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CLASS IX SOCIAL SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 6

लोकतंत्र — Democracy

TextbookNCERT
ClassClass IX
SubjectUnderstanding Society: India and Beyond
ChapterChapter 6
Chapter Nameलोकतंत्र
MediumHindi

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?

  1. 1.1 भारत में प्राचीन काल से लोकतांत्रिक परंपराएँ
  2. 1.2 संविधान सभा और भारतीय संविधान
  3. 1.3 लोकतंत्र के सिद्धांत
    1. 1.3.1 जनता की सर्वोच्च सत्ता (Popular Sovereignty)
    2. 1.3.2 विधि का शासन (Rule of Law)
    3. 1.3.3 मौलिक अधिकार
    4. 1.3.4 शक्तियों का पृथक्करण
    5. 1.3.5 जवाबदेही और पारदर्शिता
    6. 1.3.6 बहुदलीय व्यवस्था
    7. 1.3.7 कमजोर वर्गों के अधिकारों की सुरक्षा
  4. 1.4 लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका
  5. 1.5 लोकतंत्र के प्रकार
  6. 1.6 विश्व में लोकतंत्र — तुलनात्मक अध्ययन
  7. 1.7 भारत का जीवंत लोकतंत्र
  8. 1.8 जमीनी स्तर पर लोकतंत्र
    1. 1.8.1 त्रि-स्तरीय शासन व्यवस्था
    2. 1.8.2 केस स्टडी — पंचायतों की भूमिका
  9. 1.9 महिलाएँ और मतदान का अधिकार
  10. 1.10 सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI), 2005
  11. 1.11 भारतीय लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियाँ
    1. 1.11.1 आपातकाल (1975–77)
  12. 1.12 लोकतंत्र और आप — युवा नागरिक की भूमिका

1.1 भारत में प्राचीन काल से लोकतांत्रिक परंपराएँ

लोकतंत्र का विचार भारतीय जीवन-मूल्यों का प्रारंभ से ही हिस्सा रहा है। पिछले अध्याय में हमने वैदिक काल की सभा, समिति और विदथ जैसी सभाओं के बारे में पढ़ा, जो सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया में शामिल होती थीं। प्रारंभिक गणतांत्रिक राज्यों (गण या संघ) के कामकाज से भी यही स्पष्ट होता है कि आरंभ से ही राजा स्वतंत्र शासक नहीं था, बल्कि सभाओं, मंत्रियों और विभिन्न अधिकारियों से परामर्श कर कार्य करता था।

ऐक्यमत्य सूक्तम्:-

ऋग्वेद का एक सूक्त, जो सामूहिक चिंतन, साझा विचार-विमर्श और उद्देश्य की एकता के महत्व पर बल देता है। इसमें व्यक्त मूल्य — परामर्श, सहमति व साझा उत्तरदायित्व — भारत की बौद्धिक व सांस्कृतिक परंपराओं में लोकतांत्रिक सिद्धांतों की गहरी जड़ों को दर्शाते हैं।

समानो मन्त्रः समितिः समानी, समानं मनः सह चित्तमेषाम् ।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः, समानेन वो हविषा जुहोमि ॥ — ऋग्वेद, 10.191.3

बौद्ध संघ:-

गौतम बुद्ध द्वारा स्थापित एक मठवासी (मॉनैस्टिक) समुदाय, जो भी भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं को दर्शाता है। संघ में वाद-विवाद व चर्चा को प्रोत्साहन दिया जाता था, और इसके सदस्य अपने नेता को चुन सकते थे तथा मतदान द्वारा निर्णय ले सकते थे — यह सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया का उदाहरण है।

समय के लंबे दौर में विदेशी आक्रमणों ने देश के कुछ हिस्सों के राजनीतिक व सामाजिक ढाँचे को अस्त-व्यस्त किया। 19वीं सदी तक ब्रिटिश शासन ने भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश भाग पर अपना उपनिवेश स्थापित कर लिया था, जिससे राजनीतिक संरचनाएँ बदलीं और शासन में लोगों की भागीदारी सीमित हुई। तथापि, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता के लंबे संघर्ष ने लोगों में लोकतांत्रिक विचारों को पुनर्जीवित व सुदृढ़ किया।

