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Class 10 political science Notes in hindI Chapter - 2

Chapter 2: संघवाद / Federalism
Chapter Introduction: 
इस अध्याय में आप संघवाद की अवधारणा और उसकी प्रमुख विशेषताओं को समझेंगे। साथ ही भारत में संघीय व्यवस्था, केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का बँटवारा, भाषा-नीति तथा विकेंद्रीकरण जैसी महत्वपूर्ण विषयों को सरल भाषा में पढ़ेंगे।
नीचे अध्याय संघवाद के सभी महत्वपूर्ण topics को सरल भाषा में विस्तार से समझाया गया है जो NCERT syllabus पर आधारित हैं, तथा बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

 

CLASS 10 POLITICAL SCIENCE NOTES IN HINDI
CHAPTER 2 : संघवाद

DETAILS

INFORMATION

Textbook

NCERT

Class

Class 10

Subject

Political Science (Civics)

Chapter

Chapter 2

Chapter Name

संघवाद

Medium

Hindi

क्या आप Class 10 Political Science (Civics) Chapter 2 Notes in Hindi  ढूँढ रहे हैं?
यहाँ आपको संघवाद अध्याय के आसान और सरल नोट्स मिलेंगे। इस अध्याय में आप संघवाद की अवधारणा, भारत की संघीय व्यवस्था, केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का विभाजन तथा विकेंद्रीकरण के बारे में विस्तार से समझेंगे।

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
2.1 संघवाद क्या है?
2.2 भारत में संघीय व्यवस्था कैसी है?
2.3 संघीय व्यवस्था कैसे चलती है?
  2.3.1 भाषायी राज्य क्या हैं?
  2.3.2 भाषा-नीति क्या है?
  2.3.3 केंद्र-राज्य संबंध कैसे कार्य करते हैं?
2.4 भारत में विकेंद्रीकरण क्या है?

Chapter Summary
इस अध्याय में आप संघवाद की अवधारणा के बारे में समझेंगे, जिसमें शासन की शक्तियों को विभिन्न स्तरों की सरकारों के बीच बाँटा जाता है। आप जानेंगे कि संघीय व्यवस्था का उद्देश्य देश की एकता बनाए रखते हुए क्षेत्रीय आवश्यकताओं को पूरा करना होता है।
आप भारत की संघीय व्यवस्था के बारे में पढ़ेंगे, जहाँ केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच संविधान द्वारा शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है। इससे दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में कार्य कर सकती हैं।
इस अध्याय में आप यह भी समझेंगे कि संघीय व्यवस्था को सफल बनाने के लिए संविधान, स्वतंत्र न्यायपालिका तथा वित्तीय व्यवस्थाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये संस्थाएँ केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखने में सहायता करती हैं।
आप भाषायी राज्यों के गठन और भारत की भाषा-नीति के बारे में भी जानेंगे। स्वतंत्रता के बाद राज्यों का पुनर्गठन मुख्य रूप से भाषायी आधार पर किया गया, जिससे विभिन्न भाषाई समुदायों को अपनी पहचान और प्रशासनिक सुविधा प्राप्त हुई।
इसके अलावा आप केंद्र और राज्य सरकारों के बीच संबंधों को समझेंगे तथा जानेंगे कि दोनों स्तर की सरकारें मिलकर देश के विकास और प्रशासन को सुचारु रूप से चलाती हैं।
अंत में आप विकेंद्रीकरण की अवधारणा के बारे में पढ़ेंगे, जिसके अंतर्गत स्थानीय स्तर पर पंचायतों और नगर निकायों को अधिक अधिकार दिए गए हैं। इससे जनता की भागीदारी बढ़ती है और स्थानीय समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

2.1 संघवाद क्या है?

संघवाद का अर्थ क्या है :-

संघवाद :- संघवाद :- वह व्यवस्था है जिसमें कई इकाइयाँ (राज्य) मिलकर एक संगठित रूप में शासन चलाती हैं। साधारण शब्दों में, संघवाद संगठित होकर रहने का विचार है।

संघवाद की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. संघवाद का अर्थ है संगठित होकर शासन चलाना।

2. इसमें केंद्र और राज्यों के बीच सत्ता का बँटवारा होता है।

3. यह एकता और विविधता दोनों को बनाए रखने में सहायक होता है।

4. इसमें सभी इकाइयाँ मिलकर देश के विकास में भागीदारी करती हैं।

उदाहरण :- 

भारत में केंद्र सरकार और राज्य सरकार मिलकर शासन चलाते हैं, जो संघवाद का एक प्रमुख उदाहरण है।

