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Class 10 Science Notes in hindI Chapter - 7

Chapter 7: जीव जनन कैसे करते हैं? / How Do Organisms Reproduce
Chapter Introduction: 
इस अध्याय में आप जीवों में होने वाली जनन प्रक्रियाओं के बारे में समझेंगे। साथ ही अलैंगिक एवं लैंगिक जनन, पुष्पी पौधों में जनन, मानव जनन तंत्र तथा गर्भनिरोधक उपायों को सरल भाषा में विस्तार से पढ़ेंगे।
नीचे अध्याय 7 जीव जनन कैसे करते हैं? के सभी महत्वपूर्ण topics को सरल भाषा में विस्तार से समझाया गया है जो NCERT syllabus पर आधारित हैं, तथा बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। 

CLASS 10 SCIENCE NOTES IN HINDI
CHAPTER 7 : जीव जनन कैसे करते हैं

DETAILS

INFORMATION

Textbook

NCERT

Class

Class 10

Subject

Science

Chapter

Chapter 7

Chapter Name

जीव जनन कैसे करते हैं?

Medium

Hindi

 क्या आप Class 10 Science Chapter 7 Notes in Hindi  ढूँढ रहे हैं?
यहाँ आपको जीव जनन कैसे करते हैं? अध्याय के आसान और सरल नोट्स मिलेंगे। इस अध्याय में आप अलैंगिक एवं लैंगिक जनन, परागण, निषेचन, मानव जनन तंत्र तथा गर्भनिरोधक उपायों के बारे में विस्तार से समझेंगे।

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
7.1 क्या जीव पूर्णतः अपनी प्रतिकृति का सृजन करते हैं?
  7.1.1 विभिन्नता का महत्व क्या है?
7.2 एकल जीवों में जनन की विधियाँ कौन-कौन सी हैं?
  7.2.1 विखंडन क्या है?
  7.2.2 खंडन क्या होता है?
  7.2.3 पुनरुद्भवन (पुनर्जनन) क्या है?
  7.2.4 मुकुलन क्या होता है?
  7.2.5 कायिक प्रवर्धन क्या है?
  7.2.6 बीजाणु समुच्चय (बीजाणु निर्माण) द्वारा जनन कैसे होता है?
7.3 लैंगिक जनन क्या है?
  7.3.1 लैंगिक जनन प्रणाली क्यों आवश्यक है?
  7.3.2 पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन कैसे होता है?
  7.3.3 मानव में लैंगिक जनन कैसे होता है?
  7.3.3 (a) मानव का नर जनन तंत्र कैसे कार्य करता है?
  7.3.3 (b) मानव का मादा जनन तंत्र कैसे कार्य करता है?
  7.3.3 (c) यदि अंडे का निषेचन न हो तो क्या होता है?
  7.3.3 (d) जनन स्वास्थ्य क्या है और इसका महत्व क्या है?

Chapter Summary
इस अध्याय में आप जीवों में होने वाली जनन प्रक्रिया के बारे में सरल भाषा में समझेंगे। आप जानेंगे कि जनन जीवों के अस्तित्व को बनाए रखने और नई संतति उत्पन्न करने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। जनन के दौरान डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनती है तथा नई कोशिकाओं का निर्माण होता है।

आप यह भी समझेंगे कि विभिन्न जीव अपने शरीर की संरचना के अनुसार अलग-अलग प्रकार की जनन विधियाँ अपनाते हैं। अलैंगिक जनन में एक ही जीव नई संतति उत्पन्न करता है। इसमें खंडन, पुनरुद्भवन, मुकुलन तथा कायिक प्रवर्धन जैसी प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं।
इस अध्याय में आप लैंगिक जनन के बारे में भी पढ़ेंगे, जिसमें दो जीव मिलकर संतति उत्पन्न करते हैं। लैंगिक जनन द्वारा अधिक विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं, जो प्रजातियों के अस्तित्व के लिए लाभदायक होती हैं।
आप पुष्पी पौधों में होने वाली जनन प्रक्रिया को भी समझेंगे। परागकणों का परागकोश से वर्तिकाग्र तक पहुँचना परागण कहलाता है तथा इसके बाद निषेचन की प्रक्रिया होती है।
इसके अलावा आप यौवनारंभ के दौरान होने वाले शारीरिक परिवर्तनों के बारे में जानेंगे। लड़कों एवं लड़कियों में लैंगिक परिपक्वता के कई संकेत दिखाई देते हैं।
अंत में आप मानव के नर एवं मादा जनन तंत्र, निषेचन की प्रक्रिया तथा गर्भनिरोधक उपायों के बारे में पढ़ेंगे। कंडोम, कॉपर-टी एवं गर्भनिरोधक गोलियाँ जैसे उपाय गर्भधारण को रोकने में सहायता करते हैं। यह अध्याय जीवों में जनन की महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को समझने में मदद करता है।

