Notes Mine

CLASS 10 GEOGRAPHY NOTES IN HINDI CHAPTER - 4

कृषि / Agriculture

TextbookNCERT
ClassClass 10
SubjectGeography
ChapterChapter 4
Chapter Nameकृषि
MediumHindi

4.1 कृषि के प्रकार

कृषि:-

मानव की एक प्रमुख प्राथमिक आर्थिक क्रिया, जिसके अंतर्गत फसलों की खेती और पशुपालन किया जाता है।

  1. कृषि से हमें अधिकांश खाद्यान्न प्राप्त होते हैं।
  2. यह विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराती है।
  3. चाय, कॉफी, मसाले जैसे कुछ कृषि उत्पादों का निर्यात भी किया जाता है।
उदाहरण:- गेहूँ, चावल और दालें खाद्यान्न फसलें हैं, जबकि कपास उद्योगों के लिए कच्चा माल प्रदान करती है।

कृषि प्रक्रिया के चरण:-

  1. जुताई — खेत जोतकर मिट्टी को भुरभुरा बनाना, जिससे मिट्टी में हवा का संचार होता है।
  2. बुवाई — खेत में उपयुक्त बीज बोना।
  3. निराई — खेत से खरपतवार हटाना, जिससे फसल को पोषक तत्व मिलें।
  4. सिंचाई — फसल को समय-समय पर पानी देना।
  5. खाद या उर्वरक डालना — मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए।
  6. कीटनाशक का प्रयोग — फसल को कीटों और रोगों से बचाने के लिए।
  7. कटाई — फसल पकने पर काटना।
  8. दलाई/गहाई — कटाई के बाद बालियों से दाने अलग करना।

कृषि प्रणाली — प्रमुख प्रकार:-

  1. निर्वाह कृषि — किसान अपने और परिवार की आवश्यकताओं के लिए खेती करता है; कम पूँजी व पारंपरिक साधन।
  2. गहन कृषि — सीमित भूमि पर अधिक उत्पादन के लिए श्रम, खाद और सिंचाई का अधिक प्रयोग; अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों में प्रचलित।
  3. वाणिज्यिक कृषि — फसलों का उत्पादन बाजार में बेचने के उद्देश्य से; आधुनिक तकनीक, मशीनों व उर्वरकों का प्रयोग।
  4. रोपण कृषि — बड़े क्षेत्र में एक ही फसल उगाई जाती है; अधिक पूँजी व श्रमिकों की आवश्यकता।

4.1.1 प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि

प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि:-

वह कृषि प्रणाली जिसमें किसान केवल अपने और अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए खेती करता है।

  1. उत्पादन बहुत कम होता है।
  2. पारंपरिक कृषि उपकरणों (हल, कुदाल आदि) का प्रयोग।
  3. उन्नत तकनीक व आधुनिक मशीनों का उपयोग नहीं होता।
  4. वर्षा पर अधिक निर्भरता; श्रम अधिक और पूँजी कम।
उदाहरण:- भारत के आदिवासी क्षेत्रों में छोटे किसान अपने परिवार के लिए धान, मक्का या बाजरा उगाते हैं, जो प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि का उदाहरण है।

कर्तन दहन प्रणाली (स्थानांतरित कृषि):-

एक पारंपरिक कृषि प्रणाली, जिसमें किसान भूमि को अस्थायी रूप से उपयोग करते हैं।

  1. किसान जंगल के एक भाग में पेड़ काटकर (कर्तन) भूमि साफ करते हैं।
  2. कटे हुए पेड़ों-झाड़ियों को जलाया जाता है (दहन); जली राख मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है।
  3. कुछ वर्षों तक खेती के बाद उर्वरता कम होने पर किसान नई भूमि पर चले जाते हैं।
उदाहरण:- पूर्वोत्तर भारत के राज्यों (असम, मिज़ोरम, नागालैंड) में इस कृषि प्रणाली को झूम खेती कहा जाता है।

4.1.2 गहन जीविका कृषि

गहन निर्वाह कृषि:-

वह कृषि प्रणाली जिसमें सीमित भूमि पर अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए अधिक श्रम और आधुनिक साधनों का प्रयोग किया जाता है।

