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Class 9 SST Chapter 2 Notes in Hindi

CLASS 9 SST NOTES IN HINDI — CHAPTER 2

पृथ्वी की सतह का निर्माण (Shaping of the Earth's Surface)

TextbookNCERT
ClassClass 9
Subjectसामाजिक विज्ञान (Social Science)
ChapterChapter 2
Chapter Nameपृथ्वी की सतह का निर्माण
MediumHindi

2.1 प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics)

भू-आकृति (Landform):-

भू-आकृति पृथ्वी की सतह पर पाई जाने वाली एक प्राकृतिक विशेषता है, जो अपक्षय, अपरदन, निक्षेपण और पृथ्वी की भूपर्पटी की गति जैसी प्रक्रियाओं से बनती है। पर्वत, घाटियाँ, पठार, मैदान, मरुस्थल और तटीय विशेषताएँ इसके उदाहरण हैं।

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत:-

प्लेट विवर्तनिकी पृथ्वी विज्ञान का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसे W.J. मॉर्गन ने दिया, और यह पृथ्वी की भूपर्पटी की गति को समझाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी की सबसे बाहरी परत एक टुकड़ा नहीं बल्कि कई बड़े-छोटे टुकड़ों में विभाजित है, जिन्हें विवर्तनिक प्लेटें (tectonic plates) कहते हैं। ये प्लेटें अपने नीचे की अर्ध-पिघली परत पर धीरे-धीरे खिसकती हैं और पर्वत, भूकंप व ज्वालामुखी जैसी प्रमुख भौतिक विशेषताओं व प्राकृतिक घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार होती हैं।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना:-

पृथ्वी तीन मुख्य परतों से बनी है — भूपर्पटी (crust), मैंटल (mantle), और क्रोड (core)। भूपर्पटी सबसे बाहरी परत है जिस पर हम रहते हैं। इसके नीचे मैंटल है, जो बहुत मोटा और गर्म है। क्रोड सबसे भीतरी परत है और अत्यधिक गर्म व भारी है। भूपर्पटी और मैंटल के ऊपरी भाग मिलकर स्थलमंडल (lithosphere) बनाते हैं, जो विभिन्न विवर्तनिक प्लेटों में टूटा हुआ है। स्थलमंडल के नीचे दुर्बलमंडल (asthenosphere) होता है, जो अर्ध-पिघला होता है और प्लेटों को खिसकने में मदद करता है।

  1. महाद्वीपीय प्लेटें (continental plates) — महाद्वीपों को धारण करती हैं
  2. महासागरीय प्लेटें (oceanic plates) — समुद्र तल को धारण करती हैं
  3. मिश्रित प्लेटें (mixed plates) — महाद्वीप और महासागर दोनों को धारण करती हैं
नोट:- विश्व की प्रमुख विवर्तनिक प्लेटों में प्रशांत प्लेट, यूरेशियाई प्लेट, अफ्रीकी प्लेट, उत्तर अमेरिकी प्लेट, दक्षिण अमेरिकी प्लेट, भारत-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट और अंटार्कटिक प्लेट शामिल हैं।

प्लेट संचलन और सीमाएँ:-

विवर्तनिक प्लेटों की गति मैंटल में संवहन धाराओं (convection currents) के कारण होती है। पृथ्वी के क्रोड से आने वाली ऊष्मा मैंटल में पिघले हुए पदार्थ को ऊपर उठाती है, जबकि ठंडा पदार्थ नीचे बैठता है — यही निरंतर गति संवहन धाराएँ बनाती है, जो प्लेटों को अलग-अलग दिशाओं में धकेलती और खींचती हैं। जहाँ विवर्तनिक प्लेटें मिलती हैं, उन्हें प्लेट सीमाएँ (plate boundaries) कहते हैं।

