Class 10 political science Notes in hindI Chapter - 3
Chapter 3: लैंगिक मसले, धर्म और जाति / Federalism
Chapter Introduction:
इस अध्याय में आप समाज में मौजूद लैंगिक, धार्मिक और जातिगत विभाजनों तथा उनके राजनीति पर प्रभाव को समझेंगे। साथ ही महिलाओं की भागीदारी, सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता और जाति आधारित राजनीति जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाओं को सरल भाषा में पढ़ेंगे।
नीचे अध्याय 2 लैंगिक मसले, धर्म और जाति के सभी महत्वपूर्ण topics को सरल भाषा में विस्तार से समझाया गया है जो NCERT syllabus पर आधारित हैं, तथा बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
CLASS 10 POLITICAL SCIENCE NOTES IN HINDI
CHAPTER 3 : लैंगिक मसले, धर्म और जाति
DETAILS | INFORMATION |
Textbook | NCERT |
Class | Class 10 |
Subject | Political Science (Civics) |
Chapter | Chapter 3 |
Chapter Name | लैंगिक मसले, धर्म और जाति |
Medium | Hindi |
क्या आप Class 10 Political Science (Civics) Chapter 3 Notes in Hindi ढूँढ रहे हैं?
यहाँ आपको लैंगिक मसले, धर्म और जाति अध्याय के आसान और सरल नोट्स मिलेंगे। इस अध्याय में आप लैंगिक समानता, धर्म, सांप्रदायिकता, जाति व्यवस्था तथा राजनीति में इनके प्रभाव के बारे में विस्तार से समझेंगे।
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
3.1 लैंगिक मसले और राजनीति क्या हैं?
3.1.1 निजी और सार्वजनिक का विभाजन क्या है?
3.1.2 महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व क्यों महत्वपूर्ण है?
3.2 धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति क्या है?
3.2.1 सांप्रदायिकता क्या है?
3.2.2 धर्मनिरपेक्ष शासन क्या है?
3.3 जाति और राजनीति का क्या संबंध है?
3.3.1 जातिगत असमानताएँ क्या हैं?
3.3.2 राजनीति में जाति की क्या भूमिका है?
3.3.3 जाति के अंदर राजनीति क्या है?
Chapter Summary
इस अध्याय में आप समाज में मौजूद लैंगिक, धार्मिक और जातिगत विविधताओं तथा उनके राजनीति पर प्रभाव के बारे में समझेंगे। आप जानेंगे कि लोकतांत्रिक समाज में सभी नागरिकों को समान अवसर और अधिकार मिलना आवश्यक है।
आप लैंगिक मसलों के बारे में पढ़ेंगे और समझेंगे कि लंबे समय तक महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में पुरुषों की तुलना में कम अवसर प्राप्त हुए। लोकतंत्र में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस अध्याय में आप निजी और सार्वजनिक जीवन के विभाजन को भी समझेंगे। परंपरागत रूप से महिलाओं को घरेलू कार्यों तक सीमित माना गया, जबकि सार्वजनिक जीवन में पुरुषों की भूमिका अधिक रही। आधुनिक लोकतंत्र इस असमानता को कम करने का प्रयास करता है।
आप धर्म और राजनीति के संबंध के बारे में भी जानेंगे। धर्म लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार आवश्यक होता है।
अध्याय में सांप्रदायिकता की अवधारणा को भी समझाया गया है। जब धर्म का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है और विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच विभाजन उत्पन्न किया जाता है, तो इसे सांप्रदायिकता कहा जाता है।
आप धर्मनिरपेक्ष शासन के बारे में भी पढ़ेंगे, जिसमें राज्य सभी धर्मों को समान सम्मान देता है और किसी एक धर्म का पक्ष नहीं लेता। भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश है।
इस अध्याय में जाति व्यवस्था और राजनीति के संबंध का भी अध्ययन किया गया है। भारतीय समाज में जाति एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था रही है, जिसने सामाजिक असमानताओं को जन्म दिया।
आप जातिगत असमानताओं, राजनीति में जाति की भूमिका तथा जाति के अंदर राजनीति की प्रक्रिया को समझेंगे। लोकतंत्र में सामाजिक न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए अनेक प्रयास किए गए हैं।
अंत में आप यह जानेंगे कि लोकतांत्रिक राजनीति का उद्देश्य समाज में समानता, सामाजिक न्याय और सभी समूहों की भागीदारी सुनिश्चित करना है। लैंगिक समानता, धार्मिक सहिष्णुता और जातीय न्याय लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं।
3.1 लैंगिक मसले और राजनीति क्या हैं?
