CLASS IX SOCIAL SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 5
राज्य और समाज (1000 ई. तक) — State and Society up to 1000 CE
| Textbook | NCERT |
|---|---|
| Class | Class IX |
| Subject | Understanding Society: India and Beyond |
| Chapter | Chapter 5 |
| Chapter Name | राज्य और समाज (1000 ई. तक) |
| Medium | Hindi |
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
- 1.1 समाज और राज्य — बुनियादी अवधारणाएँ
- 1.2 वैदिक काल में राजनीतिक संस्थाएँ
- 1.3 प्रारंभिक जनपद और महाजनपद
- 1.4 राजा के कर्तव्य और आदर्श
- 1.5 मंत्रिपरिषद और सप्तांग सिद्धांत
- 1.6 साम्राज्यों का प्रशासन
- 1.7 नैतिकता — कानून और जीवन का आधार
- 1.8 सामाजिक संरचना — वर्ण और जाति
- 1.9 परिवार और समाज
- 1.10 महिलाओं की भूमिका
- 1.11 धार्मिक जीवन और भक्ति का उदय
- 1.12 शिक्षा की खोज — गुरुकुल प्रणाली
- 1.13 अर्थव्यवस्था
1.1 समाज और राज्य — बुनियादी अवधारणाएँ
समाज:-
एक सामान्य भू-भाग, संस्कृति और साझा अपनेपन की भावना रखने वाले व्यक्तियों के बीच सामाजिक संबंधों की व्यवस्था। इसमें परिवार जैसी संरचनात्मक इकाइयाँ और विवाह जैसी संस्थाएँ शामिल होती हैं। समाज मुख्यतः रीति-रिवाजों और प्रथाओं से नियंत्रित होता है, न कि औपचारिक कानूनों से।
राज्य:-
नियमों और कानूनों पर आधारित एक संगठित राजनीतिक व्यवस्था, जिसमें शासकों और प्रजा के अधिकार-कर्तव्य, शासन की व्यवस्थाएँ, तथा कानून-व्यवस्था लागू करने वाली संस्थाएँ शामिल होती हैं। समाज बड़े और जटिल होते गए, वैसे-वैसे ऐसी राजनीतिक व्यवस्थाएँ धीरे-धीरे विकसित हुईं।
1.2 वैदिक काल में राजनीतिक संस्थाएँ
वेद भारतीय साहित्य का सबसे प्राचीन संग्रह हैं, क्योंकि सिंधु-सरस्वती सभ्यता की लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। ऋग्वेद की रचना उत्तर-पश्चिमी भारत के सप्त-सिंधु क्षेत्र में हुई थी।
1.2.1 जन और कुल
जन:-
प्रारंभिक वैदिक समाज कुनबे (जन) में संगठित था — रक्त-संबंध से बंधे लोगों के समूह। ऋग्वेद में लगभग तीस जनों का उल्लेख है, जिनमें से पाँच (यदु, तुर्वश, पुरु, अनु, द्रुह्यु) मिलकर "पंचजन" कहलाते थे।
1.2.2 राजा और तीन सभाएँ
इस काल में राजा मुख्यतः कुल-प्रमुख के रूप में कार्य करता था, जो युद्ध में समूह का नेतृत्व करता था और सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करता था। ऋग्वेद और अथर्ववेद में तीन सभाओं का उल्लेख मिलता है।
| सभा | स्वरूप और कार्य |
|---|---|
| सभा | छोटी संस्था, मुख्यतः न्यायिक कार्य, चुनिंदा कुलीनों से बनी |
| समिति | बड़ी संस्था, नीतिगत निर्णय और राजनीतिक मामले, व्यापक जनसंख्या का प्रतिनिधित्व |
| विदथ | सामान्य जनों की सभा, युद्ध व अन्य राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा का मंच |
1.3 प्रारंभिक जनपद और महाजनपद
1.3.1 जनपद से महाजनपद तक
जनपद:-
समय के साथ वैदिक समाज की राजनीतिक व्यवस्था क्षेत्र-आधारित इकाइयों — जनपदों में विकसित हुई। 'जनपद' का शाब्दिक अर्थ है वह स्थान जहाँ किसी जन (जाति/कुल) ने सबसे पहले पैर रखा — यानी कुल-आधारित पहचान से क्षेत्रीय पहचान की ओर संक्रमण। यह परिवर्तन लगभग 1000 ई.पू. से 600 ई.पू. के बीच हुआ।
