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CLASS 10 SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 5

जैव प्रक्रम / Life Processes

TextbookNCERT
ClassClass 10
SubjectScience
ChapterChapter 5
Chapter Nameजैव प्रक्रम
MediumHindi

5.1 जैव प्रक्रम

सजीव वस्तुएँ:-

वे सभी वस्तुएँ जो पोषण, श्वसन, उत्सर्जन और वृद्धि जैसी क्रियाएँ करती हैं तथा जीवन चक्र को संचालित करती हैं। उदाहरण: मनुष्य, पशु और पौधे।

निर्जीव वस्तुएँ:-

वे सभी वस्तुएँ जिनमें पोषण, श्वसन, उत्सर्जन, वृद्धि आदि जैसे जीवन के कोई भी लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए ये किसी प्रकार की जैविक क्रियाएँ नहीं कर पाते। उदाहरण: मिट्टी, पत्थर और लकड़ी।

सजीव और निर्जीव वस्तुओं में अंतर:-

सजीवनिर्जीव
सजीव श्वसन क्रिया करते हैंनिर्जीव श्वसन क्रिया नहीं करते हैं
सजीव वृद्धि करने में सक्षम होते हैंनिर्जीव वृद्धि करने में सक्षम नहीं होते हैं
सजीव जनन क्रिया करते हैंनिर्जीव जनन क्रिया नहीं करते हैं
सजीव स्थान परिवर्तन करने में सक्षम होते हैंनिर्जीव स्थान परिवर्तन करने में सक्षम नहीं होते हैं
सजीव पोषण करने में सक्षम होते हैंनिर्जीव पोषण करने में सक्षम नहीं होते हैं
नोट:- विषाणु (Virus) में सजीव और निर्जीव दोनों के गुण होते हैं। जब यह बाहरी वातावरण में होता है, तब यह निर्जीव होता है। परंतु जब विषाणु सजीव कोशिका में प्रवेश करता है, तब यह सजीव की तरह व्यवहार करता है।

जैव प्रक्रम:-

वे सभी प्रक्रियाएँ जो एक साथ मिलकर एक जीव के जीवन को बनाए रखने में मदद करती हैं, उन्हें जैव प्रक्रम कहते हैं।

उदाहरण: श्वसन (Respiration), पाचन (Digestion), संचरण (Transportation), और प्रजनन (Reproduction)

जैव प्रक्रम में शामिल प्रक्रियाएँ:-

  1. पोषण (Nutrition)
  2. श्वसन (Respiration)
  3. वहन (Transportation)
  4. उत्सर्जन (Excretion)

5.2 पोषण

पोषण:-

भोजन का सेवन करना, पचने के बाद भोजन का अवशोषण करना और शरीर द्वारा उसे ऊर्जा के रूप में उपयोग करना, इसे पोषण कहा जाता है।

पोषण के प्रकार:-

  1. स्वपोषी पोषण: जैसे पौधे, शैवाल तथा साइनोबैक्टीरिया
  2. विषमपोषी पोषण: जैसे मनुष्य, गाय, शेर, तथा फफूंदी, प्रोटोजोआ
नोट:- विषमपोषी पोषण के तीन प्रकार होते हैं: (1) मृतजीवी पोषण जैसे बैक्टीरिया, कवक तथा प्रोटोजोआ (2) परजीवी पोषण जैसे मलेरिया तथा गोलकृमि (3) प्राणिसम पोषण जैसे मेंढ़क, मनुष्य तथा अमीबा।

5.2.1 स्वपोषी पोषण

स्वपोषी पोषण:-

वह प्रक्रिया जिसके द्वारा कोई जीव अपने आसपास के वातावरण से सरल अजैविक तत्वों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), पानी (H₂O) और सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके अपना भोजन स्वयं ही तैयार करते हैं, उसे स्वपोषण कहा जाता है।

उदाहरण: हरे पौधे इसका अच्छा उदाहरण हैं।

नोट:- स्वपोषी जीव अपनी ऊर्जा तथा कार्बन की आवश्यकताएँ प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया के माध्यम से पूरी करते हैं।

प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया:-

वह जैविक प्रक्रिया जिसमें स्वपोषी जीव सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की मदद से जल (H₂O) और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को ऊर्जा में बदलकर ग्लूकोज़ (C₆H₁₂O₆) जैसे कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं। इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन (O₂) और पानी का उत्सर्जन भी होता है।