3.1.1 निजी और सार्वजनिक का विभाजन क्या है?
श्रम का लैंगिक विभाजन क्या है :-
श्रम का लैंगिक विभाजन :- श्रम का लैंगिक विभाजन वह व्यवस्था है जिसमें कामों का बँटवारा लिंग (पुरुष और महिला) के आधार पर किया जाता है।
श्रम के लैंगिक विभाजन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. इसमें कार्यों का विभाजन पुरुष और महिलाओं के आधार पर होता है।
2. सामान्यतः घर के अंदर के काम महिलाएँ करती हैं।
3. बाहर के कार्य और रोजगार पुरुषों द्वारा किए जाते हैं।
4. सार्वजनिक जीवन में पुरुषों का वर्चस्व अधिक दिखाई देता है।
5. महिलाओं को अक्सर घर की सीमाओं तक सीमित कर दिया जाता है।
उदाहरण :-
घर में खाना बनाना और सफाई का काम महिलाओं द्वारा तथा बाहर नौकरी करना पुरुषों द्वारा करना श्रम के लैंगिक विभाजन का उदाहरण है।
नारीवादी क्या होता है :-
नारीवादी :- नारीवादी वह विचारधारा या व्यक्ति होता है जो महिलाओं और पुरुषों के लिए समान अधिकारों की मांग करता है तथा महिला सशक्तिकरण का समर्थन करता है।
नारीवाद की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. इसमें महिलाओं और पुरुषों के समान अधिकारों की बात की जाती है।
2. यह लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास करता है।
3. महिलाओं के सशक्तिकरण और स्वतंत्रता पर जोर दिया जाता है।
4. समाज में समान अवसर और सम्मान की मांग की जाती है।
उदाहरण :-
महिलाओं के लिए शिक्षा, रोजगार और समान वेतन की मांग करना नारीवाद का उदाहरण है।
नारीवादी आंदोलन क्या है :-
नारीवादी आंदोलन :- नारीवादी आंदोलन वह आंदोलन है जिसका उद्देश्य महिलाओं को समान अधिकार, सम्मान और अवसर दिलाना है।
नारीवादी आंदोलन की विशेषताएँ क्या हैं :-
नारीवादी आंदोलन की विशेषताएँ :- नारीवादी आंदोलन महिलाओं को समान अधिकार, सम्मान और अवसर दिलाने के लिए कार्य करता है।
नारीवादी आंदोलन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. यह आंदोलन महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों और सत्ता में भागीदारी की वकालत करता है।
2. महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित रखने और उन पर सभी घरेलू कार्यों का बोझ डालने का विरोध करता है।
3. यह समाज में लैंगिक समानता स्थापित करने का प्रयास करता है।
4. महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और विभिन्न क्षेत्रों में भागीदारी का समर्थन करता है।
5. यह महिलाओं के हर प्रकार के शोषण के खिलाफ आवाज उठाता है।
उदाहरण :-
महिलाओं को राजनीति, शिक्षा और नौकरी में समान अवसर दिलाने के लिए चलाए गए अभियान नारीवादी आंदोलन की विशेषताओं को दर्शाते हैं।
पितृ प्रधान समाज क्या है :-
पितृ प्रधान समाज :- पितृ प्रधान समाज वह होता है जिसमें परिवार का मुखिया पिता होता है और पुरुषों को महिलाओं की तुलना में अधिक अधिकार प्राप्त होते हैं।
पितृ प्रधान समाज की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. परिवार का मुखिया पुरुष (पिता) होता है।
2. पुरुषों को निर्णय लेने का अधिक अधिकार होता है।
3. महिलाओं की भूमिका अक्सर सीमित मानी जाती है।
4. समाज में पुरुषों का वर्चस्व अधिक होता है।
उदाहरण :-
ऐसा परिवार जहाँ सभी महत्वपूर्ण निर्णय पिता या पुरुष सदस्य द्वारा लिए जाते हैं, पितृ प्रधान समाज का उदाहरण है।
महिलाओं के दमन के मुख्य रूप क्या हैं :-
महिलाओं का दमन :- महिलाओं के दमन का अर्थ है समाज में महिलाओं के साथ असमानता, भेदभाव और अन्यायपूर्ण व्यवहार होना।
महिलाओं के दमन के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं :-
1. साक्षरता में असमानता :- महिलाओं की साक्षरता दर पुरुषों से कम होती है।
2. रोजगार और पदों में असमानता :- ऊँचे वेतन और उच्च पदों पर पुरुषों की संख्या अधिक होती है।
3. असमान लिंग अनुपात :- समाज में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में कम होती है।
4. घरेलू और सामाजिक उत्पीड़न :- महिलाओं को घर और समाज में हिंसा व भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
5. राजनीतिक भागीदारी में कमी :- जन प्रतिनिधि संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम होता है।
6. आर्थिक निर्भरता :- महिलाएँ अक्सर पुरुषों की तुलना में कम आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती हैं।
उदाहरण :-
यदि किसी समाज में महिलाओं को शिक्षा और नौकरी के समान अवसर नहीं मिलते, तो यह उनके दमन का उदाहरण है।
3.1.2 महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व क्यों महत्वपूर्ण है?
महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व क्या है :-
महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व :- महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व उस स्थिति को दर्शाता है जिसमें राजनीति और विधायिका में महिलाओं की भागीदारी और उपस्थिति होती है।
इस विषय में मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. भारत की विधायिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है।
2. लोकसभा में महिलाओं की संख्या 2019 में लगभग 14.36% तक पहुँची।
3. राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 5% से भी कम है।
4. इस मामले में भारत का स्थान दुनिया के कई देशों से पीछे है।
5. यह स्थिति दर्शाती है कि महिलाओं की राजनीति में भागीदारी अभी भी सीमित है।
उदाहरण :-
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की कम संख्या महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी का उदाहरण है।
विधायिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में सुधार के लिए क्या किया जा सकता है :-
महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए विशेष उपाय और नीतियाँ अपनाना आवश्यक है।
इस विषय में मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं :-
1. विधायिका में महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए।
2. पंचायतों की तरह कम से कम 1/3 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी चाहिए।
3. कुछ राज्यों (जैसे बिहार, उत्तराखण्ड, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश) में 50% आरक्षण का उदाहरण अपनाया जा सकता है।
4. महिलाओं को राजनीति में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित और जागरूक किया जाना चाहिए।
5. शिक्षा और प्रशिक्षण के माध्यम से महिलाओं को नेतृत्व के लिए तैयार किया जाना चाहिए।
उदाहरण :-
पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें होने से उनकी भागीदारी बढ़ी है, जो एक सफल उदाहरण है।
भारत सरकार द्वारा नारी असमानता को दूर करने के लिए कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं :-
नारी असमानता दूर करने के उपाय :- भारत सरकार ने महिलाओं को समान अधिकार और सम्मान दिलाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
नारी असमानता दूर करने के लिए मुख्य कदम निम्नलिखित हैं :-
1. दहेज प्रथा को अवैध घोषित किया गया।
2. पारिवारिक संपत्ति में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिया गया।
3. कन्या भ्रूण हत्या को कानूनन अपराध घोषित किया गया।
4. समान कार्य के लिए समान वेतन का प्रावधान किया गया।
5. महिला शिक्षा को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया।
6. “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसी योजनाएँ शुरू की गईं।
उदाहरण :-
“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान के माध्यम से लड़कियों की शिक्षा और सुरक्षा को बढ़ावा देना इसका प्रमुख उदाहरण है।
महात्मा गाँधी ने क्यों कहा कि धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता :-
महात्मा गांधी के अनुसार धर्म का अर्थ किसी एक धर्म (जैसे हिंदू या इस्लाम) से नहीं था, बल्कि नैतिक मूल्यों और आचरण से था।
इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-
1. गाँधी जी के अनुसार धर्म का मतलब नैतिकता, सत्य और अहिंसा से है।
2. उन्होंने कहा कि राजनीति को इन नैतिक मूल्यों के आधार पर चलना चाहिए।
3. धर्म (नैतिकता) के बिना राजनीति अनैतिक और भ्रष्ट हो सकती है।
4. धर्म सभी लोगों को सही और गलत का ज्ञान कराता है, जो राजनीति में जरूरी है।
उदाहरण :-
यदि सरकार सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर कार्य करे, तो यह गाँधी जी के अनुसार धर्म और राजनीति के संबंध को दर्शाता है।
पारिवारिक कानून क्या है :-
पारिवारिक कानून :- पारिवारिक कानून वे कानून होते हैं जो परिवार से जुड़े मामलों और संबंधों को नियंत्रित करते हैं।
पारिवारिक कानून की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. ये कानून विवाह से संबंधित नियमों को निर्धारित करते हैं।
2. इसमें तलाक (विवाह विच्छेद) से जुड़े प्रावधान शामिल होते हैं।
3. गोद लेना (दत्तक ग्रहण) भी इन कानूनों के अंतर्गत आता है।
4. उत्तराधिकार (संपत्ति का बँटवारा) से जुड़े नियम भी इसमें शामिल होते हैं।
5. इनका उद्देश्य परिवार में न्याय और व्यवस्था बनाए रखना होता है।
उदाहरण :-
संपत्ति के बँटवारे या विवाह से जुड़े नियमों को तय करने वाले कानून पारिवारिक कानून का उदाहरण हैं।
3.2 धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति क्या है?
