलों को उनकी वृद्धि और विकास के लिए आवश्यक मात्रा में पानी पहुँचाने की प्रक्रिया को सिंचाई कहते हैं। यह कार्य वर्षा के अभाव में या कम वर्षा होने पर किया जाता है। सिंचाई से मिट्टी में नमी बनी रहती है और फसल का उत्पादन बढ़ता है।

उदाहरण :-

कुओं, नलकूपों, नहरों, स्प्रिंकलर या ड्रिप प्रणाली द्वारा फसलों को पानी देना।

प्रश्न :- सिंचाई के प्रमुख तरीके कौन-कौन से हैं?

उत्तर :- सिंचाई के मुख्य तरीके निम्नलिखित हैं :- 

1. कुएँ :- (i) खुदे हुए कुएँ: पानी बैलों या पम्प की सहायता से निकाला जाता है।

(ii) नलकूप: गहराई में स्थित जल को मोटर पम्प द्वारा ऊपर लाकर खेतों की सिंचाई की जाती है।

2. नहरें :- (i) पानी जलाशयों या नदियों से लाया जाता है।

(ii) मुख्य नहर से निकलकर छोटी-छोटी शाखाएँ खेतों तक पानी पहुँचाती हैं।

3. नदी उन्नयन प्रणाली :- (i) पम्प द्वारा पानी सीधे नदी से खेतों में पहुँचाया जाता है।

(ii) यह प्रणाली नदियों के पास के क्षेत्रों में अधिक उपयोगी है।

4. तालाब :- छोटे-छोटे जलाशय जिनमें आपातकालीन उपयोग के लिए पानी संग्रहित किया जाता है।

5. पानी का संरक्षण :- (i) वर्षा जल को टैंकों में संग्रहित किया जाता है।

(ii) इससे मृदा अपरदन भी कम होता है।

उदाहरण :-

पंजाब और हरियाणा में नलकूप द्वारा सिंचाई, राजस्थान में नहर द्वारा सिंचाई, उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में वर्षा जल संरक्षण।

प्रश्न :- वर्षा जल संग्रहण किसे कहते हैं?

उत्तर :- वर्षा जल संग्रहण :- वह प्रक्रिया है जिसमें वर्षा के समय गिरने वाले पानी को एकत्र किया जाता है। 

उसे टैंकों, तालाबों या अन्य जलाशयों में संग्रहित किया जाता है। पानी को भूमि में रिसने दिया जाता है ताकि भूमिगत जलस्तर बढ़ सके।
उदाहरण :-

छत से बहने वाले वर्षा जल को पाइप द्वारा भूमिगत टैंक में जमा करना।

प्रश्न :- फसल पैटर्न क्या है? इसके प्रकार कौन-कौन से हैं?

उत्तर :- पैटर्न :- वह प्रक्रिया है जिसमें फसल की अधिक उपज और कम नुकसान के लिए अलग-अलग खेती के तरीके अपनाए जाते हैं। यह मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और कीट-रोग से बचाव में मदद करता है।

इसके निम्नलिखित प्रकार हैं :- 

1. मिश्रित खेती (Mixed Farming) 

2. अंतराफसलीकरण (Intercropping) 

3. फसल चक्र (Crop Rotation)

प्रश्न :- मिश्रित खेती क्या है? इसके लाभ और उदाहरण बताइए।

उत्तर :- मिश्रित खेती :- जब दो या दो से अधिक फसलें एक ही भूमि में एक साथ उगाई जाती हैं, तो इसे मिश्रित खेती कहते हैं।

मिश्रित खेती के लाभ निम्नलिखित हैं :-

1. हानि होने की संभावना कम हो जाती है, क्योंकि यदि एक फसल नष्ट हो जाए तो दूसरी से उत्पादन प्राप्त हो सकता है।

2. मिट्टी के पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग होता है।

3. कीट और रोगों का प्रकोप कम होता है।

उदाहरण :-

गेहूँ + चना, गेहूँ + सरसों, मूँगफली + सूरजमुखी

नोट :-

अगर गेहूँ और चना साथ उगाए जाएं और अचानक मौसम खराब हो जाए जिससे गेहूँ खराब हो जाए, तो भी चने से कुछ उपज मिल जाएगी।