7.1 क्या जीव पूर्णतः अपनी प्रतिकृति का सृजन करते हैं?

जनन से आप क्या समझते है :-

जनन :- एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से सभी जीव अपने समान नए जीवन का निर्माण करते हैं। यह पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता के लिए अति आवश्यक है।

जनन प्रक्रिया जीवों के अस्तित्व को बनाए रखता है। इस प्रक्रिया का प्रमुख उद्देश्य डी.एन.ए. का पुनर्निर्माण करना (प्रतिकृति बनाना) होता है, साथ ही साथ इसमें अन्य दूसरे कोशिकाओं का निर्माण भी होता है।

उदाहरण :-  

1. मानव में जनन

2. पौधों में जनन

3. बैक्टीरिया में जनन

डी० एन० ए० की प्रतिकृति का प्रजनन में क्या महत्त्व है? समझाइए :-

डी.एन.ए. :- वास्तव में, कोशिका के केन्द्रक में स्थित गुणसूत्रों के डी.एन.ए. अणु आनुवांशिक गुणों का संदेश लेकर जनक से उसकी संतति में स्थानांतरित करते हैं। डी.एन.ए. की प्रतिकृति भी पूरी तरह से त्रुटिरहित नहीं होती। इसमें कुछ भिन्नताएं उत्पन्न होती हैं, जिनमें से कुछ ऐच्छिक भिन्नताएं ही संतति में समाविष्ट हो पाती हैं।

7.1.1 विभिन्नता का महत्व क्या है?

विभिन्नता का महत्व क्यों है और यह जैव विकास में किस प्रकार योगदान करती है :-

विभिन्नता का महत्व :- यदि कोई एक समूह (समष्टि) अपने पर्यावरण के अनुकूल है, परंतु यदि पर्यावरण में कुछ बड़े बदलाव (जैसे तापमान में बदलाव, जल स्तर में बदलाव, आदि) होते हैं, तो उस समूह का पूरी तरह से नष्ट होना संभव है। लेकिन उस समूह में कुछ जीवों में भिन्नताएँ होने पर, उन जीवों के समूह के लिए जीवित रहने की कुछ संभावनाएँ अवश्य बनी रहेंगी। इस प्रकार, विभिन्नताएँ किसी प्रजाति  (समष्टि) की दीर्घकालिक उत्तरजीविता को सुनिश्चित करने में सहायक होती हैं। यह भी कहा जा सकता है कि विभिन्नता जैविक विकास का एक प्रमुख आधार है।

7.2 एकल जीवों में जनन की विधियाँ कौन-कौन सी हैं?

प्रजनन कितने प्रकार के होते हैं? विस्तार से समझाइए :-

प्रजनन दो प्रकार के होते है :-

1. अलैंगिक प्रजनन :- यह वह प्रक्रिया है जिसमें केवल एकल जीव भाग लेते है। इसमें बिना किसी लिंग भेद के एक ही जीव से नए जीवों का निर्माण होता है। इसे अलैंगिक प्रजनन कहते हैं।

उदाहरण :- 

बैक्टीरिया, हाइड्रा

2. लैंगिक प्रजनन :- यह वह प्रक्रिया है जिसमें नर और मादा दोनों भाग लेते हैं। इसमें दोनों लिंगों के युग्म से नए जीवों का निर्माण होता है। इसे लैंगिक प्रजनन कहते हैं।

उदाहरण :- 

मनुष्य, पक्षी

प्रजनन के अलैंगिक और लैंगिक प्रकारों में क्या अंतर है? इन्हें विस्तार से समझाइए :-