नोट :-  

 

संघ = संगठन + वाद = विचार = संघवाद

संघवाद क्या है :-

संघवाद :- संघवाद एक ऐसी संस्थागत व्यवस्था है जिसमें दो स्तर की राजनीतिक सरकारें मिलकर शासन चलाती हैं। इसमें एक केंद्रीय (संघीय) सरकार और दूसरी राज्य (प्रांतीय) सरकारें होती हैं।

संघवाद की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. संघवाद एक संस्थागत (Institutional) प्रणाली है।

2. इसमें दो स्तर की सरकारें होती हैं।

3. एक केंद्रीय सरकार होती है जो पूरे देश के लिए कार्य करती है।

4. दूसरी राज्य सरकारें होती हैं जो अपने-अपने राज्यों में शासन चलाती हैं।

5. दोनों स्तर की सरकारें संविधान के अनुसार अपनी-अपनी शक्तियों का उपयोग करती हैं।

उदाहरण :-

भारत में केंद्र सरकार और राज्य सरकार मिलकर शासन चलाती हैं, जो संघवाद का प्रमुख उदाहरण है।

संघीय शासन व्यवस्था क्या है :-

संघीय शासन व्यवस्था :- संघीय शासन व्यवस्था वह प्रणाली है जिसमें सत्ता का वितरण दो या दो से अधिक स्तरों के बीच किया जाता है। इसमें केंद्रीय सरकार और राज्य/प्रांतीय सरकारें मिलकर शासन चलाती हैं।

संघीय शासन व्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. इसमें सत्ता का बँटवारा दो या अधिक स्तरों पर किया जाता है।

2. एक केंद्रीय सरकार होती है, जो पूरे देश के राष्ट्रीय महत्व के विषयों को संभालती है।

3. इसके अलावा राज्य या प्रांतीय सरकारें होती हैं, जो अपने-अपने क्षेत्रों के दैनिक प्रशासन का कार्य करती हैं।

4. दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं।

5. यह व्यवस्था सत्ता के संतुलन और बेहतर प्रशासन में सहायक होती है।

उदाहरण :-
भारत में केंद्र सरकार राष्ट्रीय विषयों (जैसे रक्षा, विदेश नीति) को संभालती है, जबकि राज्य सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे स्थानीय विषयों का प्रबंधन करती हैं।

संघीय शासन व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं :-

संघीय शासन व्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. सत्ता केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारों के बीच बँटी होती है।

2. केंद्र सरकार राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर कानून बनाती है, जबकि राज्य सरकारें राज्य से जुड़े विषयों पर।

3. दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं।

4. इसमें दो या दो से अधिक स्तर की सरकारें होती हैं।

5. अलग-अलग स्तर की सरकारें एक ही नागरिक समूह पर शासन करती हैं।

6. सरकारों के अधिकार क्षेत्र संविधान में स्पष्ट रूप से निर्धारित होते हैं।

7. संविधान के मौलिक प्रावधानों में बदलाव दोनों स्तरों की सहमति से ही संभव होता है।

8. न्यायालय (अदालतें) संविधान और सरकारों के अधिकारों की व्याख्या करने का अधिकार रखती हैं।

9.  वित्तीय स्वायत्तता के लिए राजस्व के अलग-अलग स्रोत निर्धारित किए जाते हैं।

10. इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय विविधताओं का सम्मान करते हुए देश की एकता को बनाए रखना और बढ़ाना है।

 

उदाहरण :-
भारत में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच विषयों का बँटवारा (जैसे संघ सूची, राज्य सूची) संघीय शासन व्यवस्था की विशेषता को दर्शाता है।

संघवाद की बुराइयाँ क्या हैं :-

संघवाद की बुराइयाँ :- संघीय व्यवस्था में जहाँ कई लाभ होते हैं, वहीं कुछ कमियाँ (बुराइयाँ) भी देखने को मिलती हैं, जो संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं।

संघवाद की मुख्य बुराइयाँ निम्नलिखित हैं :-

1. केंद्रीय सरकार का अधिक शक्तिशाली होना, जिससे राज्यों की शक्ति कम हो सकती है।

2. संविधान संशोधन का अधिकार मुख्य रूप से केंद्र के पास होना, जिससे राज्यों की भागीदारी सीमित हो सकती है।

3. संसद को अधिक अधिकार प्राप्त होना, जिससे संतुलन बिगड़ सकता है।

4. धन संबंधी अधिकार (राजस्व) केंद्र के पास अधिक होना, जिससे राज्य सरकारें आर्थिक रूप से निर्भर हो जाती हैं।

