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CLASS 9 SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 7

कार्य, ऊर्जा एवं सरल मशीनें / Work, Energy and Simple Machines

TextbookNCERT
ClassClass 9
SubjectScience
ChapterChapter 7
Chapter Nameकार्य, ऊर्जा एवं सरल मशीनें
MediumHindi

7.1 किसी नियत बल द्वारा किया गया कार्य

कार्य (Work):-

किसी वस्तु पर लगने वाले एक नियत बल द्वारा किसी विस्थापन हेतु किए गए कार्य को इस प्रकार परिभाषित किया जाता है — किसी वस्तु पर एक नियत बल द्वारा किया गया कार्य = लगाया गया बल × बल की दिशा में विस्थापन।

W = F × s
नोट:- किए गए कार्य का वर्णन करते समय कार्य करने वाले बल (या कारक) तथा जिस वस्तु पर कार्य किया जाता है, उसे निर्दिष्ट करना महत्त्वपूर्ण होता है। यह सूत्र तब भी लागू होता है जब बल व विस्थापन क्षैतिज, ऊर्ध्व अथवा किसी भी अन्य दिशा में हों।

कार्य का SI मात्रक:-

कार्य का SI मात्रक जूल (J) है। बल का SI मात्रक न्यूटन (N) और विस्थापन का SI मात्रक मीटर (m) है, अतः 1 जूल को निम्नवत परिभाषित किया जा सकता है — यदि कोई वस्तु 1 न्यूटन बल लगाने पर बल की दिशा में 1 m विस्थापित हो तो 1 जूल कार्य संपन्न होगा।

1 J = 1 N × 1 m = 1 kg m s⁻² × 1 m = 1 kg m² s⁻²
नोट:- बल-विस्थापन ग्राफ में वस्तु पर किया गया कार्य ग्राफ के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रफल के बराबर होता है। यह तब भी लागू होता है जब बल नियत न हो — ऐसी स्थिति में कार्य प्रारंभिक और अंतिम स्थितियों के बीच घिरे क्षेत्रफल द्वारा ज्ञात किया जाता है।

7.1.1 किया गया कार्य शून्य के बराबर कब होता है?

कार्य शून्य होने की स्थितियाँ:-

  1. जब किसी वस्तु पर लगने वाला बल शून्य होता है (F = 0), तब किया गया कार्य भी शून्य होता है।
  2. जब वस्तु पर बल तो लगा हो किंतु उसमें कोई विस्थापन न हो अर्थात विस्थापन s = 0 हो — जैसे किसी दृढ़ दीवार को धकेलने पर, यदि दीवार विस्थापित न हो तो किया गया कार्य शून्य ही होगा, भले ही ऐसा करने में थकान महसूस हो।
  3. यदि किसी वस्तु पर लगाया गया बल, विस्थापन के लंबवत हो तो उस बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है, क्योंकि बल की दिशा में कोई विस्थापन नहीं होता — जैसे किसी बॉक्स को क्षैतिज दिशा में ले जाते समय उसके भार को संतुलित करने के लिए ऊर्ध्व दिशा में लगाया गया बल।
नोट:- बल और विस्थापन दोनों में परिमाण और दिशा दोनों होते हैं जबकि कार्य की कोई दिशा नहीं होती है। इसे धनात्मक या ऋणात्मक चिह्न वाली संख्या के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।

7.1.2 किए गए कार्य का धनात्मक या ऋणात्मक होना

धनात्मक कार्य:-

जब विस्थापन भी उसी दिशा में हो जिस दिशा में बल आरोपित हो, तो उस वस्तु पर बल द्वारा किया गया कार्य धनात्मक होता है। उदाहरण के लिए — जब आप एक पहिएदार कुर्सी को धकेलते हैं तो लगाया गया बल और कुर्सी का विस्थापन एक ही दिशा में होते हैं, अतः किया गया कार्य धनात्मक है।

ऋणात्मक कार्य:-

जब किसी वस्तु पर लगाए गए बल की दिशा उसके विस्थापन की दिशा के विपरीत होती है तो बल द्वारा वस्तु पर ऋणात्मक कार्य किया जाता है। उदाहरण के लिए — फुटबॉल को रोकने के लिए जब कोई गोलरक्षक फुटबॉल की गति की विपरीत दिशा में बल लगाता है तो गोलरक्षक द्वारा फुटबॉल पर ऋणात्मक कार्य किया जाता है।