1.2 संविधान सभा और भारतीय संविधान

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले, देश के लिए संविधान का प्रारूप तैयार करने हेतु 1946 में संविधान सभा का गठन किया गया। सभा को विश्व के सबसे लंबे लिखित संविधान का प्रारूप तैयार करने में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन लगे। स्वदेशी लोकतांत्रिक परंपराओं के अतिरिक्त, लोकतांत्रिक मूल्यों के वैश्विक प्रसार ने भी संविधान सभा की बहसों (CAD) को प्रभावित किया, जिसने एक सुदृढ़, लचीले, परिवर्तनकारी व प्रतिक्रियाशील संविधान के निर्माण में योगदान दिया।

नोट:- डॉ. बी.आर. अम्बेडकर भारतीय संविधान की प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष थे। संविधान 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।

संविधान सभा की बहसें इस विश्वास को दर्शाती हैं कि संविधान कोई कठोर कानूनी संहिता नहीं, बल्कि एक गतिशील दस्तावेज़ है जो अपने मूलभूत मूल्यों से समझौता किए बिना वैध संशोधनों के माध्यम से विकसित हो सकता है। इसी अनुरूप, अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधन का प्रावधान भी दिया गया है, जिससे संविधान बदलती सामाजिक-राजनीतिक आवश्यकताओं के प्रति लचीला व प्रतिक्रियाशील बना रहता है।

1.3 लोकतंत्र के सिद्धांत

1.3.1 जनता की सर्वोच्च सत्ता (Popular Sovereignty)

जनता की सर्वोच्च सत्ता:-

लोकतंत्र में शक्ति का अंतिम स्रोत जनता में निहित होता है — यानी राज्य अपनी सत्ता जनता से प्राप्त करता है। स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनावों के माध्यम से चुनी गई सरकार नीतियाँ बनाती है और कानूनों को लागू करती है।

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार:-

18 वर्ष या उससे अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को गुप्त मतदान (secret ballot) के माध्यम से वोट देने का अधिकार। नागरिक इस अधिकार का प्रयोग सरकार व प्रतिनिधियों को चुनने के लिए करते हैं।

1.3.2 विधि का शासन (Rule of Law)

विधि का शासन:-

किसी भी लोकतांत्रिक समाज का मूलभूत सिद्धांत, जो कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण को सुनिश्चित करता है, और यह स्थापित करता है कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है। कानूनों के उल्लंघन पर विवाद बल या व्यक्तिगत प्रभाव से नहीं, बल्कि विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के माध्यम से न्यायालय में सुलझाए जाते हैं। इससे शक्ति के दुरुपयोग को रोका जाता है और जनता के अधिकार सुरक्षित रहते हैं।

नोट:- संविधान के अनुच्छेद 21 में "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" का सिद्धांत निहित है, जिसके अनुसार "किसी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है।"

1.3.3 मौलिक अधिकार

मौलिक अधिकार:-

भारतीय संविधान में निहित छह मौलिक अधिकार — नागरिकों के अधिकार, स्वतंत्रता व गरिमा की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये न्यायालयों में प्रवर्तनीय (enforceable) हैं तथा अविभाज्य व अहस्तांतरणीय हैं, फिर भी विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार युक्तियुक्त प्रतिबंधों के अधीन हैं।

  1. समता का अधिकार (अनुच्छेद 14–18)
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19–22)
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23–24)
  4. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25–28)
  5. सांस्कृतिक व शैक्षणिक अधिकार (अनुच्छेद 29–30)
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)
नोट:- शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21A) 2009 में जोड़ा गया, जो 6 से 14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करता है।

1.3.4 शक्तियों का पृथक्करण

शक्तियों का पृथक्करण:-

विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका के बीच शक्तियों का बँटवारा — प्रत्येक की अलग-अलग जिम्मेदारियाँ होती हैं, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाएँ प्रभावी व उत्तरदायी ढंग से कार्य कर पाती हैं। विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है, और न्यायपालिका उनकी व्याख्या करती है — इस तरह किसी एक अंग में शक्ति का संकेंद्रण रुकता है। यह पृथक्करण सरकार के तीनों अंगों के बीच नियंत्रण व संतुलन (checks and balances) बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