6CO₂ + 12H₂O + प्रकाश ऊर्जा → C₆H₁₂O₆ (ग्लूकोज़) + 6O₂ + 6H₂O

प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक सामग्री:-

  1. कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) – यह पौधों को वायुमंडल से प्राप्त होता है।
  2. जल (H₂O) – यह पौधों को मिट्टी से अवशोषित करके प्राप्त होता है।
  3. सूर्य का प्रकाश – यह पौधों को सूर्य से ऊर्जा के रूप में प्राप्त होता है।
  4. क्लोरोफिल – यह पौधों में पाया जाने वाला हरा रंगद्रव्य होता है।

प्रकाश संश्लेषण में होने वाली घटनाएँ:-

  1. क्लोरोफिल प्रकाश की ऊर्जा को अवशोषित करता है।
  2. प्रकाश की ऊर्जा का रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरण होना।
  3. जल के अणुओं का ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन में अपघटन होना।
  4. कार्बन डाइऑक्साइड का कार्बोहाइड्रेट में परिवर्तन (अपचयन) होना।

क्लोरोप्लास्ट:-

पत्तियों की कोशिकाओं में हरे रंग के छोटे-छोटे अंगक होते हैं, जिन्हें कोशिकांग अथवा क्लोरोप्लास्ट कहते हैं। इनमें क्लोरोफिल नामक हरा रंजक पाया जाता है, जो प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में मदद करता है।

रंध्र:-

पत्तियों की सतह पर पाए जाने वाले छोटे-छोटे छिद्रों को रंध्र कहते हैं।

रंध्र के कार्य: (1) प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक गैसों का आदान-प्रदान मुख्यतः रंध्र के माध्यम से होता है। (2) वाष्पोत्सर्जन के दौरान जल वाष्प रंध्र से ही बाहर निकलता है।

रंध्र की रचना व कार्यप्रणाली:-

रंध्र के चारों ओर दो विशेष कोशिकाएँ पायी जाती हैं, जिन्हें द्वार कोशिकाएँ अथवा गार्ड कोशिकाएँ (Guard Cells) कहा जाता है। ये कोशिकाएँ रंध्र को खोलने तथा बंद करने का कार्य करती हैं, ताकि गैसों के आदान-प्रदान को नियंत्रित किया जा सके। जब द्वार कोशिकाओं में पानी प्रवेश करता है, तो वे फूल जाती हैं जिससे छिद्र खुल जाता है। जब द्वार कोशिकाएँ सिकुड़ जाती हैं, तो छिद्र बंद हो जाता है।

5.2.2 विषमपोषी पोषण

विषमपोषी पोषण:-

वह पोषण जिसमें जीव अपने भोजन के लिए दूसरे जीवों अथवा पौधों पर निर्भर होता है, अर्थात जीव स्वयं अपना भोजन बनाने में सक्षम नहीं होता।

उदाहरण: मनुष्य, पशु तथा पक्षी आदि।

विषमपोषी पोषण के प्रकार:-

  1. मृतजीवी पोषण
  2. परजीवी पोषण
  3. प्राणिसम पोषण

5.2.3 जीवों द्वारा पोषण प्राप्ति

मृतजीवी पोषण:-

इस पोषण में जीव अपना भोजन मृत तथा सड़े-गले हुए जीवों के शरीर एवं उनके अवशेषों से प्राप्त करते हैं।

उदाहरण: फफूंदी और कवक

परजीवी पोषण:-

इस पोषण में जीव अन्य जीवों के शरीर के बाहर या अंदर रहकर, उन्हें बिना मारे, अपना पोषण उनसे प्राप्त कर लेते हैं।

उदाहरण: जोंक, अमरबेल, जूँ, तथा फीताकृमि

प्राणिसम पोषण:-

इस पोषण में जीव अपना भोजन संपूर्ण रूप से ग्रहण करते हैं, तथा उनका पाचन शरीर के भीतर होता है।

उदाहरण: मनुष्य तथा अमीबा

एककोशिकीय जीव तथा अमीबा:-

एककोशिकीय जीव अपने शरीर की पूरी सतह से भोजन ग्रहण कर सकते हैं — उदाहरण: अमीबा और पैरामीशियम।

अमीबा एक कोशिका तथा अनिश्चित आकार वाला प्राणिसमपोषी जीव है। यह कूटपादों (अपने शरीर से बाहर निकले हुए तंतुओं या झिल्ली) द्वारा भोजन ग्रहण करता है — जैसे बैक्टीरिया, शैवाल के छोटे टुकड़े, डायटम तथा मृत कार्बनिक पदार्थ।