नोट:- फुटबॉल और गोलरक्षक दोनों एक-दूसरे पर बराबर और विपरीत बल लगाते हैं तथा दोनों एक-दूसरे पर कार्य करते हैं। फुटबॉल गोलरक्षक पर धनात्मक कार्य करती है जबकि गोलरक्षक फुटबॉल पर ऋणात्मक कार्य करती है।

उदाहरण 7.2:-

गोल बचाने के प्रयास में एक गोलरक्षक फुटबॉल पर इसकी गति की विपरीत दिशा में 200 N का बल लगाती है और फुटबॉल के रुकने तक उसका हाथ 15 cm पीछे हट जाता है। गोलरक्षक द्वारा फुटबॉल को रोकने में किया गया कार्य ज्ञात कीजिए।

कार्य = बल × बल की दिशा में विस्थापन
= 200 N × (−0.15 m) = −30 J

7.2 कार्य-ऊर्जा प्रमेय

ऊर्जावान वस्तु:-

कोई भी वस्तु जिसमें कार्य करने की क्षमता हो, उसे ऊर्जावान वस्तु कहते हैं। जब किसी वस्तु पर धनात्मक कार्य किया जाता है तो उसे ऊर्जा प्राप्त होती है। इसके पश्चात वह वस्तु उस ऊर्जा का उपयोग किसी अन्य वस्तु पर बल लगाने और उसे गतिशील करने में कर सकती है — इस प्रकार ऊर्जा का हस्तांतरण होता है।

कार्य-ऊर्जा प्रमेय (Work-Energy Theorem):-

किसी वस्तु पर किया गया कार्य उसकी ऊर्जा में परिवर्तन के रूप में प्रकट होता है। वस्तु पर किए गए कार्य और उसकी ऊर्जा में परिवर्तन के संबंध को कार्य-ऊर्जा प्रमेय कहते हैं।

वस्तु पर किया गया कार्य = वस्तु की ऊर्जा में परिवर्तन
नोट:- यह प्रमेय वस्तुओं के निकाय के लिए भी लागू होता है तथा तब भी लागू होता है जब वस्तु पर लगाए गए बल नियत न हों। ऊर्जा का SI मात्रक कार्य के SI मात्रक के समान ही जूल (J) है।

ऊर्जा के स्थानांतरण की विधियाँ:-

यांत्रिक कार्य करना ऊर्जा को एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानांतरित करने की एक विधि है, परंतु यह इसकी एकमात्र विधि नहीं है। ऊर्जा का स्थानांतरण ऊष्मा के रूप में भी हो सकता है, जब अलग-अलग तापमान वाली दो वस्तुएँ संपर्क में आती हैं तो ऊर्जा अधिक गर्म वस्तु से कम वस्तु की ओर प्रवाहित होती है। ऊर्जा का प्रवाह वस्तुओं के बिना सीधे संपर्क में आए भी हो सकता है — जैसे सूर्य की ऊर्जा पृथ्वी तक विकिरणों के माध्यम से पहुँचती है, तथा विद्युत परिपथों एवं ध्वनि तरंगों के माध्यम से भी ऊर्जा का स्थानांतरण हो सकता है।

7.3 ऊर्जा के रूप

ऊर्जा के विभिन्न रूप:-

ऊर्जा का अस्तित्व अनेक रूपों में होता है, तथा ऊर्जा का एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन होना संभव है।

  1. यांत्रिक ऊर्जा — वस्तुओं की स्थिति एवं गति के कारण ऊर्जा।
  2. तापीय ऊर्जा — ऊर्जा जो वस्तुओं को गर्म या ठंडा करती है।
  3. प्रकाश ऊर्जा — ऊर्जा जिसके कारण हम देख पाते हैं।
  4. ध्वनि ऊर्जा — वायु अथवा अन्य अण्विक कंपनों की ऊर्जा।
  5. विद्युत ऊर्जा — आवेशों की स्थिति अथवा गति से संबंधित ऊर्जा।
  6. नाभिकीय ऊर्जा — परमाणुओं के नाभिकों में संचित ऊर्जा।
  7. रासायनिक ऊर्जा — ईंधन और खाद्य पदार्थों में परमाणुओं के रासायनिक बंधों के रूप में संचित ऊर्जा।
नोट:- विद्युत बल्ब में विद्युत ऊर्जा प्रकाश ऊर्जा में रूपांतरित होती है और वैद्युत जल उष्मक द्वारा यही विद्युत ऊर्जा जल की तापीय ऊर्जा में परिवर्तित होती है। हम जो भोजन करते हैं उसकी रासायनिक ऊर्जा हमारी माँसपेशियों को शक्ति प्रदान करती है और यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।