3.2.1 सांप्रदायिकता क्या है?
साम्प्रदायिकता क्या है :-
साम्प्रदायिकता :- साम्प्रदायिकता वह स्थिति है जब किसी धर्म के लोग अपने धर्म को दूसरों के धर्मों से श्रेष्ठ मानने लगते हैं और उसी आधार पर भेदभाव करते हैं।
साम्प्रदायिकता की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. इसमें लोग अपने धर्म को सबसे श्रेष्ठ मानते हैं।
2. अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णुता और भेदभाव की भावना होती है।
3. इससे समाज में तनाव और विभाजन पैदा होता है।
4. यह सामाजिक सद्भाव और एकता के लिए हानिकारक है।
उदाहरण :-
किसी समुदाय द्वारा अपने धर्म को श्रेष्ठ मानकर दूसरे धर्म के लोगों के साथ भेदभाव करना साम्प्रदायिकता का उदाहरण है।
साम्प्रदायिक राजनीति के विभिन्न रूप कौन-कौन से हैं :-
साम्प्रदायिक राजनीति के विभिन्न रूप :- साम्प्रदायिक राजनीति तब दिखाई देती है जब धर्म के आधार पर राजनीति की जाती है और समाज में विभाजन बढ़ता है।
साम्प्रदायिक राजनीति के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं :-
1. कट्टरपंथी विचारधारा :- कुछ लोग अपने धर्म को सबसे श्रेष्ठ मानकर कट्टर सोच अपनाते हैं।
2. मतों का ध्रुवीकरण :- नाव में लोगों को धर्म के आधार पर बाँटकर वोट प्राप्त करना।
3. धर्म के आधार पर उम्मीदवार चयन :- राजनीतिक दल धर्म को ध्यान में रखकर प्रत्याशी घोषित करते हैं।
4. साम्प्रदायिक हिंसा :- धर्म के नाम पर हिंसा और संघर्ष उत्पन्न होना।
5. राजनीति की साम्प्रदायिक दिशा :- राजनीति का झुकाव धर्म आधारित मुद्दों की ओर होना।
6. राजनीतिक दलों का विभाजन :- दलों का साम्प्रदायिक आधार पर अलग-अलग समूहों में बँट जाना (जैसे आयरलैंड में)।
उदाहरण :-
चुनाव के समय धर्म के आधार पर वोट माँगना और लोगों को बाँटना साम्प्रदायिक राजनीति का उदाहरण है।
साम्प्रदायिकता को दूर करने की विधियाँ क्या हैं :-
साम्प्रदायिकता दूर करने के उपाय :- साम्प्रदायिकता को कम करने के लिए समाज में सहिष्णुता, समझ और एकता बढ़ाना आवश्यक है।
साम्प्रदायिकता दूर करने की मुख्य विधियाँ निम्नलिखित हैं :-
1. शिक्षा द्वारा :- शिक्षा के पाठ्यक्रम में सभी धर्मों की अच्छाइयों को बताया जाए। विद्यार्थियों को सहिष्णुता और सभी धर्मों के प्रति सम्मान सिखाया जाए।
2. प्रचार माध्यमों द्वारा :- समाचार पत्र, रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जाए। समाज में धार्मिक सहिष्णुता और भाईचारे का संदेश फैलाया जाए।
उदाहरण :-
स्कूलों में सभी धर्मों के बारे में सकारात्मक शिक्षा देना और आपसी सम्मान सिखाना साम्प्रदायिकता को कम करने का अच्छा उपाय है।
धर्मनिरपेक्षता क्या है :-
धर्मनिरपेक्षता :- धर्मनिरपेक्षता वह व्यवस्था है जिसमें राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता और सभी धर्मों को समान महत्व दिया जाता है।
धर्मनिरपेक्षता की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. राज्य किसी एक धर्म को नहीं अपनाता।
2. सभी धर्मों को समान सम्मान और महत्व दिया जाता है।
3. नागरिकों को किसी भी धर्म को अपनाने, मानने और पालन करने की स्वतंत्रता होती है।
4. राज्य सभी धर्मों के प्रति निष्पक्ष (तटस्थ) रहता है।
उदाहरण :-
भारत में लोग अपनी इच्छा से किसी भी धर्म को मान सकते हैं, जो धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण है।
3.2.2 धर्मनिरपेक्ष शासन क्या है?
