CLASS 9 SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 12
जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण
| Textbook | NCERT (अन्वेषण) |
|---|---|
| Class | Class 9 |
| Subject | विज्ञान (जीव विज्ञान) |
| Chapter | Chapter 12 |
| Chapter Name | जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण |
| Medium | Hindi |
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
- 12.1 जैव विविधता हॉटस्पॉट के रूप में भारत
- 12.2 जैव विविधता का विकास किस प्रकार हुआ?
- 12.3 जीवों का वर्गीकरण कैसे करें?
- 12.4 वर्गीकरण की आवश्यकता
- 12.5 समय-समय पर विकसित हुई जैविक वर्गीकरण की प्रणालियाँ
- 12.6 पाँच जगत वर्गीकरण
- 12.7 अनुकूलन — संरचनात्मक परिवर्तनों के परिणाम
- 12.8 वैज्ञानिक नामकरण — द्विनाम पद्धति
- 12.9 जीवाश्म — प्रमाण के रूप में
- 12.10 जैव विविधता पर मंडराता खतरा
12.1 जैव विविधता हॉटस्पॉट के रूप में भारत
जैव विविधता:-
जीवजगत की असीम विविधता ही जैव विविधता कहलाती है। पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए जैव विविधता अनिवार्य है। भारत के प्राकृतिक भूदृश्य में विविधता देखी जाती है — उत्तर में पर्वत, पश्चिम में मरुस्थल, पूर्वोत्तर में वर्षावन, दक्षिण में पठार तथा अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की लंबी तट रेखाएँ। प्रत्येक क्षेत्र की मृदा, तापमान एवं वर्षा जैसी जलवायवीय स्थितियाँ भिन्न-भिन्न हैं, जो विविध पर्यावासों को जन्म देती हैं।
स्थानिक जातियाँ (Endemic species):-
जीवों की वे जातियाँ जो विश्व के कुछ विशेष क्षेत्रों में ही पाई जाती हैं और प्राकृतिक रूप से अन्यत्र कहीं नहीं पाई जातीं, विशेषक्षेत्री या स्थानिक जातियाँ कहलाती हैं।
जैव विविधता हॉटस्पॉट:-
ऐसे क्षेत्र जो बड़ी संख्या में स्थानिक जातियों को आश्रय देते हैं और जहाँ पर्यावास की अत्यधिक क्षति हुई है, जैव विविधता के हॉटस्पॉट कहलाते हैं। ये क्षेत्र आहार जालों का संभरण करते हैं और पारिस्थितिक तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने में सहायता करते हैं, इसलिए संरक्षण के लिए विशेष महत्वपूर्ण होते हैं।
12.2 जैव विविधता का विकास किस प्रकार हुआ?
जैव विविधता के विकास की प्रक्रिया:-
जीवों के बीच के छोटे-छोटे अंतर उनकी उत्तरजीविता तथा जनन की संभावनाओं को प्रभावित करते थे, क्योंकि ये उन्हें परिवर्तित होती परिस्थितियों के अनुरूप अनुकूलन करने में सहायता करते थे। ये अंतर अनेक पीढ़ियों में संचित होते गए और जीवन के नवीन रूपों में विकसित हुए। इस प्रकार वर्तमान की विविधता दीर्घकाल तक निरंतर होते रहने वाले परिवर्तनों का परिणाम है, जिसका अध्ययन वर्गीकरण द्वारा प्रदत्त क्रमबद्ध रूपरेखा से संभव है।
12.3 जीवों का वर्गीकरण कैसे करें?
