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CLASS 10 HISTORY NOTES IN HINDI CHAPTER - 3

भूमंडलीकृत विश्व का बनना / The Making of a Global World

TextbookNCERT
ClassClass 10
SubjectHistory
ChapterChapter 3
Chapter Nameभूमंडलीकृत विश्व का बनना
MediumHindi

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?

  1. 3.1 आधुनिक युग से पहले दुनिया कैसे जुड़ी हुई थी
    1. 3.1.1 रेशम मार्ग (Silk Route) से जुड़ती दुनिया
    2. 3.1.2 भोजन की यात्रा: स्पगेटी और आलू की कहानी
    3. 3.1.3 विजय, बीमारी और व्यापार का प्रभाव
  2. 3.2 उन्नीसवीं शताब्दी (1815–1914) में विश्व में परिवर्तन
    1. 3.2.1 विश्व अर्थव्यवस्था का उदय कैसे हुआ
    2. 3.2.2 तकनीक की भूमिका
    3. 3.2.3 उन्नीसवीं सदी के आखिर में उपनिवेशवाद का विस्तार
    4. 3.2.4 रिंडरपेस्ट या मवेशी प्लेग
    5. 3.2.5 भारत से अनुबंधित श्रमिकों का जाना
    6. 3.2.6 भारतीय व्यापार, उपनिवेशवाद और वैश्विक व्यवस्था का संबंध
  3. 3.3 महायुद्धों के बीच विश्व अर्थव्यवस्था की स्थिति
    1. 3.3.1 युद्धोत्तर सुधार
    2. 3.3.2 बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग का विकास
    3. 3.3.3 महामंदी क्या थी
    4. 3.3.4 भारत पर महामंदी का प्रभाव
  4. 3.4 विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण : युद्धोत्तर काल
    1. 3.4.1 युद्धोत्तर बंदोबस्त और ब्रेटन वुड्स संस्थान
    2. 3.4.2 प्रारंभिक युद्धोत्तर वर्षों में परिवर्तन

3.1 आधुनिक युग से पहले दुनिया कैसे जुड़ी हुई थी

वैश्वीकरण:-

एक ऐसी आर्थिक प्रणाली है जिसमें व्यक्तियों, वस्तुओं और नौकरियों का एक देश से दूसरे देश तक स्थानांतरण होता है। यह देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शाता है।

  1. वैश्वीकरण से विश्व के देशों के बीच आपसी निर्भरता बढ़ती है।
  2. व्यापार, निवेश और संचार के माध्यम से विश्व एक-दूसरे से जुड़ गया है।
  3. यह रोजगार, तकनीक और पूंजी के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करता है।
  4. वैश्विक दुनिया के निर्माण को समझने के लिए व्यापार, प्रवासन, श्रमिकों की खोज और पूंजी के प्रवाह का अध्ययन आवश्यक है।

भूमंडलीकरण:-

वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत दुनिया के भिन्न-भिन्न देशों की आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक प्रणालियाँ एक-दूसरे से जुड़कर एक वैश्विक व्यवस्था का निर्माण करती हैं।

  1. इसमें वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और श्रम का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आदान-प्रदान होता है।
  2. देशों के बीच सूचना, तकनीक और अनुसंधान के परिणामों का तीव्र प्रवाह होता है।
  3. यह भिन्न-भिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं को परस्पर निर्भर बना देता है।
  4. भूमंडलीकरण से विश्व एक "वैश्विक गाँव" के रूप में दिखाई देने लगा है।

वैश्वीकरण और भूमंडलीकरण में अंतर:-

आधारवैश्वीकरणभूमंडलीकरण
परिभाषावस्तुओं, सेवाओं, पूंजी, तकनीक और श्रम के अंतर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान की प्रक्रियादुनिया की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक प्रणालियों का एकीकरण
स्वरूपमुख्यतः एक आर्थिक प्रक्रियाएक व्यापक सामाजिक प्रक्रिया
उद्देश्यविश्व को एक आर्थिक बाज़ार बनानापूरे विश्व को एक एकीकृत इकाई के रूप में जोड़ना
प्रभाव क्षेत्रव्यापार और अर्थव्यवस्था तक सीमितसंस्कृति, समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था सभी को शामिल करता है
उदाहरणभारत में विदेशी कंपनियों का निवेशसोशल मीडिया से विश्व संस्कृति का फैलाव
निष्कर्ष:- वैश्वीकरण जहाँ आर्थिक जुड़ाव को दर्शाता है, वहीं भूमंडलीकरण पूरे विश्व के सामाजिक और सांस्कृतिक एकीकरण का प्रतीक है।