अमीबा में पोषण के तीन चरण:-

  1. अंतर्ग्रहण: अमीबा कोशिकीय सतह से कूटपादों की मदद से भोजन को पकड़ता है और वह भोजन एक खाद्यधानी में संचित हो जाता है।
  2. पाचन प्रक्रिया: खाद्यधानी के भीतर जटिल पदार्थों का विभाजन करके उन्हें सरल पदार्थों में परिवर्तित किया जाता है, जो कोशिका द्रव्य में प्रवेश कर जाते हैं और कोशिका द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं।
  3. बहिष्करण: अपचित पदार्थ कोशिका की सतह तक पहुँचकर बाहर निष्कासित हो जाते हैं।

पैरामीशियम व बहुकोशिकीय जीव:-

पैरामीशियम एक एककोशिकीय जीव है, जिसका आकार निश्चित होता है और भोजन केवल एक विशिष्ट स्थान से प्राप्त किया जाता है — यह भोजन पक्ष्याभ (सीलिया) की गति द्वारा उस स्थान तक पहुँचता है, जो कोशिका की पूरी सतह पर उपस्थित होते हैं।

बहुकोशिकीय जीवों में पोषण के लिए विभिन्न अंग और अंगतंत्र होते हैं — जैसे मानव में मुँह, अन्ननाल, और आंत।

5.2.4 मनुष्य में पोषण की प्रक्रिया

मनुष्यों में पोषण के चरण:-

मुखगुहा → आमाशय → क्षुद्रांत्र (छोटी आंत) → बृहदांत्र (बड़ी आंत)

मुखगुहा में भोजन के साथ प्रक्रिया:-

मुखगुहा में भोजन को दाँतों द्वारा छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित किया जाता है, और लार ग्रंथियों से निकलने वाला लार भोजन के साथ मिलकर पेशीय गति द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जिससे भोजन आसानी से आहार नली में क्रमिक गति से चलता है।

मुखगुहा की लारग्रंथियाँ:-

मनुष्य की मुखगुहा में कुल तीन जोड़ी लारग्रंथियाँ होती हैं:

  1. पैरोटिड लार ग्रंथि: शरीर की सबसे बड़ी लार ग्रंथि, कान के नीचे स्थित। यह भोजन को पचाने में मदद करने वाला लार स्रावित करती है, जो शुष्क भोजन को नरम बनाकर पाचन को सरल बनाता है।
  2. सबमैंडिबुलर लार ग्रंथि: ठुड्डी के पास, मुँह के नीचे स्थित। यह लार भोजन को मुँह में घोलने और पाचन में मदद करती है — इनका स्राव एंज़ाइमों से युक्त होता है।
  3. सबलिंगुअल लार ग्रंथि: जीभ के नीचे स्थित, भोजन के पाचन को प्रारंभ करने में सहायता करती है और मुँह में चिकनाई बनाती है, क्योंकि इनकी लार में म्यूकस होता है।

टायलिन (लार एमाइलेस):-

यह लार में मौजूद एक एंज़ाइम है, जो मंड (स्टार्च) को शर्करा में परिवर्तित करता है।

आमाशय में भोजन के साथ प्रक्रिया:-

  1. भोजन को मुँह से आमाशय तक लाने के लिए ग्रासनली (इसोफेगस) में क्रमिक संकुचन (पेरिस्टाल्सिस) की प्रक्रिया होती है।
  2. आमाशय की पेशीय गति भोजन को पाचक रसों के साथ मिलाने में सहायक होती है।
  3. आमाशय की दीवार में स्थित जठर ग्रंथियाँ हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl), प्रोटीन पाचक एंज़ाइम पेप्सिन और श्लेष्मा (म्यूकस) स्रावित करती हैं, जो पाचन क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

जठर रसों के कार्य:-

  1. हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl): आमाशय में अम्लीय वातावरण तैयार करता है, जो पेप्सिनोजेन को सक्रिय पेप्सिन में बदलने में मदद करता है। यह जीवाणुनाशक के रूप में भी कार्य करता है।
  2. पेप्सिन एंज़ाइम: प्रोटीन के पाचन में सहायक होता है और उसे तोड़ने का काम करता है।
  3. श्लेष्मा या म्यूकस: आमाशय की जठर ग्रंथियों और आंतरिक दीवार को HCl और पेप्सिन के हानिकारक प्रभाव से बचाने का कार्य करता है।
नोट:- आमाशय में वसा का आंशिक पाचन गैस्ट्रिक लाइपेज एंज़ाइम के माध्यम से होता है। मनुष्य के आमाशय में प्रतिदिन लगभग 3 लीटर जठर रस स्रावित होता है।