12.3.1 सजीवों को वर्गीकृत करने हेतु मानदंड
वर्गीकरण के मानदंड:-
वैज्ञानिक सजीवों को समूहबद्ध करने के लिए अनेक प्रकार की विशेषताओं का अध्ययन करते हैं, जो जीवों के बीच समानताओं और भिन्नताओं को समझने में सहायता करती हैं।
- बाह्य विशेषताएँ — आकार, आमाप और शारीरिक संगठन
- पोषण की विधि — स्वपोषी अथवा विषमपोषी
- आंतरिक संरचनाएँ — कंकाल पैटर्न, अंगों की उपस्थिति/अनुपस्थिति, ऊतक प्रकार
- कोशिका संरचना — एककोशिकीय/बहुकोशिकीय, सुकेंद्रकी/पूर्वकेंद्रकी, कोशिका भित्ति उपस्थित/अनुपस्थित
- पारिस्थितिकीय भूमिका — उत्पादक, उपभोक्ता अथवा अपघटक
- जनन — अलैंगिक और/अथवा लैंगिक विधियाँ
- आनुवंशिक समानता — डीएनए के आधार पर अध्ययन की गई वंशागत समानताएँ
12.4 वर्गीकरण की आवश्यकता
वर्गीकरण की आवश्यकता:-
पृथ्वी पर करोड़ों जीव पाए जाते हैं। यदि इनका क्रमबद्ध वर्गीकरण न किया जाए तो जीवों का अध्ययन करना कठिन हो जाएगा — जैसे किसी बड़े पुस्तकालय में विषय के आधार पर व्यवस्थित न की गई पुस्तकों को ढूँढ़ना कठिन होता है। सजीवों के समूहन की यह वैज्ञानिक पद्धति जैविक वर्गीकरण (biological classification) कहलाती है।
जैविक वर्गीकरण के लाभ:-
- यह सजीवों के अध्ययन को अधिक व्यवस्थित और क्रमबद्ध बनाता है।
- यह जीवित प्राणियों के बीच समानताओं और असमानताओं को समझने में सहायता करता है।
- यह समझने में सहायता मिलती है कि विभिन्न जीव एक-दूसरे से किस प्रकार संबंधित हैं और परस्पर क्रिया करते हैं।
- यह नए खोजे गए जीवों की पहचान करने और नामकरण करने में सहायक है।
- यह विलुप्त होने के खतरे वाले जीवों की पहचान कर जैव विविधता संरक्षण में सहायता करता है।
- यह समस्त विश्व के वैज्ञानिकों के लिए एक समान प्रणाली से परिचर्चा को संभव बनाता है।
12.5 समय-समय पर विकसित हुई जैविक वर्गीकरण की प्रणालियाँ
वर्गीकरण प्रणालियों का कालक्रम:-
- कृत्रिम प्रणाली (अरस्तू) — लगभग चौथी शताब्दी सामान्य संवत पूर्व में जीवों को उनके पर्यावास (स्थल, जल, वायु) और बाहरी स्वरूप के आधार पर समूहित किया गया।
- द्विजगत प्रणाली — 18वीं शताब्दी में सभी सजीवों को प्लांटी (पादप जगत) और एनिमेलिया (जंतु जगत) में विभाजित किया गया।
- तीन जगत प्रणाली — वर्ष 1866 में सूक्ष्मजीव जगत के लिए प्रोटिस्टा को सम्मिलित किया गया।
- चार जगत प्रणाली — वर्ष 1938 में सजीवों को मोनेरा, प्रोटिस्टा, प्लांटी और एनिमेलिया में समूहित किया गया।
- पाँच जगत प्रणाली — वर्ष 1969 में रॉबर्ट एच. व्हिटेकर द्वारा सजीवों को मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया में समूहित किया गया।
प्लांटी (पादप जगत):-
जगत प्लांटी में ऐसे जीव सम्मिलित हैं जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं जाते और अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
एनिमेलिया (जंतु जगत):-