प्रजनन के अलैंगिक और लैंगिक प्रकारों में निम्नलिखित अंतर है :-

अलैंगिक प्रजनन

लैंगिक प्रजनन

एकल जीवों  द्वारा नए जीवों का निर्माण होता है।

दो एकल जीव (1 नर तथा 1 मादा) के मिलन से नये जीव का निर्माण होता है।

युग्मक का निर्माण नहीं करता है।

नर युग्मक तथा मादा युग्मक का निर्माण होता है।

नया जीव पूरी तरह से पैतृक जीव के समान तथा समरूप  होता है।

आनुवांशिक रूप से नया जीव पैतृक जीवों से मिलता-जुलता (समान) तो होता है, लेकिन समरूप नहीं होता।

यह सतत् गुणन के लिए उपयुक्त है।

यह प्रजाति (समष्टि) में विभिन्नताओं का निर्माण करने में सहायक होता है।

यह मुख्य रूप से निम्न वर्ग के जीवों में होता है।

यह मुख्य रूप से उच्च वर्ग के जीवों में पाया जाता है।

अलैंगिक प्रजनन की विधियाँ कौन-कौन सी हैं :-

अलैंगिक प्रजनन की निम्नलिखित विधियाँ हैं :-

1. विखंडन (Fission)

2. खंडन (Fragmentation)

3. पुनरुद्भवन (पुनर्जनन) (Regeneration)

4. मुकुलन (Budding)

5. बीजाणु समासंघ (Spore Formation)

6. कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation)

नोट :-

विखंडन (Fission) अलैंगिक प्रजनन दो तरह के होते है :- 

1. द्विविखंडन (Binary Fission)

2. बहुखंडन (Multiple Fission)

7.2.1 विखंडन क्या है?

अलैंगिक प्रजनन की विधि विखंडन (Fission) को समझाइए :-

विखंडन (Fission) :- यह एक प्रजनन प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत एक मूल कोशिका अपनी संरचना को तोड़कर दो या उससे अधिक संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है।

इसके दो प्रकार निम्नलिखित है :-

1. द्विविखंडन (Binary Fission) :- इस प्रक्रिया में एक जीव केवल दो कोशिकाओं में विभाजित होता है।
उदाहरण :-

लेस्मानिया तथा अमीबा। 

2. बहुखंडन (Multiple Fission) :- यह प्रक्रिया उस समय होती है जब एक जीव अपनी कोशिका को कई हिस्सों में विभाजित करता है।
उदाहरण :-

प्लाज्मोडियम (मलेरिया के कीटाणु)।

7.2.2 खंडन क्या होता है?

अलैंगिक प्रजनन की विधि खंडन (Fragmentation) को समझाइए :-

खंडन (Fragmentation) :- यह प्रजनन विधि उस समय होती है जब बहुकोशिकीय जीव अपनी संरचना में खंडित होकर छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो जाते हैं। इन टुकड़ों में वृद्धि होती है, और वे एक नए जीव के रूप में विकसित हो जाते हैं।

उदाहरण :-

स्पाइरोगाइरा (Spirogyra)

7.2.3 पुनरुद्भवन (पुनर्जनन) क्या है?

अलैंगिक प्रजनन की विधि पुनरुद्भवन (पुनर्जनन) (Regeneration) को समझाइए :-

पुनरुद्भवन (पुनर्जनन) (Regeneration) :- इस प्रक्रिया में जब कोई जीव किसी वजह से टूटकर कई टुकड़ों में विभाजित हो जाता है, तब प्रत्येक टुकड़ा एक नया जीव बनाने के रूप में विकसित हो जाता है।

उदाहरण :-

हाइड्रा तथा प्लेनेरिया।

7.2.4 मुकुलन क्या होता है?

अलैंगिक प्रजनन की विधि मुकुलन (Budding) को समझाइए :-

मुकुलन (Budding) :-  इस प्रक्रिया में जीव के शरीर पर एक छोटा सा उभार (मुकुल) बनता है, जो धीरे-धीरे विकसित होकर एक स्वतंत्र जीव के रूप में जनक से अलग हो जाता है। और इस प्रक्रिया का पालन करते हैं।

उदाहरण :-

यीस्ट (खमीर) तथा हाइड्रा।

7.2.5 कायिक प्रवर्धन क्या है?

