CLASS IX SOCIAL SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 8
अर्थशास्त्र की आधारभूत संरचनाएँ: चयन की समस्या
| Textbook | NCERT |
|---|---|
| Class | Class IX |
| Subject | Understanding Society: India and Beyond |
| Chapter | Chapter 8 |
| Chapter Name | अर्थशास्त्र की आधारभूत संरचनाएँ: चयन की समस्या |
| Medium | Hindi |
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
1.1 आवश्यकताएँ और इच्छाएँ (Needs vs Wants)
यदि आपको चुनना हो, तो क्या आप अपनी जेब-खर्च की राशि नाश्ते पर खर्च करेंगे या नए जूतों के लिए बचाएँगे? स्कूल पुस्तकालय में किसी नई पुस्तक की केवल पाँच प्रतियाँ हों लेकिन 20 विद्यार्थी उसे पढ़ना चाहते हों, तो पहले किसे मिलनी चाहिए? किसान को मिट्टी, वर्षा व बाज़ार की माँग के आधार पर कौन-सी फसल उगानी चाहिए? ये यादृच्छिक प्रश्न नहीं, बल्कि आर्थिक चयन के उदाहरण हैं, जो व्यक्तियों, उद्यमों व सरकारों को करने पड़ते हैं।
आवश्यकताएँ (Needs) और इच्छाएँ (Wants):-
हमारी कुछ प्राथमिकताएँ आवश्यकताएँ हैं, जैसे भोजन, जल व आवास जैसी अनिवार्यताएँ, जबकि अन्य इच्छाएँ हैं, जैसे गैजेट, छुट्टियाँ या विलासिता की वस्तुएँ। मानवीय इच्छाएँ असीमित होती हैं और लगातार बदलती रहती हैं — उदाहरण के लिए, लोग साइकिल से मोटरसाइकिल और फिर कार में उन्नयन (upgrade) करना चाह सकते हैं।
बाज़ार (Market):-
वह स्थान जहाँ उत्पादों व सेवाओं की खरीद-बिक्री होती है। यह भौतिक बाज़ार या इंटरनेट पर आभासी (virtual) बाज़ार हो सकता है।
1.2 चयन और सीमित संसाधन
संसाधन (Resources):-
वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन में उपयोग होने वाले कारक। ये प्राकृतिक (जैसे जल व कोयला) या मानव-निर्मित (जैसे पूँजी व प्रौद्योगिकी) हो सकते हैं। उत्पादन के कारकों — भूमि, श्रम, पूँजी व प्रौद्योगिकी — का उपयोग वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन में होता है, परंतु प्राकृतिक व मानव-निर्मित दोनों प्रकार के संसाधन सीमित मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
ये संसाधन कई वैकल्पिक उपयोगों में लगाए जा सकते हैं — जैसे फल खरीदने या जूते के लिए धन आवंटित करना। परिवारों के साथ-साथ अर्थव्यवस्थाओं को भी यह तय करना होता है कि असीमित इच्छाओं की पूर्ति व लोगों के जीवन-स्तर में सुधार हेतु दुर्लभ संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग कैसे किया जाए।
1.2.1 अवसर लागत (Opportunity Cost)
अवसर लागत:-
जब कोई एक विकल्प चुना जाता है, तो अन्य विकल्प त्याग दिए जाते हैं। जो त्यागा जाता है, उसका मूल्य ही अवसर लागत कहलाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसान के पास सीमित भूमि, जल व श्रम है और वह जौ या गेहूँ में से किसी एक की उपज बढ़ाने का चयन करता है, तो अधिक जौ उगाने के लिए कुछ गेहूँ का त्याग करना पड़ेगा — यही जौ उगाने की अवसर लागत है।
1.2.2 उत्पादन संभावना वक्र (PPC)
उत्पादन संभावना वक्र (Production Possibility Curve):-
वह वक्र जो सभी उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करके उत्पादित की जा सकने वाली वस्तुओं के विभिन्न संयोजनों को दर्शाता है। यह जौ और गेहूँ के उत्पादन के बीच व्यापार-व्यतिक्रम (trade-off) को दर्शाता है। जैसे-जैसे किसान बिंदु A से E की ओर बढ़ता है, वह अधिक जौ और कम गेहूँ उत्पादित करता है। PPC के सभी बिंदु संसाधनों के दक्ष उपयोग (बर्बादी से बचते हुए) द्वारा उत्पन्न की जा सकने वाली अधिकतम उपज को दर्शाते हैं — यह उद्यमों व सरकारों को बेहतर योजना व निर्णय-निर्धारण में सहायक है।
| संयोजन | जौ (कि.ग्रा.) | गेहूँ (कि.ग्रा.) |
|---|---|---|
| A | 0 | 100 |
| B | 25 | 90 |
| C | 50 | 70 |
| D | 75 | 40 |
| E | 100 | 0 |
1.3 अर्थशास्त्र किससे संबंधित है?