धर्मनिरपेक्ष शासन क्या हैं :-
धर्मनिरपेक्ष शासन :- धर्मनिरपेक्ष शासन वह व्यवस्था है जिसमें राज्य सभी धर्मों के प्रति समान और निष्पक्ष व्यवहार करता है।
धर्मनिरपेक्ष शासन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. भारत का संविधान किसी भी धर्म को विशेष दर्जा नहीं देता।
2. नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता होती है।
3. धर्म के आधार पर भेदभाव को अवैधानिक घोषित किया गया है।
4. शासन को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार होता है (जब आवश्यक हो)।
5. संविधान में जातिगत भेदभाव का निषेध किया गया है।
उदाहरण :-
भारत में सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार और स्वतंत्रता प्राप्त होना धर्मनिरपेक्ष शासन का उदाहरण है।
भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने वाले प्रमुख प्रावधान कौन-कौन से हैं :-
धर्मनिरपेक्ष राज्य के प्रावधान :- भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने के लिए संविधान में कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं।
धर्मनिरपेक्ष राज्य के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं :-
1. भारत का कोई राजकीय धर्म नहीं है।
2. सभी धर्मों को समान महत्व और सम्मान दिया गया है।
3. प्रत्येक नागरिक को अपनी इच्छा से किसी भी धर्म को अपनाने और मानने की स्वतंत्रता है।
4. संविधान में धर्म के आधार पर भेदभाव को असंवैधानिक घोषित किया गया है।
उदाहरण :-
भारत में सभी लोग स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का पालन कर सकते हैं, जो धर्मनिरपेक्ष राज्य का उदाहरण है।
जातिवाद क्या है :-
जातिवाद :- जातिवाद वह स्थिति है जिसमें लोगों के साथ उनकी जाति के आधार पर भेदभाव किया जाता है।
जातिवाद की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. इसमें लोगों को जाति के आधार पर विभाजित किया जाता है।
2. कुछ जातियों को ऊँचा और कुछ को नीचा माना जाता है।
3. इससे समाज में असमानता और अन्याय बढ़ता है।
4. यह सामाजिक एकता और सद्भाव के लिए हानिकारक है।
उदाहरण :-
किसी व्यक्ति के साथ उसकी जाति के आधार पर अलग व्यवहार करना जातिवाद का उदाहरण है।
वर्ण व्यवस्था क्या है :-
वर्ण व्यवस्था :- वर्ण व्यवस्था वह सामाजिक व्यवस्था है जिसमें समाज के विभिन्न जातीय समूहों को एक क्रम (पदानुक्रम) में बाँटा जाता है।
वर्ण व्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. समाज को विभिन्न वर्गों (वर्णों) में विभाजित किया जाता है।
2. इन वर्गों के बीच ऊँच-नीच का क्रम (पदानुक्रम) होता है।
3. प्रत्येक वर्ग के अलग-अलग कार्य और भूमिकाएँ निर्धारित होती हैं।
4. यह व्यवस्था समाज में असमानता को जन्म दे सकती है।
उदाहरण :-
समाज में लोगों को अलग-अलग वर्गों में बाँटकर ऊँच-नीच के आधार पर स्थान देना वर्ण व्यवस्था का उदाहरण है।
आधुनिक भारत में जाति और वर्ण व्यवस्था के कारण हुए परिवर्तन क्या हैं :-
आधुनिक भारत में परिवर्तन :- आधुनिक समय में कई सामाजिक और आर्थिक बदलावों के कारण जाति और वर्ण व्यवस्था का प्रभाव कम हुआ है।
आधुनिक भारत में जाति और वर्ण व्यवस्था के कारण हुए मुख्य परिवर्तन निम्नलिखित हैं :-
1. आर्थिक विकास :- उद्योग और रोजगार के बढ़ने से जाति का प्रभाव कम हुआ।
2. शहरीकरण (Urbanization) :- शहरों में विभिन्न जातियों के लोग साथ रहते हैं, जिससे भेदभाव कम होता है।
3. शिक्षा और साक्षरता का विकास :- शिक्षा के प्रसार से लोगों में जागरूकता बढ़ी और समानता की भावना विकसित हुई।
4. व्यावसायिक गतिशीलता :- अब लोग अपनी योग्यता के अनुसार कोई भी पेशा चुन सकते हैं, जाति पर निर्भरता कम हुई।
5. जमींदारों की स्थिति का कमजोर होना :- गाँवों में पुराने सामंती ढाँचे कमजोर पड़े, जिससे सामाजिक बदलाव आया।
उदाहरण :-
आज के समय में कोई व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर डॉक्टर या इंजीनियर बन सकता है, चाहे उसकी जाति कुछ भी हो।
3.3 जाति और राजनीति का क्या संबंध है?
