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CLASS IX SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 2

कोशिका — जीवन की निर्माण इकाई

TextbookNCERT (अन्वेषण)
ClassClass IX
SubjectScience
ChapterChapter 2
Chapter Nameकोशिका — जीवन की निर्माण इकाई
MediumHindi

2.1 कोशिकाओं का अध्ययन कैसे करें

विभेदन सीमा (Resolution):-

मानव नेत्र द्वारा दो अति निकट वस्तुओं को अलग और विशिष्ट रूप से देखने की क्षमता विभेदन सीमा कहलाती है। मानव नेत्र की विभेदन सीमा लगभग 0.1 mm है — इससे कम दूरी की दो वस्तुएँ एक ही बिंदु के रूप में प्रतीत होती हैं। कोशिका सामान्यतः इतनी छोटी होती है कि उसे नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता।

सूक्ष्मदर्शी (Microscope):-

किसी वस्तु का आवर्धन करने के लिए एक उत्तल लेंस या लेंसों का संयोजन (अभिदृश्यक लेंस + नेत्रिका) उपयोग किया जाता है, जिससे वस्तु का आकार बड़ा दिखाई देता है। सूक्ष्मदर्शी का कुल आवर्धन उसकी नेत्रिका और अभिदृश्यक लेंस की आवर्धन क्षमता पर निर्भर करता है।

नोट:- रॉबर्ट हुक पहले व्यक्ति थे जिन्होंने वर्ष 1665 में एक स्व-निर्मित सूक्ष्मदर्शी (लगभग 200–300 गुना आवर्धन क्षमता वाला) से कॉर्क के टुकड़े में बक्से जैसे कोष्ठ देखे और उन्हें 'सेल' (कोशिका) नाम दिया।

क्रियाकलाप 2.1 — कोशिका के आकार का अनुमान

सूत्र — प्याज की झिल्ली की कोशिका का अनुमानित आमाप:

अनुमानित आमाप = माइक्रोमीटर में दृश्य क्षेत्र का व्यास ÷ व्यास के अनुदिश कोशिकाओं की संख्या

उदाहरण: यदि दृश्य क्षेत्र का व्यास 5000 µm है और व्यास के अनुदिश 25 कोशिकाएँ दिखाई देती हैं, तो एक कोशिका का आमाप 5000/25 = 200 µm होगा। यदि नेत्रिका व अभिदृश्यक लेंस दोनों की आवर्धन क्षमता 10X-10X है तो कुल आवर्धन 100X होगा, यानी 200 µm आकार की कोशिका 100 गुना बड़ी दिखेगी।

इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी:-

वैज्ञानिक उच्च क्षमता वाले इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी का भी उपयोग करते हैं जो कोशिका संरचना का सूक्ष्म विवरण दर्शाते हैं। इनमें प्रकाश की अपेक्षा इलेक्ट्रॉन पुंज का उपयोग किया जाता है, जिससे नैनोमीटर स्तर पर कोशिका संरचना स्पष्टता से देखी जा सकती है। सूक्ष्मदर्शी की तीन मुख्य विशेषताएँ हैं — विभेदन, विपर्यास और आवर्धन।

2.2 कोशिका की संरचना

2.2.1 कोशिका झिल्ली — कोशिका की सार्वत्रिक विशेषता

कोशिका झिल्ली / प्लाज़्मा झिल्ली:-

कोशिका झिल्ली एक पतला आवरण है जो कोशिका को प्रत्येक ओर से घेरकर उसकी अंतर्वस्तुओं की रक्षा करती है। यह वरणात्मक रूप से पारगम्य होती है — अर्थात कुछ पदार्थों को अपने से होकर पार जाने देती है जबकि कुछ को रोक लेती है।