जनहित याचिका (PIL):-

जनहित के प्रवर्तन के लिए न्यायालय में शुरू की गई कानूनी कार्यवाही। न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है और सभी वर्गों के लोकतांत्रिक मूल्यों व अधिकारों की सुरक्षा व संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है — जनहित याचिका जैसी पहल सभी को न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर की जाती रही हैं।

1.3.5 जवाबदेही और पारदर्शिता

लोकतांत्रिक सरकारें नागरिकों के प्रति जवाबदेह होती हैं। चुनावों, सार्वजनिक बहसों और सिविल सोसाइटी के साथ जुड़ाव के माध्यम से नागरिक सरकार के कार्यों का मूल्यांकन कर सकते हैं। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही व पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाली विभिन्न संस्थागत व नीतिगत व्यवस्थाएँ मौजूद हैं — जैसे सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005, जो नागरिकों को सरकारी एजेंसियों से जानकारी माँगने की अनुमति देता है।

प्रक्रियासंस्थाएँलोकतांत्रिक मूल्य
विधायी प्रक्रियाविधायिका (संसद, राज्य विधायिका, स्थानीय निकाय)प्रतिनिधित्व, विचार-विमर्श, असहमति
चुनावी प्रक्रियाभारत निर्वाचन आयोगभागीदारी, समानता
न्यायिक प्रक्रियान्यायालयविधि का शासन, समानता, न्याय
सहभागी प्रक्रियामीडिया, सिविल सोसाइटीबहस-विचार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
जवाबदेही तंत्रCAG, CIC, लोकपाल, CVCपारदर्शिता
विकेंद्रीकरणग्रामीण व शहरी स्थानीय निकायजमीनी स्तर पर भागीदारी
संघवादकेंद्र-राज्य शक्ति विभाजन (लिखित संविधान)शक्ति का हस्तांतरण

1.3.6 बहुदलीय व्यवस्था

बहुदलीय व्यवस्था:-

एक ऐसी व्यवस्था जिसमें कई राजनीतिक दल चुनाव लड़ते हैं, जो विविध आवाज़ों व हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं — इससे लोगों को अपने अनुसार सर्वाधिक उपयुक्त दल चुनने की शक्ति मिलती है। संसद या राज्य विधानसभा के चुनावों में जो दल — या दलों का गठबंधन — 50 प्रतिशत से अधिक सीटें प्राप्त करता है, वह सरकार बनाता है, जबकि सबसे बड़ा विरोधी समूह विपक्ष कहलाता है। राजनीतिक दल जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 द्वारा निर्धारित नियमों के ढाँचे में कार्य करते हैं।

1.3.7 कमजोर वर्गों के अधिकारों की सुरक्षा

सरकार का यह कर्तव्य है कि वह जाति, लिंग, धर्म या क्षेत्रीय पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना सभी समुदायों की रक्षा करे। ऐतिहासिक कारकों के चलते अवसरों व संसाधनों का असमान वितरण हुआ है, इसलिए यह आवश्यक है कि सरकार बिना भेदभाव के, विशेषकर समाज के सबसे कमजोर वर्गों तक, संसाधनों का समान वितरण सुनिश्चित करे।

नोट:- संविधान का अनुच्छेद 46 कहता है कि "राज्य जनता के दुर्बल वर्गों के, विशिष्टतया अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के, शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा तथा उन्हें सामाजिक अन्याय और सब प्रकार के शोषण से संरक्षित रखेगा।"

1.4 लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ:-

मीडिया आज हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गया है। यह विश्व भर की घटनाओं की जानकारी देने के साथ-साथ जनता की आवाज़ के रूप में भी कार्य करता है। समाचार-पत्र, समाचार चैनल और सोशल मीडिया मंच जनता से जुड़े मुद्दों को उठाते हैं और उपयुक्त तंत्रों के माध्यम से उनके समाधान में योगदान देते हैं। लोगों की आवाज़ की रक्षा व लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका के कारण मीडिया को प्रायः 'लोकतंत्र का चौथा स्तंभ' कहा जाता है।