क्षुद्रांत्र (छोटी आंत) में प्रक्रिया:-

  1. आमाशय से भोजन छोटी आंत में अवरोधनी पेशी द्वारा नियंत्रित होकर प्रवेश करता है। यहाँ कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा का संपूर्ण पाचन होता है।
  2. क्षुद्रांत्र में आमाशय से आने वाला भोजन अम्लीय होता है, जिसे अग्नाशयिक एंज़ाइमों की क्रिया के लिए क्षारीय वातावरण यकृत द्वारा स्रावित पित्त रस से प्रदान किया जाता है।

वसा आंत में बड़े गोलिकाओं के रूप में पायी जाती है, जिस पर एंज़ाइमों का प्रभाव कम होता है। पित्त लवण इन गोलिकाओं को छोटे टुकड़ों में विभाजित कर देते हैं, जिससे एंज़ाइम की सक्रियता बढ़ जाती है — इस प्रक्रिया को इमल्सीकरण कहा जाता है।

अग्नाशयिक रस के कार्य:-

अग्नाशय अग्नाशयिक रस स्रावित करता है, जिसमें इमल्सीकृत वसा के पाचन के लिए लाइपेज एंज़ाइम और प्रोटीन के पाचन के लिए ट्रिप्सिन एंज़ाइम होता है।

आंत्र रस के कार्य:-

क्षुद्रांत्र की ग्रंथियाँ आंत्र रस स्रावित करती हैं, जिसमें मौजूद एंज़ाइम जटिल कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज़ में, वसा को वसा अम्ल तथा ग्लिसरॉल में और प्रोटीन को अमीनो अम्ल में परिवर्तित कर देते हैं।

क्षुद्रांत्र (छोटी आंत) की संरचना व कार्य:-

पचे हुए भोजन को आंत की दीवार द्वारा अवशोषित किया जाता है। क्षुद्रांत्र की आंतरिक परत पर कई अँगुली जैसे उभार होते हैं, जिन्हें दीर्घरोम (villi) कहा जाता है, जो अवशोषण के सतही क्षेत्रफल को बढ़ाते हैं। दीर्घरोम में रक्त वाहिकाओं का जाल होता है, जो पचाए गए भोजन को अवशोषित करके शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाता है।

बृहदांत्र (बड़ी आँत) की संरचना व कार्य:-

जो भोजन पूर्ण रूप से पचा नहीं होता, उसे बृहदांत्र में भेजा जाता है, जहाँ दीर्घरोम की अधिक संख्या इस पदार्थ से पानी का अवशोषण कर लेती है। शेष बचा हुआ पदार्थ गुदा द्वारा शरीर से बाहर निष्कासित कर दिया जाता है — यह गुदा अवरोधनी द्वारा नियंत्रित होता है।

मनुष्यों के दाँतों के प्रकार:-

एक सामान्य मनुष्य के मुँह में सामान्यतः 32 दाँत होते हैं, जो चार प्रकार के होते हैं:

  1. 8 कृंतक या कर्तनक (Incisors): सामने के दाँत, चपटे और छोटे — भोजन को काटने का कार्य करते हैं (दो ऊपर और दो नीचे)।
  2. 4 रदनक या भेदक (Canines): नुकीले दाँत, भोजन को फाड़ने का कार्य करते हैं (दो ऊपर और दो नीचे)।
  3. 8 अग्रचर्वणक (Premolars): पार्श्व भाग में स्थित, भोजन को चबाने और कुचलने का कार्य करते हैं (चार ऊपर और चार नीचे)।
  4. 12 चर्वणक (Molars): बड़े और चौड़े दाँत, भोजन को चबाने और पीसने का कार्य करते हैं (छह ऊपर और छह नीचे)।
नोट:- 12 चर्वणकों में से 4 अक्ल दाढ़ (Wisdom teeth) होती हैं, जिन्हें "बुद्धि के दाँत" भी कहा जाता है।