7.4 यांत्रिक ऊर्जा

यांत्रिक ऊर्जा:-

यांत्रिक ऊर्जा वह ऊर्जा है जो वस्तु में उसकी गति अथवा स्थिति के कारण होती है।

7.4.1 गतिज ऊर्जा

गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy):-

किसी वस्तु की गति के कारण उसमें जो ऊर्जा होती है उसे गतिज ऊर्जा कहते हैं। सभी गतिशील वस्तुओं, जैसे — चलती हुई साइकिल या लुढ़कती हुई गेंद में गतिज ऊर्जा होती है। यदि वस्तु गतिशील नहीं है तो उसकी गतिज ऊर्जा शून्य होती है।

K = ½ m v²
नोट:- गतिज ऊर्जा का SI मात्रक जूल (J) है। गतिज ऊर्जा की कोई दिशा नहीं होती है। जब किसी वस्तु पर धनात्मक कार्य किया जाता है और इसके वेग में वृद्धि होती है तो इसकी गतिज ऊर्जा में भी वृद्धि होती है।

उदाहरण 7.4:-

यदि किसी वाहन के वेग का परिमाण दोगुना हो जाए तो उसकी गतिज ऊर्जा का मान उसकी प्रारंभिक गतिज ऊर्जा की तुलना में कितने गुना हो जाएगा?

प्रारंभिक गतिज ऊर्जा = ½mv²
वेग 2v होने पर गतिज ऊर्जा = ½m(2v)² = 4 × ½mv²

इस प्रकार गतिज ऊर्जा का मान प्रारंभिक गतिज ऊर्जा का चार गुना हो जाएगा।

उदाहरण 7.5:-

एक भारतीय गेंदबाज अपनी सबसे अधिक तीव्रगति से फेंकी गई गेंदों में से एक को लगभग 154.8 km h⁻¹ का वेग प्रदान करता है। यदि गेंद का द्रव्यमान 0.2 kg माना जाए तो गेंद फेंकने के समय गेंद की गतिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए।

गेंद का वेग = 154.8 km h⁻¹ = 43 m s⁻¹
K = ½ × 0.2 kg × (43 m s⁻¹)² = 184.9 J

7.4.2 स्थितिज ऊर्जा

स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy):-

किसी वस्तु में विकृति के कारण अथवा वस्तुओं के एक निकाय में उनकी सापेक्ष स्थितियों के कारण जो ऊर्जा संचित होती है उसे स्थितिज ऊर्जा कहते हैं। जैसे तने हुए रबड़ बैंड, खींची गई धनुष की प्रत्यंचा या संपीडित स्प्रिंग में उनकी विशेष आकृति (विरूपता) के कारण कार्य करने की क्षमता संचित होती है।

नोट:- ऊर्जा का संचय न केवल वस्तु को विकृत करके, बल्कि किसी निकाय में वस्तुओं की सापेक्ष स्थिति में परिवर्तन करके भी किया जा सकता है — जैसे चुंबकों के विपरीत ध्रुवों को अलग करके छोड़ने पर, या एक-दूसरे से कुछ दूरी पर रखे गए विद्युत आवेशों के निकाय में।

गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा (Gravitational Potential Energy):-

पृथ्वी-गेंद निकाय गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा का सरलतम उदाहरण है। पृथ्वी की सतह से गेंद की ऊँचाई जितनी अधिक होगी उसकी स्थितिज ऊर्जा भी उतनी ही अधिक होगी।

U = mgh
नोट:- स्थितिज ऊर्जा का मात्रक जूल (J) होता है जो कार्य अथवा गतिज ऊर्जा का भी मात्रक है। समीकरण U = mgh द्वारा अभिव्यक्त h ऊँचाई पर स्थित किसी वस्तु की स्थितिज ऊर्जा पृथ्वी की सतह के निकट की ऊँचाइयों के लिए ही वैध है, क्योंकि पृथ्वी की सतह से दूर जाने पर गुरुत्वीय त्वरण का मान कम होता जाता है।