प्रश्न :- अंतराफसलीकरण क्या है? इसके उदाहरण बताइए।

उत्तर :- अंतराफसलीकरण :- अंतराफसलीकरण में दो या दो से अधिक फसलों को एक ही खेत में निर्धारित पैटर्न में उगाया जाता है। इसमें कुछ पंक्तियों में एक प्रकार की फसल और उनके बीच (एकांतर) की पंक्तियों में दूसरी फसल उगाई जाती है।

अंतराफसलीकरण के लाभ निम्नलिखित हैं :-

1. भूमि का अधिकतम उपयोग होता है।

2. अलग-अलग फसलों से कुल उत्पादन बढ़ता है।

3. कीट और रोग फैलने की संभावना कम होती है।

उदाहरण:-

सोयाबीन + मक्का, बाजरा + लोबिया

नोट :-

अगर खेत में 3 पंक्तियों में सोयाबीन बोई जाए और बीच-बीच में मक्का, तो दोनों फसलें एक-दूसरे की वृद्धि में मदद करेंगी और किसान को दो तरह का उत्पादन मिलेगा।

प्रश्न :- फसल चक्र क्या है? इसकी विशेषताएँ बताइए।

उत्तर :- फसल चक्र :- किसी खेत में पूर्व नियोजित क्रम के अनुसार अलग-अलग मौसमों में अलग-अलग फसलें उगाने की प्रक्रिया को फसल चक्र कहते हैं। इसका उद्देश्य मिट्टी के पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखना और उत्पादन बढ़ाना है। अगर बार-बार एक ही फसल बोई जाती है, तो वही पोषक तत्व बार-बार मृदा से निकल जाते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता घट जाती है, इसलिए फसल बदल-बदल कर उगाना ज़रूरी है।

फसल चक्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरता बनी रहती है।

2. कीट एवं खरपतवार का नियंत्रण होता है।

3. उपज में सुधार होता है।

4. अलग-अलग प्रकार की फसलें आसानी से उगाई जा सकती हैं।
उदाहरण :-

खरीफ में धान, रबी में गेहूँ, और फिर ग्रीष्म में दलहन उगाना — यह एक अच्छा फसल चक्र है।

प्रश्न :- फसल सुरक्षा प्रबंधन क्या है? इसके तरीके बताइए।

उत्तर :- फसल सुरक्षा प्रबंधन :- फसल को रोगकारक जीवों, कीटों, तथा हानिकारक कारकों से बचाने की प्रक्रिया को फसल सुरक्षा प्रबंधन कहते हैं। इसका उद्देश्य फसल की उपज और गुणवत्ता बनाए रखना है।

फसल सुरक्षा प्रबंधन के मुख्य तरीके निम्नलिखित हैं :-

1. रोग और कीट नियंत्रण :- कीटनाशक, फफूंदनाशी, जीवाणुनाशी दवाओं का छिड़काव।

2. सही भंडारण :- (i) अनाज को सूखाकर संग्रह करना।

(ii) नमी-रोधी बर्तनों या गोदामों में रखना।

(iii) भंडारण स्थलों पर धूप, धुआँ या रसायनों का प्रयोग।
3. प्रतिरोधी किस्मों का चयन :- ऐसे बीजों का प्रयोग जो रोगों और कीटों के प्रति अधिक सहनशील हों।
उदाहरण :-  

1. कपास की फसल में गुलाबी सुंडी से बचाव के लिए कीटनाशक का प्रयोग।

2. भंडारण के समय नीम की पत्तियों का उपयोग करके दाल को कीटों से बचाना।

नोट :-

फसल सुरक्षा प्रबंधन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं :-

1. फसल की वृद्धि के समय कीट एवं रोगों से सुरक्षा।

2. कटाई के बाद भंडारण के समय अनाज को सुरक्षित रखना।

प्रश्न :- पीड़कनाशी क्या हैं? पीड़क के प्रकार उदाहरण सहित बताइए।

उत्तर :- पीड़कनाशी :- ऐसे जीव जो फसल को नुकसान पहुँचाकर उसे मानव उपयोग के योग्य नहीं छोड़ते, उन्हें पीड़क कहते हैं। इनसे बचाव के लिए उपयोग किए जाने वाले रसायन या जैविक पदार्थ पीड़कनाशी कहलाते हैं।

पीड़क के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं :- 

1. खरपतवार :- ये फसल के साथ उगने वाले अवांछनीय पौधे होते हैं।

खरपतवार से होने वाली हानियाँ :- फसल के पोषक तत्व, पानी और प्रकाश को छीन लेते हैं।

