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CLASS 9 SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 6

गति पर बलों का प्रभाव / Effect of Force on Motion

TextbookNCERT
ClassClass 9
SubjectScience
ChapterChapter 6
Chapter Nameगति पर बलों का प्रभाव
MediumHindi

6.1 बल की अवधारणा

बल (Force):-

बल एक ऐसी भौतिक राशि है जिसके लिए हमें उसके परिमाण (magnitude) और मात्रक के साथ-साथ उसकी दिशा भी बतानी पड़ती है — ठीक वैसे ही जैसे स्थिति, विस्थापन, वेग और त्वरण जैसी राशियों के लिए बताई जाती है। बल किसी वस्तु को विरामावस्था से गति में ला सकता है, गतिशील वस्तु की चाल और गति की दिशा को परिवर्तित कर सकता है, और यहाँ तक कि किसी वस्तु के आकार में भी परिवर्तन कर सकता है।

  1. पैर से गेंद को ठोकर मारना — गेंद गति करने लगती है।
  2. बल्ले से क्रिकेट की गेंद पर प्रहार करना — गेंद की दिशा में परिवर्तन होता है।
  3. अँगुलियों से नींबू को निचोड़ना — वस्तु के आकार में परिवर्तन होता है।
नोट:- यदि किसी वस्तु पर लगाए गए बल का परिमाण या दिशा अथवा दोनों ही परिवर्तित हो जाते हैं, तो उस बल का प्रभाव भी परिवर्तित हो जाता है।

बल का SI मात्रक:-

बल का SI मात्रक न्यूटन (newton) है। अंग्रेज़ी में मात्रक लिखते समय इसे छोटे अक्षर 'n' से प्रारंभ करते हुए newton लिखा जाता है, किंतु इसके प्रतीक को बड़े अक्षर 'N' से दर्शाया जाता है। बल का परिमाण उसकी प्रबलता को व्यक्त करता है।

6.1.1 बल के परिमाण को मापना

कमानीदार तुला (Spring Balance):-

कमानीदार तुला का उपयोग न केवल किसी वस्तु का भार मापने के लिए, बल्कि सामान्य रूप से किसी भी बल के परिमाण को मापने के लिए किया जा सकता है। यदि कमानीदार तुला के स्वतंत्र सिरे को खींचा जाए तो यह उस बल को मापती है जिससे तुला के भीतर की स्प्रिंग को खींचा जा रहा होता है।

नोट:- दैनिक जीवन में जिन न्यूनतम बलों की हम प्रत्यक्ष अनुभूति कर सकते हैं वे मिलीन्यूटन (10⁻³ N) की कोटि के होते हैं, जैसे कोई हल्का-सा स्पर्श। विशेष प्रयोगों में वैज्ञानिक इससे भी बहुत छोटे — योक्टोन्यूटन (10⁻²⁴ N) तक — के बलों को माप सकते हैं।

6.2 संतुलित एवं असंतुलित बल

संतुलित बल (Balanced Force):-

जब किसी वस्तु पर दो या दो से अधिक बल इस प्रकार लगते हैं कि वे परिमाण में बराबर किंतु दिशा में विपरीत होते हैं, तो उन्हें संतुलित बल कहते हैं। जैसे रस्साकशी में यदि दोनों टीमें रस्से को बराबर बल से खींचती हैं तो रस्सा विस्थापित नहीं होता।

असंतुलित बल (Unbalanced Force):-

यदि रस्से पर एक टीम दूसरी टीम से अधिक बल लगाती है तो रस्से पर लगे बल संतुलित नहीं रह जाते और रस्सा अधिक बल वाली दिशा में विस्थापित होता है। इस स्थिति में रस्से पर लगाए गए बल असंतुलित बल कहलाते हैं।

परिणामी बल (Net Force):-

यदि किसी वस्तु पर लगाए गए बल संतुलित नहीं होते हैं तो वस्तु पर एक परिणामी बल लगता है जिसका परिमाण शून्य नहीं होता।

