CLASS 9 HISTORY NOTES IN HINDI CHAPTER 3
नात्सीवाद और हिटलर का उदय (Nazism and the Rise of Hitler)
| Textbook | NCERT |
|---|---|
| Class | Class 9 |
| Subject | History |
| Chapter | Chapter 3 |
| Chapter Name | नात्सीवाद और हिटलर का उदय |
| Medium | Hindi |
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
3.1 वाइमर गणराज्य का जन्म
वाइमर गणराज्य:-
प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) में जर्मनी की हार के बाद वहाँ राजशाही का अंत हुआ और एक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था स्थापित हुई, जो "वाइमर गणराज्य" के नाम से जानी गई।
- जर्मनी ने ऑस्ट्रिया के साथ मिलकर मित्र राष्ट्रों (इंग्लैंड, फ्रांस और रूस) से युद्ध लड़ा; 1918 में हार के बाद सम्राट कैसर विल्हेम द्वितीय को गद्दी छोड़नी पड़ी।
- 1919 में वाइमर नगर में नेशनल असेंबली की बैठक हुई, जिसने संघीय लोकतांत्रिक संविधान बनाया और जनता को मतदान का अधिकार दिया।
वर्साय की संधि (1919):-
मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी पर कई कठोर और अपमानजनक शर्तें थोपीं, जिन्होंने वाइमर गणराज्य की शुरुआत से ही नींव कमज़ोर कर दी।
- जर्मनी को युद्ध का दोषी ठहराया गया और लगभग 6 अरब पौंड का जुर्माना लगाया गया।
- उसकी सेना सीमित कर दी गई तथा 10% आबादी और 13% भू-भाग अन्य देशों को दे दिया गया।
- 75% लौह भंडार और 26% कोयला भंडार फ्रांस, पोलैंड, डेनमार्क और लिथुआनिया को दिए गए, और राइनलैंड पर मित्र राष्ट्रों का कब्ज़ा हो गया।
वाइमर गणराज्य की प्रमुख कमज़ोरियाँ:-
- वाइमर गणराज्य ने एक नया लोकतांत्रिक संविधान अपनाया, परंतु आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था से स्थिर सरकार नहीं बन पाती थी।
- अनुच्छेद 48 के तहत राष्ट्रपति को आपातकाल में पूर्ण अधिकार मिल जाते थे, जिससे तानाशाही शासन का मार्ग खुल गया।
3.1.1 प्रथम विश्वयुद्ध का जर्मनी पर असर
प्रथम विश्वयुद्ध के प्रभाव:-
प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) ने यूरोप और विश्व दोनों को गहराई से प्रभावित किया, और सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक — तीनों क्षेत्रों में स्थायी परिवर्तन लाए।
- आर्थिक प्रभाव — यूरोप की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई; जो महाद्वीप पहले कर्ज़ देने वाला था, वह अब कर्ज़दार बन गया, और लाखों लोग बेरोज़गार हो गए।
- सामाजिक प्रभाव — लाखों सैनिकों व नागरिकों की मौत ने समाज को मानसिक रूप से झकझोरा; महिलाओं ने युद्धकाल में कारखानों व दफ्तरों में काम कर अपनी सामाजिक भूमिका मज़बूत की।
- राजनीतिक प्रभाव — पुराने राजतंत्र साम्राज्य (रूस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया) समाप्त हो गए और वाइमर गणराज्य जैसी नई लोकतांत्रिक सरकारें बनीं, जबकि राष्ट्रवाद व सैन्यवाद का प्रभाव बढ़ा।