1.5 लोकतंत्र के प्रकार

प्रकारविशेषताएँउदाहरण
प्रत्यक्ष लोकतंत्रनागरिक अधिकांश निर्णय-प्रक्रियाओं में सीधे भाग लेते हैं; बड़े देशों में लागू करना कठिनस्विट्ज़रलैंड
प्रतिनिध्यात्मक लोकतंत्र (अप्रत्यक्ष)जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है; आवधिक चुनाव; सरकार जनता के प्रति उत्तरदायीभारत
संसदीय लोकतंत्रकार्यपालिका के सदस्य विधायिका के भी सदस्य होते हैं; कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायीभारत, कनाडा
राष्ट्रपति-प्रणाली लोकतंत्रकार्यपालिका विधायिका से स्वतंत्र; राष्ट्रपति सीधे जनता द्वारा निर्वाचितसंयुक्त राज्य अमेरिका

1.6 विश्व में लोकतंत्र — तुलनात्मक अध्ययन

यद्यपि लोकतंत्र की कुछ मूलभूत विशेषताएँ — जैसे स्वतंत्रता, समानता, भागीदारी, विधि का शासन, अधिकार व कर्तव्य — सभी लोकतंत्रों में साझा होती हैं, फिर भी लोकतंत्र किसी एक ही मॉडल की सरकार प्रदान नहीं करता। लोकतंत्र की विशेषताएँ देश-दर-देश भिन्न होती हैं।

देशलोकतंत्र का प्रकारशासन का प्रमुख
भारतप्रतिनिध्यात्मक (संसदीय)राष्ट्रपति (राज्य प्रमुख), प्रधानमंत्री (शासन प्रमुख)
कनाडाप्रतिनिध्यात्मक (संसदीय)गवर्नर-जनरल, प्रधानमंत्री
यूनाइटेड किंगडमसंसदीय (संवैधानिक राजतंत्र सहित)सम्राट/सम्राज्ञी, प्रधानमंत्री
स्विट्ज़रलैंडप्रत्यक्ष लोकतंत्रराष्ट्रपति (संघीय परिषद प्रमुख)
संयुक्त राज्य अमेरिकाप्रतिनिध्यात्मक (राष्ट्रपति-प्रणाली)राष्ट्रपति
नोट:- भारत में केंद्र व राज्यों के बीच शक्ति-विभाजन संविधान की संघ, राज्य व समवर्ती सूची के माध्यम से सुनिश्चित होता है, और अवशिष्ट शक्ति केंद्र सरकार के पास रहती है — इसे संघवाद (Federalism) कहा जाता है।

1.7 भारत का जीवंत लोकतंत्र

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, और भारतीय चुनावों में मतदान करने वालों की संख्या कई देशों की कुल जनसंख्या से भी अधिक है। 2024 में भारत में 96.8 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाता थे।

नोट:- औसतन एक सांसद लगभग 25 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है (2019)। चुनाव 22 अनुसूचित भाषाओं व अन्य कई भाषाओं में संपन्न होते हैं। दस लाख से अधिक मतदान केंद्र — पहाड़, जंगल, रेगिस्तान व द्वीप जैसे दूरस्थ क्षेत्रों सहित — स्थापित किए जाते हैं, कभी-कभी एक ही मतदाता के लिए भी। भारत में 2,800 से अधिक पंजीकृत राजनीतिक दल हैं।

भारतीय लोकतंत्र को सचमुच "जीवंत" बनाने वाली बात इसकी विविधता और चुनावी प्रक्रिया में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी है। भारतीय मतदाता वर्ग विभिन्न भाषाई, धार्मिक व सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमियों के लोगों से बना है, जो एक ही लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर भाग लेते हैं।