  1. यदि बल दिशा में विपरीत और परिमाण में असमान हों तो परिणामी बल का परिमाण दोनों बलों के परिमाणों के अंतर के बराबर होता है, और इसकी दिशा उस बल की दिशा में होती है जिसका परिमाण अधिक होता है।
  2. यदि दोनों बल एक ही दिशा में कार्य कर रहे हों तो परिणामी बल का परिमाण दोनों बलों के परिमाणों के योग के बराबर होता है, तथा इसकी दिशा वही होती है जो लगाए गए दोनों बलों की होती है।
उदाहरण 6.1 — एक मेज पर रखे गुटके पर 10 N और 6 N के दो बल लग रहे हैं:
(क) दोनों बल एक दिशा में — परिणामी बल = 10 N + 6 N = 16 N, दाईं ओर
(ख) विपरीत दिशा में, 10 N प्रबल — परिणामी बल = 10 N − 6 N = 4 N, दाईं ओर
(ग) विपरीत दिशा में, 6 N बाईं ओर प्रबल — परिणामी बल = 10 N − 6 N = 4 N, बाईं ओर

6.3 घर्षण बल — प्रायः अनदेखा परंतु सदैव विद्यमान बल

घर्षण बल (Friction Force):-

जब कोई वस्तु फर्श पर विरामावस्था में रखी हो और उस पर आगे की दिशा में बल लगाया जाए, तो वस्तु की निचली सतह और फर्श के मध्य उत्पन्न होने वाला घर्षण बल, लगाए गए बल के कारण होने वाली गति की विपरीत दिशा में कार्य करता है। वस्तु तभी गति करना आरंभ करेगी जब लगाए गए बल का परिमाण घर्षण बल से अधिक होगा।

नोट:- किसी वस्तु पर अनेक बल कार्य कर सकते हैं, परंतु उसकी गति केवल परिणामी बल पर निर्भर करती है।

अभिलंब बल (Normal Force):-

किसी धकेली जा रही वस्तु पर लगाए गए बल और घर्षण बल के अतिरिक्त कुछ अन्य बल भी लग सकते हैं — एक गुरुत्वाकर्षण बल (भार) है और दूसरा उस सतह द्वारा लगाया गया बल है जिस पर वस्तु रखी है, इसे अभिलंब बल कहते हैं। भार नीचे की दिशा में लगता है जबकि अभिलंब बल सतह के ऊपर की ओर लगता है — तथापि ये दोनों बल संतुलित होते हैं।

घर्षण बल के प्रभाव:-

एक बार वस्तु गति करना प्रारंभ कर दे और उस पर बल लगाना बंद कर दिया जाए, तो वस्तु की गति धीमी होती जाती है और अंततः वह रुक जाती है — यह घर्षण बल के कारण होता है। किसी गतिशील वस्तु की गति बनाए रखने के लिए हमें घर्षण बल के विरुद्ध निरंतर बल लगाना पड़ता है।

नोट:- क्रियाकलाप 6.1 और 6.2 से यह निष्कर्ष निकलता है कि जब घर्षण बल कम होता है तो वस्तु का वेग धीरे-धीरे कम होता है और विरामावस्था में आने से पहले वह अधिक दूरी तय करती है। घर्षण बल संपर्क में आने वाली सतहों की प्रकृति पर निर्भर करता है।

6.4 न्यूटन का गति का प्रथम नियम

न्यूटन का गति का प्रथम नियम:-

कोई वस्तु विरामावस्था में है तो वह विरामावस्था में ही रहेगी, और यदि गति की अवस्था में है तो नियत वेग से गति करती रहेगी, जब तक कि उस पर कोई परिणामी बल कार्य न करे।

नोट:- यदि किसी वस्तु पर लगने वाला परिणामी बल शून्य है तो वस्तु न तो गति करना आरंभ कर सकती है और न ही अपने वेग में परिवर्तन कर सकती है — ऐसी स्थिति में उसका त्वरण शून्य होता है। नियत वेग का अर्थ है वेग के परिमाण या दिशा में कोई परिवर्तन न होना।