  1. अधिक पूँजी निवेश; आधुनिक कृषि उपकरणों का उपयोग।
  2. उर्वरक, कीटनाशक और सिंचाई सुविधाओं का अधिक प्रयोग।
  3. भूमि का बार-बार उपयोग; प्रायः घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पाई जाती है।
उदाहरण:- भारत के पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों में धान की खेती गहन निर्वाह कृषि का अच्छा उदाहरण है।

4.1.3 वाणिज्यिक कृषि

वाणिज्यिक कृषि:-

वह कृषि प्रणाली जिसमें फसलों का उत्पादन बाजार में बेचने और लाभ कमाने के उद्देश्य से किया जाता है।

  1. आधुनिक कृषि निवेशों व अधिक पैदावार वाले बीजों का प्रयोग।
  2. रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक बड़े पैमाने पर प्रयोग होते हैं।
  3. उत्पादन का उद्देश्य व्यापार और लाभ होता है, न कि केवल परिवार की जरूरतें।
उदाहरण:- हरियाणा और पंजाब में चावल एक वाणिज्यिक फसल है, जबकि ओडिशा में चावल को जीविका फसल के रूप में उगाया जाता है।

रोपण कृषि:-

वाणिज्यिक कृषि का एक प्रमुख रूप, जिसमें बड़े क्षेत्र में एक ही फसल उगाई जाती है, अधिक पूँजी-श्रम व आधुनिक तकनीकों का प्रयोग होता है, और उत्पादन मुख्यतः बिक्री व निर्यात के लिए किया जाता है।

उदाहरण:- भारत में चाय, कॉफी, रबर, गन्ना और केला प्रमुख रोपण फसलें हैं।

गहन निर्वाह खेती और वाणिज्यिक खेती में अंतर

आधारगहन निर्वाह खेतीवाणिज्यिक खेती
उद्देश्यपरिवार की आजीविका के लिए उत्पादनलाभ कमाने व व्यापार के लिए उत्पादन
भूमि जोतछोटी और सीमितबड़ी भूमि जोत
तकनीक व उपकरणपारंपरिक उपकरण (कुदाल, डाओ)आधुनिक मशीनें व तकनीक
उत्पादन का उपयोगस्थानीय उपभोग/बाजारनिर्यात व दूरस्थ बाजार
फसल चक्रएक वर्ष में 2-3 फसलेंप्रायः एक ही फसल पर ध्यान
प्रमुख फसलेंधान, गेहूँगन्ना, चाय, कॉफी

4.2 शस्य प्ररूप

खरीफ फसलें:-

वे फसलें जिन्हें मानसून ऋतु के साथ बोया जाता है।

  1. बुवाई जून-जुलाई में मानसून के आगमन पर; कटाई सितंबर-अक्टूबर में।
  2. वर्षा पर अधिक निर्भर।

मुख्य खरीफ फसलें: चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, अरहर, मूंग, उड़द, कपास, जूट, मूँगफली, सोयाबीन।

उदाहरण:- चावल भारत की एक प्रमुख खरीफ फसल है, जिसे मानसून की वर्षा में बोया जाता है।

रबी फसलें:-

वे फसलें जो शीत ऋतु में बोई जाती हैं और ग्रीष्म ऋतु में काटी जाती हैं।

  1. बुवाई अक्टूबर से दिसंबर के बीच; कटाई अप्रैल से जून के बीच।
  2. ठंडी जलवायु व सिंचाई सुविधा की आवश्यकता।

मुख्य रबी फसलें: गेहूँ, जौ, चना, मटर, सरसों।

उदाहरण:- गेहूँ भारत की एक प्रमुख रबी फसल है, जिसे सर्दियों में बोया जाता है और गर्मियों में काटा जाता है।

जायद फसलें:-

वे फसलें जो रबी और खरीफ ऋतु के बीच ग्रीष्म ऋतु में उगाई जाती हैं।

  1. मार्च से जून के बीच बोई जाती हैं; सिंचाई की अधिक आवश्यकता।
  2. कम अवधि में तैयार; मुख्यतः सब्जियाँ और फल।
उदाहरण:- तरबूज, खरबूजा, खीरा, सब्जियाँ तथा चारे की फसलें जायद फसलों के प्रमुख उदाहरण हैं।