1.8 जमीनी स्तर पर लोकतंत्र

1.8.1 त्रि-स्तरीय शासन व्यवस्था

भारत का संवैधानिक ढाँचा संघ, राज्य और स्थानीय सरकारों की त्रि-स्तरीय व्यवस्था के माध्यम से कार्य करता है, जो प्रशासनिक दक्षता व लोकतांत्रिक भागीदारी को सुगम बनाता है। पंचायती राज व नगरपालिकाओं के अतिरिक्त, संविधान जनजातीय विरासत की रक्षा हेतु भी प्रावधान करता है — विशिष्ट पूर्वोत्तर क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषदें (ADC) स्थापित की गई हैं, जिन्हें जनजातीय रीति-रिवाजों को संरक्षित रखने हेतु विधायी व न्यायिक अधिकार प्राप्त हैं। पेसा अधिनियम, 1996 (पंचायत उपबंध अनुसूचित क्षेत्र विस्तार अधिनियम) अन्य राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होता है, जो ग्राम सभा को प्रमुख निर्णय-निर्धारक निकाय के रूप में सशक्त बनाता है।

1.8.2 केस स्टडी — पंचायतों की भूमिका

जेथीपुरा ग्राम पंचायत (सबरकांठा, गुजरात):-

वर्ष 2019 में अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए नानाजी देशमुख राष्ट्रीय गौरव ग्राम सभा पुरस्कार (NDRGGSP) से सम्मानित। इसने ग्राम सभाओं का प्रभावी संचालन, रिकॉर्ड का उचित रखरखाव और विशेष ग्राम सभाओं का आयोजन सुनिश्चित किया। शिक्षा, स्वच्छता व महिला-बाल कल्याण से संबंधित मुद्दों पर समय पर कार्रवाई हुई, और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के साथ ग्राम सभाओं में पर्याप्त कोरम सुनिश्चित किया गया।

दक्षिण मानुबांकुल ग्राम पंचायत (त्रिपुरा):-

विशेषतः महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने पर केंद्रित एक सक्रिय स्थानीय सरकार। यह निर्णय-प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देती है और स्वास्थ्य, स्वच्छता व आजीविका से संबंधित सुविधाएँ प्रदान करती है। महिला कल्याण व समावेशी विकास पर मजबूत फोकस के कारण इसे पंचायती राज मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर "महिला-अनुकूल पंचायत" के रूप में मान्यता मिली।

इन उदाहरणों से पता चलता है कि भारत में लोकतंत्र चुनावों के दौरान मतदान तक सीमित नहीं है। जब नागरिक जमीनी स्तर और पंचायती राज संस्थाओं में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं, तो लोकतंत्र सभी स्तरों पर अधिक उत्तरदायी, समावेशी व प्रभावी बन जाता है।

1.9 महिलाएँ और मतदान का अधिकार

कई देशों में महिलाओं को मतदान का अधिकार पाने के लिए एक लंबा व कठिन संघर्ष करना पड़ा। ब्रिटेन में महिलाओं को पूर्ण मताधिकार 1928 में मिला, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में यह 1920 में, दशकों के विरोध-प्रदर्शनों व आंदोलनों के बाद प्राप्त हुआ। इसके विपरीत, भारत में महिलाओं को यह अधिकार दिया गया — जब 1950 में संविधान लागू हुआ, तो सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों — स्त्री-पुरुष दोनों — को दिया गया, और भारतीय महिलाओं को मताधिकार पाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई या विरोध-प्रदर्शन नहीं करना पड़ा।

नोट:- संविधान के अनुच्छेद 243(d) के अनुसार प्रत्येक पंचायत में सीधे चुनाव से भरी जाने वाली कुल सीटों में से कम से कम एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं — 21 राज्यों व 2 केंद्रशासित प्रदेशों ने इसे बढ़ाकर 50% कर दिया है। इसी प्रकार, अनुच्छेद 243(t) के अनुसार प्रत्येक नगरपालिका में भी कम से कम एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं — 2023 तक 17 राज्यों व 1 केंद्रशासित प्रदेश ने इसे 50% कर दिया है।

