CLASS 10 SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 7
जीव जनन कैसे करते हैं? / How Do Organisms Reproduce
| Textbook | NCERT |
|---|---|
| Class | Class 10 |
| Subject | Science |
| Chapter | Chapter 7 |
| Chapter Name | जीव जनन कैसे करते हैं? |
| Medium | Hindi |
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
7.1 जीव अपनी प्रकृति का सृजन कैसे करते हैं
जनन:-
एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से सभी जीव अपने समान नए जीवन का निर्माण करते हैं। यह पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता के लिए अत्यंत आवश्यक है। जनन प्रक्रिया जीवों के अस्तित्व को बनाए रखती है। इस प्रक्रिया का प्रमुख उद्देश्य डी.एन.ए. का पुनर्निर्माण करना (प्रतिकृति बनाना) होता है, साथ ही साथ इसमें अन्य नई कोशिकाओं का निर्माण भी होता है।
- मानव में जनन
- पौधों में जनन
- बैक्टीरिया में जनन
डी.एन.ए. की प्रतिकृति का महत्त्व:-
कोशिका के केन्द्रक में स्थित गुणसूत्र के डी.एन.ए. अणु आनुवांशिक गुणों का संदेश लेकर जनक से उसकी संतति में स्थानांतरित करते हैं। डी.एन.ए. की प्रतिकृति भी पूरी तरह से त्रुटिरहित नहीं होती। इसमें कुछ विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं, जिनमें से कुछ अनुकूल विभिन्नताएँ ही संतति में समाविष्ट हो पाती हैं।
7.1.1 विभिन्नता का महत्व
विभिन्नता का महत्व:-
यदि कोई एक समूह (समष्टि) अपने पर्यावरण के अनुकूल है, परंतु यदि पर्यावरण में कुछ बड़े बदलाव (जैसे तापमान में बदलाव, जल स्तर में बदलाव आदि) होते हैं, तो उस समूह का पूरी तरह से नष्ट होना संभव है। लेकिन उस समूह में कुछ जीवों में विभिन्नताएँ होने पर, उन जीवों के समूह के लिए जीवित रहने की कुछ संभावनाएँ अवश्य बनी रहेंगी। इस प्रकार, विभिन्नताएँ किसी प्रजाति (समष्टि) की दीर्घकालिक उत्तरजीविता को सुनिश्चित करने में सहायक होती हैं। यह भी कहा जा सकता है कि विभिन्नता जैविक विकास का एक प्रमुख आधार है।
7.2 एकल जीवों में जनन की विधियाँ
प्रजनन के प्रकार:-
प्रजनन दो प्रकार के होते हैं:-
- अलैंगिक प्रजनन:- यह वह प्रक्रिया है जिसमें केवल एकल जीव भाग लेते हैं। इसमें बिना किसी लिंग भेद के एक ही जीव से नए जीवों का निर्माण होता है। उदाहरण: बैक्टीरिया, हाइड्रा।
- लैंगिक प्रजनन:- यह वह प्रक्रिया है जिसमें नर और मादा दोनों भाग लेते हैं। इसमें दोनों लिंगों के युग्मकों के मिलन से नए जीवों का निर्माण होता है। उदाहरण: मनुष्य, पक्षी।
अलैंगिक और लैंगिक प्रजनन में अंतर:-
| अलैंगिक प्रजनन | लैंगिक प्रजनन |
|---|---|
| एकल जीव द्वारा नए जीवों का निर्माण होता है | दो एकल जीवों (1 नर तथा 1 मादा) के मिलन से नए जीव का निर्माण होता है |
| युग्मक का निर्माण नहीं करता है | नर युग्मक तथा मादा युग्मक का निर्माण होता है |
| नया जीव पूरी तरह से पैतृक जीव के समान तथा समरूप होता है | नया जीव आनुवांशिक रूप से पैतृक जीवों से मिलता-जुलता तो होता है, लेकिन समरूप नहीं होता |
| यह सतत् गुणन के लिए उपयुक्त है | यह प्रजाति (समष्टि) में विभिन्नताओं के निर्माण में सहायक होता है |
| यह मुख्यतः निम्न वर्ग के जीवों में होता है | यह मुख्यतः उच्च वर्ग के जीवों में पाया जाता है |