दंतक्षरण:-

मुँह में कार्बोहाइड्रेट्स का पाचन लार के द्वारा शर्करा में होता है। इसके बाद, कुछ प्रकार के जीवाणु इन शर्कराओं पर क्रिया करके अम्ल का निर्माण करते हैं, जो दाँत के एनामेल (ऊपरी परत) को कमजोर कर देते हैं। कई जीवाणु खाद्य कणों के साथ मिलकर दाँतों पर एक पतली परत (दंत प्लाक) बना लेते हैं। यदि इसे नियमित रूप से ब्रश से साफ नहीं किया जाता, तो यह प्लाक दाँतों के भीतरी भाग (मज्जा) में पहुँचकर जलन का कारण बनता है, जिससे दंतक्षरण की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है।

कोशिकीय श्वसन:-

पोषण की प्रक्रिया में शरीर द्वारा ग्रहण की गई खाद्य सामग्री कोशिकाओं द्वारा उपयोग की जाती है, जिससे विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा मिलती है। इस ऊर्जा को उत्पन्न करने के लिए कोशिकाओं में भोजन के विखंडन की प्रक्रिया होती है, जिसे कोशिकीय श्वसन कहा जाता है।

5.3 श्वसन

5.3.1 श्वसन से ऊर्जा प्राप्ति

श्वसन के प्रकार:-

  1. वायवीय श्वसन
  2. अवायवीय श्वसन

5.3.2 वायवीय एवं अवायवीय श्वसन

वायवीय श्वसन:-

कोशिकाओं के द्रव्य में स्थित माइटोकॉन्ड्रिया में पायरूवेट का विखंडन तब होता है, जब ऑक्सीजन उपस्थित होती है। इस प्रक्रिया को वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration) कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप जल, कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो ATP के रूप में संचित होती है। वायवीय श्वसन में अपेक्षाकृत अधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है।

अवायवीय श्वसन:-

कोशिका द्रव्य में, ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में, ग्लूकोज़ का आंशिक रूप से विखंडन एंज़ाइमों की सहायता से होता है। इस प्रक्रिया को अवायवीय श्वसन कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप एथेनॉल, लैक्टिक अम्ल, और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया में ऊर्जा का केवल एक छोटा हिस्सा प्राप्त होता है।

वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में अंतर:-

वायवीय श्वसनअवायवीय श्वसन
ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता हैऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है
ग्लूकोज़ का पूर्ण रूप से विघटन होता हैग्लूकोज़ का आंशिक रूप से विघटन होता है
परिणामस्वरूप CO₂, पानी और ऊर्जा उत्पन्न होती हैएथेनॉल, लैक्टिक अम्ल, CO₂ और ऊर्जा उत्पन्न होती है
यह कोशिका द्रव्य और माइटोकॉन्ड्रिया में होता हैयह केवल कोशिका द्रव्य में होता है
अधिक ऊर्जा (लगभग 36 ATP) उत्पन्न होती हैकम ऊर्जा (केवल 2 ATP तक) उत्पन्न होती है
उदाहरण: मानवउदाहरण: यीस्ट
नोट:- कोशिकीय श्वसन से उत्पन्न ऊर्जा ATP (एडिनोसिन ट्राईफॉस्फेट) के रूप में संचित होती है, जिसे कोशिका अपनी कार्यप्रणाली के लिए ईंधन के रूप में इस्तेमाल करती है। कोशिकीय श्वसन एक प्रकार की ऊष्माक्षेपी प्रक्रिया है।

पौधे में रात्रि और दिन की घटनाओं में अंतर:-

रात्रि में घटनादिन में घटना
प्रकाश संश्लेषण नहीं होता, इसलिए CO₂ का उत्सर्जन मुख्य गतिविधि बन जाती हैश्वसन से उत्पन्न CO₂ का उपयोग प्रकाश संश्लेषण में होता है, जिसके परिणामस्वरूप मुख्यतः O₂ का उत्सर्जन होता है

जलीय जीवों में श्वसन:-

जलीय जीव जल में घुले हुए ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं। चूँकि जल में ऑक्सीजन की मात्रा स्थलीय जीवों की तुलना में कम होती है, इसलिए इनकी श्वसन दर भी स्थलीय जीवों से अधिक होती है। मछली जल को अपने मुँह से अंदर लेकर उसे गिल्स (क्लोम) तक पहुँचाती है, जहाँ जल में घुली ऑक्सीजन को रक्त द्वारा अवशोषित किया जाता है।