उदाहरण :- जेन्थियम, पारथेनियम।

2. कीट :- ऐसे छोटे-छोटे जीव जो फसल को काटकर या रस चूसकर नष्ट करते हैं।

खरपतवार से होने वाली हानियाँ :- जड़, तना, पत्तियों को नुकसान; पौधों का रस चूसना।

उदाहरण :- टिड्डी, कपास की गुलाबी सुंडी।

3. रोगाणु :- ऐसे सूक्ष्मजीव जो पौधों में बीमारियाँ उत्पन्न करते हैं। जैसे बैक्टीरिया, फंगस, वायरस। इनका प्रसार पानी, हवा, मिट्टी द्वारा होता है।

उदाहरण :- 1. बैक्टीरिया: सिट्रस कैंकर, 2. फंगस: गेंहूँ का करनाल बंट, 3. वायरस: मोज़ेक रोग

नोट :- 

1. खरपतवार नियंत्रण: 2,4-D नामक शाकनाशी का प्रयोग।

2. कीट नियंत्रण: कीटनाशक (जैसे एंडोसल्फान) का छिड़काव।

3. रोग नियंत्रण: फफूंदनाशी दवा का छिड़काव।

प्रश्न :- अनाज का भण्डारण क्या है? इसे प्रभावित करने वाले कारकों को उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर :- अनाज का भण्डारण :- वह प्रक्रिया है जिसमें अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाता है, ताकि पूरे साल मौसम के अनुसार भोजन उपलब्ध हो सके।भण्डारण के दौरान अनाज कई कारणों से खराब हो सकता है। ये कारण मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं :- 

1. जैविक कारक :- जीवित प्राणियों के कारण, जैसे :- बैक्टीरिया, फंगस (कवक), कीट, चिड़िया, चिचड़ी

2. अजैविक कारक :- निर्जीव कारण, जैसे :- अधिक नमी, तापमान में अनियमितता
इन कारकों से अनाज की गुणवत्ता घट जाती है, भार कम हो जाता है, रंग बदल जाता है और अंकुरण की क्षमता कम हो जाती है।

उदाहरण :-

गोदाम में रखे गेहूँ का अत्यधिक नमी के कारण फंगस लग जाना, जिससे उसका रंग और स्वाद बदल जाता है।

प्रश्न :- कार्बनिक खेती क्या है? इसमें अनाज को सुरक्षित रखने के उपायों को उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर :- कार्बनिक खेती :- एक ऐसी कृषि पद्धति है जिसमें कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग बहुत कम या बिलकुल नहीं किया जाता। इससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति लंबे समय तक बनी रहती है और अनाज, फल व सब्जियों में हानिकारक रसायन नहीं मिलते।

अनाज को सुरक्षित रखने के मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं :-

1. सुखाना :- अनाज को सूरज की रोशनी में अच्छी तरह सुखाना चाहिए, ताकि उसमें नमी न रहे।

2. सफाई का ध्यान :- (i) अनाज में कीड़े न हों। (ii) गोदाम की अच्छी तरह सफाई हो। (iii) छत, दीवार और फर्श में दरारें हों तो उनकी मरम्मत की जाए।

3. धूमक (फ्यूमिगेशन) :-  भंडारण गृह में आवश्यकता अनुसार कवकनाशी व कीटनाशी का प्रयोग किया जाए।

4. भंडारण उपकरण :- (i) पूसाधानी, पूसा कोठार, पंत कुठला जैसे सुरक्षित उपकरणों का प्रयोग।

(ii) साफ और सूखे दाने को प्लास्टिक बैग में रखना, ताकि वायु, नमी व तापमान का असर न हो।
उदाहरण :-

पूसाधानी में रखे सुखाए हुए गेहूँ को कई महीनों तक बिना कीड़े और फफूंदी के सुरक्षित रखा जा सकता है।

प्रश्न :- पशुपालन क्या है? इसके मुख्य उद्देश्य उदाहरण सहित बताइए।

उत्तर :- पशुपालन का अर्थ है घरेलू पशुओं को वैज्ञानिक तरीके से पालना, जिसमें उनके भोजन, आवास, नस्ल सुधार और रोग नियंत्रण का ध्यान रखा जाता है।

पशुपालन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं :-

1. दूध प्राप्त करना :- गाय, भैंस, बकरी आदि से दूध और दूध से बने उत्पाद प्राप्त करना।