जड़त्व (Inertia):-

वस्तुओं की विराम अथवा एकसमान गति की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करने की प्रवृत्ति को आइज़ैक न्यूटन ने 'जड़त्व' कहा और इसी विचार का उपयोग करके गति का प्रथम नियम प्रतिपादित किया। सत्रहवीं शताब्दी में गैलीलियो गैलिली ने विचार प्रयोगों के माध्यम से दर्शाया था कि यदि कोई वस्तु क्षैतिज तल पर गति करती है और उसकी गति में आने वाली सभी बाधाओं को हटा दिया जाए तो वह अनिश्चित काल तक गतिमान रहेगी।

उदाहरण (गति व विराम के ग्राफ):-

  1. विरामावस्था में रखी वस्तु का वेग शून्य रहता है और स्थिति-समय ग्राफ समय-अक्ष के समांतर एक सीधी रेखा होता है, जबकि वेग-समय ग्राफ शून्य वेग को दर्शाने वाली सीधी रेखा होता है।
  2. नियत वेग से गतिमान वस्तु (जिस पर कोई परिणामी बल कार्य नहीं कर रहा) का स्थिति-समय ग्राफ एक झुकी हुई सीधी रेखा तथा वेग-समय ग्राफ समय-अक्ष के समांतर सीधी रेखा होता है।

6.5 न्यूटन का गति का द्वितीय नियम

न्यूटन का गति का द्वितीय नियम:-

जब किसी वस्तु पर कोई परिणामी बल कार्य करता है तो वस्तु परिणामी बल की दिशा में त्वरित होती है। त्वरण का परिमाण परिणामी बल के परिमाण के समानुपाती होता है और वस्तु के द्रव्यमान के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

a = F / m
अथवा F = m a
नोट:- क्रियाकलाप 6.3 व 6.4 से निष्कर्ष निकलता है कि (i) नियत द्रव्यमान वाली वस्तु का त्वरण उस पर लगे परिणामी बल के बढ़ने के साथ बढ़ता है, और (ii) दिए गए बल के परिमाण के लिए उत्पन्न त्वरण वस्तु के द्रव्यमान के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

एक न्यूटन बल की परिभाषा:-

एक न्यूटन बल वह बल है जो 1 kg द्रव्यमान वाली वस्तु में 1 m s⁻² का त्वरण उत्पन्न करता है।

F = (1 kg) × (1 m s⁻²) = 1 kg m s⁻² = 1 N

गुरुत्वीय त्वरण (g):-

गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में गिरती हुई वस्तु के त्वरण को पृथ्वी द्वारा लगाए गए गुरुत्वाकर्षण बल के कारण गुरुत्वीय त्वरण कहा जाता है और इसे g से दर्शाया जाता है। इसका मात्रक m s⁻² है।

F = m g

पृथ्वी की सतह के निकट g का मान लगभग 9.8 m s⁻² नियत माना जा सकता है; त्वरित आकलनों के लिए g = 10 m s⁻² भी लिया जा सकता है।

नोट:- किसी वस्तु पर पृथ्वी द्वारा लगाए गए गुरुत्वाकर्षण बल के कारण त्वरण (g) वस्तु के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है।

संवेग (Momentum):-

किसी वस्तु का संवेग उसके द्रव्यमान और वेग के गुणनफल के रूप में परिभाषित किया जाता है। संवेग की दिशा वही होती है जो वेग की दिशा होती है। न्यूटन के गति के द्वितीय नियम को अधिक संपूर्णता से संवेग के पदों में व्यक्त किया जाता है — किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर परिणामी बल के समानुपाती होती है और परिवर्तन उसी दिशा में होता है जिसमें परिणामी बल कार्य करता है। इस रूप में व्यक्त द्वितीय नियम उन स्थितियों में भी मान्य होता है जहाँ वस्तु का द्रव्यमान नियत नहीं होता।