जगत एनिमेलिया में ऐसे जीव सम्मिलित हैं जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन करते हैं और भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं।
12.6 पाँच जगत वर्गीकरण
पाँच जगत वर्गीकरण:-
इस वर्गीकरण में सभी जीवों को कोशिका के प्रकार (पूर्वकेंद्रकी/सुकेंद्रकी), संगठन के स्तर (एककोशिकीय/बहुकोशिकीय), कोशिका संरचना (कोशिका भित्ति उपस्थित/अनुपस्थित) और पोषण की विधि (स्वपोषी/विषमपोषी) के आधार पर पाँच जगतों — मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया — में समूहित किया जाता है।
12.6.1 जगत मोनेरा — एककोशिकीय पूर्वकेंद्रकी जीव
जगत मोनेरा:-
जीवाणु और नील-हरित शैवाल एककोशिकीय पूर्वकेंद्रकी जीव हैं जिन्हें मोनेरा जगत के अंतर्गत समूहित किया गया है। ये मृदा, जल, वायु, उष्ण स्रोतों तथा अन्य चरम परिस्थितियों सहित सर्वत्र पाए जाते हैं, यहाँ तक कि मानव शरीर के भीतर भी। कुछ जीवाणु हानिकारक (रोगजनक) होते हैं जबकि अनेक जीवाणु लाभदायक भी होते हैं, जैसे लैक्टोबैसिलस और राइजोबियम। नील-हरित शैवाल स्वपोषी और अपघटक होते हैं।
12.6.2 जगत प्रोटिस्टा — एककोशिकीय सुकेंद्रकी जीव
जगत प्रोटिस्टा:-
ऐसे सभी एककोशिकीय सुकेंद्रकी जीवों को प्रोटिस्टा जगत में समूहित किया गया है जिनमें कोशिका भित्ति नहीं होती अथवा जिनकी कोशिका भित्ति सेल्युलोस की बनी होती है। ये जल या नम स्थानों में रहते हैं (जैसे अमीबा, पैरामीशियम, यूग्लीना)। इनमें कुछ स्वपोषी होते हैं और कुछ विषमपोषी। ये जलीय आहार शृंखलाओं में महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं।
12.6.3 जगत फंजाई — कोशिका भित्ति युक्त बहुकोशिकीय, विषमपोषी सुकेंद्रकी जीव
जगत फंजाई (कवक):-
कवक प्रायः बहुकोशिकीय सुकेंद्रकी जीव होते हैं जिनकी कोशिका भित्ति काइटिन की बनी होती है। ये अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते, बल्कि मृत या सड़ रहे पदार्थों से पोषक तत्वों को महीन तंतुओं (जो मिलकर कवक जाल/mycelium बनाते हैं) के माध्यम से अवशोषित करते हैं। अधिकांश कवक मृतपोषी (saprophyte) होते हैं और पारिस्थितिक तंत्र में अपघटक की महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुछ परजीवी के रूप में रहकर पादपों तथा जंतुओं में रोग उत्पन्न करते हैं।
12.6.4 जगत प्लांटी — कोशिका भित्ति युक्त बहुकोशिकीय, स्वपोषी सुकेंद्रकी जीव
जगत प्लांटी:-
पादप बहुकोशिकीय, स्वपोषी जीव होते हैं जो प्रकाश संश्लेषण करते हैं। इनकी कोशिकाओं में सेल्युलोस से बनी दृढ़ कोशिका भित्ति होती है जो अवलंब और सुरक्षा प्रदान करती है। जगत प्लांटी को पाँच वर्गों में विभाजित किया गया है — थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म।
थैलोफाइटा (शैवाल):-