- मनोवैज्ञानिक प्रभाव — लोगों के मन में भय, असुरक्षा और आक्रोश भर गया, और नेताओं-प्रचारकों ने "आक्रामक व मर्दाना पुरुषत्व" को गौरव का प्रतीक बताना शुरू किया।
3.1.2 राजनीतिक रैडिकलवाद और आर्थिक संकट
1923 का आर्थिक संकट:-
1923 में जर्मनी में आया भयानक आर्थिक संकट राजनीतिक अस्थिरता और रैडिकलवादी विचारों को भी जन्म देने वाला था।
- जर्मनी ने भारी कर्ज़ लेकर युद्ध लड़ा था, और युद्ध के बाद वर्साय संधि के तहत स्वर्ण मुद्रा में हर्जाना भरना पड़ा, जिससे स्वर्ण भंडार लगभग समाप्त हो गया।
- 1923 में आर्थिक तंगी के कारण जर्मनी ने कर्ज़ व हर्जाना चुकाने से इंकार कर दिया, जिसके जवाब में फ्रांस ने रूर क्षेत्र (कोयला भंडार वाला इलाका) पर कब्ज़ा कर लिया।
- रूर पर कब्ज़े से उद्योग ठप हो गए और सरकार ने खर्च चलाने के लिए बड़ी मात्रा में मुद्रा छापनी शुरू कर दी, जिससे मार्क का मूल्य गिरता गया।
अति-मुद्रास्फीति (Hyperinflation):-
वह स्थिति जब वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बहुत तेज़ी से बढ़ने लगती हैं और मुद्रा का मूल्य लगभग खत्म हो जाता है।
- प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भारी युद्ध क्षतिपूर्ति देने के लिए जर्मन सरकार ने बहुत अधिक मात्रा में नोट छापे, जिससे मार्क का मूल्य लगातार घटता गया।
- आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगीं और लोग नोटों से भरे थैले लेकर रोटी खरीदने जाते थे।
- मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग बुरी तरह प्रभावित हुए, बचत का मूल्य खत्म हो गया, और गरीबी व असंतोष बढ़ गया।
3.1.3 मंदी के सालों में जर्मनी की स्थिति
1929 की आर्थिक महामंदी:-
जर्मनी की औद्योगिक प्रगति अमेरिका से लिए गए अल्पकालिक ऋणों पर निर्भर थी; जब अमेरिकी शेयर बाज़ार गिरा, तो अमेरिका ने अपने कर्ज़ वापस माँग लिए।
- फैक्ट्रियाँ बंद हो गईं, उत्पादन ठप पड़ गया और निर्यात तेज़ी से घटने से विदेशी व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ।
- किसानों की फसलें बिकनी बंद हो गईं, जिससे ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी और बेरोज़गारी बढ़ी; बेरोज़गारों की संख्या 60 लाख तक पहुँच गई।
- मध्यम वर्ग की बचत खत्म हो गई और जनता सरकार से निराश हो गई।
नात्सीवाद:-
एक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचारधारा जो राष्ट्र की सत्ता, जातीय श्रेष्ठता और तानाशाही शासन पर आधारित थी; इसका जनक एडॉल्फ हिटलर को माना जाता है।
- नाज़ियों ने अपने विचारों को राष्ट्रीय समाजवाद (National Socialism) कहा, जिसमें व्यक्ति से अधिक राष्ट्र को महत्व दिया गया।
- नस्ली कल्पनालोक (यूजेनिक्स) की धारणा के अनुसार वे केवल शुद्ध आर्य नस्ल के लोगों वाला समाज बनाना चाहते थे, और अन्य नस्लों को नष्ट या अलग करना चाहते थे।
- जीवन परिधि (लेबेन्सराउम) के सिद्धांत के तहत जर्मन लोगों को बसाने के लिए नए इलाकों पर कब्ज़े हेतु उन्होंने पड़ोसी देशों पर आक्रमण किया।
3.2 हिटलर का उदय
हिटलर के उदय के कारण:-