अलैंगिक प्रजनन की विधि कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) को समझाइए :-

कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) :- कुछ पौधों के द्वारा नए पौधे का निर्माण उनके शरीर के ही भागों (कायिक भागों) जैसे जड़, तना, पत्तियाँ आदि से होता है। इस प्रक्रिया को कायिक प्रवर्धन कहा जाता है

उदाहरण :-

राइज़ोपस (Rhizopus) तथा  मूकोर (Mucor)।

कायिक प्रवर्धन की कौन सी प्राकृतिक विधियाँ होती हैं :-

कायिक प्रवर्धन की प्राकृतिक विधियाँ निम्नलिखित है :-

प्राकृतिक विधि

उदाहरण

जड़ द्वारा प्रवर्धन

कुछ पौधों में जैसे उहेलिया और शकरकंदी, नए पौधे जड़ से उत्पन्न होते हैं।

तने द्वारा प्रवर्धन

आलू और अदरक जैसे पौधों में तने के द्वारा नए पौधे बनते हैं।

पत्तियों द्वारा प्रवर्धन

ब्रायोफिलम जैसे पौधों की पत्तियों में कलिकाएँ उत्पन्न होती हैं, जो बाद में नए पौधों में परिवर्तित हो जाती हैं।

कायिक प्रवर्धन की कृत्रिम विधियाँ कौन सी होती हैं :-

कायिक प्रवर्धन की कृत्रिम विधियाँ निम्नलिखित है :-

कृत्रिम विधि

उदाहरण

रोपण

पौधों को उनके भागों से नया पौधा उगाना, जैसे आम।

कर्तन

पौधों के तने के भाग को काटकर नया पौधा उगाना, जैसे गुलाब।

लेयरिंग

पौधों के तने को मिट्टी में दबाकर नए पौधे का निर्माण करना, जैसे चमेली

ऊतक संवर्धन

पौधे के ऊतक (सेल) से नया पौधा विकसित करना, जैसे आर्किड और सजावटी पौधे।

कायिक संवर्धन के क्या लाभ होते हैं :-

कायिक संवर्धन के निम्नलिखित लाभ होते हैं :-

1. बीज से न उत्पन्न होने वाले पौधों, जैसे केला और गुलाब, से नए पौधे प्राप्त किए जा सकते हैं। यह पौधों की किस्मों को बनाए रखने में मदद करता है।

2. इस प्रक्रिया से उत्पन्न नए पौधे अपने जनक के आनुवंशिक गुणों को समान रूप से प्राप्त करते हैं। इससे उच्च गुणवत्ता वाले पौधों का उत्पादन होता है।

3. यह बीज रहित फलों के उत्पादन में सहायक होती है। यह विधि तेज़ी से और अधिक पौधे उत्पन्न करने में सक्षम होती है।

4. यह पौधों को उगाने का एक सरल और किफायती तरीका है। यह विधि फसल की गुणवत्ता को बनाए रखने में सहायक होती है।

7.2.6 बीजाणु समुच्चय (बीजाणु निर्माण) द्वारा जनन कैसे होता है?

अलैंगिक प्रजनन की विधि बीजाणु समासंघ (Spore Aggregation) को समझाइए :-

बीजाणु समासंघ (Spore Aggregation) :- कुछ जीवों के तंतुओं के अंत में बीजाणु धानी उत्पन्न होती है, जिसमें बीजाणु पाए जाते हैं। ये बीजाणु गोल आकार के होते हैं और एक मोटी परत से संरक्षित रहते हैं। जब इन बीजाणुओं को अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं, तो वे वृद्धि करने लगते हैं।

उदाहरण :-

राइज़ोपस (Rhizopus) तथा  मूकोर (Mucor)।

ऊतक संवर्धन विधि का क्या महत्व है और इसे किस प्रकार के पौधों के लिए उपयोगी माना जाता है :-

ऊतक संवर्धन :- एक जैविक प्रक्रिया है, जिसमें पौधे के किसी हिस्से से कोशिकाओं को लेकर उन्हें विशेष पोषक माध्यमों में रखा जाता है। यहाँ इन कोशिकाओं का विभाजन तथा वृद्धि होती है, जिससे कैलस (कोशिकाओं का गुच्छा) का निर्माण होता है। फिर, इन कैलस को एक हॉर्मोनल माध्यम के अन्दर रखा जाता है, जहां से विभेदन प्रक्रिया का आरंभ होता है और नए पौधे उत्पन्न होते है। 