थैलोफाइटा सबसे सरल पादपों में से हैं जो अधिकांशतः जल या नम पर्यावरण में पाए जाते हैं। इनका शरीर थैलस (सरल संरचना) होता है जिसके माध्यम से गैसों, पोषक तत्वों तथा जल का प्रत्यक्ष आदान-प्रदान होता है। ये जलीय पर्यावासों के लिए पूर्णतः अनुकूलित हैं।
ब्रायोफाइटा:-
ब्रायोफाइटा प्रथम स्थलीय पौधे हैं जिन्हें जनन के लिए जल की भी आवश्यकता होती है, इसलिए इन्हें पादप जगत का उभयचर कहा जाता है। इनका शरीर थैलोफाइट की तुलना में अधिक विभेदित होता है और इनमें मूलाभास (rhizoids) जैसी संरचनाएँ होती हैं। इनमें जल और भोजन के परिवहन के लिए संवहनी ऊतक नहीं होते।
टेरिडोफाइटा:-
टेरिडोफाइट जैसे फर्न में वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ होती हैं। इनमें संवहनी ऊतक — जाइलम और फ्लोएम होते हैं जो क्रमशः जल और भोजन को संपूर्ण पौधे तक पहुँचाते हैं। इन्हें जनन के लिए जलीय परिस्थितियों की आवश्यकता होती है और ये बीज उत्पन्न नहीं करते हैं।
जिम्नोस्पर्म (अनावृतबीजी):-
जिम्नोस्पर्म जैसे चीड़ (पाइन) और साइकैड ठंडे और शुष्क क्षेत्रों के लिए अनुकूलित होते हैं। इनकी सुई या शल्क जैसी पत्तियाँ जल की हानि को कम करती हैं। इनमें निषेचन के लिए जल की आवश्यकता नहीं होती और इनके बीज फलों में बंद नहीं होते, बल्कि शंकुओं पर अनावृत रहते हैं।
एंजियोस्पर्म (आवृतबीजी):-
एंजियोस्पर्म अर्थात पुष्पी पौधे सबसे अधिक जटिलकाय संगठन वाले पादपों को प्रदर्शित करते हैं। ये पुष्प और फल उत्पन्न करते हैं। पुष्प परागणकर्ताओं को आकर्षित करते हैं जिससे जनन की दक्षता बढ़ती है, जबकि फल बीजों को नए स्थानों तक फैलाने में सहायक होते हैं। अतः पृथ्वी पर यह सर्वाधिक विविधता वाला पादप समूह है।
12.6.5 जगत एनिमेलिया (जंतु जगत) — बहुकोशिकीय, विषमपोषी सुकेंद्रकी जीव
जगत एनिमेलिया:-
जंतु बहुकोशिकीय और विषमपोषी जीव होते हैं जो अपने भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं। जंतुओं के वर्गीकरण का मुख्य आधार पृष्ठरज्जु (notochord) की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति है। इसके आधार पर जंतुओं को दो समूहों में वर्गीकृत किया गया है — नॉन कॉर्डेटा (अकशेरुकी जीव) और कॉर्डेटा (कशेरुकी जीव)।
अकशेरुकी जीव (Invertebrates):-
अकशेरुकी जीवों में पृष्ठरज्जु नहीं होती। स्पंज से लेकर एकाइनोडर्म तक शरीर संगठन की जटिलता क्रमशः बढ़ती जाती है। इन्हें आगे निम्नलिखित संघों में वर्गीकृत किया गया है:
- पोरीफेरा (छिद्रधारी जीव) — बहुकोशिकीय परंतु ऊतक व अंग संगठन नहीं। शरीर में छोटे-छोटे छिद्र व नाल होते हैं। कोशिकीय स्तर का संगठन। उदाहरण — स्पंज।
- नाइडेरिया — ऊतक-स्तरीय संगठन। एक ही छिद्र भोजन ग्रहण व अपशिष्ट निष्कासन दोनों के लिए कार्य करता है। उदाहरण — हाइड्रा, जेलीफिश, कोरल।
- प्लैटीहेल्मिन्थीस (चपटे कृमि) — द्विपार्श्व सममिति, अंग-स्तर का संगठन। अनेक परजीवी जीवन शैली अपनाते हैं।