प्राचीन काल में वैश्विक संपर्क कैसे स्थापित हुआ:-

  1. यात्री, व्यापारी, पुजारी और तीर्थयात्री ज्ञान, अवसर, आध्यात्मिक पूर्ति और उत्पीड़न से मुक्ति के लिए दूर-दूर तक यात्रा करते थे।
  2. वे अपने साथ सामान, धन, कौशल, विचार, आविष्कार और बीमारियाँ तक ले जाते थे।
  3. 3000 ईसा पूर्व में सिंधु घाटी सभ्यता का तटीय व्यापार पश्चिम एशिया से जुड़ा हुआ था।
  4. रेशम मार्ग के माध्यम से चीन का पश्चिमी देशों से संपर्क स्थापित हुआ।
  5. भोजन और फसलों का आदान-प्रदान भी हुआ — जैसे नूडल्स चीन से इटली पहुँचा और वहाँ स्पगेटी कहलाया।
  6. यूरोपीय विजेताओं ने जब अमेरिका में चेचक के रोगाणु ले जाए, तो यह बीमारी वहाँ तेजी से फैल गई।
उदाहरण:- रेशम मार्ग के माध्यम से चीन का रेशम रोमन साम्राज्य तक पहुँचा, जिससे व्यापार और सांस्कृतिक संबंध दोनों मजबूत हुए।

3.1.1 रेशम मार्ग (Silk Route) से जुड़ती दुनिया

रेशम मार्ग (सिल्क रूट):-

एक ऐतिहासिक व्यापारिक मार्ग था जो एशिया, यूरोप और उत्तरी अफ्रीका को जोड़ता था। इस मार्ग का उपयोग वस्तुओं, विचारों, संस्कृतियों और धर्मों के आदान-प्रदान के लिए किया जाता था।

  1. रेशम मार्ग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर 14वीं शताब्दी तक सक्रिय रहा।
  2. यह चीन, भारत, फारस, अरब, ग्रीस और इटली को आपस में जोड़ता था।
  3. इस मार्ग से मुख्य रूप से रेशम का व्यापार होता था, इसलिए इसे "सिल्क रूट" कहा गया।
  4. यह केवल स्थल मार्ग नहीं था, बल्कि समुद्री मार्गों को भी शामिल करता था।
  5. इस मार्ग ने सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत किया।

रेशम मार्ग की मुख्य विशेषताएँ:-

  1. इस सिल्क रूट से होकर चीन के बर्तन अन्य देशों तक पहुँचते थे।
  2. यूरोप से सोना और चाँदी इसी मार्ग के माध्यम से एशिया में लाए जाते थे।
  3. ईसाई, इस्लाम और बौद्ध धर्म जैसे प्रमुख धर्म इसी मार्ग से दुनिया के भिन्न-भिन्न भागों में फैले।
  4. रेशम मार्ग को दूरस्थ क्षेत्रों को जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता था।
  5. यह मार्ग मध्ययुगीन काल से पहले भी अस्तित्व में था और 15वीं शताब्दी तक सक्रिय होता रहा।

3.1.2 भोजन की यात्रा: स्पगेटी और आलू की कहानी

भोजन की यात्रा (स्पगेटी और आलू):-

भोजन की यात्रा का अर्थ है खाद्य पदार्थों का एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप में पहुँचना, जिससे लोगों के खान-पान और कृषि पर प्रभाव पड़ा।

  1. स्पगेटी – इसकी उत्पत्ति चीन के नूडल से हुई और धीरे-धीरे यह दुनिया के अन्य हिस्सों में पहुँचा। इसका इटैलियन रूप स्पगेटी कहलाया, जिसे आज पूरी दुनिया में खाया जाता है।
  2. आलू – आलू अमेरिका से यूरोप पहुँचा और यूरोप के लोगों की जीवनशैली और खाने की आदतों में बदलाव लाया। मिर्च, टमाटर, मक्का, सोया, मूंगफली और शकरकंद भी अमेरिका से यूरोप पहुँचे।
नोट:- आयरलैंड में आलू पर निर्भरता अधिक होने के कारण 1840 के दशक में आलू की फसल खराब होने पर लाखों लोग भूख से मरे, जिसे आयरिश अकाल कहा गया।