महाजनपद:-
लगभग 600 ई.पू. से 300 ई. के बीच बड़ी राजनीतिक इकाइयों — महाजनपदों का उदय हुआ। ऐतिहासिक स्रोतों में सामान्यतः सोलह महाजनपदों का उल्लेख मिलता है, जिनमें मगध (वर्तमान बिहार) अपनी रणनीतिक स्थिति, उपजाऊ मैदानों और सशक्त शासकों के कारण सबसे शक्तिशाली बनकर उभरा।
1.3.2 दक्षिण भारत के प्रारंभिक राज्य (तमिलकम)
दक्षिण भारत में चोल (कावेरी नदी घाटी), पांड्य (ताम्रपर्णी व वैगई घाटी), केरलपुत्र (चेर) और सत्यपुत्र जैसे राज्य थे। इनका उल्लेख अशोक के अभिलेखों में भी मिलता है। चोल, चेर और पांड्य शासकों को तमिलकम के "तीन मुकुटधारी राजा" या 'वेंडर' कहा जाता था। इनकी जानकारी संगम साहित्य (300 ई.पू.–300 ई.) से मिलती है।
1.4 राजा के कर्तव्य और आदर्श
छठी शताब्दी ई.पू. से शासक विभिन्न क्षेत्रों में राजा, महाराजा या सम्राट जैसी उपाधियों से जाने जाने लगे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार राजा का ऊर्जावान और सक्रिय होना आवश्यक था, तभी उसके अधिकारी भी सक्रिय रहते थे। महाभारत का शांतिपर्व राजा के नैतिक आचरण, न्याय और उसकी प्रजा के प्रति उत्तरदायित्वों पर मार्गदर्शन देता है — बाहरी खतरों व आंतरिक अव्यवस्था से रक्षा, तथा अपहरण, चोरी, व्यभिचार जैसे मामलों में न्याय।
1.4.1 चक्रवर्ती सम्राट की अवधारणा
चक्रवर्ती क्षेत्र:-
प्रारंभिक भारतीय राजाओं की भौगोलिक-राजनीतिक चेतना अपने राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप तक फैली थी। इसे जम्बूद्वीप, भारतवर्ष, अश्वमेध व राजसूय यज्ञ, पृथिवी और चक्रवर्ती क्षेत्र जैसे शब्दों से व्यक्त किया गया। अर्थशास्त्र के अनुसार पृथिवी हिमवत (हिमालय) और समुद्र के बीच की भूमि है, जिसे "सार्वभौम शासक का क्षेत्र" कहा गया।
1.5 मंत्रिपरिषद और सप्तांग सिद्धांत
सप्तांग सिद्धांत:-
कौटिल्य के अनुसार राज्य सात अंगों से बना एक जैविक समग्र (organic whole) था — स्वामी (राजा), अमात्य (मंत्री/अधिकारी), जनपद (क्षेत्र व जनसंख्या), दुर्ग (किलेबंद नगर), कोष (राजकोष), दंड (सेना व कानून-व्यवस्था) और मित्र (सहयोगी)। राज्य तभी प्रभावी ढंग से कार्य कर सकता था जब ये सभी अंग परस्पर समन्वित हों।
राजा अकेले शासन नहीं करता था, बल्कि मंत्रि-परिषद (वृद्ध राजनेताओं की छोटी संस्था) उसे सलाह व सहयोग देती थी। इसमें कोषाध्यक्ष, प्रमुख कर-संग्रहकर्ता, प्रमुख विधि-सलाहकार और सेनापति शामिल होते थे। एक अशोककालीन अभिलेख बताता है कि सम्राट की अनुपस्थिति में मंत्रि-परिषद स्वतंत्र रूप से जनहित में निर्णय ले सकती थी।
1.6 साम्राज्यों का प्रशासन
1.6.1 मौर्य और सातवाहन प्रशासन
प्रारंभिक भारतीय राज्य व साम्राज्य सामान्यतः प्रांतों में बँटे थे, जो आगे मंडलों और जिलों में विभाजित होते थे। सातवाहन साम्राज्य आहार (प्रशासनिक विभाग) में बँटा था, जिसका प्रमुख अमात्य होता था। आहारों के नीचे ग्रामिक (गाँव का मुखिया) द्वारा शासित गाँव होते थे। जिला-स्तर पर प्रदेशिक न्यायिक व प्रशासनिक कार्यों के उत्तरदायी थे, और वे प्रायः बैंकर, कारवाँ-नेता, कारीगर व लेखकों जैसे प्रमुख निवासियों से परामर्श कर निर्णय लेते थे।
1.6.2 विकेंद्रीकरण का दौर (लगभग 300–800 ई.)