उदाहरण 7.7:-

एक क्षेत्ररक्षक ने गेंद पकड़ने के पश्चात 200 g द्रव्यमान की क्रिकेट की गेंद को उत्साह में पृथ्वी की सतह से 10 m ऊँचा उछाल दिया। गेंद की उच्चतम स्थिति में उसकी स्थितिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए (g = 10 m s⁻²)।

mgh = 0.2 kg × 10 m s⁻² × 10 m = 20 J

7.4.3 यांत्रिक ऊर्जा का संरक्षण

यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण नियम (Conservation of Mechanical Energy):-

किसी वस्तु की गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा के योग को इसकी यांत्रिक ऊर्जा कहते हैं। जब कोई वस्तु गुरुत्वीय बल के कारण गतिमान होती है और उस पर कोई अन्य बाह्य बल कार्य नहीं कर रहा हो तो इसकी यांत्रिक ऊर्जा नियत बनी रहती है अर्थात वस्तु की यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित रहती है।

नोट:- जैसे-जैसे कोई वस्तु ऊँचाई से नीचे गिरती जाती है उसकी स्थितिज ऊर्जा कम होती जाती है जबकि उसकी गतिज ऊर्जा में उतनी ही वृद्धि होती है, जिससे कुल यांत्रिक ऊर्जा (mgh) नियत बनी रहती है — जैसा कि सरल लोलक के दोलन में गतिज व स्थितिज ऊर्जा के आपसी रूपांतरण से देखा जा सकता है।

उदाहरण 7.8:-

h ऊँचाई की फिसलपट्टी के आधार तल पर पहुँचने पर बच्चे के वेग का परिमाण ज्ञात कीजिए (घर्षण की उपेक्षा करते हुए)।

½mv² = mgh
v = √(2gh)

चूँकि बच्चे का फिसलपट्टी के आधार तल पर वेग केवल फिसलपट्टी की ऊँचाई h पर निर्भर करता है, इसलिए फिसलपट्टी की आकृति अथवा बच्चे के द्रव्यमान का उसके इस वेग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

7.5 शक्ति

शक्ति (Power):-

शक्ति को कार्य करने की दर के रूप में परिभाषित किया जाता है। गणितीय रूप से औसत शक्ति P किसी कार्य W को इसे करने में लगे समय t से विभाजित करके प्राप्त की जाती है।

P = W / t
नोट:- शक्ति का SI मात्रक वाट (W) है। एक वाट शक्ति 1 जूल कार्य प्रति सेकंड के बराबर होती है अर्थात 1 W = 1 J s⁻¹। एक अश्वशक्ति (horsepower) 746 W के बराबर होती है।

उदाहरण 7.10:-

कोई भारोत्तोलक 5 सेकंड में 75 kg के द्रव्यमान को 2 m तक ऊपर उठाता है। इस कार्य को करने के लिए आवश्यक शक्ति ज्ञात कीजिए।

किया गया कार्य = mgh = 75 kg × 10 m s⁻² × 2 m = 1500 J
आवश्यक शक्ति = 1500 J / 5 s = 300 W

7.6 सरल मशीनें

सरल मशीन (Simple Machine):-

ऐसे उपकरण जो किसी कार्य को करने में लगाए जाने वाले बल के परिमाण या दिशा को बदलकर कार्य को सरल बनाने में सहायता करते हैं, उन्हें सरल मशीन कहा जाता है। मशीन पर हम जो बल लगाते हैं उसे आयास (effort) कहते हैं और वह बल जिसके विरुद्ध मशीन कार्य करती है उसे भार कहते हैं।

यांत्रिक लाभ = भार / आयास
नोट:- उत्तोलक किसी कार्य को करने के लिए आवश्यक बल को कम करता है परंतु किए गए कुल कार्य के परिमाण को परिवर्तित नहीं करता। मशीनें ऊर्जा का सृजन नहीं करतीं, वे केवल इसको अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग करने में हमारी सहायता करती हैं।

7.6.1 घिरनी

घिरनी (Pulley):-

घिरनी एक पहिया होता है जिसमें खाँचा बना होता है जो रस्सी को दिशा देता है। एक स्थिर घिरनी उस पर लगाए जाने वाले बल के परिमाण में कोई परिवर्तन नहीं करती वरन उसकी दिशा में परिवर्तन कर देती है, जिससे भार को ऊपर की ओर खींचने की तुलना में नीचे की ओर खींचना अधिक सरल हो जाता है।