3.1.3 विजय, बीमारी और व्यापार का प्रभाव

यूरोप ने अमेरिका और विश्व में विजय व व्यापार के माध्यम से प्रभाव कैसे बनाया:-

  1. सोलहवीं सदी में यूरोपीय नाविकों ने एशिया और अमेरिका तक नए समुद्री मार्ग खोजे, जिससे व्यापार और विजय दोनों संभव हुए।
  2. अमेरिका में खनिजों और अनाज का बड़ा भंडार था, जिसने विश्व के अन्य भागों के लोगों का जीवन बदल दिया।
  3. यूरोपियों ने अमेरिका में चेचक के जीवाणु अपने साथ ले जाकर स्थानीय लोगों को बीमार किया, जिससे आसानी से विजय प्राप्त हुई।
  4. यूरोप में गरीबी, बीमारी और धार्मिक टकराव के कारण कई लोग अमेरिका गए और वहाँ अवसरों का लाभ उठाया।
  5. अठारहवीं सदी तक भारत और चीन दुनिया के सबसे धनी देश थे, लेकिन चीन ने बाहरी संपर्क घटा दिया, जिससे विश्व व्यापार का केंद्र यूरोप की ओर शिफ्ट हुआ।

3.2 उन्नीसवीं शताब्दी (1815–1914) में विश्व में परिवर्तन

उन्नीसवीं सदी में आर्थिक आदान-प्रदान के प्रकार:-

  1. वस्तुओं का प्रवाह – व्यापार मुख्य रूप से वस्तुओं जैसे कपड़ा, गेहूँ के माध्यम से होता था।
  2. श्रम का प्रवाह – लोग काम या रोजगार की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते थे।
  3. पूंजी का प्रवाह – अल्प या दीर्घ अवधि के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों में निवेश किया जाता था।
उदाहरण:- यूरोपियन निवेशकों ने भारत और अफ्रीका में रेलवे और उद्योग स्थापित किए, जबकि मजदूरों का प्रवास अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में काम करने के लिए हुआ।

3.2.1 विश्व अर्थव्यवस्था का उदय कैसे हुआ

विश्व अर्थव्यवस्था का उदय:-

18वीं सदी के अंत तक ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव हुए, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था के उदय की नींव रखी।

  1. जनसंख्या वृद्धि – कुछ समय बाद जनसंख्या में अचानक वृद्धि हुई, जिससे भोजन की माँग बढ़ गई।
  2. आवश्यक सुधार – बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए कृषि आधारित सामान की मात्रा में वृद्धि की जरूरत थी।
  3. कॉर्न लॉ की समाप्ति – सरकार ने कॉर्न लॉ को समाप्त कर दिया, जिससे भिन्न-भिन्न देशों के व्यापारी ब्रिटेन में भोजन निर्यात करने लगे।
  4. विकास और वैश्विक व्यापार – भोजन की आपूर्ति में सुधार और निर्यात से आर्थिक विकास शुरू हुआ और वैश्विक अर्थव्यवस्था का उदय हुआ।
नोट:- कॉर्न लॉ – ब्रिटेन में लागू यह कानून था, जिसके तहत मक्का के आयात पर पाबंदी थी।

कॉर्न लॉ के समय और उसके हटाने के बाद के बदलाव:-

कॉर्न लॉ के समयकॉर्न लॉ हटाने के बाद
भोजन की माँग बढ़ीव्यापार में वृद्धि हुई
जनसंख्या में वृद्धि हुईविकास की गति तेज हुई
भोजन के दाम बढ़ गएभोजन का अधिक भंडार होने लगा

3.2.2 तकनीक की भूमिका

विश्व अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण में तकनीक का योगदान:-

  1. रेलवे ने आंतरिक भूभागों और बंदरगाहों को आपस में जोड़ दिया।
  2. स्टीमशिप के कारण भारी मात्रा में माल को अटलांटिक के पार ले जाना आसान हो गया।
  3. टेलीग्राफ की मदद से संचार व्यवस्था में तेजी आई और आर्थिक लेन-देन बेहतर ढंग से होने लगे।

