CLASS IX SOCIAL SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 7
निर्वाचन (चुनाव) — Elections
| Textbook | NCERT |
|---|---|
| Class | Class IX |
| Subject | Understanding Society: India and Beyond |
| Chapter | Chapter 7 |
| Chapter Name | निर्वाचन (चुनाव) |
| Medium | Hindi |
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
1.1 चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं?
चुनाव लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रयोग की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में से एक हैं। नियमित व आवधिक चुनाव लोकतंत्र के केंद्र में होते हैं। सार्वजनिक पदों के प्रतिनिधियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चुनावों के माध्यम से चुना जा सकता है।
प्रत्यक्ष निर्वाचन:-
ऐसे चुनाव जिनमें नागरिक अपने प्रतिनिधियों या नेताओं को चुनने के लिए सीधे मतदान करते हैं। भारत में लोकसभा, विधानसभा (विधान सभा) और स्थानीय निकायों (पंचायत, नगर निगम आदि) के सदस्य हर पाँच वर्ष में प्रत्यक्ष चुनावों से चुने जाते हैं।
अप्रत्यक्ष निर्वाचन:-
ऐसे चुनाव जिनमें नागरिक प्रतिनिधियों को वोट देते हैं, जो आगे नेताओं को चुनते/निर्वाचित करते हैं। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष चुनावों के माध्यम से निर्वाचित होते हैं।
लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण तत्वों में से एक है उन लोगों के आवधिक चुनाव में भाग लेना जो हमारी ओर से निर्णय लेंगे। निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। हमारे प्रतिनिधियों को चुनने और उन्हें जवाबदेह ठहराने का अधिकार आवधिक चुनावों के माध्यम से सुनिश्चित होता है, और हमारा मत इस अधिकार के प्रयोग का प्रमुख साधन है।
चुनाव प्रतिनिधित्व, समानता, वैधता, जवाबदेही जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों को सुनिश्चित करते हैं और नागरिकों को मताधिकार व अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन का अवसर प्रदान करते हैं।
1.2 भारत की निर्वाचन मशीनरी
लोकतंत्र को साकार करने के लिए चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से संपन्न होने चाहिए। भारत जैसे विशाल व विविधतापूर्ण देश में, जहाँ हज़ारों निर्वाचन क्षेत्रों में करोड़ों लोग मतदान करते हैं, इस हेतु कानूनों, राष्ट्रीय-राज्य-स्थानीय सभी स्तरों पर सुव्यवस्थित व समन्वित प्रणाली, तथा एक सुदृढ़ मशीनरी की आवश्यकता होती है। यहीं पर निर्वाचन प्रणाली और विभिन्न हितधारक — भारत निर्वाचन आयोग (ECI), विभिन्न राजनीतिक दल, सिविल सोसाइटी, मीडिया व मतदाता — अपनी भूमिका निभाते हैं। हमारा संविधान व विभिन्न संसदीय कानून इन सभी हितधारकों के कार्यों व शक्तियों का प्रावधान करते हैं।
1.3 निर्वाचन प्रणाली
चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न करने का पहला कदम यह तय करना है कि डाले गए मतों को विधायिका में सीटों में कैसे परिवर्तित किया जाए। निर्वाचन प्रणाली सीटों का आवंटन जिस तरीके से करती है, वही उसे अन्य प्रणालियों से अलग करता है। हमारे संविधान निर्माताओं ने दो सबसे सामान्य निर्वाचन प्रणालियों पर चर्चा की और अंततः बहुलता (plurality) प्रणाली को अपनाया, जिसे 'फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट' (FPTP) प्रणाली भी कहा जाता है।
1.3.1 फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP)
FPTP प्रणाली:-