कृषि की मुख्य फसलें (उपयोग के आधार पर):-

  1. खाद्य फसलें — भोजन की आवश्यकता पूरी करती हैं; अनाज, दालें, तिलहन (उदाहरण: गेहूँ, चावल, मक्का)।
  2. नकदी फसलें — बाजार में बेचकर आय के लिए उगाई जाती हैं व उद्योगों को कच्चा माल देती हैं (उदाहरण: चाय, कॉफी, रबर, जूट, कपास)।
  3. बागवानी फसलें — फल, फूल और सब्जियाँ; पोषण और आय दोनों के लिए महत्वपूर्ण (उदाहरण: आम, केला, सेब, टमाटर, आलू)।

4.3 भारत की प्रमुख फसलें

चावल की खेती:-

भारत में प्रमुख खाद्य फसल; चीन के बाद भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।

  1. जलवायु — उष्णकटिबंधीय फसल, गीले मानसून में अच्छी वृद्धि।
  2. तापमान — 25°C से ऊपर और भारी आर्द्रता।
  3. वर्षा — 100 सेमी से अधिक; कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई आवश्यक।
  4. क्षेत्र — उत्तर व उत्तर-पूर्वी भारत के मैदान, तटीय व डेल्टा क्षेत्र; सिंचाई के माध्यम से पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश व राजस्थान के कुछ हिस्से।
उदाहरण:- पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र चावल की प्रमुख खेती वाले क्षेत्र हैं।

गेहूँ की खेती:-

भारत की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसल, मुख्यतः उत्तर व उत्तर-पश्चिमी भाग में उगाई जाती है।

  1. मृदा — जलोढ़ मिट्टी, काली मिट्टी।
  2. तापमान — वृद्धि के समय ठंडा मौसम, कटाई के समय तेज धूप।
  3. वर्षा — 50 से 75 सेमी वार्षिक।
  4. क्षेत्र — दक्कन का उत्तर-पश्चिमी भाग, काली मिट्टी वाले क्षेत्र, गंगा-सतलुज का मैदान।

मुख्य उत्पादक राज्य: पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान।

उदाहरण:- पंजाब और हरियाणा गेहूँ की प्रमुख खेती वाले क्षेत्र हैं।

मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी):-

इन अनाजों में पोषक तत्वों की मात्रा अधिक होती है। ज्वार भारत में क्षेत्रफल व उत्पादन के हिसाब से तीसरी सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसल है।

  1. बाजरा — मृदा: बलुई मिट्टी, उथली काली मिट्टी; उत्पादक राज्य: राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा।
  2. रागी — मृदा: लाल, काली, बलुई, दोमट मिट्टी; उत्पादक राज्य: कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, सिक्किम, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश।
उदाहरण:- राजस्थान और महाराष्ट्र में बाजरा, कर्नाटक में रागी और महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश में ज्वार की प्रमुख खेती होती है।

मक्का की खेती:-

एक खरीफ फसल, जिसका उपयोग भोजन और चारे दोनों के लिए किया जाता है।

  1. तापमान — 21°C से 27°C।
  2. मृदा — पुरानी जलोढ़ मिट्टी पर अच्छी उगती है।
  3. क्षेत्र — बिहार में रबी में भी उगाई जाती है; गंगा-सतलुज मैदान व मध्य भारत के कुछ भाग भी उपयुक्त।
  4. मुख्य उत्पादक राज्य — कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना।

दालों की खेती:-

भारत में सबसे अधिक उगाई और खाई जाने वाली प्रोटीन युक्त फसलें।

  1. मुख्य दालें — तुर (अरहर), उड़द, मूंग, मसूर, मटर, चना।
  2. अरहर को छोड़कर अन्य सभी दालें वायु से नाइट्रोजन लेकर भूमि की उर्वरता बनाए रखती हैं; फलीदार होने के कारण फसल आवर्तन (rotation) में बोई जाती हैं।
  3. मुख्य उत्पादक राज्य — मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक।

गन्ने की खेती:-

भारत की प्रमुख नकदी फसल; ब्राज़ील के बाद भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।

  1. जलवायु — गर्म और आर्द्र जलवायु में अच्छी वृद्धि।
  2. तापमान — 21°C से 27°C; वर्षा — 75 से 100 सेमी वार्षिक।
  3. मुख्य उत्पादक राज्य — उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु।