अलैंगिक प्रजनन की विधियाँ:-
- द्विखंडन (Fission)
- खंडन (Fragmentation)
- पुनरुद्भवन (पुनर्जनन) (Regeneration)
- मुकुलन (Budding)
- बीजाणु समूह (Spore Formation)
- कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation)
7.2.1 द्विखंडन
द्विखंडन (Fission):-
यह एक प्रजनन प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत एक मूल कोशिका अपनी संरचना को तोड़कर दो या उससे अधिक संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है। इसके दो प्रकार हैं:-
- द्विखंडन (Binary Fission):- इस प्रक्रिया में एक जीव केवल दो कोशिकाओं में विभाजित होता है। उदाहरण: लेस्मानिया तथा अमीबा।
- बहुखंडन (Multiple Fission):- यह प्रक्रिया उस समय होती है जब एक जीव अपनी कोशिका को कई हिस्सों में विभाजित करता है। उदाहरण: प्लाज्मोडियम (मलेरिया का कीटाणु)।
7.2.2 खंडन
खंडन (Fragmentation):-
यह प्रजनन विधि उस समय होती है जब बहुकोशिकीय जीव अपनी संरचना में खंडित होकर छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो जाते हैं। इन टुकड़ों में वृद्धि होती है, और वे एक नए जीव के रूप में विकसित हो जाते हैं।
7.2.3 पुनरुद्भवन (पुनर्जनन)
पुनरुद्भवन/पुनर्जनन (Regeneration):-
इस प्रक्रिया में जब कोई जीव किसी वजह से टूटकर कई टुकड़ों में विभाजित हो जाता है, तब प्रत्येक टुकड़ा एक नया जीव बनाने के रूप में विकसित हो जाता है।
7.2.4 मुकुलन
मुकुलन (Budding):-
इस प्रक्रिया में जीव के शरीर पर एक छोटा सा उभार (मुकुल) बनता है, जो धीरे-धीरे विकसित होकर एक स्वतंत्र जीव के रूप में जनक से अलग हो जाता है।
7.2.5 कायिक प्रवर्धन
कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation):-
कुछ पौधों में नए पौधे का निर्माण उनके शरीर के ही भागों (कायिक भागों) जैसे जड़, तना, पत्तियाँ आदि से होता है। इस प्रक्रिया को कायिक प्रवर्धन कहा जाता है।
कायिक प्रवर्धन की प्राकृतिक विधियाँ:-
| विधि | उदाहरण |
|---|---|
| जड़ द्वारा प्रवर्धन | दहेलिया और शकरकंदी जैसे पौधों में नए पौधे जड़ से उत्पन्न होते हैं |
| तने द्वारा प्रवर्धन | आलू और अदरक जैसे पौधों में तने द्वारा नए पौधे बनते हैं |
| पत्तियों द्वारा प्रवर्धन | ब्रायोफिलम जैसे पौधों की पत्तियों में कलिकाएँ उत्पन्न होती हैं, जो बाद में नए पौधों में परिवर्तित हो जाती हैं |
कायिक प्रवर्धन की कृत्रिम विधियाँ:-
| विधि | उदाहरण |
|---|---|
| रोपण | पौधों को उनके भागों से नया पौधा उगाना, जैसे आम |
| कर्तन | पौधों के तने के भाग को काटकर नया पौधा उगाना, जैसे गुलाब |
| लेयरिंग | पौधों के तने को मिट्टी में दबाकर नए पौधे का निर्माण करना, जैसे चमेली |
| ऊतक संवर्धन | पौधे के ऊतक (कोशिका) से नया पौधा विकसित करना, जैसे ऑर्किड और सजावटी पौधे |
कायिक प्रवर्धन के लाभ:-
- बीज से न उत्पन्न होने वाले पौधों, जैसे केला और गुलाब, से नए पौधे प्राप्त किए जा सकते हैं। यह पौधों की किस्मों को बनाए रखने में मदद करता है।
- इस विधि से उत्पन्न नए पौधे अपने जनक के आनुवंशिक गुण समान रूप से प्राप्त करते हैं, जिससे उच्च गुणवत्ता वाले पौधों का उत्पादन होता है।
- यह बीजरहित फलों के उत्पादन में सहायक होती है, और यह तेज़ी से अधिक पौधे उत्पन्न करने में सक्षम होती है।