लगभग 300 से 800 ई. के बीच सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ। राज्य को प्रांतों में बाँटा गया, जिन्हें उत्तर में भुक्ति और दक्षिण में मंडल कहा जाता था। प्रांत आगे विभाजित थे — उत्तर में विषय/भोग और दक्षिण में कोट्टम/वलनाडु; फिर जिले — उत्तर में अधिष्ठान/पत्तन और दक्षिण में नाडु; और गाँवों के समूह — उत्तर में विथि तथा दक्षिण में पट्टला/कूर्रम। सबसे निचली इकाई गाँव थी।
गुप्तों ने कौटिल्य की पूर्व-प्रचलित व्यवस्था को काफी हद तक बनाए रखा — मंत्री नागरिक प्रशासन का प्रमुख होता था। गुप्त काल में 'संधिविग्रहिक' (शांति व युद्ध मंत्री) नामक नया पद जोड़ा गया, और कुमारामात्य नामक स्थानीय/प्रांतीय प्रशासक भी सामने आए। दामोदरपुर ताम्रपत्र (कुमारगुप्त प्रथम के काल के) के अनुसार जिला-कार्यालय में पाँच सदस्य होते थे — प्रमुख जिला अधिकारी, प्रमुख बैंकर, प्रमुख कारवाँ व्यापारी, प्रमुख कारीगर और राजस्व प्रमुख।
1.6.3 ग्राम स्वायत्तता — पल्लव और चालुक्य
पल्लवों (लगभग 275–897 ई.) ने केंद्रीकृत राजतंत्र और विकेंद्रीकृत स्थानीय शासन का मिश्रण अपनाया। इनकी एक विशेषता गाँवों को दिए जाने वाले कर-मुक्त भूमि-अनुदान थे, जिन्हें ब्रह्मदेय गाँव कहा जाता था। ग्राम सभाओं की वरियम नामक छोटी समितियाँ सिंचाई, बगीचों और मंदिर-प्रबंधन जैसे विशिष्ट कार्य संभालती थीं। चालुक्यों (लगभग 543–753 ई.) ने भी ब्रह्मिन बस्तियों को अग्रहारम नामक भूमि-अनुदान दिए, जिनमें से कुछ (जैसे ऐहोल व बादामी) आगे चलकर शिक्षा के प्रमुख केंद्र बने।
1.6.4 चोल प्रशासन और उत्तरामेरुर अभिलेख
परवर्ती (साम्राज्यवादी) चोल (9वीं–11वीं सदी) अपनी कुशल प्रशासनिक व राजस्व व्यवस्था के लिए जाने जाते थे। चोल साम्राज्य मंडलम (प्रांत), वलनाडु (जिले), नाडु (गाँवों के समूह) और अंततः उर (व्यक्तिगत गाँव) में बँटा था। गाँव सबसे छोटी इकाई थी, और ग्राम सभाएँ विवाद निपटाने व स्थानीय मामलों के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं — ये राजस्व वसूली, भूमि-प्रबंधन, सिंचाई, सड़क निर्माण आदि के लिए स्वतंत्र व आत्मनिर्भर संस्थाओं की तरह कार्य करती थीं।
कुडवोलई (मतपत्र-घट प्रणाली):-
परांतक प्रथम (10वीं सदी) के उत्तरामेरुर अभिलेख में वर्णित ग्राम-चुनाव पद्धति। योग्य उम्मीदवारों के नाम ताड़-पत्रों पर लिखकर एक बड़े घड़े में रखे जाते थे। सार्वजनिक सभा में एक बालक इन पत्तों को एक-एक कर निकालता था, जिससे ग्राम सभा और उसकी समितियों (वरियम) के प्रतिनिधि चुने जाते थे। निष्पक्षता के लिए यह प्रक्रिया प्रायः मंदिर में, समुदाय की उपस्थिति में की जाती थी।
1.7 नैतिकता — कानून और जीवन का आधार
धर्म:-
धर्म का अर्थ यहाँ धर्म/पंथ नहीं, बल्कि कर्तव्य, दायित्व, नैतिकता और सदाचार है। यह जीवन जीने की एक ऐसी पद्धति है जिसमें नैतिक मूल्य केंद्रीय होते हैं, और व्यक्तियों से समाज में अपनी भूमिका के अनुसार कर्तव्य निभाने की अपेक्षा की जाती है। बौद्ध धर्म में इसी नैतिक सिद्धांत के लिए पाली शब्द 'धम्म' प्रयोग होता है।