तिलहन की खेती:-

भारत तिलहन का एक बड़ा उत्पादक देश है।

मुख्य तिलहन: मूंगफली, सरसों, नारियल, तिल, सोयाबीन, अरंडी, अलसी, सूरजमुखी।

उदाहरण:- मूंगफली उत्पादन में चीन प्रथम व भारत दूसरे स्थान पर है; रेपसीड/सरसों में कनाडा प्रथम, चीन दूसरा और भारत तीसरे स्थान पर है।

4.4 खाद्यान्न के अलावा अन्य खाद्य फसलें

चाय की खेती:-

भारत की एक महत्वपूर्ण नकदी फसल।

  1. जलवायु — उष्णकटिबंधीय व उपोष्णकटिबंधीय (गर्म और आर्द्र)।
  2. मृदा — गहरी, उपजाऊ, ह्यूमस व कार्बनिक पदार्थों में समृद्ध मिट्टी।
  3. वर्षा — 150 से 300 सेमी वार्षिक, पूरे वर्ष समान रूप से।
  4. प्रमुख उत्पादक राज्य — असम और पश्चिम बंगाल।
उदाहरण:- 2020 में चाय उत्पादन में चीन प्रथम व भारत दूसरे स्थान पर रहा।

कॉफी की खेती:-

भारत की एक महत्वपूर्ण नकदी फसल, चाय की तरह बागानों में उगाई जाती है।

  1. प्रथम किस्म — यमन से लाई गई अरेबिका किस्म।
  2. प्रारंभिक क्षेत्र — बाबा बूदन पहाड़ियों में शुरुआत।

बागवानी फसलें:-

भारत में फल और सब्जियों की खेती को बागवानी कहते हैं।

  1. 2017 में भारत विश्व में फलों और सब्जियों के उत्पादन में चीन के बाद दूसरे स्थान पर।
  2. भारत उष्णकटिबंधीय और शीतोष्णकटिबंधीय दोनों प्रकार के फलों का उत्पादक।
  3. प्रमुख सब्जियाँ — मटर, फूलगोभी, प्याज, बंदगोभी, टमाटर, बैंगन, आलू।

4.5 अखाद्य फसलें

रबड़ की खेती:-

एक महत्वपूर्ण कच्चा माल देने वाली फसल, जो मुख्यतः उद्योगों में उपयोग होती है।

  1. भूमध्यरेखीय क्षेत्र की फसल; विशेष परिस्थितियों में उष्ण-उपोष्ण क्षेत्र में भी उगाई जाती है।
  2. जलवायु — 200 सेमी से अधिक वर्षा और 25°C से अधिक तापमान वाली नम व आर्द्र जलवायु।
  3. उत्पादक राज्य — केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह और मेघालय के गारो पहाड़।

कपास की खेती:-

सूती कपड़ा उद्योग का मुख्य कच्चा माल; भारत इसका मूल स्थल माना जाता है।

  1. 2017 में भारत विश्व में चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक।
  2. मृदा — दक्कन पठार के शुष्कतर भागों की काली मिट्टी उपयुक्त।
  3. तापमान व जलवायु — उच्च तापमान, हल्की वर्षा या सिंचाई, 210 पाला-रहित दिन और खुली धूप आवश्यक।
  4. उत्पादक राज्य — महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश।
  5. फसल अवधि — खरीफ फसल, पकने में 6-8 महीने।

जूट की खेती:-

जूट का उत्पादन मुख्यतः उपजाऊ और अच्छी जल-निकासी वाली मिट्टी में किया जाता है।

  1. मृदा आवश्यकता — जल-निकासी वाली बाढ़ के मैदान की उपजाऊ मिट्टी।
  2. मुख्य उत्पादक राज्य — पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, उड़ीसा, मेघालय।
  3. उपयोग — बैग, रस्सी, चटाई आदि बनाने में।

शस्यावर्तन:-

भूमि की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए किसी खेत में फसलें बदल-बदल कर बोना।

  1. भूमि को थकने से बचाने के लिए विभिन्न फसलों का उपयोग।
  2. मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद; कीट-रोगों का प्रकोप कम होना।
उदाहरण:- एक साल धान, अगले साल गेहूँ या दाल बोना।