5. केंद्र सरकार का राज्य सरकारों के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप, जिससे राज्यों की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।

उदाहरण :-

यदि केंद्र सरकार किसी राज्य के निर्णयों में बार-बार हस्तक्षेप करे, तो यह संघवाद की कमजोरी को दर्शाता है।

संघवाद के प्रकार कौन-कौन से हैं :-

संघवाद के प्रकार :- संघवाद मुख्यतः दो प्रकार का होता है, जो यह बताते हैं कि देश में संघ की रचना कैसे की गई है।

संघवाद के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं :- 

1. साथ आकर संघ बनाना (Coming Together Federation) :- इसमें दो या अधिक स्वतंत्र इकाइयाँ मिलकर एक बड़ा संघ बनाती हैं। सभी राज्यों को समान शक्ति और अधिकार प्राप्त होते हैं। इसमें केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन होता है।

उदाहरण :-

ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका

2. साथ लेकर संघ बनाना (Holding Together Federation) :- इसमें एक बड़ा देश अपनी विविधताओं को ध्यान में रखते हुए राज्यों का गठन करता है। इसमें केंद्रीय सरकार अधिक शक्तिशाली होती है। राज्यों की शक्तियाँ केंद्र की तुलना में कम होती हैं।

उदाहरण :-

भारत, जापान

एकात्मक और संघात्मक सरकारों के बीच क्या अंतर है :-

एकात्मक और संघात्मक सरकारों के बीच अंतर निम्नलिखित है :- 

 

आधार

एकात्मक शासन व्यवस्था

संघात्मक शासन व्यवस्था

1. शक्ति का स्वरूप

केंद्र सरकार अधिक शक्तिशाली होती है।

केंद्र सरकार अपेक्षाकृत कम शक्तिशाली होती है।

2. संविधान संशोधन

केवल केंद्र सरकार संशोधन कर सकती है।

केंद्र अकेले संशोधन नहीं कर सकता, राज्यों की भी सहमति आवश्यक होती है।

3. शक्तियों का वितरण

शक्तियाँ एक ही स्थान पर केंद्रित होती हैं।

शक्तियाँ कई स्तरों (केंद्र और राज्य) में विभाजित होती हैं।

4. नागरिकता

इसमें एक ही नागरिकता होती है।

कई संघीय देशों में दोहरी नागरिकता होती है।

5. सरकारों के अधिकार

केंद्र सरकार राज्यों से शक्तियाँ ले सकती है।

दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्र होती हैं।

भारत की संघीय व्यवस्था में बेल्जियम से मिलती-जुलती और अलग विशेषताएँ क्या हैं :-

भारत और बेल्जियम की संघीय व्यवस्था की तुलना निम्नलिखित है :- 

 

आधार

समान विशेषता

अलग विशेषता

शासन व्यवस्था

दोनों देशों में पूरे देश के लिए एक संघ (केंद्र) सरकार होती है।

बेल्जियम में केंद्र की कई शक्तियाँ क्षेत्रीय सरकारों को दी गई हैं, जबकि भारत में केंद्र सरकार कई मामलों में राज्यों पर नियंत्रण रखती है।

2.2 भारत में संघीय व्यवस्था कैसी है?

भारत में संघीय व्यवस्था कैसी है :-

भारत में संघीय व्यवस्था :- भारत में संघीय व्यवस्था एक ऐसी प्रणाली है जिसमें केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर शासन चलाती हैं। यह व्यवस्था देश की विविधता और एकता दोनों को बनाए रखने में सहायक है।

भारत की संघीय व्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. भारत को आजादी के समय विभाजन जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

2. आजादी के बाद कई स्वतंत्र रजवाड़ों का भारत में विलय किया गया।

3. यद्यपि संविधान में “संघ” शब्द का प्रयोग सीधे नहीं किया गया, फिर भी भारत का गठन संघीय सिद्धांतों पर आधारित है।

4. प्रारंभ में संविधान ने दो स्तरीय शासन व्यवस्था का प्रावधान किया था :- 1. केंद्र सरकार, 2. राज्य सरकारें

5. केंद्र सरकार पूरे देश का प्रतिनिधित्व करती है।

6. बाद में पंचायत और नगरपालिकाओं के रूप में तीसरा स्तर जोड़ा गया।

7. इस प्रकार भारत में अब तीन स्तरीय संघीय व्यवस्था (केंद्र, राज्य और स्थानीय) मौजूद है।