- यह पौधों को उगाने का एक सरल और किफायती तरीका है, जो फसल की गुणवत्ता को बनाए रखने में सहायक होता है।
7.2.6 बीजाणु समूह द्वारा जनन
बीजाणु समूह (Spore Formation):-
कुछ जीवों के तंतुओं के अंत में बीजाणुधानी उत्पन्न होती है, जिसमें बीजाणु पाए जाते हैं। ये बीजाणु गोल आकार के होते हैं और एक मोटी परत से सुरक्षित रहते हैं। जब इन बीजाणुओं को अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं, तो वे वृद्धि करने लगते हैं।
ऊतक संवर्धन (Tissue Culture):-
एक जैविक प्रक्रिया है, जिसमें पौधे के किसी हिस्से से कोशिकाओं को लेकर उन्हें विशेष पोषक माध्यमों में रखा जाता है। यहाँ इन कोशिकाओं का विभाजन तथा वृद्धि होती है, जिससे कैलस (कोशिकाओं का गुच्छ) का निर्माण होता है। फिर, इस कैलस को एक हॉर्मोनल माध्यम के अंदर रखा जाता है, जहाँ से विभेदन प्रक्रिया आरंभ होती है और नए पौधे उत्पन्न होते हैं।
द्विखंडन और बहुखंडन में अंतर:-
| विशेषताएँ | द्विखंडन | बहुखंडन |
|---|---|---|
| परिस्थितियाँ | अनुकूल परिस्थितियाँ | प्रतिकूल परिस्थितियाँ |
| विभाजन प्रक्रिया | केन्द्रक दो भागों (पुत्री केन्द्रकों) में विभाजित होता है | केन्द्रक कई भागों (संतति केन्द्रकों) में विभाजित होता है |
| कोशाद्रव्य का बँटवारा | केन्द्रक विभाजन के साथ होता है | केन्द्रक विभाजन के बाद विभिन्न भागों में बाँटा जाता है |
| प्रकार | एककोशिकीय जीव से दो संतति जीवों का निर्माण होता है | एककोशिकीय जीव से कई संतति जीवों का निर्माण होता है |
| उदाहरण | अमीबा (Amoeba) | प्लाज्मोडियम (Plasmodium) |
7.3 लैंगिक जनन
7.3.1 लैंगिक जनन प्रणाली की आवश्यकता
लैंगिक प्रजनन:-
इस प्रकार के प्रजनन में नए जीवों का निर्माण करने के लिए नर और मादा दोनों की भागीदारी अनिवार्य होती है। लैंगिक प्रजनन तब होता है जब नर और मादा युग्मकों का मिलन होता है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप संतति में विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं।
डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनाने की आवश्यकता:-
जनन की प्रक्रिया में डी.एन.ए. का प्रतिकृतिकरण करना एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया द्वारा नए जीवन का निर्माण होता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि जीवधारी की संरचना वही बनी रहती है। इसके परिणामस्वरूप, जीवधारी अपनी उत्पत्ति और पर्यावरण के अनुसार अनुकूलित रहता है।
7.3.2 पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन
पुष्पी पौधों के जनन अंग:-
आवृतबीजी (एंजियोस्पर्म) पौधों के जनन अंग पुष्प में स्थित होते हैं। इनमें बाह्यदल, पंखुड़ी, पुंकेसर और स्त्रीकेसर शामिल हैं। पुंकेसर और स्त्रीकेसर ही पुष्प के जनन अंग होते हैं, जिनमें जनन कोशिकाएँ स्थित होती हैं।
एकलिंगी और उभयलिंगी पुष्प:-
| प्रकार | विवरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| एकलिंगी पुष्प | इन पुष्पों में केवल एक जननांग (पुंकेसर या स्त्रीकेसर) होता है | पपीता तथा तरबूज |
| उभयलिंगी पुष्प | इन पुष्पों में दोनों जननांग (पुंकेसर और स्त्रीकेसर) होते हैं | गुड़हल तथा सरसों |
बीज निर्माण की प्रक्रिया के चरण:-