चकबंदी:-

बिखरी हुई कृषि जोतों या खेतों को एक साथ मिलाकर आर्थिक रूप से लाभप्रद बनाना।

  1. खेतों को संगठित रूप में एकत्र करना; सिंचाई-मशीनरी के प्रयोग में सुविधा।
  2. भूमि का अधिकतम व प्रभावी उपयोग; किसानों की उत्पादन लागत कम व लाभ अधिक।
उदाहरण:- अलग-अलग मालिकों के छोटे-छोटे खेतों को जोड़कर एक बड़ा खेत बनाना।

हरित क्रांति:-

कृषि क्षेत्र में कुछ फसलों (विशेषकर गेहूँ और चावल) की पैदावार बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीक, उच्च उपज वाले बीज और उर्वरकों का प्रयोग करना।

  1. उच्च उपज देने वाले बीजों का उपयोग; उर्वरक-कीटनाशकों का सही प्रयोग।
  2. सिंचाई व मशीनरी का आधुनिक इस्तेमाल; उत्पादन में क्रांतिकारी वृद्धि।
उदाहरण:- पंजाब और हरियाणा में गेहूँ की पैदावार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।

हरित क्रांति की हानियाँ:-

  1. अत्यधिक रसायनों-उर्वरकों के प्रयोग से भूमि की उर्वरता घटी।
  2. अधिक सिंचाई के कारण भूगत जल स्तर नीचा हुआ।
  3. जैव विविधता में कमी — कुछ पारंपरिक फसलें व स्थानीय जातियाँ लुप्त हुईं।
  4. अमीर और गरीब किसानों के बीच आर्थिक अंतर बढ़ा।
  5. पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव, जैसे मृदा व जल प्रदूषण।

श्वेत क्रांति:-

दूध के उत्पादन में वृद्धि।

  1. पशुओं की नस्लों में सुधार करके दूध उत्पादन बढ़ाया गया।
  2. आधुनिक तकनीकों का उपयोग; देश में दूध की उपलब्धता व डेयरी उद्योग का विकास।
उदाहरण:- अमूल (Amul) और अन्य डेयरी सहकारी समितियाँ इस क्रांति का हिस्सा रही हैं।

4.6 कृषि का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, रोजगार और उत्पादन में योगदान

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व:-

  1. भारत कृषि प्रधान देश है।
  2. लगभग दो-तिहाई आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है।
  3. सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 26% कृषि से आता है।
  4. कृषि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है और उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराती है।
उदाहरण:- गेहूँ, चावल, कपास, जूट, गन्ना आदि फसलें देश के लिए भोजन और उद्योगों के कच्चे माल के रूप में महत्वपूर्ण हैं।

भारतीय कृषि की मुख्य विशेषताएँ:-

  1. छोटे खेत — किसानों के पास आमतौर पर छोटा भूखंड, मुख्यतः परिवार के लिए फसल।
  2. पशु आधारित कार्य — हल चलाना, ढुलाई जैसे कार्यों में पशुओं की महत्वपूर्ण भूमिका।
  3. मानसून पर निर्भरता — भारतीय किसान मुख्यतः मानसून की वर्षा पर निर्भर रहते हैं।
उदाहरण:- उत्तर भारत में छोटे किसान अपने खेत में गेहूँ और चावल उगाते हैं और हल चलाने के लिए बैल का प्रयोग करते हैं।

4.7 वैश्वीकरण का कृषि पर प्रभाव

भारतीय कृषि पर वैश्विक/भूमंडलीय प्रभाव:-

  1. अस्थिर कीमतें — किसानों को कृषि उत्पादों की साल-दर-साल बदलती कीमतों का सामना करना पड़ता है।
  2. व्यापार उदारीकरण — अंतर्राष्ट्रीय व घरेलू व्यापार उदारीकरण कृषि उत्पादों की कीमतों को प्रभावित करता है।
  3. निर्यात प्रोत्साहन — कुछ प्रमुख कृषि वस्तुओं के निर्यात को उदार बनाया गया है।
  4. उच्च उपज वाली फसलें व आधुनिक तकनीक-निवेश से कृषि में बड़ा परिवर्तन आया है।
उदाहरण:- चावल और गेहूँ के निर्यात के कारण अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे छोटे व बड़े किसानों को प्रभावित करते हैं।