राजनीति और नैतिकता का यह संबंध मौर्यों से लेकर चोलों तक स्पष्ट दिखाई देता है — अशोक के अभिलेखों ने नैतिक आचरण, अहिंसा व करुणा पर बल देकर 'धम्म' का प्रचार किया, जबकि 10वीं सदी के उत्तरामेरुर अभिलेख में ग्राम-सभा उम्मीदवारों के लिए "ईमानदार आय" और "पवित्र मन" जैसी शर्तें निर्धारित थीं।
1.8 सामाजिक संरचना — वर्ण और जाति
1.8.1 वर्ण व्यवस्था
वर्ण:-
चार सामाजिक वर्गों — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — का सबसे प्राचीन उल्लेख ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुषसूक्त में मिलता है। प्रारंभिक वैदिक ग्रंथों में जन्म पर आधारित कोई निश्चित सामाजिक स्थिति नहीं दिखती — सामाजिक पहचान जातीयता, उप-समूह, भौगोलिक क्षेत्र, गाँव, गोत्र, भाषा और विशेषतः व्यवसाय जैसे जटिल कारकों से तय होती थी।
- ब्राह्मण — वेदों का अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ करना/कराना, दान देना-लेना
- क्षत्रिय (राजन्य) — युद्ध, प्रजा-रक्षा, न्याय प्रशासन
- वैश्य — कृषि, पशुपालन, व्यापार जैसी आर्थिक गतिविधियाँ
- शूद्र — अन्य वर्णों की सहायता (व्यवहार में कृषि, पशुपालन, व्यापार व शिल्प में भी संलग्न)
1.8.2 जाति का उदय
जाति:-
धीरे-धीरे वर्णों के बीच अंतर्विवाह, प्रवासी समुदायों के अंतर्विवाही (endogamous) बनने और क्षेत्रीय भिन्नताओं के कारण जाति नामक अलग सामाजिक संरचना उभरी। वर्णों की संख्या चार तक सीमित थी, परंतु जातियों की संख्या पर कोई सीमा नहीं थी — नए सामाजिक समूहों व व्यवसायों के विकसित होने के साथ जातियों की संख्या बढ़ती गई।
1.8.3 सामाजिक गतिशीलता
वर्ण और जाति सदैव कठोर श्रेणियाँ नहीं थीं — इनके भीतर और आर-पार पर्याप्त सामाजिक गतिशीलता मौजूद थी। नंद, मौर्य, शुंग, सातवाहन, वाकाटक, गुप्त और पुष्यभूति जैसे कई शासक विविध सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए। मंदसौर स्तंभ अभिलेख (473 ई.) में रेशम बुनकरों की एक श्रेणी का उल्लेख है, जो गुजरात के लाट से मध्य प्रदेश के दशपुर में स्थानांतरित हुई और बुनाई के साथ-साथ धनुर्विद्या, ज्योतिष जैसे कार्यों में भी दक्ष थी। संगम साहित्य के तोलकाप्पियम में भी अरसर (राजा), वणिगर (व्यापारी) व वेलार (किसान) जैसे व्यावसायिक समूहों का उल्लेख मिलता है, जो दर्शाता है कि समाज कठोर वर्ण-वर्गीकरण से अधिक व्यवसाय व आर्थिक कार्यों पर आधारित था।
1.9 परिवार और समाज
वैदिक समाज में कुल (परिवार) सबसे छोटी और मौलिक सामाजिक इकाई थी, जो ग्राम के माध्यम से बड़ी राजनीतिक संरचना से जुड़ी थी। कई ग्राम मिलकर विश बनाते थे, जिसका प्रमुख विशपति होता था, और विश के ऊपर जन होता था, जिसका मुख्य रक्षक राजा होता था।
गोत्र:-
एक पितृवंशीय (patrilineal) वंश या कुल, जो परंपरागत रूप से किसी वैदिक ऋषि से जुड़ा माना जाता था। गोत्र संबद्धता विवाह-नियमों के निर्धारण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी।
चार आश्रम:-
व्यक्ति के जीवन को चार आश्रमों में बाँटा गया, प्रत्येक के अपने धर्म (कर्तव्य) निर्धारित थे, जो सामाजिक, नैतिक व आध्यात्मिक पूर्णता की ओर ले जाते थे।
- ब्रह्मचर्य — विद्यार्थी जीवन का चरण
- गृहस्थ — गृहस्थी का चरण
- वानप्रस्थ — वन में जीवन
- संन्यास — संसार का त्याग