  1. अभिसारी सीमा (Convergent boundary):- जब दो प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं। महाद्वीपीय प्लेटों के टकराने से वलित पर्वत (जैसे हिमालय) बनते हैं। महासागरीय प्लेट का महाद्वीपीय प्लेट से टकराना ज्वालामुखी गतिविधि और भूकंप का कारण बनता है।
  2. अपसारी सीमा (Divergent boundary):- जब प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती हैं, तो मैग्मा नीचे से ऊपर उठकर नई भूपर्पटी बनाता है, जैसे मध्य-महासागरीय कटक (मध्य-अटलांटिक कटक इसका उदाहरण है)।
  3. रूपांतरण सीमा (Transform boundary):- जहाँ प्लेटें बिना भूपर्पटी बनाए या नष्ट किए एक-दूसरे के पास से खिसकती हैं — इससे मुख्यतः भूकंप आते हैं, जैसे अमेरिका में सैन एंड्रियास फॉल्ट।
रिंग ऑफ फायर:- अधिकांश भूकंप और ज्वालामुखी प्लेट सीमाओं के साथ-साथ आते हैं, विशेषकर प्रशांत महासागर के आस-पास के क्षेत्र में, जिसे "रिंग ऑफ फायर" कहा जाता है।

भूकंप — प्राचीन भारतीय समझ:-

प्राचीन समय में भी भूकंपों को 'भूकंप' (bhūkampa) यानी पृथ्वी का हिलना कहा जाता था। बृहत्संहिता में वराहमिहिर ने भूकंप पर एक विशेष खंड समर्पित किया, जिसमें बताया कि हवा, वर्षा, बादल, पशुओं के व्यवहार और ग्रहों की स्थिति में बदलाव इनके संकेत हो सकते हैं। उन्होंने भूकंपों को चार तात्विक शक्तियों — वायु, अग्नि, इंद्र (आकाश/गर्जन), और वरुण (जल) से जोड़ा, जो विशिष्ट नक्षत्रों और क्षेत्रों से संबंधित थीं।

2.2 अपक्षय और अपरदन की प्रक्रिया

2.2.1 अपक्षय (Weathering)

अपक्षय:-

अपक्षय वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पृथ्वी की सतह पर चट्टानें विभिन्न प्रक्रियाओं के कारण छोटे टुकड़ों में टूटती हैं। इसमें टूटी हुई सामग्री की गति शामिल नहीं होती, केवल टूटना होता है। अपक्षय के तीन मुख्य प्रकार हैं:

  1. भौतिक अपक्षय:- तापमान परिवर्तन, पाला, या हवा के कारण चट्टानें छोटे टुकड़ों में टूटती हैं
  2. रासायनिक अपक्षय:- जल, वायु, या अम्ल के साथ अभिक्रिया के कारण चट्टानों के खनिज बदलकर नए पदार्थ बनाते हैं
  3. जैविक अपक्षय:- पौधों, जानवरों, या सूक्ष्मजीवों के कारण होता है — जैसे पौधों की जड़ें चट्टानों की दरारों में घुसकर उन्हें तोड़ देती हैं

2.2.2 अपरदन (Erosion)

अपरदन:-

अपरदन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मिट्टी, चट्टानें, और अन्य सतही सामग्री जल, पवन, बर्फ, या लहरों जैसे प्राकृतिक कारकों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाई जाती है। अपक्षय के विपरीत, जो केवल चट्टानों को तोड़ता है, अपरदन में टूटी हुई सामग्री की गति शामिल होती है।

  1. जल अपरदन:- नदियों, वर्षा, या समुद्री लहरों के कारण
  2. पवन अपरदन:- शुष्क और रेतीले क्षेत्रों में आम
  3. हिमानी अपरदन:- गतिशील बर्फ चट्टानों को खुरचती और ले जाती है
  4. तटीय अपरदन:- समुद्री लहरें तट के किनारे की भूमि को घिसती हैं

अपरदन कई मानवीय व्यवसायों को प्रभावित करता है — किसानों के लिए यह उपजाऊ ऊपरी मिट्टी हटाता है, जिससे पैदावार घटती है; नदी व तट के पास रहने वालों के लिए यह भूमि, घर और सड़कें बहा सकता है; निर्माण व खनन में यह भूमि को अस्थिर करता है और सुरक्षा जोखिम पैदा करता है।