उदाहरण :-
भारत में केंद्र सरकार, राज्य सरकार और पंचायत/नगरपालिका मिलकर शासन चलाते हैं, जो संघीय व्यवस्था का उदाहरण है।

भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बँटवारा कैसे किया गया है :-

भारतीय संविधान में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट बँटवारा किया गया है, ताकि दोनों अपने-अपने कार्य सुचारु रूप से कर सकें। संविधान में विधायी (कानून बनाने की) शक्तियों को बाँटा गया है। 

इन शक्तियों को निम्नलिखित तीन सूचियों में विभाजित किया गया है :- 

1. संघ सूची (Union List) :- इसमें राष्ट्रीय महत्व के विषय होते हैं। इन पर केवल केंद्र सरकार कानून बनाती है।

2. राज्य सूची (State List) :- इसमें राज्य से संबंधित विषय होते हैं। इन पर केवल राज्य सरकार कानून बनाती है।

3. समवर्ती सूची (Concurrent List) :- इसमें ऐसे विषय होते हैं, जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।

संघ सूची क्या है :-

संघ सूची :- संघ सूची में वे विषय शामिल होते हैं जो राष्ट्रीय महत्व के होते हैं, और जिन पर पूरे देश के लिए एक समान नीति बनाना आवश्यक होता है।

संघ सूची की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. इसमें राष्ट्रीय महत्व के विषय शामिल होते हैं। जैसे :- रक्षा, विदेशी मामले, बैंकिंग, संचार और मुद्रा आदि।

2. इन विषयों पर पूरे देश के लिए एक समान नीति की आवश्यकता होती है। इसलिए इन विषयों को संघ सूची में रखा गया है।

3. संघ सूची के विषयों पर केवल केंद्र सरकार को कानून बनाने का अधिकार होता है।

4. पहले संघ सूची में 97 विषय थे, जो अब बढ़कर लगभग 100 विषय हो गए हैं।

उदाहरण :- रक्षा और विदेश नीति जैसे विषयों पर सिर्फ केंद्र सरकार ही निर्णय लेती है, इसलिए ये संघ सूची में शामिल हैं।

राज्य सूची क्या है :-

राज्य सूची :- राज्य सूची में वे विषय शामिल होते हैं जो प्रांतीय और स्थानीय महत्व के होते हैं, और जिनका प्रबंधन राज्य स्तर पर करना अधिक उचित होता है।

राज्य सूची की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. इसमें प्रांतीय और स्थानीय महत्व के विषय शामिल होते हैं। जैसे :- पुलिस, व्यापार, वाणिज्य, कृषि और सिंचाई आदि।

2. इन विषयों पर केवल राज्य सरकार को कानून बनाने का अधिकार होता है।

3. इनका संचालन राज्य स्तर पर करना अधिक प्रभावी होता है।

4. पहले राज्य सूची में 66 विषय थे, जो अब घटकर लगभग 61 विषय रह गए हैं।

उदाहरण :-
किसी राज्य में कृषि या पुलिस व्यवस्था से जुड़े नियम राज्य सरकार द्वारा बनाए जाते हैं, इसलिए ये विषय राज्य सूची में आते हैं।

समवर्ती सूची क्या है :-

समवर्ती सूची :- समवर्ती सूची में वे विषय शामिल होते हैं जिनमें केंद्र और राज्य दोनों की समान रुचि होती है, इसलिए इन पर दोनों स्तर की सरकारें कानून बना सकती हैं।

समवर्ती सूची की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. इसमें ऐसे विषय होते हैं जिनमें केंद्र और राज्य दोनों की साझी दिलचस्पी होती है। जैसे :-  शिक्षा, वन, मजदूर संघ, विवाह, गोद लेना और उत्तराधिकार आदि।

2. इन विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों को कानून बनाने का अधिकार होता है।

3. यदि दोनों के कानूनों में टकराव होता है, तो केंद्र सरकार का कानून मान्य होता है।

4. पहले इसमें 47 विषय थे, जो अब बढ़कर लगभग 52 विषय हो गए हैं।

उदाहरण :-
शिक्षा के क्षेत्र में केंद्र और राज्य दोनों नीतियाँ बना सकते हैं, लेकिन विवाद की स्थिति में केंद्र का निर्णय प्रभावी होता है।

अवशिष्ट शक्तियाँ क्या हैं :-

अवशिष्ट शक्तियाँ :- अवशिष्ट शक्तियाँ वे होती हैं जिनमें ऐसे विषय शामिल होते हैं जो संघ, राज्य और समवर्ती सूची में नहीं आते, और इन पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार को होता है।

अवशिष्ट शक्तियों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. इसमें वे विषय आते हैं जो तीनों सूचियों में शामिल नहीं होते।

2. इन विषयों पर केवल केंद्र सरकार को कानून बनाने का अधिकार होता है।

3. ये विषय अक्सर नए या उभरते हुए क्षेत्रों से संबंधित होते हैं।

4. इससे शासन में स्पष्टता और सुविधा बनी रहती है।

उदाहरण :-

इंटरनेट या साइबर कानून जैसे नए विषय, जो पहले सूचियों में नहीं थे, अवशिष्ट शक्तियों के अंतर्गत आते हैं।

2.3 संघीय व्यवस्था कैसे चलती है?