2. कृषि कार्य करना :- बैल, ऊँट आदि से खेत की जुताई करवाना।

3. खेत जोतना :- बैलों की मदद से खेत की मिट्टी तैयार करना।

4. यातायात में प्रयोग :- बैलगाड़ी, ऊँटगाड़ी, घोड़ा आदि का परिवहन में उपयोग।

उदाहरण :-

गाय से दूध प्राप्त करना और बैल से खेत की जुताई करवाना पशुपालन के सामान्य उदाहरण हैं।

प्रश्न :- पशु कृषि के प्रकार कौन-कौन से होते हैं? दुग्ध स्त्रवण काल को परिभाषित कीजिए।

उत्तर :- पशु कृषि के प्रकार निम्नलिखित हैं :-

1. दूध देने वाले मादा पशु :- इसमें गाय (Bos indicus), भैंस (Bubalus bubalis) जैसी मादा पशुएँ आती हैं, जो दूध और दूध से बने उत्पाद देती हैं।
2. हल चलाने वाले नर पशु :- ऐसे नर पशु जो दूध नहीं देते और कृषि कार्यों जैसे हल चलाना, सिंचाई करना तथा बोझा ढोना आदि में उपयोग होते हैं।

3. दुग्ध स्त्रवण काल :- जन्म से लेकर अगली गर्भधारण की अवधि के बीच के समय में जो दूध उत्पादन होता है, उसे दुग्ध स्त्रवण काल कहते हैं।

उदाहरण :-

गाय से दूध प्राप्त करना और बैल से खेत की जुताई करवाना।

प्रश्न :- पशुओं की देखभाल कैसे करनी चाहिए?

उत्तर :- पशुओं की देखभाल के लिए निम्नलिखित बिंदुओं का ध्यान रखना चाहिए :- 

1. सफाई संबंधी उपाय :- (i) पशुओं के लिए हवादार और छायादार स्थान होना चाहिए।
(ii) चमड़ी की नियमित कंघी या ब्रशिंग करनी चाहिए।

(iii) पशु आश्रय ढलान वाले हों, ताकि पानी इकट्ठा न हो।
 2. भोजन संबंधी उपाय :- (i) भूसे में पर्याप्त फाइबर (रेशा) होना चाहिए।

(ii) आहार में गाढ़ा प्रोटीन होना चाहिए।

(iii) दूध की मात्रा बढ़ाने के लिए आहार में विटामिन और खनिज शामिल होने चाहिए।
उदाहरण :-

दूध देने वाली गाय को हवादार गोशाला में रखना, रोज ब्रश करना और आहार में चारा, खली, मिनरल मिक्सचर देना।

प्रश्न :- पशुओं को बीमारी से कैसे बचाया जा सकता है?

उत्तर :- पशुओं को बीमारी से बचाने के लिए निम्नलिखित बातें ध्यान में रखनी चाहिए :- 

1. स्वस्थ पशु की पहचान :- (i) नियमित रूप से खाना खाता हो।
(ii) सही तरीके से बैठता और उठता हो।
2. परजीवी से बचाव :- (i) बाह्य परजीवी (जैसे :-  जूँ, किलनी) से त्वचा रोग हो सकते हैं, इसलिए त्वचा की सफाई जरूरी है।

(ii) अंतः परजीवी (जैसे :-  कीड़े) अमाशय, आँत और यकृत को प्रभावित करते हैं, इसलिए समय-समय पर कृमिनाशक दवा देनी चाहिए।
3. सामान्य रोकथाम :- (i) पशु आश्रय को साफ और सूखा रखना।

(ii) बीमार पशु को तुरंत अलग करके इलाज कराना।
उदाहरण :-

गाय को हर 6 महीने में कृमिनाशक दवा देना और गर्मियों में नहलाकर किलनी हटाना।

प्रश्न :- पशुओं को रोगों से बचाने के लिए टीकाकरण क्यों आवश्यक है?

उत्तर :- पशुओं को रोगों से बचाने के लिए टीकाकरण आवश्यक है क्योंकि 

1. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है :- टीका लगाने से पशु के शरीर में बैक्टीरिया और वायरस से लड़ने की क्षमता विकसित होती है।

2. घातक रोगों से बचाव :- यह पशुओं को ऐसे रोगों से बचाता है जो जानलेवा हो सकते हैं, जैसे :-  गलघोटू, खुरपका-मुँहपका, ब्लैक क्वार्टर आदि।

3. दूध और उत्पादन में वृद्धि :- स्वस्थ पशु अधिक दूध और बेहतर गुणवत्ता का उत्पादन करते हैं।

4. रोग फैलने से रोकथाम :- एक बीमार पशु से दूसरों में संक्रमण न फैले, इसके लिए टीकाकरण जरूरी है।

उदाहरण :-

गाय और भैंस को खुरपका-मुँहपका रोग से बचाने के लिए साल में एक बार टीका लगाया जाता है।

प्रश्न :- कुक्कुट पालन के प्रमुख प्रकार कौन-कौन से हैं और उनका उद्देश्य क्या है?