3.2.3 उन्नीसवीं सदी के आखिर में उपनिवेशवाद का विस्तार

उन्नीसवीं सदी के आखिर में उपनिवेशवाद का प्रभाव:-

  1. यूरोप में व्यापार के विस्तार और आर्थिक लाभ के कारण लोगों की जीवनशैली बेहतर हुई।
  2. उपनिवेशों में स्थानीय लोगों के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
  3. अफ्रीका के अधिकांश देशों की सीमाएँ सीधी रेखाओं में बनाई गईं, जो प्राकृतिक या सांस्कृतिक सीमाओं के आधार पर नहीं थीं।
  4. 1885 में यूरोप की शक्तियों ने बर्लिन सम्मेलन में मिलकर अफ्रीका को बाँट दिया।

3.2.4 रिंडरपेस्ट या मवेशी प्लेग

रिंडरपेस्ट (मवेशी प्लेग):-

एक ऐसी बीमारी थी जो मवेशियों में तेजी से फैलती थी और अफ्रीका में 1890 के दशक में बड़े पैमाने पर देखी गई। यह अफ्रीका में 1880 के दशक के अंत में ब्रिटिश एशिया से लाए गए घोड़ों के साथ आई।

  1. यह बीमारी तेजी से पूरे महाद्वीप में फैल गई और 1892 तक पश्चिमी अफ्रीका तक पहुँच गई।
  2. रिंडरपेस्ट ने अफ्रीका के मवेशियों की आबादी का लगभग 90% हिस्सा नष्ट कर दिया।
  3. मवेशियों के नुकसान से अफ्रीकियों की रोज़ी-रोटी पर गंभीर संकट आया और उन्हें खेतों व बागानों में काम करना पड़ा।
  4. इस स्थिति ने यूरोपियनों को अफ्रीका में उपनिवेश स्थापित करने में आसानी प्रदान की।

3.2.5 भारत से अनुबंधित श्रमिकों का जाना

बंधुआ मजदूर:-

वे लोग थे जिन्हें निश्चित समय के लिए किसी मालिक के अधीन काम करने को बाध्य किया जाता था। इनकी स्थिति बहुत कठिन थी।

  1. अधिकांश मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखाग्रस्त क्षेत्रों से लिए गए।
  2. इन्हें कैरेबियन द्वीप, मॉरीशस, फिजी, सीलोन (श्रीलंका) और मलाया (मलेशिया) जैसे स्थानों पर भेजा गया।
  3. भारत में कई बंधुआ मजदूरों को असम के चाय बागानों में काम पर लगाया गया।
  4. एजेंट इन मजदूरों को झूठे वादे करके ले जाते थे और वहाँ उन्हें बहुत कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता था।
  5. 1900 के दशक में राष्ट्रवादियों ने इस प्रथा का विरोध शुरू किया और 1921 में यह व्यवस्था समाप्त कर दी गई।

3.2.6 भारतीय व्यापार, उपनिवेशवाद और वैश्विक व्यवस्था का संबंध

भारतीय व्यापार, उपनिवेश और वैश्विक व्यवस्था का संबंध:-

उन्नीसवीं सदी में भारत का व्यापार ब्रिटिश उपनिवेशवाद के नियंत्रण में आ गया, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था ब्रिटेन के हित में काम करने लगी।

  1. भारत से उत्तम कॉटन के कपड़े पहले यूरोप निर्यात होते थे।
  2. औद्योगिकीकरण (Industrialization) के बाद ब्रिटिश उत्पादकों ने भारत से आने वाले कपड़ों पर प्रतिबंध लगवा दिया।
  3. इसके परिणामस्वरूप ब्रिटेन में बने कपड़े भारत के बाजारों में बड़ी मात्रा में आने लगे।
  4. 1800 में भारत के निर्यात का 30% हिस्सा कॉटन कपड़ों का था, जो 1815 में घटकर 15%, और 1870 में केवल 3% रह गया।
  5. वहीं 1812 से 1871 तक कच्चे कपास का निर्यात 5% से बढ़कर 35% हो गया।
  6. इस दौरान नील (Indigo) और अफीम (Opium) का निर्यात भी तेज़ी से बढ़ा। अफीम मुख्यतः चीन भेजी जाती थी।
  7. भारत से कच्चा माल और अनाज ब्रिटेन को निर्यात किया जाने लगा, जबकि ब्रिटेन से तैयार माल भारत में आयात होने लगा।
  8. इससे व्यापार का संतुलन (Trade Surplus) ब्रिटेन के पक्ष में चला गया।
  9. भारत की आमदनी से ब्रिटेन ने अपने अन्य उपनिवेशों की देखरेख और 'होम चार्ज' (Home Charges) जैसे खर्चों का भुगतान किया।
  10. होम चार्ज में ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन, कर्ज़ की भरपाई, और भारत में तैनात अधिकारियों के वेतन शामिल थे।