इस प्रणाली में लोकसभा और विधानसभा के सदस्यों का चुनाव होता है। प्रत्येक मतदाता अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक उम्मीदवार को वोट देता है, और सर्वाधिक मत पाने वाला उम्मीदवार विजयी होता है — भले ही उसके मत कुल डाले गए मतों के 50% से कम हों।
विधान सभाएँ प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित निकाय हैं, जो अपने-अपने राज्यों व कुछ केंद्रशासित प्रदेशों के लिए कानून बनाती हैं। विधान सभा के चुनाव लोकसभा के समान, FPTP निर्वाचन प्रणाली से ही संपन्न होते हैं।
1.3.2 आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (PR) और एकल संक्रमणीय मत
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली:-
राज्यसभा, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और विधान परिषद के चुनाव इस प्रणाली से — एकल संक्रमणीय मत (single transferable vote) के माध्यम से — संपन्न होते हैं। मतदाता अपनी वरीयता (प्राथमिकता) अंकित करते हैं।
प्रक्रिया — सबसे पहले सभी उम्मीदवारों के प्रथम वरीयता मतों की गणना होती है; जो न्यूनतम आवश्यक मत (कोटा) प्राप्त कर लेते हैं, वे निर्वाचित घोषित हो जाते हैं। सबसे कम मत पाने वाले उम्मीदवार को हटा दिया जाता है, और उसके मत उन उम्मीदवारों को स्थानांतरित कर दिए जाते हैं जिन्हें उन मतपत्रों पर द्वितीय वरीयता में रखा गया था। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक आवश्यक संख्या में उम्मीदवार निर्वाचित न हो जाएँ।
1.4 निर्वाचन से संबंधित कानून
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RPA 1950):-
यह मुख्यतः सीटों के आवंटन व निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन, मतदाता सूचियों की तैयारी व संशोधन, तथा यह सुनिश्चित करने से संबंधित है कि 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार प्राप्त हो।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA 1951):-
यह चुनाव संचालन तथा चुनाव-पश्चात विवादों के अन्य सभी पहलुओं से संबंधित है। इसमें उम्मीदवारों के नामांकन, चुनाव प्रचार, मतदान प्रक्रिया और विवादों के समाधान के नियम निर्धारित हैं। यह अधिनियम निर्वाचन अपराधों व भ्रष्ट आचरणों को भी सूचीबद्ध करता है।
- किसी उम्मीदवार (या उसकी सहमति से) द्वारा किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने, हटने, वोट देने या न देने के लिए कोई उपहार, प्रस्ताव या वादा करना
- धर्म, जाति, नस्ल, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट देने या न देने की अपील करना
- उम्मीदवारों द्वारा या उनकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा सरकारी कर्मचारियों (राजपत्रित अधिकारी, न्यायाधीश, सशस्त्र बल, पुलिस, उत्पाद शुल्क अधिकारी) से सहायता लेना निषिद्ध है
1.5 परिसीमन आयोग
परिसीमन:-
लोकसभा व विधान सभा के चुनावों हेतु प्रत्येक राज्य में सीटों की संख्या निर्धारित करने और क्षेत्रीय सीमाएँ तय करने की प्रक्रिया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में सीट-जनसंख्या अनुपात यथासंभव समान रहे। परिसीमन के बिना कोई सांसद पाँच लाख लोगों का प्रतिनिधित्व कर सकता है, जबकि दूसरा पच्चीस लाख का — जो समान प्रतिनिधित्व के उद्देश्य को विफल कर देगा।
1.6 भारत निर्वाचन आयोग (ECI)
भारत निर्वाचन आयोग:-
एक स्वायत्त स्थायी संवैधानिक निकाय, जिसकी स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई। यह लोकसभा, राज्यसभा, विधान सभा, विधान परिषद, राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के चुनाव संचालित करता है। संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 इसकी स्थापना व शक्तियों-कर्तव्यों का प्रावधान करते हैं। संविधान ने चुनाव संचालन की संपूर्ण प्रक्रिया की अधीक्षा, निर्देशन व नियंत्रण ECI को सौंपा है।