1.10 सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI), 2005

सूचना का अधिकार अधिनियम:-

प्रतिनिधित्व व विधायन (legislation) की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से भारत में अधिनियमित एक कानून, जो नागरिकों को सरकारी विभागों से सूचना माँगने का अधिकार देता है, जिससे जवाबदेही व लोकतांत्रिक शासन मजबूत होता है। नागरिकों, पत्रकारों, सिविल सोसाइटी समूहों और निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा पारदर्शिता व जवाबदेही से जुड़ी चिंताओं की जाँच संसदीय समितियों ने की, विशेषज्ञ समूहों ने इस प्रस्ताव की समीक्षा की, संसद में इस पर बहस हुई, और विभिन्न हितधारकों के परामर्श से इसे परिष्कृत किया गया। संसद द्वारा पारित होने के बाद यह अधिनियम 2005 में लागू हुआ।

1.11 भारतीय लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियाँ

लोकतंत्र को संस्थाओं व नागरिकों दोनों से निरंतर देखभाल, जागरूकता व सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता होती है। संविधान सभी नागरिकों को मूल्यवान अधिकार तो प्रदान करता है, लेकिन साथ ही व्यक्तियों से इन अधिकारों का जिम्मेदारी से प्रयोग करने की अपेक्षा भी रखता है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, भ्रामक सूचना फैलाना, या सार्वजनिक नियमों का उल्लंघन करना जैसे कार्य लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करते हैं।

भारत ने प्रतिनिधित्व व भागीदारी सुनिश्चित करने में उल्लेखनीय प्रगति की है, फिर भी उसे निरक्षरता, गलत सूचना और असमानता जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हाल के समय में, विशेषकर सोशल मीडिया व अन्य डिजिटल मंचों के माध्यम से फर्जी खबरों (fake news) का प्रसार एक बड़ी चिंता बनकर उभरा है। गरीबी, क्षेत्रवाद, लैंगिक असमानता व सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दे भी समान भागीदारी में बाधाएँ खड़ी करते हैं।

1.11.1 आपातकाल (1975–77)

आपातकाल:-

भारत में लोकतंत्र के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक, जो 1975–77 में लगाई गई थी। जून 1975 में आंतरिक अशांति के आधार पर सरकार द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया। इस अवधि में अधिकांश मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लगी, और कई राजनीतिक नेताओं व कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। लोकतांत्रिक संस्थाएँ गंभीर दबाव में आईं और नागरिकों की स्वतंत्रता सीमित हुई।

नोट:- संविधान के अनुच्छेद 352, 356 व 360 क्रमशः राष्ट्रीय आपातकाल, राष्ट्रपति शासन व वित्तीय आपातकाल की घोषणा के प्रावधानों से संबंधित हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए जन आंदोलनों ने, विशेषकर बिहार व गुजरात में, विद्यार्थियों व नागरिकों को लामबंद किया। 1977 में आपातकाल हटा लिया गया, और आम चुनावों में सत्तारूढ़ सरकार की पराजय ने भारतीय लोकतंत्र की मजबूती को दर्शाया।

1.12 लोकतंत्र और आप — युवा नागरिक की भूमिका

सुसूचित रहना एक युवा नागरिक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक है। समाचार-पत्र पढ़ना, समाचार कार्यक्रम देखना और इंटरनेट का जिम्मेदारी से उपयोग करना हमें राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के प्रति जागरूक रहने में सहायक है। प्रामाणिक सूचना तक पहुँच हमें सार्वजनिक मुद्दों पर सुविचारित राय बनाने और समाज में सकारात्मक योगदान देने में सक्षम बनाती है।

नागरिक उत्तरदायित्व:-

इसमें दूसरों के अधिकारों का सम्मान, सोशल मीडिया का जिम्मेदार उपयोग, कानूनों व नियमों का पालन, देश की विविधता की सराहना, और एकता को मजबूत करने वाली गतिविधियों में भागीदारी शामिल है। राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) और राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC) जैसे कार्यक्रम नागरिक उत्तरदायित्व, सामाजिक जागरूकता व लोकतांत्रिक आदर्शों के प्रति सम्मान विकसित करने हेतु डिज़ाइन किए गए हैं।

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