विसरण (Diffusion):-

उच्च से निम्न सांद्रता की ओर कणों की शुद्ध गति है, जो झिल्ली के बिना भी होती है।

परासरण (Osmosis):-

एक वरणात्मक पारगम्य झिल्ली के माध्यम से जल की गति को परासरण कहते हैं। जल तनु विलयन क्षेत्र (जहाँ जल के अणुओं की सांद्रता अधिक) से सांद्र विलयन क्षेत्र (जहाँ जल के अणुओं की सांद्रता कम) की ओर गति करता है जब तक दोनों क्षेत्रों की सांद्रता समान नहीं हो जाती। परासरण एक वरणात्मक रूप से पारगम्य झिल्ली के पार जल का विसरण है।

उदाहरण:- आलू के दो टुकड़ों को साधारण जल तथा 20% नमक/चीनी के घोल में रखने पर — साधारण जल वाले टुकड़े का आमाप बढ़ जाता है जबकि सांद्र घोल वाले टुकड़े का आमाप संकुचित हो जाता है, क्योंकि झिल्ली जल को अंदर-बाहर आने देती है किंतु नमक/चीनी के अणुओं को रोक देती है।
विलयन का प्रकारतुलनापरिणाम
समपरासारीबाह्य सांद्रता = अंतःकोशिकीय सांद्रताकोई परिवर्तन नहीं
अल्पपरासारीबाह्य सांद्रता < अंतःकोशिकीय सांद्रताकोशिका फूलती है
अतिपरासारीबाह्य सांद्रता > अंतःकोशिकीय सांद्रताकोशिका संकुचित होती है

तरल-मोज़ेक मॉडल (Fluid-Mosaic Model):-

कोशिका झिल्ली लगभग 7–10 नैनोमीटर मोटी होती है और लिपिड (वसा) व प्रोटीन से बनी होती है। यह मॉडल इसकी संरचना स्पष्ट करता है।

  1. झिल्ली में लिपिड की एक द्विपरत होती है (जल-आकर्षी शीर्ष बाहर की ओर, जल-प्रतिकर्षी पूँछें भीतर की ओर) जिनमें प्रोटीन अंतःस्थापित होते हैं।
  2. झिल्ली के अंदर अणु गति कर सकते हैं, पलट सकते हैं और घूम सकते हैं, इसलिए यह तरल (fluid) है।
  3. झिल्ली में प्रोटीन गेटकीपर की भाँति कार्य करते हैं और पदार्थों को भीतर-बाहर जाने में सहायता करते हैं।
  4. अणु मोज़ेक में टाइलों की तरह व्यवस्थित होते हैं, इसलिए इसे मोज़ेक मॉडल कहते हैं।

2.2.2 कोशिका भित्ति — कोशिकाओं का बाहरी आवरण

कोशिका भित्ति (Cell Wall):-

पादप, कवक और जीवाणुओं की कोशिकाओं में कोशिका झिल्ली के चारों ओर एक अतिरिक्त परत होती है जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं। यह पत्तियों व फूलों की दृढ़ता बनाए रखने, आकार बनाए रखने और पौधों को सीधा खड़ा रखने में सहायता करती है। दृढ़ होते हुए भी यह पारगम्य होती है — जल और घुले खनिज इससे आर-पार जा सकते हैं।

नोट:- पादप कोशिका भित्ति मुख्यतः सेल्युलोस से बनी होती है, जो एक कार्बोहाइड्रेट है। सांद्र चीनी विलयन में रखने पर पादप कोशिकाएँ जल खोकर भी सिकुड़ती नहीं क्योंकि दृढ़ कोशिका भित्ति आकार बनाए रखती है, जबकि जंतु कोशिकाओं (जिनमें भित्ति नहीं होती) में कपोल कोशिकाएँ अत्यधिक संकुचित हो जाती हैं।

2.3 कोशिका का आंतरिक भाग — एक समन्वित कार्य प्रणाली

कोशिका के मूलभूत भाग:-

  1. एक वरणात्मक रूप से पारगम्य झिल्ली — प्लाज़्मा झिल्ली
  2. एक अर्धतरल जेली जैसा पदार्थ — कोशिकाद्रव्य
  3. एक सुस्पष्ट केंद्रक

केंद्रक के अतिरिक्त कोशिकाद्रव्य में अनेक उप-कोशिकीय घटक होते हैं जिन्हें कोशिकांग (organelles) कहते हैं।