राज्य स्तर पर चुनाव कार्य की निगरानी राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा की जाती है, जिन्हें ECI संबंधित राज्य सरकार से परामर्श कर सिविल सेवकों में से नियुक्त करता है। जिला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट व तहसीलदार आदि को जिला निर्वाचन अधिकारी, रिटर्निंग अधिकारी, निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी आदि के रूप में चुनाव कार्य सौंपा जाता है।
1.6.1 मतदाता सूची तैयार करना
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR):-
ECI मतदाता सूची तैयार करने के लिए हर घर में आधिकारिक गणनाकार भेजता है, और एकत्रित जानकारी के आधार पर प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए मतदाता सूचियाँ तैयार की जाती हैं, जो मतदान केंद्र-वार व्यवस्थित होती हैं। केवल वे लोग ही मतदान कर सकते हैं जिनका नाम सूची में शामिल है। SIR मतदाता सूचियों को अद्यतन, सत्यापित व संशोधित करने की प्रक्रिया है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि कोई भी योग्य नागरिक छूटे नहीं और कोई भी अयोग्य व्यक्ति सूची में शामिल न हो। यह मृत्यु, निवास परिवर्तन, दोहरा नामांकन व स्थायी रूप से अप्राप्य होने के आधार पर मतदाताओं के नाम भी हटाता है।
1.6.2 चुनाव कार्यक्रम व राजनीतिक दलों का पंजीकरण
जब विधायिका का संवैधानिक रूप से निर्धारित कार्यकाल (पाँच वर्ष) समाप्त होता है, या कार्यकाल पूर्ण होने से पहले विधायिका भंग होती है, तो ECI चुनाव संचालन हेतु आवश्यक मशीनरी सक्रिय करता है। भारत जैसे विशाल व विविधतापूर्ण देश के लिए चुनाव कार्यक्रम तय करते समय मौसम की स्थिति, कृषि चक्र, स्कूल-विश्वविद्यालय परीक्षा कार्यक्रम, त्योहार आदि कई कारकों पर विचार करना पड़ता है।
केवल ECI में पंजीकृत राजनीतिक दल ही चुनाव लड़ सकते हैं; स्वतंत्र उम्मीदवार (जो किसी दल से संबद्ध नहीं) भी चुनाव लड़ सकते हैं। ECI राजनीतिक दलों से समय-समय पर संगठनात्मक चुनाव कराने की अपेक्षा कर आंतरिक दलीय लोकतंत्र सुनिश्चित करता है। ECI राजनीतिक दलों को मान्यता-प्राप्त राष्ट्रीय या राज्य/क्षेत्रीय दल, अथवा पंजीकृत-गैर-मान्यता प्राप्त दल के रूप में वर्गीकृत करता है, और चुनाव चिह्नों के आवंटन व दलों की मान्यता से संबंधित विवादों में अर्ध-न्यायिक निकाय के रूप में भी कार्य करता है।
1.6.3 स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना
चुनावों को सार्थक बनाने के लिए संपूर्ण प्रक्रिया निष्पक्ष व पारदर्शी ढंग से संचालित होनी चाहिए। यदि निष्पक्षता सुनिश्चित न हो, तो निर्वाचन संस्थाओं पर जनता का विश्वास धीरे-धीरे कमजोर हो सकता है। ECI ने चुनाव प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाने के लिए कई पहलें की हैं — विशेषकर दिव्यांगजनों (PwDs), वरिष्ठ नागरिकों, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों तथा विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूहों (PVTGs) के लिए बुनियादी ढाँचे की सुगम्यता व प्रौद्योगिकी-सहायता प्राप्त समावेशन पर केंद्रित।
1.7 राजनीतिक दल
राजनीतिक दलों का महत्व:-
राजनीतिक दल लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अनिवार्य हैं, क्योंकि वे सीधे जमीनी स्तर पर कार्य करते हैं। वे शासन, जवाबदेही, प्रतिनिधित्व व जन-सहभागिता प्रदान कर लोकतंत्र को प्रभावी ढंग से कार्य करने में मदद करते हैं।
- जनमत को संगठित करना
- विशिष्ट मुद्दों पर अभियान चलाना
- मतदाताओं को सार्थक विकल्प देना