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी की स्थिति बहुत खराब थी, जिसका फायदा उठाकर हिटलर ने जनता का विश्वास जीता।
- वर्साय संधि की कठोर शर्तों ने जर्मनी को आर्थिक, सैन्य और मानसिक रूप से तोड़ दिया था, जिससे जनता में बदले की भावना भर गई।
- वाइमर गणराज्य की राजनीतिक कमज़ोरियों तथा वामपंथी-समाजवादी गुटों में फूट से विपक्ष कमज़ोर पड़ा, जिसका हिटलर ने फायदा उठाया।
- नात्सी प्रचार (प्रोपेगेंडा) के माध्यम से जनता को समझाया गया कि केवल हिटलर ही जर्मनी की गरिमा लौटा सकता है।
- 1929 की महामंदी से लाखों लोग बेरोज़गार हो गए, और हिटलर ने रोज़गार व आर्थिक स्थिरता का वादा किया।
हिटलर का राजनीतिक उभार:-
- 1919 में हिटलर ने जर्मन वर्कर्स पार्टी की सदस्यता ली और धीरे-धीरे उस पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
- उसने पार्टी का नाम बदलकर नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी (नात्सी पार्टी) रख दिया, जो आगे चलकर जर्मनी की सबसे प्रभावशाली पार्टी बनी।
- जनता की निराशा का फायदा उठाकर नात्सी पार्टी ने 1932 के चुनावों में 32% वोट हासिल किए, और 1933 में हिटलर जर्मनी का चांसलर बना।
हिटलर की राजनीतिक शैली:-
हिटलर की शैली पूरी तरह नाटकीय और प्रचार-प्रधान थी; वह जनता को प्रभावित करने के लिए आडंबर, प्रदर्शन और भावनात्मक नारों का प्रयोग करता था।
- भव्य रैलियों व सभाओं के माध्यम से जनता में एकता और निष्ठा की भावना जगाता था, जिसमें स्वस्तिक छपे लाल झंडे व नात्सी सैल्यूट जैसे प्रतीक प्रयोग किए जाते थे।
- अपने जोशीले और भावनात्मक भाषणों से लोगों को आकर्षित करता था, और खुद को आर्थिक-राजनीतिक संकट से जर्मनी को उबारने वाला मसीहा बताकर प्रचारित करता था।
नात्सीवाद की लोकप्रियता के कारण:-
- 1929 की महामंदी के बाद बैंक दिवालिया हो गए, फैक्ट्रियाँ बंद हो गईं, और मजदूर बेरोज़गार हो गए, जिससे जनता में भुखमरी व असुरक्षा की भावना बढ़ी।
- मध्यवर्ग को आर्थिक गिरावट का सबसे ज़्यादा असर झेलना पड़ा; नात्सीवाद ने उन्हें स्थिरता व सम्मान का भरोसा दिया।
- रेडियो, पोस्टर और रैलियों के माध्यम से हिटलर को "राष्ट्र रक्षक" के रूप में प्रस्तुत किया गया, और साम्यवाद (कम्युनिज़्म) के भय से उच्च वर्ग व उद्योगपतियों ने भी उसे समर्थन दिया।
3.2.1 लोकतंत्र का ध्वंस
लोकतंत्र का ध्वंस:-
हिटलर के सत्ता में आने के बाद जर्मनी में लोकतंत्र धीरे-धीरे समाप्त कर दिया गया और उसने अपने विरोधियों को खत्म कर तानाशाही शासन स्थापित कर दिया।
- 30 जनवरी 1933 को राष्ट्रपति हिंडनबर्ग ने हिटलर को जर्मनी की सबसे शक्तिशाली पदवी — चांसलर — बनाया।
- फरवरी 1933 में जर्मन संसद राइखस्टाग भवन में रहस्यमय आग लगी, जिसका दोष हिटलर ने कम्युनिस्टों पर लगाकर उन्हें गिरफ्तार करवाया और हज़ारों कम्युनिस्टों को कंसन्ट्रेशन कैंपों में भेज दिया।