विभिन्न जीवों के श्वसन अंग:-

  1. मनुष्य → फेफड़ा
  2. मच्छर → श्वसन नलिकाएँ (ट्रेकिया)
  3. मछली → गलफड़ या गिल्स
  4. केंचुआ → त्वचा

5.4 वहन (परिसंचरण)

श्वसन तंत्र में वायु का प्रवाह:-

नासिका → ग्रसनी → कंठ → श्वास नली (ट्रेकिया) → श्वसनिका (ब्रोंकस) → फेफड़े → कूपिका कोशिकाएँ → रक्त वाहिकाएँ

मानव श्वसन तंत्र में हवा नासिका द्वारा प्रवेश करती है, जो आगे ग्रसनी में जाती है। कंठ से होते हुए यह श्वास नली में प्रवेश करती है। इसके बाद यह हवा श्वसनिका से होती हुई फेफड़ों तक पहुँच जाती है। वहाँ से हवा कूपिका कोशिकाओं तक पहुँचती है, और अंत में रक्त वाहिकाओं में रक्त का संचार होता है।

नोट:- नाक में मौजूद श्लेष्मा और सूक्ष्म बाल वायु के साथ प्रवेश करने वाली अशुद्धियों (धूल, मिट्टी, बैक्टीरिया, परागकण, राख आदि) को अवरुद्ध कर लेते हैं।

ग्रसनी तथा कंठ:-

ग्रसनी: एक ऐसा मार्ग है जो श्वसन तंत्र एवं पाचन तंत्र दोनों में काम आता है।

कंठ (स्वरयंत्र): श्वास नली के ऊपर और ग्रासनली के ठीक सामने स्थित यह नलिका वयस्कों में करीब 5 सेंटीमीटर लंबी होती है। कंठ में उपास्थि के वलय पाए जाते हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि वायु का मार्ग अवरुद्ध न हो।

फेफड़ों में गैसों का विनिमय:-

फेफड़ों के भीतर वायुमार्ग छोटी-छोटी नलिकाओं में विभाजित हो जाते हैं, जो अंत में गुब्बारे जैसी संरचनाओं में बदल जाते हैं, जिन्हें कूपिका (Alveoli) कहा जाता है। कूपिका ऐसी सतह प्रदान करती है, जो गैसों के आदान-प्रदान के लिए उपयुक्त होती है। कूपिका की दीवारों में रक्त वाहिकाओं का विस्तृत जाल पाया जाता है।

पसलियों और डायाफ्राम की भूमिका:-

श्वास अंदर लेते समय हमारी पसलियाँ ऊपर की ओर उठती हैं और डायाफ्राम चपटा हो जाता है, जिसके कारण वक्षगुहा का आकार बढ़ जाता है। इस परिवर्तन के कारण वायु फेफड़ों में खींची जाती है और कूपिकाओं में भर जाती है। रक्त शेष शरीर से CO₂ को कूपिकाओं में छोड़ने के लिए लाता है। इसके बाद, कूपिकाओं में मौजूद रक्त ऑक्सीजन ग्रहण करके उसे शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचा देता है।

अंतःश्वसन तथा उच्छ्वसन में अंतर:-

अंतःश्वसन के दौरानउच्छ्वसन के दौरान
वक्षीय गुहा में विस्तार होता हैवक्षीय गुहा अपने पूर्व आकार में लौट आती है
पसलियों से जुड़ी माँसपेशियाँ संकुचित हो जाती हैंपसलियों से जुड़ी माँसपेशियाँ ढीली हो जाती हैं
वक्ष ऊपर व बाहर की ओर बढ़ता हैवक्ष अपनी सामान्य स्थिति में लौटता है
गुहा में वायु का दबाव घटता है, वायु फेफड़ों में प्रवेश करती हैगुहा में वायु का दबाव बढ़ता है, वायु (CO₂) फेफड़ों से बाहर निकलती है

संवहन तंत्र:-

संवहन तंत्र मनुष्य में भोजन, ऑक्सीजन तथा अन्य जरूरी तत्वों की निरंतर आपूर्ति करता है।

5.4.1 मानव में वहन तंत्र

मानव संवहन तंत्र के प्रमुख घटक:-

  1. हृदय
  2. रक्त वाहिकाएँ (धमनी और शिरा)
  3. वहन माध्यम (रक्त और लसीका)