उदाहरण :-

आर्किड्स और सजावटी पौधे।

द्विखण्डन और बहुखण्डन में क्या अन्तर है? दोनों के उदाहरण देकर स्पष्ट करें :-

द्विखण्डन और बहुखण्डन में अन्तर  निम्नलिखित है :-

विशेषताएँ

द्विखण्डन

बहुखण्डन

परिस्थितियाँ

अनुकूल परिस्थितियाँ

प्रतिकूल परिस्थितियाँ

विभाजन प्रक्रिया

केन्द्रक दो भागों (पुत्री केन्द्रकों) में विभाजित होता है।

केन्द्रक कई भागों (संतति केन्द्रकों) में विभाजित होता है।

कोशाद्रव्य का बँटवारा

कोशाद्रव्य का बँटवारा केन्द्रक विभाजन के साथ होता है।

कोशाद्रव्य केन्द्रक विभाजन के बाद विभिन्न भागों में बाँटा जाता है।

प्रकार

एककोशिकीय जीव से दो सन्तति जीवो का निर्माण होता हैं।

एककोशिकीय जीव से कई सन्तति जीवों का निर्माण होता हैं।

उदाहरण

अमीबा (Amoeba)

प्लाज्मोडियम ((Amoeba))

7.3 लैंगिक जनन क्या है?

7.3.1 लैंगिक जनन प्रणाली क्यों आवश्यक है?

लैंगिक प्रजनन क्या है? इसके द्वारा उत्पन्न होने वाली संतति में किस प्रकार की विशेषता होती है :-

लैंगिक प्रजनन :- इस प्रकार के प्रजनन में नए जीवों का निर्माण करने के लिए नर और मादा दोनों की भागीदारी अनिवार्य होती है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि संतति उत्पन्न करने के लिए दोनों लिंगों का योगदान आवश्यक होता है। अर्थात्  लैंगिक प्रजनन तब होता है जब नर और मादा युग्मकों का मिलन होता है।

विशेषता :-

इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप संतति में भिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं।

नोट :- 

नर और मादा युग्मकों के मिलन को निषेचन कहा जाता है।

डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनाना जनन हेतु क्यों आवश्यक है :-

डी.एन.ए. :- जनन की प्रक्रिया में डी.एन.ए. का प्रतिकृतिकरण करना एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के द्वारा नए जीवन का निर्माण होता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि जीवधारी की संरचना वही बनी रहती है। इसके परिणामस्वरूप, जीवधारी अपनी उत्पत्ति और पर्यावरण के अनुसार अनुकूलित रहता है।

7.3.2 पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन कैसे होता है?

पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन के अंग कौन से होते हैं और इनका कार्य क्या है :-

पुष्पी पौधे :- आवृतबीजी (एंजियोस्पर्म) पौधों के जनन अंग पुष्प में स्थित होते हैं।  इनमें बाह्यदल, पंखुड़ी, पुंकेसर और स्त्रीकेसर शामिल हैं। पुंकेसर और स्त्रीकेसर ही पुष्प के जनन अंग होते हैं, जिनमें जनन कोशिकाएँ स्थित होती हैं।

फूलों के कौन-कौन से प्रकार होते हैं? इन दोनों प्रकारों में क्या अंतर होता है?  उदाहरण देकर स्पष्ट करें :-

फूलों के दो प्रमुख प्रकार होते हैं :-

1. एकलिंगी पुष्प

2. उभयलिंगी पुष्प

एकलिंगी पुष्प तथा उभयलिंगी पुष्प में अंतर निम्नलिखित है :- 

प्रकार

विवरण

उदाहरण

एकलिंगी पुष्प

इन पुष्प में केवल एक जननांग (पुंकेसर या स्त्रीकेसर) होता है।

पपीता तथा तरबूज

उभयलिंगी पुष्प

इन पुष्प में दोनों जननांग (पुंकेसर और स्त्रीकेसर) होते हैं।

गुड़हल तथा  सरसों

बीज निर्माण की प्रक्रिया के प्रमुख चरणों को क्रमबद्ध तरीके से समझाइए :-

बीज निर्माण की प्रक्रिया के प्रमुख चरण निम्नलिखित है :-

1. परागकण का स्थानांतरण :- परागकोश में उत्पन्न परागकण वायु, जल अथवा जन्तुओं के द्वारा उसी फूल के वर्तिकाग्र (स्वपरागण) अथवा अन्य दूसरे फूलों के वर्तिकाग्र (परपरागण) पर पहुँचते हैं।