- मार्च 1933 में विशेषाधिकार अधिनियम (Enabling Act) पारित हुआ, जिससे हिटलर को संसद की मंज़ूरी के बिना कानून बनाने का अधिकार मिल गया — यह तानाशाही शासन की शुरुआत थी।
- नात्सी पार्टी के अलावा सभी राजनीतिक पार्टियों व ट्रेड यूनियनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, और हिटलर को बिना मुकदमे किसी को भी गिरफ्तार, निर्वासित या मारने का अधिकार मिल गया।
द्वितीय विश्वयुद्ध का अंत:-
द्वितीय विश्वयुद्ध का अंत कई निर्णायक घटनाओं के बाद हुआ, जिनमें अमेरिका का युद्ध में प्रवेश और परमाणु बमों का प्रयोग सबसे प्रमुख थे।
- 1941 में जापान ने अमेरिका के पर्ल हार्बर पर हमला किया, जिसके बाद अमेरिका मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन, फ्रांस, रूस) की ओर से युद्ध में शामिल हुआ।
- अप्रैल 1945 में सोवियत सेना ने बर्लिन पर कब्ज़ा किया और हिटलर ने आत्महत्या कर ली, जिससे नात्सी शासन का अंत हुआ।
- अगस्त 1945 में अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए, जिसमें लाखों लोग मारे गए और जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया।
3.3 नात्सी जर्मनी में युवाओं और महिलाओं की स्थिति
युवाओं की स्थिति:-
नात्सी शासन के दौरान युवाओं को शिक्षा, खेल और संगठनों के माध्यम से हिटलर व नात्सी विचारधारा के अनुसार ढालने की कोशिश की गई, ताकि एक "नस्लीय रूप से शुद्ध और आज्ञाकारी नागरिक" तैयार हो सके।
- जर्मन और यहूदी बच्चे एक साथ नहीं पढ़ सकते थे; यहूदी, रोमा और शारीरिक रूप से अक्षम बच्चों को स्कूलों से निकाल दिया गया।
- स्कूली पुस्तकों को दोबारा लिखा गया ताकि नस्लीय भेदभाव और हिटलर की श्रेष्ठता का प्रचार किया जा सके, और बच्चों को आर्य जाति को सबसे श्रेष्ठ बताया जाता था।
- 10 वर्ष की उम्र में बच्चों को "युंगफोल्क" संगठन में शामिल किया जाता था, और 14 वर्ष की उम्र में सभी लड़कों के लिए "हिटलर यूथ" की सदस्यता अनिवार्य थी।
- लड़कियों को घर-परिवार, बच्चों की देखभाल और मातृत्व पर केंद्रित शिक्षा दी जाती थी, ताकि वे "आर्य नस्ल" को आगे बढ़ा सकें।
महिलाओं की स्थिति:-
नात्सी शासन में महिलाओं की भूमिका को घर और मातृत्व तक सीमित कर दिया गया; उन्हें पुरुषों के समान अधिकार नहीं दिए गए, बल्कि "आर्य नस्ल" को आगे बढ़ाने का माध्यम माना गया।
- लड़कियों को सिखाया जाता था कि उनका मुख्य कर्तव्य एक अच्छी माँ बनना और शुद्ध रक्त वाले बच्चों को जन्म देना है; उन्हें यहूदियों और अन्य अवांछित नस्लों से दूर रहने का आदेश दिया गया।
- महिलाओं की शिक्षा को सीमित कर दिया गया और उन्हें गृहकार्य, बच्चों की देखभाल व नात्सी मूल्य-मान्यताओं की शिक्षा के लिए तैयार किया जाता था।
- अधिक बच्चे पैदा करने वाली माताओं को सरकार द्वारा कांस्य, रजत और स्वर्ण पदक दिए जाते थे, जबकि नस्लीय तौर पर अवांछित बच्चों को जन्म देने वाली माताओं को दंडित व अपमानित किया जाता था।
- योग्य माताओं को अस्पतालों में विशेष सुविधाएँ, दुकानों में छूट, तथा रेल व थिएटर टिकटों पर रियायतें दी जाती थीं।