3.3 महायुद्धों के बीच विश्व अर्थव्यवस्था की स्थिति

3.3.1 युद्धोत्तर सुधार

प्रथम विश्व युद्ध और इसका प्रभाव:-

  1. यह युद्ध 1914 से 1918 तक चला।
  2. यह युद्ध दो गुटों के बीच लड़ा गया – मित्र राष्ट्र (Allied Powers): ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, और बाद में अमेरिका; केंद्रीय शक्तियाँ (Central Powers): जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, ओटोमन साम्राज्य और तुर्की।
  3. इस युद्ध से आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ गई।
  4. कई देशों की अर्थव्यवस्थाएँ कमजोर हो गईं और लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
उदाहरण:- प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी पर भारी युद्ध क्षतिपूर्ति लगाई गई, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह टूट गई।

प्रथम विश्व युद्ध के समय हुए युद्धकालीन रूपांतरण:-

  1. इस युद्ध में लगभग 90 लाख लोग मारे गए और 2 करोड़ घायल हुए।
  2. मरने वालों में अधिकतर युवा कामकाजी लोग थे, जिससे कामगारों की भारी कमी हो गई।
  3. परिवारों में कमाने वालों की संख्या घटने से लोगों की आय कम हो गई।
  4. पुरुषों के युद्ध में जाने के कारण महिलाओं ने कारखानों में काम करना शुरू किया।
  5. युद्ध ने आर्थिक शक्तियों के संबंधों को तोड़ दिया, जिससे विश्व व्यापार प्रभावित हुआ।
  6. ब्रिटेन ने अमेरिका से कर्ज लिया, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिका एक अंतर्राष्ट्रीय साहूकार के रूप में उभरा।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद हुए युद्धोत्तर सुधारों का प्रभाव:-

  1. जापान और भारत में उद्योगों का विकास हुआ क्योंकि युद्ध के समय ब्रिटेन अपने उद्योगों पर ध्यान नहीं दे सका।
  2. युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक शक्ति घट गई और वह अमेरिका पर निर्भर हो गया।
  3. ब्रिटेन पर अमेरिकी कर्ज का बोझ बढ़ गया जिससे उसकी अंतर्राष्ट्रीय स्थिति कमजोर हुई।
  4. युद्ध के दौरान चीजों की माँग बढ़ी, लेकिन युद्ध खत्म होने पर माँग घट गई और 20% कामगार बेरोजगार हो गए।
  5. युद्ध से पहले पूर्वी यूरोप गेहूँ का मुख्य निर्यातक था, पर युद्ध के दौरान कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया इसकी जगह ले चुके थे।
  6. युद्ध के बाद जब पूर्वी यूरोप ने फिर से गेहूँ की आपूर्ति शुरू की, तो बाजार में गेहूँ की अधिकता से कीमतें गिर गईं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ।

3.3.2 बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग का विकास

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग की शुरुआत:-

प्रथम विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था तेजी से उभरने लगी और 1920 के दशक में बड़े पैमाने पर उत्पादन उसकी सबसे बड़ी विशेषता बन गया।

  1. हेनरी फोर्ड ने बड़े पैमाने पर उत्पादन (Mass Production) की शुरुआत की, जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ी और कीमतें घट गईं।
  2. अमेरिका के कामगारों की आमदनी बढ़ी, जिससे उनके पास अधिक खर्च करने की क्षमता आई।
  3. उत्पादों की माँग में वृद्धि हुई — विशेषकर कार, रेडियो, रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन जैसे उपभोक्ता सामानों की।
  4. कारों का उत्पादन 1919 में 20 लाख से बढ़कर 1929 में 50 लाख हो गया।
  5. आसान किस्तों पर कर्ज मिलने से लोगों ने ज्यादा सामान खरीदे और उपभोग में वृद्धि हुई।
  6. अमेरिकी अर्थव्यवस्था खुशहाल हो गई और 1923 के बाद अमेरिका सबसे बड़ा विदेशी साहूकार बन गया।
उदाहरण:- हेनरी फोर्ड की कार कंपनी ने "मॉडल टी" कार का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया, जिससे कार आम लोगों की पहुँच में आ गई और अमेरिकी उपभोग संस्कृति की शुरुआत हुई।