2. परागनलिका का विकास :- परागकण से एक परागनलिका का विकस होता है, जो वर्तिका से गुजरते हुए बीजांड तक पहुँचती है।

3. निषेचन :- अंडाशय में नर और मादा युग्मक का निषेचन होता है, जिसके परिणामस्वरूप युग्मनज का निर्माण होता है।

4. विभाजन और भ्रूण का निर्माण :- युग्मनज में विभाजन होता है और  भ्रूण का निर्माण होता है।

5. बीज का निर्माण :- बीजांड द्वारा एक कठोर आवरण का विकस होता है जो बााद में बीज में बदल जाता है।

6. फल का विकास :- अंडाशय एक फल में बन जाता है और फूल के अन्य भाग झड़ने लगते हैं।

अंकुरण क्या है? इसे स्पष्ट रूप से समझाइए :-

अंकुरण :- बीज (जो भविष्य में पौधा बनेगा) या भ्रूण, जब उपयुक्त परिस्थितियों में विकसित होता है तथा नए पौधे के रूप में उभरता है, तो इस प्रक्रिया को अंकुरण कहा जाता है।

परागण और निषेचन में क्या अंतर है? उदाहरण देकर स्पष्ट करें :-

परागण और निषेचन में अंतर निम्नलिखित है :- 

विषय

परागण

निषेचन

परिभाषा

पराग कणों का परागकोश से वर्तिकाग्र तक पहुँचने की प्रक्रिया को परागण कहा जाता है।

नर और मादा युग्मकों का मिलकर नया युग्मज बनाना निषेचन कहलाता है।

प्रक्रिया

परागण में पराग कणों का स्थानांतरण होता है।

निषेचन में नर और मादा युग्मकों का मिलन होता है, जिससे नया जीवन उत्पन्न होता है।

माध्यम

यह प्रक्रिया हवा, पानी, कीट, पक्षी आदि के द्वारा होती है।

उच्च पादपों में यह कार्य परागनलिका द्वारा संपन्न होता है।

समय

परागण निषेचन से पहले ही होता है।

निषेचन परागण के बाद ही होता है।

7.3.3 मानव में लैंगिक जनन कैसे होता है?

मानवों में प्रजनन कैसे होता है :-

मानवों में प्रजनन की प्रक्रिया लैंगिक जनन के द्वारा होती है, जिसमें नर और मादा युग्मकों का मिलन होता है।

लैंगिक परिपक्वता क्या है :-

लैंगिक परिपक्वता :- वह समय जब व्यक्ति के शरीर में यौनिक विकास की प्रक्रिया शुरू होती है, और नर में शुक्राणु तथा मादा में अंड कोशिका का निर्माण प्रारंभ होता है, उसे लैंगिक परिपक्वता कहते हैं। इस अवधि को किशोरावस्था में योवनारंभ भी कहा जाता है।

यौवनारंभ में होने वाले सामान्य परिवर्तन क्या होते हैं :-

यौवनारंभ में होने वाले सामान्य परिवर्तन निम्नलिखित है :-

प्रकार

परिवर्तन

किशोरों में

• कांख तथा जननांग के पास घने बालों का उगना।

• त्वचा का तैलीय हो जाना और मुँहासो का निकलना।

लड़कियों में

• स्तन का आकार बढ़ने लगना।

• रजोधर्म का आरंभ होना।

लड़कों में

• चेहरे पर दाढ़ी और मूंछ का उगना।

• आवाज में बदलाव, यानी आवाज का फटना।

सारांश

ये सभी परिवर्तन इस बात के संकेत हैं कि व्यक्ति लैंगिक परिपक्वता की ओर बढ़ रहा है।

7.3.3 (a) मानव का नर जनन तंत्र कैसे कार्य करता है?