पूर्वकेंद्रकी कोशिकाएँ (Prokaryotic cells):-

जिनमें सुस्पष्ट केंद्रक और झिल्ली-आबद्ध कोशिकांग नहीं होते (pro = पूर्व, karyon = केंद्रक)। इनमें अधिकांश कोशिकीय गतिविधियाँ प्रत्यक्षतः कोशिकाद्रव्य में होती हैं। इनका डीएनए विशेष प्रोटीन से संबद्ध एकल गोल अणु के रूप में होता है, इस क्षेत्र को केंद्रकाभ (nucleoid) कहते हैं।

यूकैरयोटिक कोशिकाएँ (Eukaryotic cells):-

जिनमें एक सुस्पष्ट केंद्रक और अनेक झिल्ली-आबद्ध कोशिकांग होते हैं (eu = वास्तविक, karyon = केंद्रक)। पादप और जंतु कोशिकाएँ इसी श्रेणी में आती हैं।

विशेषताएँपूर्वकेंद्रकी कोशिकासुकेंद्रकी कोशिका
आद्य केंद्रकउपस्थितअनुपस्थित
सामान्य कोशिका व्यास1–10 µm10–100 µm
कोशिकाओं की संख्यासामान्यतः एककोशिकीयएककोशिकीय या बहुकोशिकीय
झिल्ली-आबद्ध कोशिकांगअनुपस्थितउपस्थित
झिल्ली-आबद्ध केंद्रकअनुपस्थितउपस्थित
नोट:- विषाणु (viruses), विषाणुभ (viroids) और प्रोसंक (prions) अकोशिकीय संक्रामक कारक हैं जो इतने छोटे होते हैं कि प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से नहीं देखे जा सकते। विषाणु आनुवंशिक सामग्री व प्रोटीन आवरण से बने होते हैं; विषाणुभ में प्रोटीन आवरण नहीं होता; प्रोसंक अपवलित प्रोटीन होते हैं जिनमें आनुवंशिक सामग्री नहीं होती।

केंद्रक — कूटबद्ध अनुदेशों का केंद्र

केंद्रक (Nucleus):-

इसका एक द्विपरती आवरण होता है जिसे केंद्रक झिल्ली कहते हैं, जिसमें छिद्र होते हैं जो केंद्रक व कोशिकाद्रव्य के बीच पदार्थों के आवागमन को संभव बनाते हैं। केंद्रिका राइबोसोम की उपइकाइयों का संश्लेषण करती है। केंद्रक में गुणसूत्र (chromosome) होते हैं जो केवल कोशिका विभाजन के समय छड़ाकार संरचनाओं के रूप में दिखाई देते हैं।

नोट:- गुणसूत्र डीएनए और विशेष प्रोटीन से बने होते हैं। डीएनए के कार्यात्मक खंडों को जीन कहते हैं। विभाजन न करने वाली कोशिका में डीएनए क्रोमेटिन पदार्थ के रूप में उपस्थित रहता है; विभाजन के समय यह गुणसूत्रों में संगठित हो जाता है।
उदाहरण:- मनुष्यों में परिपक्व लाल रक्त कोशिकाओं में केंद्रक नहीं होता (केंद्रक-रहित), जिससे हीमोग्लोबिन के लिए अधिक स्थान मिलता है, पर स्वयं की मरम्मत न कर पाने के कारण इनका जीवनकाल लगभग 120 दिन ही होता है।

राइबोसोम — प्रोटीन की फैक्टरी

राइबोसोम:-

ये सूक्ष्म संरचनाएँ हैं जो कोशिकाद्रव्य में मुक्त रूप से उपस्थित अथवा अंतर्द्रव्यी जालिका से जुड़ी हुई हो सकती हैं। राइबोसोम में प्रोटीन संश्लेषण होता है।

अंतर्द्रव्यी जालिका — निर्माणशाला

अंतर्द्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum):-

एक बड़ा कोशिकांग है जो कोशिकाद्रव्य के भीतर जाल के रूप में फैला होता है और केंद्रक आवरण की बाहरी झिल्ली से जुड़ा होता है। यह प्रोटीन, वसा और हार्मोन के संश्लेषण व परिवहन में भूमिका निभाती है। यह दो प्रकार की होती है:

  1. रुक्ष अंतर्द्रव्यी जालिका (RER):- सतह पर राइबोसोम जुड़े होने से खुरदुरी दिखती है; मुख्यतः प्रोटीन संश्लेषण व स्रवण में सम्मिलित।
  2. चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका (SER):- सतह पर राइबोसोम नहीं होते; वसा व हार्मोन के संश्लेषण व भंडारण का कार्य करती है।

गॉल्जी उपकरण — पैकेजिंग और शिपिंग केंद्र

गॉल्जी उपकरण (Golgi apparatus):-

चपटी, थैली जैसी संरचनाओं की ढेरियाँ मिलकर गॉल्जी उपकरण बनाती हैं, जो अंतर्द्रव्यी जालिका, कोशिका झिल्ली व अन्य कोशिकांगों से जुड़ी होती है। यह कोशिका के 'डाकघर' की भाँति कार्य करता है — प्रोटीन और/या लिपिड को रूपांतरित, वर्गीकृत और पुटिकाओं में पैक कर परिवहन, स्रवण अथवा लाइसोसोम निर्माण करता है।

नोट:- इसे 1898 में इतालवी वैज्ञानिक कैमिलो गॉल्जी ने श्वेत उल्लू की तंत्रिका कोशिकाओं में देखा था। संरचना की पुष्टि कई दशक बाद इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से हुई, तब इसे उनके सम्मान में 'गॉल्जी उपकरण' नाम दिया गया।

लाइसोसोम — निर्मलन प्रणाली

लाइसोसोम (लयनकाय):-

एंजाइम से भरे एकल झिल्ली-आबद्ध थैले होते हैं जो अवांछित प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और कोशिका के क्षतिग्रस्त अंगों को विघटित कर सकते हैं जिससे कोशिका स्वच्छ और स्वस्थ रहती है। विघटन से बने उत्पाद कोशिकाद्रव्य में पुनः उपयोग हेतु निर्मुक्त होते हैं।

उदाहरण:- मानव की शुक्राणु कोशिकाओं में लाइसोसोमीय एंजाइम होते हैं, जो अंडाणु की बाहरी परत के विघटन में सहायता कर निषेचन संपन्न कराते हैं।

माइटोकॉन्ड्रिया — कोशिका का ऊर्जा केंद्र

माइटोकॉन्ड्रिया (सूत्रकणिका):-

इसे कोशिका का 'ऊर्जा केंद्र' (powerhouse) कहा जाता है क्योंकि यह अधिकांश कोशिकीय गतिविधियों हेतु ऊर्जा प्रदान करता है। यह दो झिल्लियों से घिरा होता है — बाहरी झिल्ली चिकनी व छिद्रित होती है; भीतरी झिल्ली अँगुली जैसे उभारों (अंतःकटक/cristae) में अंतर्वलित होती है, जो रासायनिक अभिक्रियाओं हेतु सतह क्षेत्र बढ़ाती है। ग्लूकोस व अन्य अणु विघटित होकर कोशिकीय श्वसन प्रक्रिया में ऊर्जा (ATP के रूप में) निर्मुक्त करते हैं।

लवक — पादप कोशिकाओं में भोजन संश्लेषण का केंद्र

लवक (Plastid):-

पादप कोशिकाओं में भोजन संश्लेषण व भंडारण के लिए विशेष कोशिकांग होते हैं। तीन प्रकार:

  1. हरितलवक:- पर्णहरित (chlorophyll) युक्त, सूर्य के प्रकाश को अवशोषित कर प्रकाश-संश्लेषण करता है। इसमें अर्ध-तरल पीठिका (stroma) होती है जिसमें चक्रिका के आकार की झिल्लीनुमा संरचनाएँ (पर्णहरित युक्त) होती हैं।
  2. वर्णीलवक (Chromoplast):- फूलों-फलों में पर्णहरित के अतिरिक्त अन्य वर्णक (पीला, नारंगी, लाल) रखते हैं, जो परागणकारियों/जंतुओं को आकर्षित करते हैं।
  3. अवर्णी लवक (Leucoplast):- रंगहीन, स्टार्च/तेल/प्रोटीन जैसी खाद्य सामग्री का भंडारण करते हैं (जैसे आलू में स्टार्च)।
नोट:- माइटोकॉन्ड्रिया और हरितलवक दोनों में अपना डीएनए व राइबोसोम होता है, जो एककोशिकीय जीवों के साथ एक साझा विकासीय इतिहास दर्शाता है।

रसधानी — भंडारण और अवलंब के लिए कोशिकांग

रसधानी (Vacuole):-

एक परिपक्व पादप कोशिका में सामान्यतः एक बड़ी केंद्रीय रसधानी होती है जो वरणात्मक पारगम्य झिल्ली से घिरी होती है और कोशिका-रस (जल, खनिज, शर्करा, अपशिष्ट) से भरी होती है। यह कोशिका के भीतर दबाव बनाए रखकर पादप कोशिका को दृढ़ रखती है। पर्याप्त जल न मिलने पर रसधानी से जल हानि होती है और पौधा मुरझा जाता है। जंतु कोशिकाओं में रसधानियाँ छोटी होती हैं, फिर भी अस्थायी भंडारण में सहायक हैं।

2.4 सामान्य कोशिकाएँ किस प्रकार वृद्धि और विभाजन करती हैं

कोशिका वृद्धि और विभाजन:-

शरीर की कोशिकाएँ पुरानी, मृत या क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को प्रतिस्थापित करने के लिए वृद्धि करती हैं और विभाजित होती हैं। शरीर की वृद्धि केवल कोशिकाओं के बड़ा होने से नहीं, बल्कि कोशिकाओं के विभाजित होकर नई कोशिकाएँ बनाने से होती है।

2.4.1 कोशिका विभाजन

कोशिका विभाजन (Cell division):-

वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पूर्वविद्यमान कोशिकाओं से नई कोशिकाएँ उत्पन्न होती हैं, जिससे वृद्धि, ऊतकों की मरम्मत और जनन संभव होता है। पूर्वकेंद्रकी और सुकेंद्रकी दोनों कोशिकाएँ विभाजित होती हैं, परंतु सुकेंद्रकी कोशिकाएँ कोशिका चक्र (cell cycle) नामक प्रक्रिया द्वारा अधिक नियंत्रित ढंग से विभाजित होती हैं। कोशिका विभाजन के दो प्रमुख प्रकार हैं — समसूत्री विभाजन (mitosis) और अर्धसूत्री विभाजन (meiosis)।

समसूत्री विभाजन (Mitosis):-

एक जनक कोशिका से आनुवंशिक रूप से समान दो संतति कोशिकाएँ उत्पन्न करता है। प्रत्येक नई कोशिका को जनक कोशिका के समान डीएनए और समान संख्या में गुणसूत्र मिलते हैं। यह वृद्धि, मरम्मत, रखरखाव और अलैंगिक जनन के लिए महत्वपूर्ण है।

अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis):-

एक द्वि-चरणीय विभाजन प्रक्रिया है जिसमें युग्मक (gametes) बनते हैं और यह केवल जनन अंगों की कोशिकाओं में होता है। जनक कोशिका दो बार विभाजित होकर चार संतति कोशिकाएँ बनाती है, जिनमें से प्रत्येक में गुणसूत्रों की संख्या आधी होती है। यह लैंगिक जनन में आनुवंशिक विविधता के सृजन के लिए महत्वपूर्ण है। निषेचन के समय दो युग्मकों के मिलने पर गुणसूत्रों की मूल संख्या पुनर्स्थापित हो जाती है।

नोट:- मनुष्य सहित जंतुओं में अर्धसूत्री विभाजन नर के वृषण (testes) की कोशिकाओं में शुक्राणु तथा मादा के अंडाशय (ovaries) की कोशिकाओं में अंडाणु बनाने के लिए होता है। पौधों में यह परागकोश (नर भाग) व अंडाशय (मादा भाग) में होता है।