3.3.3 महामंदी क्या थी

महामंदी:-

महामंदी 1929 में शुरू हुई और 1930 के दशक के मध्य तक जारी रही। इस दौरान विश्व के अधिकांश देशों में उत्पादन, रोजगार, आय और व्यापार में भारी गिरावट आई।

प्रमुख कारण:-

  1. युद्धोत्तर अर्थव्यवस्था कमजोर हो चुकी थी।
  2. कीमतें गिरने लगीं, जिससे किसानों की आय घट गई।
  3. किसानों ने आमदनी बढ़ाने के लिए अधिक उत्पादन करना शुरू किया, जिससे स्थिति और बिगड़ी।
  4. कई देशों ने अमेरिका से कर्ज लिया, लेकिन अमेरिकी उद्योगपतियों ने मंदी की आशंका देखते हुए कर्ज देना बंद कर दिया।
  5. इसके परिणामस्वरूप हजारों बैंक दिवालिया हो गए और आर्थिक संकट गहरा गया।
उदाहरण:- अमेरिका में स्टॉक मार्केट क्रैश 1929 में हुआ, जिससे निवेशकों के लाखों डॉलर डूब गए और बैंकिंग प्रणाली पर बड़ा संकट आया।

3.3.4 भारत पर महामंदी का प्रभाव

भारत पर महामंदी का प्रभाव:-

1928 से 1934 के बीच भारत पर महामंदी के गंभीर प्रभाव पड़े।

  1. इस दौरान देश का आयात और निर्यात लगभग आधा रह गया।
  2. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरने से गेहूँ की कीमत 50 प्रतिशत तक गिर गई।
  3. किसानों और काश्तकारों को भारी नुकसान हुआ।
  4. महामंदी ने शहरी जनता और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया।
  5. 1931 में मंदी चरम सीमा पर पहुँच गई, जिससे ग्रामीण भारत में असंतोष और उथल-पुथल का दौर शुरू हो गया।
उदाहरण:- उत्तर प्रदेश और पंजाब के किसानों को गेहूँ की घटती कीमतों के कारण भारी आर्थिक संकट झेलना पड़ा।

3.4 विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण : युद्धोत्तर काल

3.4.1 युद्धोत्तर बंदोबस्त और ब्रेटन वुड्स संस्थान

युद्धोत्तर काल में विश्व अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के मुख्य सुधार:-

दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना पर गहरा प्रभाव पड़ा। युद्ध के बाद के सुधार मुख्य रूप से अमेरिका और सोवियत संघ के उदय और अंतर्राष्ट्रीय नीतियों पर आधारित थे।

  1. औद्योगिक देशों में आर्थिक संतुलन बनाए रखना और पूर्ण रोजगार सुनिश्चित करना।
  2. पूँजी, सामान और कामगारों के प्रवाह पर बाहरी दुनिया के प्रभाव को नियंत्रित करना भी महत्वपूर्ण रणनीति थी।

ब्रेटन वुड्स समझौता:-

1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में हुआ एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन था, जिसमें वैश्विक आर्थिक और मौद्रिक व्यवस्था को स्थिर करने के लिए निर्णय लिए गए।

  1. इस सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) की स्थापना हुई।
  2. ब्रेटन वुड्स व्यवस्था स्थिर विनिमय दरों (Fixed Exchange Rates) पर आधारित थी।
  3. इसका उद्देश्य युद्धोत्तर वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिर करना और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सुचारू बनाना था।

3.4.2 प्रारंभिक युद्धोत्तर वर्षों में परिवर्तन

नया अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक आदेश (NIEO):-

1950 और 60 के दशक में विकसित हुआ एक वैश्विक आर्थिक प्रस्ताव था, जिसका उद्देश्य विकासशील देशों के आर्थिक हितों की रक्षा करना था।

  1. उस समय अधिकांश विकासशील देशों को पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के तेज विकास से लाभ नहीं मिला।
  2. इन देशों ने खुद को G-77 के रूप में एक समूह में संगठित किया।
  3. NIEO का उद्देश्य था कि विकासशील देशों को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक नियंत्रण, कच्चे माल के लिए उचित मूल्य, और विकसित देशों के बाजारों में अपने उत्पादों की बेहतर पहुँच प्रदान करना।