संघीय व्यवस्था कैसे चलती है :-

भारत में संघीय व्यवस्था भाषायी राज्यों के गठन, भाषा नीति और केंद्र-राज्य संबंधों के माध्यम से सुचारु रूप से संचालित होती है।

2.3.1 भाषायी राज्य क्या हैं?

भाषायी राज्य क्या हैं और उनका महत्व क्या है :-

भाषायी राज्य :- भाषायी राज्य वे होते हैं जिनका गठन भाषा के आधार पर किया जाता है, ताकि लोगों को अपनी भाषा में प्रशासन और सुविधाएँ मिल सकें।

भाषायी राज्यों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. भारत में भाषा के आधार पर राज्यों का गठन एक महत्वपूर्ण और कठिन परीक्षा थी।

2. नए राज्यों के निर्माण के लिए पुराने राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन किया गया।

3. शुरुआत में नेताओं को डर था कि इससे देश के टूटने का खतरा हो सकता है।

4. इसलिए केंद्र सरकार ने कुछ समय के लिए राज्यों के पुनर्गठन को टाल दिया।

5. लेकिन बाद में यह साबित हुआ कि इससे देश और अधिक मजबूत और एकीकृत हुआ।

6. इससे प्रशासन पहले की अपेक्षा अधिक सरल और प्रभावी बन गया।

7. कुछ राज्यों का गठन केवल भाषा के आधार पर नहीं, बल्कि संस्कृति, भूगोल और नृजातीय विविधता को ध्यान में रखकर भी किया गया।

उदाहरण :-

भारत में आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों का गठन भाषा के आधार पर किया गया, जिससे प्रशासन अधिक सुविधाजनक हुआ।

2.3.2 भाषा-नीति क्या है?

भारत की भाषा नीति क्या है :-

भारत की भाषा नीति :- भारत में भाषा नीति ऐसी बनाई गई है जिसमें देश की भाषाई विविधता का सम्मान करते हुए सभी भाषाओं को महत्व दिया गया है।

भारत की भाषा नीति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. भारत के संघीय ढाँचे की दूसरी महत्वपूर्ण परीक्षा भाषा नीति को लेकर हुई।

2. भारत में किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया।

3. हिंदी सहित 22 भाषाओं को अनुसूचित भाषा का दर्जा दिया गया है।

4. अंग्रेजी को राजकीय भाषा के रूप में मान्यता दी गई, विशेषकर गैर-हिंदी भाषी राज्यों को ध्यान में रखते हुए।

5. सभी राज्यों की मुख्य भाषाओं का विशेष ध्यान और सम्मान किया गया है।

6. हिंदी को राजभाषा माना गया, लेकिन यह सभी की मातृभाषा नहीं है, इसलिए अन्य भाषाओं का भी संरक्षण किया गया।

7. केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए उम्मीदवार किसी भी मान्यता प्राप्त भाषा में परीक्षा दे सकते हैं।

उदाहरण :-

 

भारत में विभिन्न भाषाओं को संविधान में मान्यता देना और सभी को समान महत्व देना भाषा नीति का प्रमुख उदाहरण है।

2.3.3 केंद्र-राज्य संबंध कैसे कार्य करते हैं?

भारत में केंद्र-राज्य संबंध कैसे रहे हैं :-

केंद्र-राज्य संबंध :- भारत में केंद्र और राज्य सरकारों के संबंध इस बात पर निर्भर करते हैं कि शासन करने वाले दल और नेता संघीय व्यवस्था का पालन कैसे करते हैं। समय के साथ इन संबंधों में कई बदलाव आए हैं।

केंद्र-राज्य संबंध की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. सत्ता की साझेदारी का वास्तविक रूप शासक दलों के व्यवहार पर निर्भर करता है।

2. शुरूआती समय में केंद्र और अधिकांश राज्यों में एक ही पार्टी की सरकार थी।

3. इससे राज्य सरकारें पूरी तरह स्वतंत्र रूप से अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाईं।