3.3.1 जातिगत असमानताएँ क्या हैं?
जातिगत असमानता क्या है :-
जातिगत असमानता :- असमानता वह स्थिति है जिसमें जाति के आधार पर लोगों के बीच आर्थिक और सामाजिक विषमता पाई जाती है।
जातिगत असमानता की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. समाज में आर्थिक असमानता जाति के आधार पर देखी जाती है।
2. सामान्यतः ऊँची जाति के लोग अधिक संपन्न होते हैं।
3. पिछड़ी जातियाँ मध्यम स्थिति में होती हैं।
4. दलित और आदिवासी वर्ग सबसे कमजोर स्थिति में होते हैं।
5. निम्न जातियों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या अधिक होती है।
उदाहरण :-
यदि किसी समाज में निम्न जातियों के लोग अधिक गरीब और वंचित हों, तो यह जातिगत असमानता का उदाहरण है।
3.3.2 राजनीति में जाति की क्या भूमिका है?
राजनीति में जाति की भूमिका क्या है :-
राजनीति में जाति :- राजनीति में जाति एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जहाँ चुनाव और समर्थन प्राप्त करने में जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखा जाता है।
राजनीति में जाति की मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं :-
1. चुनाव में उम्मीदवार चुनते समय मतदाताओं की जातियों का ध्यान रखा जाता है।
2. समर्थन प्राप्त करने के लिए जातिगत भावनाओं को उकसाया जाता है।
3. किसी भी संसदीय क्षेत्र में एक ही जाति का पूर्ण बहुमत नहीं होता।
4. कोई भी राजनीतिक दल केवल एक जाति के आधार पर चुनाव नहीं जीत सकता।
5. इसलिए पार्टियाँ विभिन्न जातियों का समर्थन पाने की कोशिश करती हैं।
उदाहरण :-
चुनाव के समय राजनीतिक दल विभिन्न जातियों के उम्मीदवार खड़े करते हैं और सभी जातियों का समर्थन पाने की कोशिश करते हैं, यह राजनीति में जाति की भूमिका को दर्शाता है।
राजनीति जाति व्यवस्था और जाति की पहचान को कैसे प्रभावित करती है :-
राजनीति जाति व्यवस्था और जाति की पहचान को नए रूप में ढालती है और उसमें परिवर्तन लाती है।
राजनीति का जाति व्यवस्था और जाति की पहचान पर मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं :-
1. जाति समूह का विस्तार :- प्रत्येक जाति अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए अन्य जातियों या उपजातियों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास करती है।
2. गठबंधन की आवश्यकता :- राजनीति में सफलता के लिए जाति समूह अन्य जातियों के साथ मिलकर गठबंधन बनाते हैं।
3. नए जातीय समूहों का निर्माण :- राजनीतिक क्षेत्र में पिछड़े और अगड़े जैसे नए जाति समूह उभरकर सामने आए हैं।
4. जाति पहचान में बदलाव :- राजनीति के कारण जाति की पहचान स्थिर न रहकर बदलती और विकसित होती रहती है।
उदाहरण :-
चुनाव के समय विभिन्न जातियाँ आपस में मिलकर गठबंधन बनाती हैं, जिससे उनकी राजनीतिक ताकत बढ़ती है।
जाति के आधार पर भारत में चुनावी नतीजे तय क्यों नहीं किए जा सकते :-
भारत में चुनाव केवल जाति के आधार पर तय नहीं होते क्योंकि मतदाता कई अन्य महत्वपूर्ण बातों को भी ध्यान में रखते हैं।