उत्तर :- कुक्कुट पालन में मुर्गियों को अंडा और मांस उत्पादन के लिए पाला जाता है। इसके मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं :- 

1. ब्रोलर्स :- (i) मांस उत्पादन के लिए पाले जाने वाले चूजे।
(ii) जन्म से लगभग 6–8 हफ्तों के भीतर बाजार में बेच दिए जाते हैं।

(iii) इनका मांस मुलायम और स्वादिष्ट होता है।

उदाहरण :- 

ब्रॉयलर मुर्गी — Cobb 500 नस्ल।
2. लेयर :- (i) अंडा उत्पादन के लिए पाली जाने वाली मुर्गियाँ।

(ii) ये जन्म के लगभग 20 हफ्ते बाद अंडे देना शुरू करती हैं।
(iii) अंडा देने की अधिक क्षमता और लंबा उत्पादन काल होता है।
उदाहरण :-

लेयर मुर्गी — White Leghorn नस्ल।

 

प्रश्न :- मुर्गी उत्पादन में नई किस्में विकसित करने के लिए किन विशेषताओं को ध्यान में रखा जाता है?

उत्तर :- मुर्गी उत्पादन में संकरण (Cross-breeding) के माध्यम से नई नस्लें विकसित की जाती हैं, जिनमें निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं :- 

1. अधिक चूजे और अच्छी नस्ल :- (i) एक बार में अधिक संख्या में स्वस्थ चूजों का उत्पादन।
(ii) अंडे और मांस की गुणवत्ता उच्च।

2. कम खर्च में पालन :- कम भोजन और देखभाल में भी अच्छा उत्पादन।
3. छोटे कद के ब्रॉयलर माता-पिता :- व्यावसायिक उत्पादन के लिए ऐसे माता-पिता जिनसे छोटे लेकिन तेजी से बढ़ने वाले चूजे मिलें।

4. गर्मी के अनुकूलन की क्षमता :- गर्म मौसम में भी अच्छी उत्पादकता बनाए रखना।

5. उच्च तापमान सहने की क्षमता :- अत्यधिक गर्मी में भी जीवित रहने और उत्पादन करने की क्षमता।

उदाहरण :-

(i) Vanaraja नस्ल — अंडा और मांस दोनों के लिए उपयुक्त।

(ii) Cobb 500 नस्ल — ब्रॉयलर उत्पादन के लिए लोकप्रिय।

प्रश्न :- मछली उत्पादन के प्रकार कौन-कौन से होते हैं?

उत्तर :- मछली हमारे भोजन में प्रोटीन का एक मुख्य स्रोत है। मछली उत्पादन मुख्यतः निम्नलिखित दो प्रकार का होता है :-

1. पंखयुक्त मछलियाँ (Fin Fish) :- (i) शरीर में पंख पाए जाते हैं।
(ii) सामान्यतः स्वच्छ जल में पाली जाती हैं।

उदाहरण :-

कटला, रोहू, मृगल, कॉमन कार्प।

2. कवचीय मछलियाँ (Shell Fish) :- शरीर कठोर कवच से ढका होता है।
उदाहरण :-

प्रॉन, मोलस्का।

नोट :-

कटला मछली (पंखयुक्त) और प्रॉन (कवचीय) दोनों हमारे भोजन में प्रोटीन के अच्छे स्रोत हैं।

प्रश्न :- मधुमक्खी पालन क्या है?