4. जब केंद्र और राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें बनीं, तो कई बार केंद्र ने राज्यों के अधिकारों की अनदेखी की।

5. केंद्र सरकार ने कई बार संवैधानिक प्रावधानों का दुरुपयोग करके राज्य सरकारों को भंग किया, जो संघवाद के विरुद्ध था।

6. 1990 के बाद स्थिति में सुधार हुआ और कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ।

7. इस समय से केंद्र में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ।

8. इससे सत्ता की साझेदारी और राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान बढ़ा।

9. सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों ने भी केंद्र द्वारा राज्यों को मनमाने तरीके से भंग करने पर रोक लगाई।

10. आज संघीय व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक मजबूत और प्रभावी हो गई है।

उदाहरण :-

भारत में गठबंधन सरकारों का बनना और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ना केंद्र-राज्य संबंधों में सुधार का उदाहरण है।

गठबंधन सरकार क्या होती है :-

गठबंधन सरकार :- जब एक से अधिक राजनीतिक दल मिलकर सरकार बनाते हैं, तो उसे गठबंधन सरकार कहा जाता है।

गठबंधन सरकार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. इसमें दो या अधिक राजनीतिक दल शामिल होते हैं।

2. ये दल मिलकर सरकार का गठन करते हैं।

3. यह स्थिति तब बनती है जब किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता।

4. सभी दल मिलकर नीतियाँ और निर्णय लेते हैं।

5. इसमें सत्ता की साझेदारी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

उदाहरण :-
भारत में कई बार केंद्र में अलग-अलग दलों के मिलकर सरकार बनाने की स्थिति गठबंधन सरकार का उदाहरण है।

अनुसूचित भाषाएँ क्या होती हैं :-

अनुसूचित भाषाएँ :- वे भाषाएँ जो भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल की गई हैं, उन्हें अनुसूचित भाषाएँ कहा जाता है।

अनुसूचित भाषाओं की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. ये भाषाएँ संविधान की आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध होती हैं।

2. वर्तमान में कुल 22 भाषाएँ इसमें शामिल हैं।

3. इन भाषाओं को सरकारी मान्यता और संरक्षण प्राप्त होता है।

4. इनका उपयोग सरकारी कार्यों और प्रतियोगी परीक्षाओं में किया जा सकता है।

5. इन भाषाओं के विकास के लिए सरकार विशेष प्रयास करती है।

उदाहरण :-

हिंदी, तमिल, तेलुगु, बंगाली आदि भाषाएँ अनुसूचित भाषाओं के उदाहरण हैं।

भाषाई राज्य क्यों बनाए गए :-

भाषाई राज्य :- भारत में भाषाई राज्यों का गठन इसलिए किया गया ताकि लोग अपनी भाषा में प्रशासन और शासन से जुड़ सकें तथा देश में एकता बनी रहे।

भाषाई राज्यों के बनने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :-

1. प्रत्येक राज्य की अपनी राजभाषा होती है, और अधिकांश काम उसी भाषा में किया जाता है।

2. संविधान के अनुसार अंग्रेजी का प्रयोग 1965 के बाद समाप्त होना था, लेकिन गैर-हिंदी भाषी राज्यों ने इसका विरोध किया।

3. विशेष रूप से तमिलनाडु में इस मुद्दे पर उग्र आंदोलन हुआ।

4. केंद्र सरकार ने समाधान के रूप में हिंदी के साथ अंग्रेजी के प्रयोग को भी जारी रखा।

5. कुछ लोगों का मानना था कि इससे अंग्रेजी जानने वाले लोगों को अधिक लाभ मिलेगा।

6. सरकार की नीति हिंदी को प्रोत्साहित करने की रही, लेकिन इसे अन्य राज्यों पर थोपा नहीं गया।

7. इस लचीले दृष्टिकोण के कारण भारत भाषाई विवादों से बचा और एकता बनी रही।

उदाहरण :-
भारत में अंग्रेजी और हिंदी दोनों का उपयोग सरकारी कार्यों में करना भाषाई विवाद को सुलझाने का एक अच्छा उदाहरण है।

भारत में भाषायी विविधता क्या है :-

भारत में भाषायी विविधता :- भारत एक ऐसा देश है जहाँ बहुत अधिक भाषाएँ बोली जाती हैं, इसलिए इसे भाषायी विविधता वाला देश कहा जाता है।

मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. 1991 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 1500 भाषाएँ बोली जाती हैं।