भारत में खाद्य उत्पादन घटने के कारण:-

  1. कृषि भूमि की कमी — गैर-कृषि उपयोग (उद्योग, आवास, सड़कें) के लिए भूमि लेने से खेती योग्य भूमि घटी।
  2. उर्वरक-कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग — मिट्टी की उपजाऊ क्षमता कम होना।
  3. असक्षम जल प्रबंधन — अनुचित सिंचाई से जलाक्रांतता व लवणता जैसी समस्याएँ।
  4. भूजल का अत्यधिक दोहन — जल स्तर गिरने से सिंचाई लागत बढ़ी।
  5. भंडारण व बाजार की कमी — उत्पादन का लाभ किसानों तक पूरा नहीं पहुँच पाना।
उदाहरण:- कई क्षेत्रों में जल संसाधनों की कमी और मिट्टी की उपजाऊ क्षमता में गिरावट के कारण गेहूँ-चावल की पैदावार में लगातार कमी देखी गई है।

भारत के किसानों के सामने प्रमुख चुनौतियाँ:-

  1. मानसून की अनियमितता — वर्षा का असमान या असमय होना फसल को प्रभावित करता है।
  2. गरीबी और ऋण का दुष्चक्र — कम आय व उच्च लागत के कारण किसान कर्ज़ के जाल में फंस जाते हैं।
  3. शहरों की ओर पलायन — ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की कमी के कारण।
  4. सरकारी सुविधाओं तक पहुँच में कठिनाई व बिचौलियों का प्रभाव।
  5. अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता — वैश्विक बाजार में अन्य देशों के उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा।
उदाहरण:- मानसून में अनियमित वर्षा के कारण कई किसानों की खरीफ फसल बर्बाद हो जाती है, जिससे उन्हें ऋण लेकर फसल बोनी पड़ती है।

4.8 प्रौद्योगिकीय और संस्थागत सुधार

कृषिगत सुधारों के मुख्य उपाय:-

  1. सिंचाई और उर्वरक — बेहतर सिंचाई व्यवस्था, जैविक खाद और आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग।
  2. प्रत्यक्ष सहायता — किसानों को सीधे बैंक खातों में सहायता राशि पहुँचाना।
  3. सरकारी सहायता व ऋण — सस्ते ऋण, बिजली और पानी की सुलभता।
  4. बाजार तक पहुँच — कृषि उत्पादों को आसानी से बाजार तक पहुँचाना।
  5. फसल बीमा — बाढ़, सूखा, चक्रवात, आग, कीट आदि से बचाव।
  6. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) — फसलों के लिए सुनिश्चित मूल्य।
  7. शिक्षा और जानकारी — कृषि शिक्षा, मौसम संबंधी जानकारी।
  8. अनुसंधान व प्रशिक्षण — कृषि विद्यालय, विश्वविद्यालय व अनुसंधान केंद्रों की स्थापना।
उदाहरण:- किसान कार्ड और ग्रामीण बैंक के माध्यम से छोटे किसानों को ऋण और बीमा की सुविधा दी जाती है, जिससे उनकी आय और सुरक्षा बढ़ती है।

सरकार द्वारा किसानों के हित में किए गए संस्थागत सुधार:-

  1. फसल बीमा — प्राकृतिक आपदाओं व कीटों से होने वाले नुकसान के लिए फसल बीमा की सुविधा।
  2. सहकारी बैंक — किसानों को सस्ते ऋण व वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए सहकारी बैंकों का विकास।
  3. समर्थन मूल्य (MSP) — फसलों के लिए उचित मूल्य तय करना व किसानों को प्रोत्साहित करना।
  4. मौसम जानकारी — किसानों को समय-समय पर मौसम संबंधी सूचनाएं प्रदान करना।
  5. कृषि शिक्षा और तकनीक — नवीन कृषि तकनीक, औजार, उर्वरक आदि की जानकारी रेडियो व दूरदर्शन के माध्यम से प्रसारित करना।
उदाहरण:- किसानों को फसल बीमा और MSP की सुविधा मिलने से उनकी आर्थिक सुरक्षा बढ़ती है और जोखिम कम होता है।
Scroll to Top