हृदय की संरचना और कार्य:-

हृदय एक पेशीय अंग होता है, जो आकार में मुट्ठी जितना होता है। यह शरीर में ऑक्सीजन से भरपूर रक्त को कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रक्त से मिलाने से रोकने के लिए कई हिस्सों में विभाजित होता है। हृदय के दाएँ और बाएँ हिस्से का विभाजन ऑक्सीजनयुक्त और ऑक्सीजन-रहित रक्त को आपस में मिलने से रोकता है। हृदय में स्थित वाल्व रक्त के प्रवाह को उल्टी दिशा में जाने से रोकते हैं।

रक्तदाब:-

वह दबाव जो रक्त वाहिकाओं की दीवार पर पड़ता है, उसे रक्तदाब कहा जाता है।

धमनी तथा शिरा में अंतर:-

धमनीशिरा
रक्त को हृदय से शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँचाती हैंविभिन्न अंगों से ऑक्सीजन-रहित रक्त एकत्र करके हृदय तक वापस लाती हैं (फेफड़ों की शिरा अपवाद है)
दीवारें लचीली और मोटी होती हैं, क्योंकि रक्त उच्च दबाव से प्रवाहित होता हैदीवारें पतली, कमजोर और कम लचीली होती हैं
इनमें वाल्व नहीं होतेइनमें वाल्व होते हैं, जो रक्त प्रवाह को नियंत्रित करते हैं
ये शरीर के अंदर ऊतकों के नीचे स्थित होती हैंये सामान्यतः शरीर की सतह के करीब होती हैं

लसीका:-

यह एक प्रकार का तरल ऊतक होता है, जो रक्त प्लाज्मा की तरह होता है, लेकिन इसमें कम मात्रा में प्रोटीन होते हैं। लसीका शरीर में तरल पदार्थों के संचलन (वहन) में मदद करता है और शरीर के विभिन्न हिस्सों तक पोषक तत्व पहुँचाने में सहायता करता है।

5.4.2 पादपों में परिवहन

पादपों में परिवहन तंत्र:-

पादप तंत्र का एक हिस्सा, जिसे ज़ाइलम (Xylem) कहा जाता है, मृदा से जल और खनिज लवणों को पौधों के विभिन्न भागों तक पहुँचाता है। वहीं, फ्लोएम (Phloem) पत्तियों में संश्लेषित कार्बोहाइड्रेट्स और अन्य उत्पादों को पौधे के अन्य हिस्सों में पहुँचाता है। जल का मृदा से जड़ों तक प्रवेश जड़ और मृदा के बीच आयन सांद्रण में अंतर के कारण होता है, जिससे एक जल स्तंभ बनता है जो जल को ऊपर की ओर खींचता है। जल का एक हिस्सा पत्तियों से वाष्प के रूप में वातावरण में निकल जाता है, जिसे वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) कहा जाता है।

पौधों में भोजन का स्थानांतरण:-

प्रकाश संश्लेषण द्वारा उत्पन्न विलेय पदार्थों का परिवहन स्थानांतरण कहलाता है, जो फ्लोएम ऊतक के माध्यम से होता है।

  1. यह स्थानांतरण पत्तियों से पौधे के अन्य हिस्सों में ऊर्ध्वमुखी (ऊपर की दिशा में) और अधोमुखी (नीचे की दिशा में) दोनों दिशाओं में होता है।
  2. फ्लोएम ऊतक द्वारा यह स्थानांतरण ऊर्जा की मदद से संपन्न होता है।

उदाहरण: सुक्रोज़ फ्लोएम में ATP ऊर्जा के माध्यम से परासरण दाब (osmotic pressure) द्वारा स्थानांतरित होता है।

5.5 उत्सर्जन

उत्सर्जन:-

वह जैविक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से जीव अपनी उपापचयी क्रियाओं के दौरान उत्पन्न हानिकारक नाइट्रोजन युक्त अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालते हैं। एककोशिकीय जीव इन अपशिष्ट पदार्थों को अपनी कोशिका की सतह से पानी में घोलकर निष्कासित कर देते हैं।

5.5.1 मानव में उत्सर्जन की प्रक्रिया

मानव उत्सर्जन तंत्र के अंग:-

मानव उत्सर्जन तंत्र में दो वृक्क (किडनी), दो मूत्रवाहिनियाँ, एक मूत्राशय और एक मूत्रमार्ग शामिल होते हैं।