2. इन भाषाओं को कुछ मुख्य भाषा समूहों में बाँटा गया है।

3. जैसे — भोजपुरी, मगही, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, भीली आदि को हिंदी समूह में रखा गया है।

4. भाषा समूह बनाने के बाद भी भारत में लगभग 114 प्रमुख भाषाएँ पाई जाती हैं।

5. इनमें से 22 भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिया गया है, जिन्हें अनुसूचित भाषाएँ कहा जाता है।

6. अन्य भाषाओं को अ- अनुसूचित भाषाएँ कहा जाता है।

7. इस विविधता के कारण भारत दुनिया के सबसे भाषायी विविध देशों में से एक है।

उदाहरण :-

भारत में हिंदी, तमिल, तेलुगु, बंगाली जैसी कई भाषाओं का एक साथ प्रयोग होना भाषायी विविधता का उदाहरण है।

2.4 भारत में विकेंद्रीकरण क्या है?

भारत में विकेंद्रीकरण क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी :-

भारत में विकेंद्रीकरण :- विकेंद्रीकरण का अर्थ है सत्ता को निचले स्तर तक बाँटना, ताकि स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर ही किया जा सके।

विकेंद्रीकरण की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. भारत एक बहुत विशाल और विविधता वाला देश है, इसलिए केवल दो स्तर की सरकार पर्याप्त नहीं थी।

2. कई राज्य आकार और जनसंख्या में बहुत बड़े हैं, जिससे प्रशासन कठिन हो जाता है।

3. अलग-अलग क्षेत्रों में भाषा, खानपान और संस्कृति में विविधता पाई जाती है।

4. कई समस्याएँ ऐसी होती हैं जिनका समाधान स्थानीय स्तर पर ही बेहतर तरीके से किया जा सकता है।

5. स्थानीय सरकार के माध्यम से लोगों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित होती है।

6. इसलिए भारत में सरकार के तीसरे स्तर (स्थानीय स्वशासन) की आवश्यकता महसूस हुई।

उदाहरण :-

भारत में ग्राम पंचायत और नगरपालिकाएँ स्थानीय स्तर पर समस्याओं का समाधान करती हैं, जो विकेंद्रीकरण का उदाहरण है।

पंचायती राज क्या है :-

पंचायती राज :- पंचायती राज वह व्यवस्था है जिसमें गांव के स्तर पर स्थानीय शासन चलाया जाता है।

पंचायती राज की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. यह ग्राम स्तर पर स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था है।

2. इसके माध्यम से गांव के लोग अपने क्षेत्र का शासन स्वयं चलाते हैं।

3. दिसंबर 1992 में 73वां और 74वां संविधान संशोधन पारित किया गया।

4. इन संशोधनों के द्वारा स्थानीय स्वशासन निकायों को संवैधानिक दर्जा दिया गया।

5. इससे भारत में पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत बनाया गया।

उदाहरण :-

 

ग्राम पंचायत द्वारा गांव के विकास कार्य (जैसे सड़क, पानी, सफाई) करना पंचायती राज का उदाहरण है।

1992 के पंचायती राज व्यवस्था के प्रमुख प्रावधान क्या हैं :-

1992 के पंचायती राज के प्रमुख प्रावधान :- 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के बाद स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए।

मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं :-

1.  स्थानीय स्वशासी निकायों के नियमित चुनाव कराना अनिवार्य कर दिया गया।

2. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ी जातियों के लिए सीटों का आरक्षण किया गया।

3. कम से कम एक-तिहाई (1/3) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं।

4. प्रत्येक राज्य में चुनाव कराने के लिए राज्य चुनाव आयोग नामक स्वतंत्र संस्था बनाई गई।

5. राज्य सरकारों को अपने राजस्व और अधिकारों का कुछ हिस्सा स्थानीय निकायों को देना अनिवार्य किया गया।

उदाहरण :-

ग्राम पंचायत के चुनाव में महिलाओं और अनुसूचित वर्गों के लिए आरक्षित सीटें होना इन प्रावधानों का उदाहरण है।

ग्राम पंचायत क्या है :-

ग्राम पंचायत :- ग्राम पंचायत गांव के स्तर पर स्थानीय स्वशासन की एक महत्वपूर्ण इकाई होती है, जो गांव के प्रशासन और विकास कार्यों को संभालती है।

ग्राम पंचायत की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. प्रत्येक गांव या गांवों के समूह की एक पंचायत होती है।