- परागकण का स्थानांतरण:- परागकोश में उत्पन्न परागकण वायु, जल अथवा जन्तुओं द्वारा उसी फूल के वर्तिकाग्र (स्वपरागण) अथवा अन्य दूसरे फूलों के वर्तिकाग्र (परपरागण) पर पहुँचते हैं।
- परागनलिका का विकास:- परागकण से एक परागनलिका विकसित होती है, जो वर्तिका से गुजरते हुए बीजांड तक पहुँचती है।
- निषेचन:- अंडाशय में नर और मादा युग्मक का निषेचन होता है, जिसके परिणामस्वरूप युग्मनज का निर्माण होता है।
- विभाजन और भ्रूण का निर्माण:- युग्मनज में विभाजन होता है और भ्रूण का निर्माण होता है।
- बीज का निर्माण:- बीजांड द्वारा एक कठोर आवरण विकसित होता है जो बाद में बीज में बदल जाता है।
- फल का विकास:- अंडाशय एक फल में बदल जाता है और फूल के अन्य भाग झड़ने लगते हैं।
अंकुरण:-
बीज (जो भविष्य में पौधा बनेगा) या भ्रूण, जब उपयुक्त परिस्थितियों में विकसित होता है तथा नए पौधे के रूप में उभरता है, तो इस प्रक्रिया को अंकुरण कहा जाता है।
परागण और निषेचन में अंतर:-
| विषय | परागण | निषेचन |
|---|---|---|
| परिभाषा | परागकणों का परागकोश से वर्तिकाग्र तक पहुँचने की प्रक्रिया | नर और मादा युग्मकों का मिलकर नया युग्मज बनाना |
| प्रक्रिया | परागकणों का स्थानांतरण होता है | नर और मादा युग्मकों का मिलन होता है, जिससे नया जीवन उत्पन्न होता है |
| माध्यम | यह प्रक्रिया हवा, पानी, कीट, पक्षी आदि द्वारा होती है | उच्च पादपों में यह कार्य परागनलिका द्वारा संपन्न होता है |
| समय | परागण निषेचन से पहले ही होता है | निषेचन परागण के बाद ही होता है |
7.3.3 मानव में लैंगिक जनन
मानव में प्रजनन:-
मानवों में प्रजनन की प्रक्रिया लैंगिक जनन द्वारा होती है, जिसमें नर और मादा युग्मकों का मिलन होता है।
लैंगिक परिपक्वता:-
वह समय जब व्यक्ति के शरीर में यौवन संबंधी विकास की प्रक्रिया शुरू होती है, और नर में शुक्राणु तथा मादा में अंड कोशिका का निर्माण प्रारंभ होता है, उसे लैंगिक परिपक्वता कहते हैं। इस अवस्था को किशोरावस्था में यौवनारंभ भी कहा जाता है।
यौवनारंभ में होने वाले सामान्य परिवर्तन:-
| प्रकार | परिवर्तन |
|---|---|
| किशोरों में (सामान्य) | कांख तथा जननांग के पास घने बालों का उगना; त्वचा का तैलीय होना और मुँहासों का निकलना |
| लड़कियों में | स्तन का आकार बढ़ना; रजोधर्म का आरंभ होना |
| लड़कों में | चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ का उगना; आवाज़ में बदलाव (आवाज़ का फटना) |
7.3.3 (a) नर जनन तंत्र
नर जनन तंत्र:-
इसमें वे अंग शामिल होते हैं जो जनन कोशिकाओं का उत्पादन करते हैं और उन कोशिकाओं को निषेचन स्थल तक पहुँचाते हैं। इन अंगों का संयुक्त कार्य ही नर जनन तंत्र का निर्माण करता है।
| अंग | कार्य |
|---|---|
| वृषण | शुक्राणु का निर्माण करता है (शरीर के तापमान से कम तापमान पर स्थित); टेस्टोस्टेरॉन हॉर्मोन उत्पन्न करता है |
| टेस्टोस्टेरॉन | शुक्राणु उत्पादन को नियंत्रित करता है; लड़कों में यौवनावस्था के परिवर्तन लाता है |
| शुक्रवाहिनी | शुक्राणुओं का मोचन (Ejaculation) करती है; मूत्राशय से आने वाली नली से जुड़कर संयुक्त नली बनाती है |
| मूत्रमार्ग | मूत्र और वीर्य दोनों के बाहर जाने का मार्ग; लिंग के बाहरी आवरण के रूप में जाना जाता है |
| शुक्राशय व प्रोस्टेट ग्रंथियाँ | अपना स्राव शुक्रवाहिनी में डालती हैं, जिससे शुक्राणु तरल माध्यम में आते हैं और वीर्य का निर्माण होता है |