अर्थशास्त्र (Economics):-
यह शब्द ग्रीक शब्द 'ओइकोनोमिया' से बना है, जो दो शब्दों से मिलकर बना है — 'ओइकोस' (जिसका अर्थ आमतौर पर 'घर' है) और 'नेमीन' (जिसका सबसे उपयुक्त अर्थ है 'प्रबंधन')। इस प्रकार, अर्थशास्त्र का अर्थ है 'घर का प्रबंधन'। सीमित संसाधनों व असीमित इच्छाओं की स्थिति में, केवल परिवारों को ही नहीं, बल्कि राष्ट्रों को भी अपने संसाधनों के दक्ष उपयोग की योजना बनानी होती है।
चूँकि संसाधनों के प्रतिस्पर्धी उपयोग होते हैं, इसलिए व्यक्तियों, उद्यमों व सरकारों को यह तय करना होता है कि उनका सर्वोत्तम आवंटन कैसे किया जाए, क्योंकि ये निर्णय लोगों व समाज के समग्र कल्याण को प्रभावित करते हैं। अर्थशास्त्र यह बताता है कि विभिन्न आर्थिक इकाइयाँ — उपभोक्ता, उत्पादक, सरकारें व वित्तीय संस्थाएँ — किसी अर्थव्यवस्था में किस प्रकार परस्पर क्रिया करती हैं।
आर्थिक इकाई (Economic Entities):-
वह जो किसी आर्थिक गतिविधि में भाग लेता है, उदाहरण के लिए, उत्पादक, उपभोक्ता, सरकार व उद्यम।
अच्छे निर्णय अनुमान पर नहीं, बल्कि आँकड़ों (data) व विश्लेषण पर निर्भर करते हैं। परिवार आवश्यक वस्तुओं (भोजन, दवाइयाँ, स्कूल सामग्री), गैर-आवश्यक वस्तुओं (आभूषण, मनोरंजन, रेस्तरां भोजन) व बचत हेतु धन आवंटित करते हैं। सरकारें कराधान से प्राप्त राजस्व का उपयोग बुनियादी ढाँचे व कल्याण कार्यक्रमों पर व्यय की योजना बनाने में करती हैं।
1.3.1 अर्थशास्त्रियों के कार्यक्षेत्र
नीति (Policy):-
संगठनों या व्यक्तियों द्वारा अपनाया गया या प्रस्तावित कार्रवाई का कोई सिद्धांत या मार्ग।
अर्थशास्त्री उपलब्ध विकल्पों, संबंधित अवसर लागतों व संभावित परिणामों का अध्ययन कर व्यक्तियों, उद्यमों व संस्थाओं को निर्णय लेने में मदद करते हैं। उनके कार्यक्षेत्र में शामिल हैं —
- नीति-निर्माण — कराधान या कल्याण व्यय पर सरकारों का मार्गदर्शन करना
- व्यावसायिक परामर्श — फर्मों को वृद्धि योजना या दक्षता सुधारने में सहायता करना
- अनुसंधान व शिक्षा — आर्थिक रुझानों का अध्ययन करना व अन्य को पढ़ाना
- वित्त — निवेशकों को यह सलाह देना कि कहाँ निवेश करें
1.3.2 भारत का आर्थिक सर्वेक्षण
आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey):-
वित्त मंत्रालय द्वारा तैयार किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण वार्षिक दस्तावेज़, जो केंद्रीय बजट से पहले संसद में प्रस्तुत किया जाता है। यह पिछले वर्ष के दौरान देश के आर्थिक प्रदर्शन की समीक्षा करता है और कृषि, उद्योग, सेवाओं जैसे विभिन्न क्षेत्रों तथा रोजगार, मुद्रास्फीति, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढाँचे जैसे अन्य क्षेत्रों का विश्लेषण करता है। यह नीति-निर्माताओं के लिए आगामी केंद्रीय बजट हेतु महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान कर एक खाके (blueprint) के रूप में भी कार्य करता है।
1.4 अर्थशास्त्र के प्रमुख प्रश्न
असीमित इच्छाओं व सीमित संसाधनों के बीच किसी भी असंतुलन से तीन प्रमुख प्रश्न उत्पन्न होते हैं, जिन्हें अर्थशास्त्र संबोधित करने का प्रयास करता है — क्या उत्पादन करें, कैसे उत्पादन करें, और किसके लिए उत्पादन करें।
1.4.1 क्या उत्पादन करें और किसके लिए?