2. इसमें कई सदस्य (पंच) होते हैं जो जनता द्वारा चुने जाते हैं।

3. पंचायत का एक अध्यक्ष होता है।

4. इस अध्यक्ष को सरपंच या प्रधान कहा जाता है।

5. यह संस्था गांव के विकास और प्रशासन से जुड़े कार्यों को संचालित करती है।

उदाहरण :-
ग्राम पंचायत द्वारा गांव में सड़क, पानी और सफाई के कार्य कराना इसका उदाहरण है।

पंचायत समिति क्या है :-

पंचायत समिति :- पंचायत समिति एक मध्य स्तर की स्थानीय स्वशासन इकाई होती है, जो कई ग्राम पंचायतों को मिलाकर बनाई जाती है।

पंचायत समिति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. कई ग्राम पंचायतें मिलकर पंचायत समिति का गठन करती हैं।

2. इसे मंडल समिति या ब्लॉक स्तर की पंचायत भी कहा जाता है।

3. यह ग्राम पंचायत और जिला परिषद के बीच का स्तर होता है।

4. इसके सदस्यों का चुनाव उस क्षेत्र के पंचायत सदस्य करते हैं।

5. यह समिति क्षेत्र के विकास कार्यों का समन्वय और संचालन करती है।

उदाहरण :-
किसी ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली कई ग्राम पंचायतों के कार्यों को समन्वित करने वाली संस्था पंचायत समिति होती है।

पंचायतों की मुख्य परेशानियाँ क्या हैं :-

पंचायतों की मुख्य परेशानियाँ :- पंचायती राज व्यवस्था के बावजूद कई समस्याएँ और चुनौतियाँ सामने आती हैं, जो इसके प्रभावी कार्य को प्रभावित करती हैं।

पंचायतों की मुख्य परेशानियाँ निम्नलिखित हैं :-

1. जागरूकता का अभाव — लोगों में अपने अधिकारों और कर्तव्यों की जानकारी कम होती है।

2. धन का अभाव — विकास कार्यों के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं मिलते।

3. अधिकारियों की मनमानी — कई बार अधिकारी नियमों का सही पालन नहीं करते।

4. जन सहभागिता में कमी — लोग पंचायत के कार्यों में सक्रिय भाग नहीं लेते।

5. समय पर वित्तीय सहायता का अभाव — केंद्र और राज्य सरकार से धन समय पर नहीं मिलता।

6. चुनाव नियमित रूप से नहीं होते — इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित होती है।

उदाहरण :-
यदि किसी ग्राम पंचायत को विकास कार्यों के लिए समय पर धन नहीं मिलता, तो सड़क या पानी जैसी सुविधाएँ समय पर पूरी नहीं हो पातीं।

जिला परिषद क्या है :-

जिला परिषद :- जिला परिषद जिला स्तर पर स्थानीय स्वशासन की सर्वोच्च इकाई होती है, जो पूरे जिले के विकास कार्यों का संचालन करती है।

जिला परिषद की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. जिले की सभी पंचायत समितियों को मिलाकर जिला परिषद का गठन होता है।

2. इसके अधिकांश सदस्यों का चुनाव किया जाता है।

3. इसमें जिले के लोकसभा और विधानसभा के चुने हुए सांसद और विधायक भी सदस्य होते हैं।

4. इसके साथ ही जिला स्तर के कुछ अधिकारी भी इसमें शामिल होते हैं।

5. जिला परिषद का एक प्रमुख (अध्यक्ष) होता है, जो इसका राजनीतिक प्रधान होता है।

6. यह संस्था पूरे जिले के विकास कार्यों का समन्वय और नियंत्रण करती है।

 

उदाहरण :-
जिला परिषद द्वारा पूरे जिले में सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य योजनाओं का संचालन करना इसका उदाहरण है।

नगर निगम क्या है :-

नगर निगम :- नगर निगम बड़े शहरों में स्थानीय स्वशासन की संस्था होती है, जो शहर के प्रशासन और विकास कार्यों को संभालती है।

नगर निगम की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

1. शहरों में भी स्थानीय शासन की व्यवस्था होती है।

2. छोटे शहरों में नगरपालिका तथा बड़े शहरों में नगर निगम होता है।

3. दोनों संस्थाओं का संचालन निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है।

4. नगरपालिका का प्रमुख उसका राजनीतिक प्रधान होता है।

5. नगर निगम के प्रमुख को मेयर कहा जाता है।

6. यह संस्था शहर के विकास, सफाई, पानी और अन्य सुविधाओं का ध्यान रखती है।

उदाहरण :-
किसी बड़े शहर में सड़क निर्माण, सफाई और जल आपूर्ति का कार्य नगर निगम द्वारा किया जाता है।

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