सिंधु-सरस्वती सभ्यता:- इस सभ्यता ने जल प्रबंधन के लिए कंटूरिंग, बंडिंग, टेरेसिंग, बाँध और नहरों जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग किया, जिनका उल्लेख वेदों, कृषिपराशर, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, और वृक्षायुर्वेद जैसे ग्रंथों में मिलता है। नागालैंड की ज़ाबो प्रणाली पहाड़ी ढलानों पर मिट्टी और जल संरक्षण के लिए एकीकृत खेती का उदाहरण है।

2.3 अपक्षय के कारक (Agents of Gradation)

अपक्षय के कारक (Agents of Gradation):-

अपक्षय के कारक वे प्राकृतिक शक्तियाँ हैं जो पृथ्वी की सतह पर सामग्री को घिसती, ले जाती और जमा करती हैं, जिससे समय के साथ सतह समतल या चिकनी होती है। इसके मुख्य कारक हैं — बहता जल, हिमनद, पवन, लहरें, और भूमिगत जल।

नोट:- नदियाँ, नील, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी उपजाऊ मैदानी नदियों ने कृषि समाजों और प्रारंभिक शहरों को जन्म दिया। हिमालय ने भारत को आक्रमणों से बचाया, लेकिन खैबर दर्रे जैसे मार्गों से सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी संभव हुआ।

2.3.1 बहता जल (Running Water)

जलप्रपात (Waterfall):-

जलप्रपात एक भू-आकृति है, जहाँ नदी किसी खड़ी चट्टान या ऊर्ध्वाधर ढलान पर बहती है, जिससे नाटकीय गिरावट बनती है। ये नदी के ऊपरी मार्ग में बनते हैं, जहाँ कठोर चट्टानें अपक्षय का प्रतिरोध करती हैं जबकि नीचे की नरम चट्टानें घिस जाती हैं। इनका उपयोग जल-विद्युत उत्पादन में भी किया जाता है।

विसर्प (Meander):-

विसर्प नदी के मध्य या निचले मार्ग में पार्श्विक अपरदन और निक्षेपण के कारण बना एक घुमावदार मोड़ है। नदी बहते हुए मोड़ों के बाहरी किनारों को घिसती है और भीतरी किनारों पर तलछट जमा करती है, जिससे धीरे-धीरे बड़े लूप बनते हैं। यह उपजाऊ मिट्टी के कारण कृषि के लिए महत्वपूर्ण है और बस्तियों के पैटर्न को भी प्रभावित करता है।

उदाहरण:- तमिलनाडु का ग्रैंड एनिकट (कल्लनई) नदियों के सिंचाई-उपयोग का एक उदाहरण है।

डेल्टा (Delta):-

डेल्टा एक भू-आकृति है जो नदी के मुहाने पर बनती है, जहाँ नदी समुद्र, महासागर या झील में बहती है और अपने साथ लाई गई तलछट जमा करती है। समय के साथ यह जमाव एक पंखे के आकार या त्रिकोणीय भूमि क्षेत्र बनाता है। डेल्टा की समृद्ध जलोढ़ मिट्टी इसे कृषि (जैसे चावल व जूट) के लिए अत्यंत उपजाऊ बनाती है, और मीठे व खारे पानी का मिश्रण मत्स्य-पालन के लिए भी लाभदायक होता है।

2.3.2 लहरें और धाराएँ (Waves and Currents)

तट और तटीय भू-आकृतियाँ:-

लहरें और धाराएँ लगातार समुद्री सतह पर गति करती हैं और तटीय क्षेत्रों में भूमि को नया आकार देती हैं। इनकी क्रिया से समुद्र तट, बालू पट्टी, समुद्री भृगु (cliffs), समुद्री गुफाएँ, मेहराब (arches), और स्तंभ (stacks) जैसी भू-आकृतियाँ बनती हैं।