नर जनन तंत्र क्या है :-

नर जनन तंत्र :- में वे अंग शामिल होते हैं जो जनन कोशिकाओं का उत्पादन करते हैं और उन कोशिकाओं को निषेचन स्थल तक पहुँचाते हैं। इन अंगों का संयुक्त कार्य ही नर जनन तंत्र का निर्माण करता है।

नर जनन तंत्र के प्रमुख अंग और उनके कार्य क्या हैं :-

नर जनन तंत्र के प्रमुख अंग और उनके कार्य निम्नलिखित है :- 

अंग

कार्य

नर जनन तंत्र

जनन कोशिका उत्पादक अंग और निषेचन स्थल तक कोशिकाओं को पहुँचाने वाले अंगों का संयुक्त तंत्र।

वृषण

शुक्राणु का निर्माण वृषण में होता है, जो शरीर के तापमान से कम तापमान पर स्थित होते हैं। वृषण ग्रंथि टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन उत्पन्न करती है।

टेस्टोस्टेरॉन

1. शुक्राणु उत्पादन को नियंत्रित करता है।

2. लड़कों में यौवनावस्था के परिवर्तन लाता है।

शुक्रवाहिनी

शुक्राणुओं का मोचन (Ejaculation) शुक्रवाहिनियों द्वारा होता है, जो मूत्राशय से आने वाली नली से जुड़ जाती है, और एक संयुक्त नली का निर्माण करती हैं।

मूत्रमार्ग

मूत्र और वीर्य दोनों के बाहर जाने का मार्ग। इसे शिश्न के बाहरी आवरण के रूप में जाना जाता है।

संबंधित ग्रंथियाँ

शुक्राशय और प्रोस्ट्रेट ग्रंथियाँ अपने स्राव को शुक्रवाहिनी में डालती हैं, जिससे शुक्राणु तरल माध्यम में आते हैं। यह माध्यम शुक्राणुओं को पोषण और स्थानांतरण में सहायता करता है, और मिलकर वीर्य का निर्माण करते हैं।

7.3.3 (b) मानव का मादा जनन तंत्र कैसे कार्य करता है?

मादा जनन तंत्र के प्रमुख अंग और उनके कार्य क्या हैं :-

मादा जनन तंत्र के प्रमुख अंग और उनके कार्य निम्नलिखित है :-

अंग

कार्य

अंडाशय

1. अंडाशय में मादा युग्मक या अंड कोशिका का निर्माण होता है।

2. लड़की के जन्म के समय से ही अंडाशय में अपरिपक्व अंड (हजारों) होते हैं।

3. यौवनारंभ के बाद कुछ अंड परिपक्व होते हैं।

4. प्रत्येक महीने अंडाशय द्वारा एक परिपक्व अंड उत्पन्न होता है।

5. अंडाशय एस्ट्रोजन और प्रोजैस्ट्रोन हार्मोन का निर्माण करता है।

अंडवाहिका (फेलोपियन ट्यूब)

1. अंडाशय से उत्पन्न अंड कोशिका को गर्भाशय तक पहुँचाती है।

2. इस स्थान पर अंड कोशिका और शुक्राणु का निषेचन होता है।

गर्भाशय

1. गर्भाशय एक थैलीनुमा संरचना होती है, जहाँ शिशु का विकास होता है।

2. गर्भाशय ग्रीवा के माध्यम से योनि से जुड़ा होता है।

7.3.3 (c) यदि अंडे का निषेचन न हो तो क्या होता है?

अंड कोशिका का निषेचन होने पर क्या होता है :-

जब अंड कोशिका का निषेचन होता है, तो निषेचित अंड को युग्मनज कहा जाता है, जिसे गर्भाशय में रोपित किया जाता है। गर्भाशय में रोपण के बाद, युग्मनज में विभाजन और विभेदन की प्रक्रिया होती है, जिसके परिणामस्वरूप भ्रूण का निर्माण होता है।