पुरुषार्थ (जीवन के चार लक्ष्य):-
धर्म (सदाचार), अर्थ (भौतिक कल्याण), काम (इच्छाओं की पूर्ति) और मोक्ष (सांसारिक बंधनों से मुक्ति)। इस ढाँचे में धर्म और मोक्ष का नैतिक दृष्टि से विशेष महत्व है, क्योंकि ये मानव जीवन को दिशा व उद्देश्य प्रदान करते हैं।
1.10 महिलाओं की भूमिका
वैदिक काल को प्रायः ऐसे काल के रूप में वर्णित किया जाता है जिसमें महिलाओं का समाज में ऊँचा व सम्मानजनक स्थान था। महिलाएँ विद्वत्तापूर्ण शिक्षा में भाग लेती थीं और कुछ संदर्भों में पुरुषों के साथ अनुष्ठान भी संपन्न करती थीं। ऋग्वेद के कई सूक्त परंपरागत रूप से महिला ऋषिकाओं — अपाला, विश्ववारा, घोषा और लोपामुद्रा — को समर्पित हैं। उषा (प्रातःकाल की देवी) व अदिति (देवमाता) जैसी देवियों का भी वैदिक संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान था।
समय के साथ महिलाओं की स्थिति व भूमिकाओं में उतार-चढ़ाव आया, फिर भी घरेलू प्रबंधन, कृषि, शिल्प व धार्मिक कार्यों में महिलाओं के योगदान के कई उदाहरण मिलते हैं — जैसे गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त, जिन्होंने वाकाटक राज्य में रीजेंट (संरक्षिका) के रूप में शासन किया और अपने नाम से भूमि-अनुदान जारी किए। संगम साहित्य में कवयित्री अव्वैयार जैसी प्रभावशाली महिलाओं का उल्लेख है, और चोल काल में सेम्बियन महादेवी ने मंदिर-निर्माण को संरक्षण दिया।
1.11 धार्मिक जीवन और भक्ति का उदय
वैदिक देवमंडल में कोई कठोर पदानुक्रम नहीं था — विभिन्न देवताओं को विभिन्न सूक्तों में सर्वोच्च बताया गया है। वैदिक लोगों की आस्था प्रकृति-पूजा से जुड़ी थी, क्योंकि प्रत्येक वैदिक देवता प्रकृति के किसी तत्व (सूर्य, वर्षा, अग्नि, पृथ्वी, उषा आदि) से संबद्ध था।
भक्ति:-
एक ऐसा मार्ग जिसने वेदोक्त विस्तृत अनुष्ठानों के बिना देवताओं से सीधा संबंध प्रदान किया, और जो वर्ग या लिंग की परवाह किए बिना सभी के लिए सुलभ था। भक्ति परंपरा का संगठित व व्यापक स्वरूप छठी सदी के तमिल क्षेत्र में अलवार (विष्णु भक्त) और नायनार (शिव भक्त) संत-कवियों की गतिविधियों से प्रमुखता में आया।
प्रथम सहस्राब्दी ई.पू. के मध्य के आसपास परिव्राजक (घुमक्कड़), भिक्षु और श्रमण जैसे संन्यासियों का एक वर्ग उभरा, जो भौतिक सुख-सुविधाओं व सामाजिक संबंधों से अनासक्ति का समर्थन करते थे। गौतम बुद्ध और महावीर इसी काल के प्रभावशाली विचारक थे।
1.12 शिक्षा की खोज — गुरुकुल प्रणाली
प्रारंभिक भारत में शिक्षा जीवन का अभिन्न अंग थी, जिसका उद्देश्य समग्र था। सत्य, धैर्य, नियमितता, विनम्रता, इंद्रिय-नियंत्रण, आत्म-शुद्धि (सत्त्वशुद्धि), जीवन-प्रकृति-पर्यावरण की एकता का बोध, और सभी प्राणियों के प्रति आदर — ये भारतीय शिक्षा द्वारा विकसित आंतरिक मूल्य थे। विद्यार्थी वेदों के साथ-साथ व्याकरण, तर्कशास्त्र, दर्शन, नैतिकता, गणित, विज्ञान, चिकित्सा व खगोलशास्त्र का भी अध्ययन करते थे, और संगीत, नृत्य, चित्रकला, शारीरिक शिक्षा व धनुर्विद्या जैसी कलाओं में भी प्रशिक्षित होते थे।
गुरु-शिष्य परंपरा:-