  1. समुद्र तट (Beach):- लहरों द्वारा तलछट के निक्षेपण से बना रेत, कंकड़ या चट्टानों से युक्त क्षेत्र
  2. भृगु (Cliffs):- तट का आधार लहरों द्वारा घिसने से बनी खड़ी चट्टानी सतह
  3. तरंग-कर्तित मंच (Wave-cut platforms):- भृगु के पीछे हटने पर बचा हुआ समतल क्षेत्र
  4. गुफाएँ, मेहराब और स्तंभ:- जब लहरें चट्टान के कमज़ोर हिस्सों को घिसती हैं, तो गुफाएँ बनती हैं; दोनों ओर की गुफाओं के मिलने से मेहराब बनते हैं; मेहराब के ढहने पर बचे स्तंभ को "स्तंभ" (stack) कहते हैं

2.3.3 हिमनद (Glaciers)

हिमानी अपरदन और भू-आकृतियाँ:-

हिमानी अपरदन तब होता है जब हिमनद भूमि पर धीरे-धीरे खिसकते हैं, भू-दृश्य को तराशते हैं। हिमानी अपरदन से बनी सामान्य भू-आकृतियाँ:

  1. U-आकार की घाटियाँ:- हिमनदों द्वारा नदी घाटियों को चौड़ा व गहरा करने से बनती हैं
  2. हिमगह्वर (Cirques):- हिमनद के शीर्ष पर कटोरे-आकार की गर्तिकाएँ
  3. श्रृंगिका (Aretes):- घाटियों के बीच तीखी कटकें
  4. लटकती घाटियाँ (Hanging valleys):- जहाँ छोटे हिमनद बड़े हिमनदों से मिलते हैं
  5. फियोर्ड (Fjords):- जब समुद्र हिमानी घाटियों में भर जाता है, तब बनने वाले गहरे, संकरे प्रवेश-मार्ग

हिमोढ़ (Moraines):-

हिमोढ़ ऐसी भू-आकृतियाँ हैं जो हिमनदों द्वारा ढोए गए और छोड़े गए चट्टान, मिट्टी, व मलबे (जिसे 'टिल' कहते हैं) के निक्षेपण से बनती हैं। इसके प्रकार हैं — पार्श्विक हिमोढ़ (हिमनद के किनारों पर बनते हैं), अंतस्थ हिमोढ़ (हिमनद के अंत में बनते हैं, उसकी अधिकतम सीमा दर्शाते हुए), और मध्यवर्ती हिमोढ़ (जब दो हिमनद मिलते हैं और उनके पार्श्विक हिमोढ़ बीच में जुड़ते हैं)।

2.3.4 पवन (Wind)

पवन अपरदन और भू-आकृतियाँ:-

पवन अपरदन तब होता है जब तेज़ हवाएँ रेत और मिट्टी के ढीले कणों को उठाकर ले जाती हैं, जिससे भू-दृश्य धीरे-धीरे आकार लेता है।

  1. यारडांग (Yardangs):- पवन द्वारा तराशी गई धारीदार चट्टानी कटकें
  2. वेंटीफैक्ट्स:- रेत के थपेड़ों से पॉलिश व आकार पाई चट्टानें
  3. अपवाहन गर्त (Deflation hollows/blowouts):- ढीली सामग्री हटने से बनी उथली गर्तिकाएँ
  4. मरुस्थलीय फर्श (Desert pavements):- महीन कणों के उड़ जाने के बाद बची समतल सतह

बालुका स्तूप (Dunes):-

बालुका स्तूप मरुस्थलीय क्षेत्रों या रेतीले तटों पर पवन द्वारा निर्मित रेत की पहाड़ियाँ या कटकें हैं।

  1. बरखान स्तूप:- अर्धचंद्राकार, सीमित रेत और एक ही पवन दिशा वाले क्षेत्रों में बनते हैं
  2. अनुदैर्घ्य स्तूप:- प्रचलित पवन के समानांतर बनी लंबी कटकें
  3. तारा स्तूप:- कई भुजाओं वाले, जहाँ हवाएँ अलग-अलग दिशाओं से आती हैं
  4. परवलयिक स्तूप:- U-आकार के, अक्सर वनस्पति द्वारा स्थिर