जब अंड कोशिका का निषेचन नहीं होता है, तो क्या प्रक्रिया होती है :-

जब अंड कोशिका का निषेचन नहीं होता है, तो निम्नलिखित प्रक्रिया होती है :-

1. हर महीने निषेचित अंड प्राप्त करने के लिए गर्भाशय खुद को तैयार करता है। 

2. गर्भाशय की भित्ति मांसल और स्पंजी बन जाती है, जो भ्रूण के विकास हेतु आवश्यक होती है।
3. निषेचन नहीं होने पर यह भित्ति आवश्यक नहीं रह जाती है, और धीरे-धीरे टूटकर रक्त और म्यूकस के रूप में योनि के मार्ग से बाहर निकल जाती है।
3. यह चक्र लगभग एक महीने में पूरा होता है, और इसे ऋतुस्राव या रजोधर्म कहा जाता है।
4. 40 से 50 वर्ष की उम्र के पश्चात अंडाशय से अंड का निर्माण होना बंद हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप रजोधर्म समाप्त हो जाता है, इसे रजोनिवृति कहा जाता है।

प्लेसेंटा क्या है और इसका गर्भावस्था में क्या कार्य है :-

प्लेसेंटा एक विशेष प्रकार का ऊतक है, जो गर्भाशय में एक तश्तरी जैसी बनावट में स्थित होता है।

प्लेसेंटा के प्रमुख कार्य निम्नलिखित है :-

1. माँ के रक्त से भ्रूण को पोषक तत्व जैसे ग्लूकोज और ऑक्सीजन प्रदान करना।

2. भ्रूण द्वारा उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थों को हटाना।

गर्भकाल क्या होता है और इसकी अवधि कितनी होती है :-

गर्भकाल :- वह अवधि है जो अंडाणु के निषेचन से लेकर शिशु के जन्म तक होती है। यह सामान्यत: लगभग 9 महीने की होती है।

7.3.3 (d) जनन स्वास्थ्य क्या है और इसका महत्व क्या है?

जनन स्वास्थ्य का क्या अर्थ है :-

कौन से रोग लैंगिक संचरण के माध्यम से फैल सकते हैं, और कंडोम का उपयोग इनसे कैसे बचाव कर सकता है :-

ऐसे कई रोग होते हैं, जो लैंगिक संबंधों के माध्यम से फैल सकते हैं,

उदाहरण :-

1. बैक्टीरियल संक्रमण: सिफलिस, गोनेरिया

2. वायरल संक्रमण: HIV-AIDS, मस्सा (warts)

कंडोम का उपयोग इन रोगों के संचरण को कुछ हद तक रोक सकता है।

गर्भरोधन का क्या अर्थ है :-

गर्भधारण को रोकने की प्रक्रिया को गर्भरोधन कहते हैं।

गर्भरोधन के कौन-कौन से प्रकार होते हैं और प्रत्येक विधि में क्या किया जाता है :-

गर्भरोधन के निम्नलिखित  प्रकार होते हैं :-

प्रकार

विवरण

यांत्रिक अवरोध

शुक्राणुओं को अंडाणु तक पहुँचने से रोकने वाली विधियाँ। 

उदाहरण :-

कंडोम (पुरुषों के लिए), सर्वाइकल कैप (महिलाओं के लिए)।

रासायनिक तकनीक

यह विधि दवाइयों के माध्यम से अंडाणु के उत्पादन को रोकने के लिए हॉर्मोनल संतुलन में बदलाव करती है। 

इसके कुछ विपरीत प्रभाव भी होते हैं।

IUCD (Intra Uterine Contraceptive Device)

गर्भाशय में लूप या कॉपर-टी डालने से गर्भधारण को रोका जाता है।

शल्यक्रिया तकनीक

1. नसबंधी (Vasectomy): पुरुषों में शुक्रवाहिकाओं को ब्लॉक करके शुक्राणुओं के स्थानांतरण को रोक देना।

2. ट्यूबेक्टोमी (Tubectomy): महिलाओं में अंडवाहिनी को अवरुद्ध करके अंड के स्थानांतरण को रोक देना।।

भ्रूण हत्या क्या है, और स्वस्थ समाज के लिए लिंग अनुपात का संतुलन क्यों आवश्यक है :-

भ्रूण हत्या :- जब मादा भ्रूण को गर्भाशय में ही नष्ट कर दिया जाता है, तो इसे भ्रूण हत्या कहा जाता है।

लिंग अनुपात का संतुलन एक स्वस्थ समाज के लिए बहुत आवश्यक है, और यह तभी संभव है जब लोग भ्रूण हत्या और भ्रूण लिंग निर्धारण जैसी प्रथाओं के बारे में जागरूक हों और इन्हें रोका जाए।

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