चीन में नई आर्थिक नीति:-

  1. चीन में मजदूरी बहुत कम थी, जिससे उत्पादन लागत कम रही।
  2. कम लागत वाली संरचना ने चीनी उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सस्ता और प्रतिस्पर्धी बनाया।
  3. चीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए निवेश का पसंदीदा स्थान बन गया।
  4. नई आर्थिक नीति ने चीन को वैश्विक आर्थिक प्रणाली में सक्रिय खिलाड़ी बनाया।

बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs):-

वे बड़ी कंपनियाँ होती हैं जो एक ही समय में कई देशों में उत्पादन, व्यापार और निवेश करती हैं।

  1. एमएनसी का वैश्विक प्रसार 1950 और 1960 के दशकों में हुआ, जब अमेरिकी व्यापार दुनिया भर में फैल रहा था।
  2. भिन्न-भिन्न देशों द्वारा लगाए गए उच्च आयात शुल्क ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी निर्माण इकाइयाँ विदेशों में स्थापित करने के लिए मजबूर किया।
  3. ये कंपनियाँ उत्पादन, विपणन और वितरण के अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क के माध्यम से वैश्विक व्यापार को प्रभावित करती हैं।
उदाहरण:- कोका-कोला, मैकडॉनल्ड्स और मोबिल जैसी कंपनियाँ कई देशों में फैक्ट्रियाँ और कार्यालय स्थापित करके स्थानीय बाजारों में अपने उत्पाद बेचती हैं।

वीटो:-

वीटो का अर्थ है किसी कानून या प्रस्ताव को अस्वीकार करने का संवैधानिक अधिकार।

  1. यह अधिकार किसी व्यक्ति या निकाय को दिया जाता है ताकि वे किसी प्रस्ताव को लागू होने से रोक सकें।
  2. आमतौर पर राष्ट्रपति, सरकार के प्रमुख या अन्य संवैधानिक पदाधिकारी को यह अधिकार होता है।
  3. वीटो का प्रयोग कानूनों, नीतियों या अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को रोके जाने के लिए किया जाता है।

टैरिफ:-

एक कर है जो किसी देश के आयात या निर्यात पर दूसरे देश द्वारा लगाया जाता है। इसे आमतौर पर सीमा शुल्क के रूप में लागू किया जाता है।

  1. यह कर आमतौर पर सीमा, हवाई अड्डा या बंदरगाह पर लगाया जाता है।
  2. टैरिफ का उद्देश्य घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा देना होता है।
  3. यह सरकार की आय बढ़ाने का एक साधन भी होता है।

विनिमय दर:-

वे दरें हैं जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में एक देश की मुद्रा को दूसरे देश की मुद्रा से जोड़ती हैं।

  1. यह दर तय करती है कि एक देश की मुद्रा की कितनी इकाइयाँ अन्य देश की मुद्रा के बराबर हैं।
  2. विनिमय दरें दो प्रकार की होती हैं – स्थिर विनिमय दर और अस्थायी विनिमय दर।
  3. स्थिर विनिमय दर में मुद्रा का मूल्य किसी अन्य मुद्रा या सोने से स्थिर रखा जाता है।
  4. अस्थायी विनिमय दर में मुद्रा का मूल्य बाज़ार की माँग और आपूर्ति के अनुसार बदलता रहता है।
उदाहरण:- यदि 1 अमेरिकी डॉलर = 83 भारतीय रुपये है, तो यह विनिमय दर बताती है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में 1 डॉलर के लिए कितने रुपये चुकाने होंगे।

पिछले दो दशकों में विश्व अर्थव्यवस्था में हुए प्रमुख बदलाव:-

  1. चीन, भारत और ब्राज़ील जैसे विकासशील देशों ने तेज़ी से आर्थिक विकास किया।
  2. इन देशों के आर्थिक उदय ने वैश्विक व्यापार और निवेश के प्रवाह को प्रभावित किया।
  3. अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में नई ताकतें उभरीं और वैश्विक उत्पादन तथा उपभोग के केंद्र बदलने लगे।
  4. तकनीक और सूचना प्रौद्योगिकी ने व्यापार और आर्थिक लेन-देन में तेजी लाई।
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