- नेमाटोडा (गोल कृमि) — शरीर लंबा व बेलनाकार, दो छिद्र (मुख और गुदा), अंग तंत्र स्तर का संगठन।
- ऐनेलिडा (सखंड कृमि) — शरीर बेलनाकार व खंडों में विभाजित (खंडीभवन), देहगुहा उपस्थित। उदाहरण — केंचुआ।
- आर्थ्रोपोडा (संधिपाद जीव) — संधित उपांग व कठोर बहिःकंकाल। उदाहरण — कीट, केकड़े, मकड़ियाँ।
- मोलस्का (मृदु कवची जीव) — कोमल काया, अंग तंत्र स्तर का संगठन, कवच द्वारा सुरक्षा। उदाहरण — घोंघा, स्क्विड, ऑक्टोपस।
- एकाइनोडर्मेटा (शूलचर्मी जीव) — पृष्ठरज्जु रहित परंतु कैल्सियम कार्बोनेट से बना कठोर अंतःकंकाल। उदाहरण — स्टारफिश, समुद्री अर्चिन।
| संघ | पर्यावास | संगठन का स्तर | कंकाल |
|---|---|---|---|
| पोरीफेरा | जल (समुद्री) | कोशिकीय | अंतःकंकाल |
| नाइडेरिया | जल (अलवण और समुद्री) | ऊतक | X |
| प्लैटीहेल्मिन्थीस | जल/परपोषी के अंदर | अंग | X |
| नेमाटोडा | मृदा/जल/परपोषी के अंदर | अंग तंत्र प्रणाली | X |
| ऐनेलिडा | नम मिट्टी/जल | अंग तंत्र | X |
| आर्थ्रोपोडा | भूमि/जल | अंग तंत्र | बहिःकंकाल |
| मोलस्का | जल/नम भूमि | अंग तंत्र | बहिःकंकाल |
| एकाइनोडर्मेटा | समुद्री जल | अंग तंत्र | अंतःकंकाल |
प्रोटोकॉर्डेट:-
प्रोटोकॉर्डेट (जैसे ऐम्फिऑक्सस) में पृष्ठरज्जु जीवन की किसी न किसी अवस्था में उपस्थित होती है। यह संरचना अकशेरुकी जीवों से कशेरुकी जीवों की ओर परिवर्तन को दर्शाती है और यह हमें समझने में सहायता करती है कि पृष्ठरज्जु वाले प्राणी अपेक्षाकृत सरल रूपों से किस प्रकार विकसित हुए होंगे।
कशेरुकी (कशेरुक दंड युक्त प्राणी):-
कशेरुकी प्राणियों में कशेरुक दंड (रीढ़ की हड्डी) होता है जो एक अंतःकंकाल संरचना है और मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु जैसे महत्वपूर्ण अंगों की रक्षा करता है। कशेरुकी जीवों को उनके पर्यावास उपयोग, देहावरण और जनन के प्रतिरूप के आधार पर पाँच समूहों में विभाजित किया गया है — मत्स्य (Pisces), उभयचर (Amphibia), सरीसृप (Reptilia), पक्षी (Aves) और स्तनधारी (Mammalia)।
12.7 अनुकूलन — संरचनात्मक परिवर्तनों के परिणाम
संरचनात्मक अनुकूलन:-
वर्तमान में प्राणियों में जो विविधता दिखाई देती है वह लंबे समय से शरीर की संरचना में हुए परिवर्तनों का परिणाम है। मछलियों में पख और क्लोम जल में तैरने और श्वास लेने में सहायता करते हैं। पक्षियों में पंख और खोखली हड्डियाँ उड़ने में सहायक होती हैं। ऊँट में वसा का संचय और ध्रुवीय भालू में मोटा फर यह दर्शाते हैं कि संरचनात्मक विशेषताएँ चरम स्थितियों में उत्तरजीविता में सहायता करती हैं।
12.7.1 वर्गीकरण की पदानुक्रमी प्रकृति
वर्गीकरण का पदानुक्रम:-
वर्गीकरण एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है जिसमें बड़े समूहों से आरंभ करके छोटे और अधिक विशिष्ट समूहों तक पहुँचा जाता है। प्रत्येक निम्नतर स्तर पर जीव अधिक समान विशेषताओं को साझा करते हैं।