यह बुनियादी प्रश्न इस बात से संबंधित है कि किसी निश्चित अवधि में अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कौन-सी वस्तुएँ व सेवाएँ, और कितनी मात्रा में, उत्पादित की जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, क्या किसानों को गन्ना व धान जैसी जल-गहन फसलें उगानी चाहिए, या बाजरा व दालों जैसी सूखा-प्रतिरोधी फसलें? यहाँ, गन्ना उत्पादन की अवसर लागत जल-बचत व बेहतर मृदा स्वास्थ्य से प्राप्त होने वाले संभावित लाभों का त्याग है — यह अल्पकालिक आर्थिक लाभ व दीर्घकालिक सततता (sustainability) के बीच के व्यापार-व्यतिक्रम को दर्शाता है।
'किसके लिए उत्पादन करें' प्रश्न इस बात पर विचार करता है कि उत्पादित वस्तुओं-सेवाओं का उद्देश्य क्या है, उनका उत्पादन व वितरण कैसे होता है, और उनके उत्पादन से किसे लाभ होता है। चूँकि संसाधन सीमित हैं और लोगों की आवश्यकताएँ, आय-स्तर, रुचियाँ व जीवन-शैली भिन्न-भिन्न होती हैं, इसलिए उत्पादक यह तय करते हैं कि वे किस उपभोक्ता वर्ग की सेवा करना चाहते हैं।
1.4.2 कैसे उत्पादन करें?
उत्पादन क्या करना है, यह तय करने के बाद अगला प्रश्न है — इसे कैसे उत्पादित किया जाए, यानी किन विधियों, संसाधनों व प्रौद्योगिकियों का उपयोग किया जाए। इसका उत्तर देने के लिए उत्पादकों को उत्पादन के कारकों — भूमि, श्रम, पूँजी व प्रौद्योगिकी — का सही मिश्रण चुनना होता है।
श्रम-गहन (Labour-intensive) और पूँजी-गहन (Capital-intensive) उत्पादन:-
उत्पादन श्रम-गहन (अधिक श्रमिकों व कम मशीनरी का उपयोग) या पूँजी-गहन (अधिक मशीनों व प्रौद्योगिकी और कम श्रमिकों का उपयोग) हो सकता है। सामान्यतः कृषि व हस्तशिल्प से संबंधित आर्थिक गतिविधियाँ श्रम पर अधिक निर्भर करती हैं, जबकि इस्पात व वाहन-निर्माण जैसे उद्योग मशीनरी पर अधिक निर्भर करते हैं।
उत्पादन तकनीक का चुनाव पूँजी की लागत, प्रौद्योगिकी के चयन और उत्पाद की प्रकृति पर निर्भर करता है। उत्पादन के विभिन्न कारकों की उपलब्धता व उनकी सापेक्ष लागत, तथा देश के कानून व विनियम, इस प्रमुख प्रश्न को संबोधित करने के लिए उद्यमों के निर्णय को निर्धारित करते हैं — यदि श्रम सस्ता व सुगमता से उपलब्ध है, तो श्रम-गहन विधियाँ पसंद की जाती हैं, परंतु यदि श्रम महँगा या दुर्लभ है, तो मशीनें अधिक कुशल हो जाती हैं।
1.5 आर्थिक प्रणालियाँ और निर्णय-प्रक्रिया
किसी अर्थव्यवस्था में इन तीन प्रमुख प्रश्नों के उत्तर इस बात पर निर्भर करते हैं कि वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन में उपयोग होने वाले संसाधनों को किस प्रकार संगठित किया गया है और उनसे संबंधित निर्णय-प्रक्रिया को कौन नियंत्रित करता है। वस्तुओं, सेवाओं व संसाधनों के उत्पादन, उपभोग व वितरण के तंत्रों को परिभाषित करने वाली प्रणाली को किसी देश की आर्थिक प्रणाली कहा जाता है।