जाति के आधार पर भारत में चुनावी नतीजे तय नहीं किए जा सकते इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-
1. मतदाताओं की जागरूकता :- कई मतदाता जाति से ऊपर उठकर सही उम्मीदवार को वोट देते हैं।
2. आर्थिक और राजनीतिक प्राथमिकताएँ :- लोग अपने आर्थिक हित और राजनीतिक दलों की नीतियों को महत्व देते हैं।
3. किसी एक जाति का बहुमत नहीं :- किसी भी संसदीय क्षेत्र में एक ही जाति का पूर्ण बहुमत नहीं होता।
4. विभिन्न आधारों पर मतदान :- मतदाता विकास, शिक्षा, रोजगार आदि मुद्दों के आधार पर भी मतदान करते हैं।
उदाहरण :-
कई बार लोग विकास कार्यों और नीतियों को देखकर वोट देते हैं, न कि केवल जाति के आधार पर।
3.3.3 जाति के अंदर राजनीति क्या है?
जाति पर अधिक ध्यान देने से राजनीति में क्या नकारात्मक परिणाम होते हैं :-
राजनीति में जाति पर अत्यधिक ध्यान देने से समाज और शासन दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं।
जाति पर अधिक ध्यान देने से राजनीति में मुख्य नकारात्मक परिणाम निम्नलिखित हैं :-
1. महत्वपूर्ण मुद्दों से ध्यान हटना :- गरीबी, विकास और भ्रष्टाचार जैसे जरूरी मुद्दों की अनदेखी हो जाती है।
2. सामाजिक तनाव और संघर्ष :- जातीय विभाजन से समाज में तनाव और आपसी संघर्ष बढ़ते हैं।
3. हिंसा की संभावना :- अत्यधिक जातिवाद के कारण हिंसा की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।
उदाहरण :-
यदि चुनाव में केवल जाति के आधार पर वोट माँगे जाएँ, तो विकास जैसे मुद्दे पीछे रह जाते हैं, जो नकारात्मक परिणाम को दर्शाता है।
अनुसूचित जातियाँ क्या हैं :-
अनुसूचित जातियाँ :- अनुसूचित जातियाँ वे जातियाँ हैं जिन्हें पारंपरिक समाज में निम्न माना गया और जिनका सामाजिक व आर्थिक विकास पर्याप्त रूप से नहीं हो पाया।
अनुसूचित जातियाँ की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. ये वे जातियाँ हैं जिन्हें पहले अछूत या अलग माना जाता था।
2. इनका सामाजिक और आर्थिक विकास अपेक्षाकृत कम हुआ है।
3. सरकार ने इनके उत्थान के लिए विशेष सुविधाएँ और आरक्षण प्रदान किया है।
4. भारत की जनसंख्या में इनका लगभग 16.2% हिस्सा है।
उदाहरण :-
सरकार द्वारा शिक्षा और नौकरी में आरक्षण देना अनुसूचित जातियों के उत्थान का उदाहरण है।
भारत में आज भी जातिगत असमानताएँ किस प्रकार जारी हैं :-
भारत में आधुनिक विकास के बावजूद जातिगत असमानताएँ अभी भी कई रूपों में मौजूद हैं।
इस विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं :-
1. कुछ जातियों के साथ आज भी अछूतों जैसा व्यवहार किया जाता है।
2. अधिकतर लोग आज भी अपनी जाति या समुदाय में ही विवाह (एंडोगैमी) करते हैं।
3. कुछ जातियाँ अधिक विकसित और संपन्न हैं, जबकि कुछ अत्यधिक पिछड़ी हुई हैं।
4. कई जगहों पर निम्न जातियों का शोषण अब भी देखने को मिलता है।
5. राजनीति में भी चुनाव और मंत्रिमंडल गठन में जातीय समीकरण को ध्यान में रखा जाता है।
उदाहरण :-
कई क्षेत्रों में आज भी निम्न जातियों के लोगों को समान अवसर और सम्मान नहीं मिल पाता, जो जातिगत असमानता को दर्शाता है।