द्वितीय नियम के व्यावहारिक उदाहरण:-

  1. क्रिकेट में क्षेत्ररक्षक तीव्र गति से आती गेंद को पकड़ते समय हाथों को पीछे की ओर खींचता है — इससे संपर्क का समय बढ़ जाता है, जिससे त्वरण व बल का परिमाण कम हो जाता है और चोट लगने की संभावना घट जाती है।
  2. वाहनों में एयरबैग टक्कर के समय तेज़ी से फूलकर एक नरम गद्दी बना देते हैं, जिससे टक्कर में लगने वाला समय बढ़ जाता है और त्वरण कम हो जाता है, परिणामस्वरूप गंभीर चोट की संभावना कम हो जाती है।
  3. नारियल को तोड़ने के लिए उसे तीव्र वेग से कठोर सतह पर टकराया जाता है — वेग में अत्यंत कम समय में परिवर्तन के कारण धरती को नारियल पर बहुत अधिक बल लगाना पड़ता है, जो नारियल को तोड़ देता है।

6.6 न्यूटन का गति का तृतीय नियम

न्यूटन का गति का तृतीय नियम:-

जब भी कोई वस्तु किसी दूसरी वस्तु पर बल लगाती है तो दूसरी वस्तु भी उसी समय पहली वस्तु पर बराबर बल विपरीत दिशा में लगाती है।

नोट:- बल सदैव युग्मों (pairs) में होते हैं, परंतु ये दोनों बल दो अलग-अलग वस्तुओं पर लगते हैं, इसलिए ये एक-दूसरे को संतुलित नहीं करते। यदि दो समान व विपरीत बल एक ही वस्तु पर कार्य करें तो ही वे एक-दूसरे को संतुलित करते हैं।

तृतीय नियम के व्यावहारिक उदाहरण:-

  1. पेड़ पर चढ़ते समय व्यक्ति के पैर तने पर नीचे की ओर धक्का देते हैं; तने और पैरों के मध्य घर्षण व्यक्ति को ऊपर की ओर बराबर बल से धकेलता है।
  2. डोंगी चालक जब चप्पू से जल को पीछे धकेलता है, तो जल चप्पू को बराबर बल से आगे की ओर धकेलता है, जिससे डोंगी आगे बढ़ती है।
  3. चलते या दौड़ते समय पैर पृथ्वी की सतह को पीछे की ओर धकेलते हैं और सतह पैरों पर विपरीत दिशा में (घर्षण के रूप में) बल लगाती है, जिससे व्यक्ति आगे की ओर गति करता है।
  4. रॉकेट प्रमोचन — रॉकेट का इंजन गैस को नीचे की ओर बाहर निकालता है, जिसके कारण रॉकेट पर ऊपर की ओर बराबर बल लगता है; यह बल रॉकेट के भार से अधिक होने पर रॉकेट उड़ान भरता है।
नोट:- न्यूटन का तृतीय नियम संपर्क बलों और असंपर्क बलों (जैसे चुंबकीय बल, स्थिरवैद्युत बल, गुरुत्वाकर्षण बल) — दोनों प्रकार के बलों के लिए समान रूप से लागू होता है।

6.7 वस्तुओं के निकाय पर लगने वाले बल

निकाय (System):-

जब दो या दो से अधिक परस्पर जुड़ी वस्तुओं को एक साथ मानकर विश्लेषण किया जाता है, तो उसे निकाय कहा जाता है। निकाय के भीतर के बलों (आंतरिक बलों) पर विचार करने की आवश्यकता नहीं होती — केवल बाहर से लगने वाले बल (बाह्य बल) ही महत्त्वपूर्ण होते हैं।

दो पेटिकाओं (m₁ व m₂) की डोरी से जुड़ी प्रणाली पर बाह्य बल F लगने पर:
a = F / (m₁ + m₂)

दो पेटिकाओं का निकाय ठीक उसी तरह त्वरित होता है जैसे द्रव्यमान (m₁ + m₂) वाली एक वस्तु त्वरित होती है।

नोट:- परस्पर जुड़ी हुई वस्तुओं को एक निकाय के रूप में मानने से विश्लेषण प्रायः सरल हो जाता है — यह जटिल वस्तुओं के निकायों के अध्ययन में भी न्यूटन के नियमों की उपादेयता को उजागर करता है।
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