विभाजन में त्रुटियाँ:-

समसूत्री विभाजन में त्रुटियाँ अनियंत्रित कोशिका विभाजन का कारण बनती हैं, जिससे अर्बुद (tumour) का निर्माण हो सकता है। अर्धसूत्री विभाजन में त्रुटियाँ आनुवंशिक विकार या गर्भावस्था के प्रारंभिक चरण में गर्भपात का कारण बन सकती हैं।

उदाहरण:- वैज्ञानिकों ने जंतुओं की कोशिकाओं को शरीर के बाहर पोषक समृद्ध माध्यम में वृद्धि करने की विधि विकसित की है, जिसे कोशिका संवर्धन (tissue culture) कहते हैं — यह जैव-रसायनों, भोजन, औषधि व टीकों के उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है।

2.5 कोशिका सिद्धांत — जीव विज्ञान का एकीकरण सिद्धांत

पुरातन (क्लासिकल) कोशिका सिद्धांत:-

  1. सभी सजीव एक या एक से अधिक कोशिकाओं से बने होते हैं।
  2. कोशिका सजीवों में संरचना और कार्य की मूलभूत इकाई है।
  3. सभी कोशिकाएँ पूर्वविद्यमान कोशिकाओं से उत्पन्न होती हैं।

यह सिद्धांत जीवाणुओं से लेकर मनुष्य तक सभी जीवों को एकीकृत करता है एवं कोशिका विभाजन के माध्यम से जीवन की निरंतरता की व्याख्या करता है।

नोट:- 1838 में मैथियास श्लीडेन ने बताया कि सभी पादप कोशिकाओं से बने होते हैं; 1839 में थियोडोर श्वान ने पाया कि सभी जंतु भी कोशिकाओं से बने होते हैं; 1855 में रुडोल्फ विरचो ने बताया कि नई कोशिकाएँ केवल पूर्वविद्यमान कोशिकाओं से बनती हैं।

2.5.1 क्या कोशिकाएँ चिरकाल तक वृद्धि और जनन करती हैं?

संपर्क अवरोध और कैंसर:-

प्रत्येक कोशिका की एक निश्चित जीवन अवधि होती है। अनेक जंतु कोशिकाओं में कोशिका विभाजन सामान्यतः तब अवरुद्ध हो जाता है जब कोशिकाएँ निकटवर्ती कोशिकाओं के संपर्क में आती हैं — इसे संपर्क अवरोध कहते हैं। कैंसर कोशिकाएँ यह नियंत्रण खो देती हैं और अनियंत्रित रूप से विभाजित होती रहती हैं, जिससे अर्बुद (tumours) बनते हैं जो सदम्य (benign) या दुर्दम (malignant) हो सकते हैं। पादप कोशिकाएँ कठोर कोशिका भित्ति के कारण संपर्क अवरोध नहीं दर्शातीं।

क्रमादेशित कोशिका मृत्यु (PCD):-

कोशिका के वरणात्मक रूप से नष्ट होने की आनुवंशिकतः नियंत्रित और व्यवस्थित प्रक्रिया है, जो सामान्य विकास, कोशिकीय गुणवत्ता नियंत्रण और प्रतिरक्षा कार्य के लिए अनिवार्य है।

उदाहरण:- जब भ्रूण विकसित होता है, तो पी.सी.डी. अँगुलियों के बीच की कोशिकाओं को लुप्त करके अँगुलियाँ बनाने में सहायता करता है — इसके बिना हाथ जालयुक्त होते।
नोट:- 1902 में ऑस्ट्रियाई वनस्पतिशास्त्री गॉटलीब हैबरलैंड्ट ने प्रस्तावित किया कि किसी भी जीवित पादप कोशिका को उपयुक्त पोषक तत्व व परिस्थितियाँ मिलें तो वह संपूर्ण पादप में विकसित हो सकती है। पादप कोशिकाओं की इस क्षमता को पूर्णशक्तता (totipotency) कहते हैं, जिसने पादप ऊतक संवर्धन प्रौद्योगिकी की नींव रखी।
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