उत्तर :- मधुमक्खी पालन :- वह प्रक्रिया है जिसमें मधुमक्खियों की कॉलोनियों को बड़े पैमाने पर पालकर उनकी देखभाल की जाती है, ताकि शहद और मोम जैसी उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त की जा सकें।

मधुमक्खी पालन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-

1. इसे एपियरी (Apiary) भी कहते हैं।

2. इसका उद्देश्य शहद, मोम और अन्य मधुमक्खी उत्पादों का उत्पादन करना है।

3. अधिकतर किसान इसे अतिरिक्त आय के स्रोत के रूप में अपनाते हैं।

4. इसमें मधुमक्खियों के भोजन, आवास और रोग-नियंत्रण का ध्यान रखा जाता है।

उदाहरण :-

ग्राम क्षेत्र में बक्सों में मधुमक्खी के छत्ते लगाकर शहद उत्पादन करना मधुमक्खी पालन का एक रूप है।

प्रश्न :- ऐपिअरी (Apiary) क्या है और इसका महत्व क्या है?

उत्तर :- ऐपिअरी :- वह स्थान या व्यवस्था है जहाँ मधुमक्खियों के छत्तों को मनचाही जगह पर अनुशासित तरीके से रखा जाता है, ताकि बड़ी मात्रा में मकरंद (Nectar) और पराग (Pollen) एकत्र कर शहद एवं मोम का उत्पादन किया जा सके।

ऐपिअरी (Apiary) की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-

1. यह मधुमक्खी पालन का संगठित रूप है।

2. छत्तों को सुव्यवस्थित तरीके से रखा जाता है।

3. इससे उत्पादन अधिक और गुणवत्तापूर्ण होता है।

4. मकरंद और पराग के संग्रहण में आसानी होती है।

5. किसानों के लिए अतिरिक्त आय का अच्छा स्रोत है।
उदाहरण :-

गाँव में लकड़ी के बक्सों में 50–100 छत्तों को एक साथ रखकर शहद उत्पादन करना ऐपिअरी का उदाहरण है।

प्रश्न :- भारत में पाई जाने वाली मधुमक्खियों के प्रकार और यूरोपियन मधुमक्खी (Apis mellifera) के लाभ बताइए।

उत्तर :- भारत में पाई जाने वाली मधुमक्खियों के प्रकार निम्नलिखित है :-

1. Apis cerana indica – सामान्य भारतीय मधुमक्खी।

2. Apis dorsata – एक शैल मधुमक्खी।

3. Apis florea – छोटी मधुमक्खी।

4. Apis mellifera – यूरोपियन मधुमक्खी (भारत में भी प्रयोग होती है)।

Apis mellifera (यूरोपियन मधुमक्खी) के लाभ निम्नलिखित है :-

1. अधिक मात्रा में शहद एकत्र करने की क्षमता।

2. तेज़ी से प्रजनन करने की क्षमता।

3. कम डंक मारती है, इसलिए संभालना आसान।

4. लंबे समय तक निर्धारित छत्ते में रह सकती है।
उदाहरण :-

हरियाणा और पंजाब में यूरोपियन मधुमक्खियों से बड़े पैमाने पर व्यावसायिक शहद उत्पादन किया जाता है।

प्रश्न :- मधुमक्खी का चरागाह क्या होता है? यह शहद की गुणवत्ता को कैसे प्रभावित करता है?

उत्तर :- मधुमक्खी का चरागाह :- वह स्थान जहाँ मधुमक्खियाँ मधु (मकरंद) एकत्रित करती हैं, उसे मधुमक्खी का चरागाह कहते हैं।

चरागाह की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-

1. मधुमक्खियाँ पुष्पों से मकरंद और पराग एकत्र करती हैं।

2. चरागाह के फूलों की किस्में शहद का स्वाद और गुणवत्ता निर्धारित करती हैं।

3. अलग-अलग फूलों से प्राप्त मकरंद का स्वाद और रंग अलग होता है।
उदाहरण :- 

कश्मीर के बादाम के फूलों से प्राप्त शहद बहुत स्वादिष्ट और सुगंधित होता है।

प्रश्न :- शहद क्या है? इसके उपयोग लिखिए।

उत्तर :- शहद :- एक गाढ़ा, मीठा तरल पदार्थ है, जो मधुमक्खियाँ फूलों के मकरंद से बनाती हैं।

शहद के उपयोग निम्नलिखित है :-

1. औषधीय प्रयोग – घाव भरने, खाँसी-जुकाम में लाभकारी।

2. शर्करा के रूप में – प्राकृतिक मीठा, भोजन में स्वाद बढ़ाने के लिए।

3. ऊर्जा का स्रोत – इसमें ग्लूकोज़ और फ्रक्टोज़ होने से तुरंत ऊर्जा देता है।
उदाहरण :-

सर्दियों में अदरक के रस के साथ शहद लेने से गले की खराश में आराम मिलता है।

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