- चुनावों के दौरान मतदाताओं को सूचित निर्णय लेने में सक्षम बनाना
1.7.1 दल-बदल और दल-बदल विरोधी कानून
दल-बदल (Defection):-
जिस राजनीतिक दल के बैनर तले उम्मीदवार निर्वाचित हुआ हो, उसे छोड़ना या बदलना। इसमें किसी अन्य दल में शामिल होना या विधायिका में मतदान जैसे मामलों में दल के निर्णयों से स्वतंत्र रूप से कार्य करना शामिल हो सकता है। दलीय अनुशासन व राजनीतिक स्थिरता के संदर्भ में देखा जाए तो इसे राजनीतिक अवसरवाद माना जाता है; इसके विपरीत, इसे अंतरात्मा की आवाज़ बनाए रखने या बदलती जनता की अपेक्षाओं के प्रति प्रतिक्रिया के रूप में भी देखा जा सकता है।
दल-बदल विरोधी कानून:-
भारत में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से 1985 में पारित। इस कानून का उद्देश्य दल-बदल को रोकना है, जिससे निर्वाचित सरकार को स्थिरता मिलती है। इस कानून के अनुसार, यदि संसद या राज्य विधानसभा का कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी दलीय सदस्यता त्याग देता है या दल के निर्देश (व्हिप) के विरुद्ध मतदान करता है, तो उस सदस्य को संबंधित सदन से अयोग्य घोषित किया जा सकता है। ऐसे मामलों में क्या किया जाना है, यह सदन के अध्यक्ष या सभापति तय करते हैं।
1.7.2 दलों की मान्यता के मानदंड
| दल का प्रकार | मान्यता के मानदंड (कोई एक शर्त पूरी हो) |
|---|---|
| राष्ट्रीय दल | लोकसभा/विधानसभा के आम चुनाव में चार या अधिक राज्यों में कम से कम 6% वैध मत तथा लोकसभा में चार सीटें; या लोकसभा में कम से कम 2% सीटें (कम से कम तीन राज्यों से); या कम से कम चार राज्यों में राज्य दल के रूप में मान्यता प्राप्त |
| राज्य/क्षेत्रीय दल | राज्य विधानसभा चुनाव में कम से कम 6% वैध मत व दो सीटें; या लोकसभा चुनाव में राज्य से 6% मत व एक सीट; या विधानसभा की कम से कम 3% सीटें (या तीन सीटें, जो भी अधिक हो); या हर 25 लोकसभा सीट पर एक सीट; या राज्य में 8% वैध मत |
| पंजीकृत-अमान्यता प्राप्त दल (RUPP) | विधानसभा/आम चुनाव में पर्याप्त मत प्रतिशत प्राप्त न करने वाले दल; या पंजीकरण के बाद कभी चुनाव न लड़ने वाले दल |
1.8 स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनावों के समक्ष चुनौतियाँ
भारत में 96.8 करोड़ (2024 में) से अधिक मतदाताओं, हज़ारों मतदान केंद्रों और सैकड़ों राजनीतिक दलों के लिए, विविध क्षेत्रों व सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं में फैले हुए, चुनाव कराना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। गलत सूचना, फर्जी खबरें, धमकी (intimidation) जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए ECI RPA 1950 व 1951, आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct), EVM, वोटर वेरिफाइएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT), मतदाता जागरूकता अभियान व अन्य उपायों के माध्यम से कार्य करता है।
आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct):-
चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों व उम्मीदवारों के आचरण को नियंत्रित करने वाले दिशा-निर्देशों का एक समूह, जो निष्पक्ष चुनाव प्रचार व चुनाव प्रक्रिया की शुचिता सुनिश्चित करता है।
निरंतर सतर्कता और सक्रिय नागरिक भागीदारी के साथ, चुनाव अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बन सकते हैं और लोकतंत्र अधिक सुदृढ़ हो सकता है। मतदान डालना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार होने के साथ-साथ एक कर्तव्य भी है — चुनाव लोकतंत्र की आत्मा हैं, क्योंकि वे प्रत्येक नागरिक को सरकार के गठन में समान आवाज़ प्रदान करते हैं।