नोट:- वृक्क रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर, उदर में स्थित होते हैं। मूत्र बनने के बाद, यह मूत्रवाहिनी के माध्यम से मूत्राशय में पहुँचता है, जहाँ यह एकत्रित होता है। मूत्र तब तक मूत्राशय में रहता है जब तक मूत्रमार्ग से बाहर नहीं निकलता।

मूत्र बनने का उद्देश्य:-

मूत्र बनने का मुख्य उद्देश्य रक्त से हानिकारक और अनुपयोगी अपशिष्ट (वर्ज्य) पदार्थों को छानकर शरीर से बाहर निकालना है।

वृक्क में मूत्र निर्माण की प्रक्रिया:-

  1. केशिका गुच्छ (Glomerulus): रक्त से अपशिष्ट पदार्थों और पानी का निस्पंदन होता है।
  2. बोमन संपुट (Bowman's Capsule): फिल्टर किया हुआ रक्त प्लाज्मा यहाँ एकत्रित होता है।
  3. नलिकाकार भाग: यहाँ प्रारंभिक मूत्र का संशोधन होता है, और आवश्यक पदार्थों का पुनः अवशोषण होता है।
  4. संग्राहक वाहिनी (Collecting Duct): मूत्र एकत्रित होकर मूत्रवाहिनी में पहुँचता है।
नोट:- नलिकाकार भाग के तीन मुख्य हिस्से: (1) समीपस्थ कुंडलित नलिका (PCT) – आवश्यक पदार्थों (जैसे ग्लूकोज़, आयन) का पुनः अवशोषण। (2) हेनले लूप – पानी और आयन का पुनः अवशोषण। (3) दूरस्थ कुंडलित नलिका (DCT) – अनावश्यक पदार्थों का निष्कासन।

वृक्काणु (नेफ्रॉन):-

वृक्क का क्रियात्मक और संरचनात्मक घटक वृक्काणु (नेफ्रॉन) होता है।

वृक्क में उत्सर्जन की प्रक्रिया — विस्तार से:-

  1. केशिका गुच्छ से निस्पंदन: वृक्क धमनी की शाखा वृक्काणु में प्रवेश करने से, जल, लवण, अमीनो अम्ल, ग्लूकोज़, तथा नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थ केशिका गुच्छ के माध्यम से छनकर बोमन कैप्सूल में चले जाते हैं।
  2. वरणात्मक पुनः अवशोषण: वृक्काणु की नलिकाओं में, शरीर के लिए आवश्यक पदार्थ जैसे जल, लवण, ग्लूकोज़ और अमीनो अम्ल का पुनः अवशोषण किया जाता है।
  3. नलिका स्रवण की प्रक्रिया: यूरिया, अनावश्यक लवण और जल जैसे अपशिष्ट पदार्थ वृक्काणु के नलिकाकार भाग के अंत में जमा होते हैं, जिससे मूत्र बनता है। यह मूत्र संग्राहक वाहिनी और मूत्रवाहिनी के माध्यम से मूत्राशय में पहुँचता है, जहाँ वह संग्रहित होता है और मूत्राशय के दाब से मूत्रमार्ग के द्वारा बाहर निकलता है।

कृत्रिम वृक्क (डायलिसिस):-

  1. यह एक यंत्र है जिसका उपयोग रोगियों के रक्त से नाइट्रोजन युक्त अपशिष्ट पदार्थों को निकालने के लिए किया जाता है, जैसा वास्तविक वृक्क करता है।
  2. एक सामान्य स्वस्थ व्यक्ति में प्रतिदिन लगभग 180 लीटर प्रारंभिक निस्यंद वृक्क द्वारा बनाया जाता है, जिसमें से केवल लगभग 1-2 लीटर मूत्र के रूप में उत्सर्जित होता है, और बचा हुआ निस्यंद वृक्क नलिकाओं में पुनः अवशोषित हो जाता है।

5.5.2 पादपों में उत्सर्जन

पादपों में उत्सर्जन की प्रक्रिया:-

पादप अतिरिक्त जल से छुटकारा पाने के लिए वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया का उपयोग करते हैं। कई पादपों में अपशिष्ट (वर्ज्य) पदार्थ कोशिकीय रिक्तिका में एकत्रित रहते हैं। कुछ अपशिष्ट पदार्थ, जैसे रेज़िन और गोंद, पुराने जाइलम में जमा होते हैं। पादप कुछ अपशिष्ट पदार्थों को आसपास की भूमि में भी छोड़ते हैं।

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