| स्तर | बाघ | मटर |
|---|---|---|
| जगत | एनिमेलिया | प्लांटी |
| संघ | कॉर्डेटा | मैग्नोलियोफाइटा |
| वर्ग | मैमेलिया | मैग्नोलियोप्सिडा |
| गण | कार्निवोरा | फेबेलीस |
| कुल | फेलिडी | फेबेसी |
| वंश | पेंथेरा | पाइसम |
| जाति | पी. टाइग्रिस | पाइसम सेटाइवम |
12.8 वैज्ञानिक नामकरण — द्विनाम पद्धति
द्विनाम पद्धति:-
वैज्ञानिक जीवों के नामकरण की एक सार्वभौमिक प्रणाली का उपयोग करते हैं, जिसे द्विनाम पद्धति कहा जाता है। यह प्रणाली कैरोलस लिनियस द्वारा 18वीं शताब्दी में प्रस्तुत की गई थी। इसके अनुसार प्रत्येक जीव का एक वैज्ञानिक नाम होता है जो दो भागों में होता है — वंश और जाति। इन नामों को लैटिन भाषा या उसके लैटिनकृत रूप में लिखा जाता है।
वैज्ञानिक नाम लिखने के नियम:-
- प्रत्येक वैज्ञानिक नाम के दो भाग होते हैं — वंश और जाति।
- वंश का नाम पहले लिखा जाता है और अंग्रेजी भाषा में इसका पहला अक्षर बड़ा (capital) होता है, इसके पश्चात जाति का नाम छोटे (small) अक्षरों में लिखा जाता है।
- वैज्ञानिक नाम को तिरछे (italics) अक्षरों में लिखा जाता है, और हाथ से लिखते समय इन्हें अलग-अलग रेखांकित किया जाता है।
तीन डोमेन पद्धति:-
आनुवंशिक अनुसंधान में प्रगति के पश्चात वैज्ञानिकों ने जीवों की तुलना डीएनए स्तर पर करना आरंभ किया। कार्ल वूस (1977) ने आनुवंशिक आँकड़ों के आधार पर तीन डोमेन पद्धति प्रस्तावित की — बैक्टीरिया, आर्किया और यूकैरिया। इस पद्धति ने दर्शाया कि सूक्ष्मजीव प्रकारों की विविधता उससे कहीं अधिक है जितना पहले सोचा जाता था।
12.9 जीवाश्म — प्रमाण के रूप में
जीवाश्म (Fossil):-
जीवाश्म पादपों और जंतुओं के ऐसे परिरक्षित अवशेष होते हैं जो चट्टानों, रेत और मिट्टी की परतों में दबे पाए जाते हैं। सामान्यतः पुरानी परतों में अपेक्षाकृत साधारण जीव मिलते हैं जबकि नई परतों में अधिक जटिल जीव मिलते हैं। जीवाश्म प्राकृतिक अभिलेख की भाँति कार्य करते हैं जिससे हमें यह समझने में सहायता मिलती है कि करोड़ों वर्षों में जीवन में किस प्रकार के परिवर्तन देखे गए।
12.10 जैव विविधता पर मंडराता खतरा
प्रत्येक जाति चाहे वह बड़ी हो या छोटी, प्रकृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पौधे भोजन और ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं, जंतु पुष्पों का परागण और बीजों का प्रकीर्णन करते हैं तथा सूक्ष्मजीव पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करते हैं। प्रदूषण, वनों की कटाई, संसाधनों का अत्यधिक उपयोग जैसी मानवीय गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के कारण जैव विविधता का ह्रास हो रहा है। पृथ्वी से जब कोई एक जाति विलुप्त हो जाती है तो उस पर निर्भर अन्य जातियाँ भी धीरे-धीरे कम हो सकती हैं और अंततः विलुप्त भी हो सकती हैं।