1.5.1 नियोजित अर्थव्यवस्था (Planned Economy)
नियोजित अर्थव्यवस्था:-
एक आर्थिक प्रणाली जिसमें संसाधनों के आवंटन तथा वस्तुओं-सेवाओं की कीमतें सरकार द्वारा निर्धारित की जाती हैं। इसमें सरकार की एक केंद्रीय नियोजन प्राधिकरण (जैसे योजना आयोग) बाज़ार में सभी प्रमुख आर्थिक निर्णय लेती है — क्या व कितना उत्पादित होगा, कैसे उत्पादित होगा, और इसका उपयोग कौन किस मूल्य पर कर सकेगा। सरकार का भूमि, कारखानों, बैंकों व परिवहन जैसे अधिकांश संसाधनों व क्षेत्रों पर स्वामित्व होता है।
1.5.2 बाज़ार अर्थव्यवस्था (Market Economy)
बाज़ार अर्थव्यवस्था:-
एक आर्थिक प्रणाली जिसमें संसाधनों के आवंटन तथा वस्तुओं-सेवाओं की कीमतें मुख्यतः बाज़ार शक्तियों (माँग व आपूर्ति) द्वारा निर्धारित होती हैं, सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम रहता है। सरकार की भूमिका सार्वजनिक वस्तुएँ व भौतिक बुनियादी ढाँचा प्रदान करना है — वह फुटबॉल मैच के रेफरी की तरह सुरक्षा व कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करती है, परंतु कीमतें या उत्पादन नियंत्रित नहीं करती।
1.5.3 मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy)
मिश्रित अर्थव्यवस्था:-
संसाधन आवंटन की वह बाज़ार प्रणाली जिसमें सरकार व निजी क्षेत्र बाज़ार में सह-अस्तित्व में रहते हैं और परस्पर प्रतिस्पर्धा भी करते हैं, तथा निजी खिलाड़ी सरकार द्वारा विनियमित होते हैं। लगभग सभी अर्थव्यवस्थाएँ मिश्रित होती हैं। इस प्रणाली में निजी व्यक्ति, उद्यम व सरकार — तीनों ही आर्थिक चयन व निर्णय-निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सार्वजनिक वस्तुएँ (Public Goods):-
वे वस्तुएँ व सेवाएँ जो बिना किसी को बाहर रखे सभी व्यक्तियों को उपलब्ध होती हैं। कुछ लोगों द्वारा सार्वजनिक वस्तुओं का उपयोग अन्य लोगों को उनके उपयोग से नहीं रोकता — उदाहरण के लिए, पार्क, सड़कें, पुलिस सेवाएँ, स्ट्रीट लाइट व बुनियादी शिक्षा।
अर्थशास्त्र मूलतः दुर्लभ संसाधनों व असीमित इच्छाओं की दुनिया में चयन करने से संबंधित है। व्यक्तियों, उद्यमों व सरकारों को प्रत्येक निर्णय की अवसर लागत को ध्यान में रखते हुए उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग निरंतर तय करना होता है। ये चयन तीन प्रमुख आर्थिक प्रश्नों में परिलक्षित होते हैं — क्या, कैसे व किसके लिए उत्पादन करें। अधिकांश आधुनिक अर्थव्यवस्थाएँ बाज़ार व नियोजित — दोनों आर्थिक प्रणालियों के तत्वों को संयोजित करती हैं।