शिक्षक-विद्यार्थी संबंध को पवित्र माना जाता था। गुरु (आचार्य) अत्यंत सम्मानित होता था और विद्यार्थी को अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक के रूप में देखा जाता था। गुरु का घर ही गुरुकुल का केंद्र होता था, और विद्यार्थी को शिक्षक के परिवार के सदस्य के समान माना जाता था।
प्रारंभिक भारत में तक्षशिला, नालंदा (427 ई. में स्थापित), वल्लभी (480 ई.), विक्रमशिला (783–820 ई.) जैसे शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र विकसित हुए, जिन्होंने भारत व अन्य क्षेत्रों से विद्यार्थियों को आकर्षित किया।
1.13 अर्थव्यवस्था
1.13.1 कृषि और भू-राजस्व
मौर्य राज्य ने आर्थिक गतिविधियों के नियमन व निरीक्षण हेतु विस्तृत प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की थी। भूमि पर मूल कर उत्पादन का एक निश्चित अनुपात था, जो सामान्यतः एक-छठा (1/6) होता था। कौटिल्य ने खेती योग्य भूमि, बंजर/परती भूमि, ऊँची व सूखी भूमि, बोए गए खेत और बागानों सहित विभिन्न प्रकार की ग्राम-भूमि का विस्तृत विवरण दिया है। दक्कन में डेक्कन की काली मिट्टी के कारण कपास की खेती बढ़ी, और संगम साहित्य में चेर क्षेत्र को कटहल, काली मिर्च व हल्दी जैसी वस्तुओं से समृद्ध बताया गया है।
1.13.2 सिंचाई
कृषि सिंचाई पर अत्यधिक निर्भर थी, इसलिए जलाशयों, नहरों व बाँधों के निर्माण व रखरखाव को बहुत महत्व दिया जाता था। जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा नियुक्त गवर्नर पुष्यगुप्त ने गिरनार (सौराष्ट्र/गुजरात) के पास सुदर्शन झील पर बाँध बनवाया था।
1.13.3 व्यापार मार्ग और बंदरगाह
इस काल में व्यापार व वाणिज्य का विस्तार आर्थिक विकास की एक प्रमुख विशेषता थी। अर्थशास्त्र के अनुसार मगध वस्त्र, रत्न, प्रवाल, मोती, धातु व खनिज उत्तर, मध्य व दक्षिण भारत के विभिन्न भागों के साथ व्यापार करता था। लगभग छठी सदी ई.पू. तक दो प्रमुख स्थल-मार्ग — दक्षिणापथ और उत्तरापथ — स्थापित हो चुके थे, जो कालांतर में परवर्ती राजवंशों द्वारा बनाए व विस्तारित किए गए। मुजिरिस, कावेरीपट्टिनम, अरिकमेडु व मसुलीपट्टनम जैसे प्रमुख बंदरगाहों ने भारतीय व विदेशी व्यापारियों को आकर्षित किया, और ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में रोम के साथ भारत का व्यापार काफी बढ़ गया था।
1.13.4 श्रेणियाँ (गिल्ड)
श्रेणी (गिल्ड):-
व्यापारियों, कारीगरों व शिल्पियों के सामूहिक संगठन, जो एक ही व्यवसाय, शिल्प या पेशे से जुड़े लोगों के संघ होते थे। महाजनपदों (छठी सदी ई.पू.) के उदय के बाद व्यापार-वाणिज्य के विस्तार में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। जातक साहित्य में अठारह प्रकार की श्रेणियों का उल्लेख है। श्रेणियाँ माल की गुणवत्ता नियंत्रित करती थीं, अक्सर मूल्य निर्धारित करती थीं, और श्रेणी-न्यायालयों के माध्यम से सदस्यों के आचरण की निगरानी भी करती थीं।
साँची स्तूप के दक्षिणी प्रवेशद्वार पर अंकित एक अभिलेख विदिशा के हाथी-दाँत कारीगरों की श्रेणी द्वारा किए गए कल्याणकारी कार्यों का उल्लेख करता है — ये कारीगर स्तूप के प्रवेशद्वारों व रेलिंग पर पत्थर की मूर्तियाँ गढ़ने के लिए जिम्मेदार थे, जो शिल्प-श्रेणियों की कला-निर्माण व धार्मिक संरक्षण दोनों में सक्रिय भूमिका दर्शाता है।