7.3.3 (b) मादा जनन तंत्र
| अंग | कार्य |
|---|---|
| अंडाशय | मादा युग्मक (अंड कोशिका) का निर्माण करता है; जन्म से ही हज़ारों अपरिपक्व अंड मौजूद होते हैं; यौवनारंभ के बाद प्रतिमाह एक परिपक्व अंड उत्पन्न होता है; एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन हॉर्मोन बनाता है |
| अंडवाहिका (फेलोपियन ट्यूब) | अंडाशय से उत्पन्न अंड कोशिका को गर्भाशय तक पहुँचाती है; यहीं अंड कोशिका और शुक्राणु का निषेचन होता है |
| गर्भाशय | थैलीनुमा संरचना जहाँ भ्रूण का विकास होता है; ग्रीवा के माध्यम से योनि से जुड़ा होता है |
7.3.3 (c) अनिषेचित अंडे की स्थिति
अंड कोशिका के निषेचन पर:-
जब अंड कोशिका का निषेचन होता है, तो निषेचित अंड को युग्मनज कहा जाता है, जिसे गर्भाशय में रोपित किया जाता है। गर्भाशय में रोपण के बाद, युग्मनज में विभाजन और विभेदन की प्रक्रिया होती है, जिसके परिणामस्वरूप भ्रूण का निर्माण होता है।
अंड कोशिका के निषेचित न होने पर:-
- हर महीने निषेचित अंड प्राप्त करने के लिए गर्भाशय स्वयं को तैयार करता है।
- गर्भाशय की परत मांसल और स्पंजी बन जाती है, जो भ्रूण के विकास हेतु आवश्यक होती है।
- निषेचन नहीं होने पर यह परत आवश्यक नहीं रह जाती है, और धीरे-धीरे टूटकर रक्त व म्यूकस के रूप में योनि मार्ग से बाहर निकल जाती है।
- यह चक्र लगभग एक महीने में पूरा होता है, और इसे ऋतुस्राव या रजोधर्म कहा जाता है।
प्लेसेंटा:-
एक विशेष प्रकार का ऊतक है, जो गर्भाशय में एक तश्तरी जैसी बनावट में स्थित होता है। इसके प्रमुख कार्य हैं:-
- माँ के रक्त से भ्रूण को पोषक तत्व जैसे ग्लूकोज और ऑक्सीजन प्रदान करना।
- भ्रूण द्वारा उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थों को हटाना।
गर्भकाल:-
वह अवधि है जो अंडाणु के निषेचन से लेकर शिशु के जन्म तक होती है। यह सामान्यतः लगभग 9 महीने की होती है।
7.3.3 (d) जनन स्वास्थ्य
लैंगिक संचरित रोग:-
ऐसे कई रोग होते हैं, जो लैंगिक संबंधों के माध्यम से फैल सकते हैं:-
- बैक्टीरियल संक्रमण: सिफलिस, गोनोरिया
- वायरल संक्रमण: HIV-AIDS, मस्सा (warts)
गर्भरोधन:-
गर्भधारण को रोकने की प्रक्रिया को गर्भरोधन कहते हैं।
| प्रकार | विवरण |
|---|---|
| यांत्रिक अवरोध | शुक्राणुओं को अंडाणु तक पहुँचने से रोकने वाली विधियाँ, जैसे कंडोम (पुरुषों के लिए), सर्वाइकल कैप (महिलाओं के लिए) |
| रासायनिक तकनीक | दवाइयों के माध्यम से अंडाणु के उत्पादन को रोकने हेतु हॉर्मोनल संतुलन में बदलाव करती है; इसके कुछ विपरीत प्रभाव भी होते हैं |
| IUCD (Intra Uterine Contraceptive Device) | गर्भाशय में लूप या कॉपर-टी डालकर गर्भधारण को रोका जाता है |
| शल्य क्रिया तकनीक | नसबंदी (Vasectomy): पुरुषों में शुक्रवाहिकाओं को ब्लॉक करना; ट्यूबेक्टोमी (Tubectomy): महिलाओं में अंडवाहिनी को अवरुद्ध करना |
भ्रूण हत्या और लिंग अनुपात:-
जब मादा भ्रूण को गर्भाशय में ही नष्ट कर दिया जाता है, तो इसे भ्रूण हत्या कहा जाता है। लिंग अनुपात का संतुलन एक स्वस्थ समाज के लिए बहुत आवश्यक है, और यह तभी संभव है जब लोग भ्रूण हत्या और भ्रूण लिंग निर्धारण जैसी प्रथाओं के बारे में जागरूक हों और इन्हें रोका जाए।