नोट:- चूँकि आयास और भार के मान परिमाण में समान हैं, अतः स्थिर घिरनी का यांत्रिक लाभ 1 होता है। चल घिरनी या घिरनी निकाय का यांत्रिक लाभ 1 से अधिक हो सकता है जिसमें हम कम आयास से बहुत अधिक भार को उठा सकते हैं।

7.6.2 आनत तल

आनत तल (Inclined Plane):-

आनत तल एक ऐसी सरल मशीन है जो भारी वस्तु को ऊपर चढ़ाने या नीचे उतारने में सहायता करती है। इसका उपयोग करने पर किसी वस्तु को सीधे ऊपर उठाने की तुलना में कम बल की आवश्यकता होती है, किंतु यह बल अधिक दूरी तक लगाना पड़ता है।

यांत्रिक लाभ = भार / आयास = mg / F′ = L / h
नोट:- आनत तल की लंबाई (L), ऊँचाई (h) से अधिक होती है इसलिए आयास बल mg से कम होता है और आनत तल का यांत्रिक लाभ 1 से अधिक होता है। आनत तल के झुकाव कोण को कम करके यदि इसकी लंबाई बढ़ाई जाए तो वस्तु को चलाने के लिए आवश्यक आयास और कम किया जा सकता है।

उदाहरण 7.12:-

कोई व्यक्ति किसी वस्तु को 30 cm की ऊँचाई तक उठाने के लिए आनत तल का उपयोग करता है। आनत तल के उच्चतम और निम्नतम बिंदुओं के बीच की क्षैतिज दूरी 40 cm है। इस कार्य में सहायक आनत तल का यांत्रिक लाभ ज्ञात कीजिए।

ऊँचाई AB = 30 cm, चौड़ाई BC = 40 cm
आनत तल की लंबाई AC = 50 cm (समकोण त्रिभुज के गुण से)
यांत्रिक लाभ = L/h = 50 cm / 30 cm = 1.67

7.6.3 उत्तोलक

उत्तोलक (Lever):-

उत्तोलक एक दृढ़ छड़ (जैसे कि पैमाना) होती है जो किसी स्थिर बिंदु पर घूमने में सक्षम होती है। इसके तीन मुख्य भाग होते हैं — (i) आलंब (fulcrum) — एक स्थिर बिंदु जिस पर उत्तोलक घूम सकता है, (ii) भार (load) — वह बल जिसके विरुद्ध उत्तोलक कार्य करता है, (iii) आयास (effort) — भार को उठाने में लगाया गया बल। आलंब से आयास की दूरी को आयास भुजा तथा आलंब से भार की दूरी को भार भुजा कहते हैं।

F₁ × d₁ = F₂ × d₂
यांत्रिक लाभ = भार/आयास = आयास भुजा/भार भुजा
नोट:- आयास भुजा को बढ़ाकर उत्तोलक आयास की तुलना में भार पर अधिक बल आरोपित करता है। उत्तोलक के उपयोग से आवश्यक आयास सामान्यतया कम होता है, लेकिन उसे अधिक दूरी तक स्थानांतरित करना पड़ता है जिससे किया गया कुल कार्य समान रहे।

उत्तोलकों का वर्गीकरण:-

  1. प्रथम श्रेणी (आलंब बीच में) — संडासी, कैंची, सब्बल, प्लास, दंड-तुला, सी-सॉ प्रकार का झूला।
  2. द्वितीय श्रेणी (भार बीच में) — नींबू निष्कर्षणी, हथठेला, बोतल खोलने की मशीन।
  3. तृतीय श्रेणी (आयास बीच में) — चिमटा, झाड़ू, हथौड़ी, चप्पू, चिमटी।
नोट:- दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली अनेक मशीनें दो या अधिक सरल मशीनों से मिलकर बनी होती हैं। इन सभी प्रकरणों में यांत्रिक ऊर्जा का संरक्षण होता है — घर्षण की उपेक्षा करने पर आयास द्वारा किया गया कार्य भार द्वारा किए गए उपयोगी कार्य के बराबर होता है।

उदाहरण 7.13:-

एक झूले में चार कुर्सियाँ A, B, D, E और आलंबन बिंदु C है। AC = EC = 2 m और BC = DC = 1 m है। झूले को संतुलित करने के लिए 15 kg और 30 kg द्रव्यमान वाले बच्चों को किन कुर्सियों पर बैठना चाहिए?

15 kg × 2 m = 30 kg × L
L = 1 m

अतः 15 kg वाला बच्चा कुर्सी A पर और दूसरा बच्चा कुर्सी D पर बैठना चाहिए।

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