2.3.5 भूमिगत जल (Underground Water)

कार्स्ट स्थलाकृति:-

भूमिगत जल, विशेषकर चूना पत्थर या घुलनशील चट्टानों वाले क्षेत्रों में, रासायनिक अपक्षय और अपरदन के माध्यम से "कार्स्ट स्थलाकृति" नामक अनोखी भू-आकृतियाँ बनाता है।

  1. गुफाएँ:- अम्लीय जल द्वारा चट्टान घुलने से बने खोखले स्थान
  2. स्टैलेक्टाइट:- गुफाओं की छत से लटकती हुई हिमलंब-आकार की संरचनाएँ
  3. स्टैलेग्माइट:- गुफाओं के फर्श से ऊपर उठती संरचनाएँ
  4. डोलिन/सिंकहोल:- भूमि के भूमिगत गुहा में धँसने से बनी गर्तिकाएँ
  5. भूमिगत नदियाँ:- गुफा प्रणालियों से होकर बहने वाली नदियाँ

2.4 भू-आकृतियाँ और आपदाएँ

भूस्खलन (Landslides):-

भूस्खलन प्राकृतिक और मानवीय कारकों के मिश्रण से होता है, जो ढलानों को अस्थिर बनाते हैं। भारी व निरंतर वर्षा एक मुख्य प्राकृतिक कारण है, क्योंकि पानी मिट्टी व चट्टानों में रिसकर उनका भार बढ़ाता है और घर्षण कम करता है। भूकंप व ज्वालामुखी विस्फोट भी भूमि हिलाकर ढलानों को कमज़ोर कर सकते हैं। वनों की कटाई, खनन, सड़क निर्माण, और पहाड़ी ढलानों पर अनियोजित निर्माण जैसी मानवीय गतिविधियाँ ढलानों के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ती हैं।

हिमस्खलन (Avalanches):-

हिमस्खलन खड़ी पर्वत ढलानों पर बर्फ की अचानक अस्थिरता के कारण होता है। कम समय में भारी हिमपात बर्फ की परत पर अतिरिक्त भार डालता है, जिससे यह अस्थिर हो जाती है, विशेषकर जब यह कमज़ोर परतों पर टिकी हो। तापमान में अचानक वृद्धि आंशिक पिघलाव का कारण बन सकती है, जिससे बर्फ को जोड़े रखने वाला घर्षण कम हो जाता है।

हिमनद झील प्रस्फुटन बाढ़ (GLOFs):-

हिमनद झील प्रस्फुटन बाढ़ (Glacial Lake Outburst Floods) प्राकृतिक और जलवायु कारकों के कारण हिमनद झीलों से बड़ी मात्रा में पानी के अचानक निकलने से होती है। बढ़ते तापमान के कारण हिमनदों के तेज़ी से पिघलने से झीलों का आकार व जलस्तर बढ़ता है, जिससे उनके बर्फ या ढीले हिमोढ़ से बने प्राकृतिक बाँधों पर दबाव पड़ता है। भूकंप, हिमस्खलन, या भूस्खलन झील पर प्रहार कर बाँध को कमज़ोर कर सकते हैं, जिससे इसका अचानक ढहना होता है।

धूल भरी आँधी (Dust Storms):-

धूल भरी आँधी तेज़ हवाओं द्वारा ढीली, सूखी मिट्टी व रेत की बड़ी मात्रा को हवा में उठाने से होती है। लंबे समय तक सूखा और कम वर्षा मिट्टी को सुखा देते हैं, जिससे हवा के लिए बारीक कणों को उठाना आसान हो जाता है। ये मरुस्थलीय और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में आम हैं, जहाँ मिट्टी ढीली व सूखी होती है। वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, या खराब कृषि पद्धतियों के कारण विरल वनस्पति आवरण भी भूमि को उजागर छोड़ देता है।

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