CLASS 10 POLITICAL SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 1
सत्ता की साझेदारी (Power Sharing)
| Textbook | NCERT |
|---|---|
| Class | Class 10 |
| Subject | Political Science (Civics) |
| Chapter | Chapter 1 |
| Chapter Name | सत्ता की साझेदारी |
| Medium | Hindi |
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
1.1 बेल्जियम और श्रीलंका की स्थिति
सत्ता की साझेदारी:-
जब किसी शासन व्यवस्था में सभी सामाजिक समूहों और समुदायों को सरकार में भाग लेने का अवसर मिलता है, तो उसे सत्ता की साझेदारी कहा जाता है। यह लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
- यह लोकतंत्र का मुख्य सिद्धांत माना जाता है।
- इसमें सभी सामाजिक समूहों और समुदायों को शासन में भाग लेने का अवसर मिलता है।
- लोकतांत्रिक सरकार में हर नागरिक का शासन में हिस्सा होता है।
- यह हिस्सा भागीदारी और प्रतिनिधित्व के माध्यम से संभव होता है।
- इस व्यवस्था में नागरिकों को शासन से जुड़े निर्णयों पर अपनी राय देने का अधिकार होता है।
1.2 श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद
बहुसंख्यकवाद:-
बहुसंख्यकवाद वह धारणा है जिसमें बहुसंख्यक समुदाय यह मानता है कि वह अपनी इच्छा के अनुसार देश का शासन चला सकता है, और इसके लिए अल्पसंख्यक समुदाय की आवश्यकताओं या इच्छाओं की अनदेखी की जा सकती है।
1956 के कानून के द्वारा उठाए गए मुख्य कदम निम्नलिखित हैं:
- 1956 में एक कानून पारित किया गया, जिसका उद्देश्य सिंहली समुदाय की सर्वोच्चता स्थापित करना था।
- नए संविधान में यह प्रावधान किया गया कि सरकार बौद्ध धर्म को संरक्षण और बढ़ावा देगी।
- विश्वविद्यालयों और सरकारी नौकरियों में सिंहलियों को प्राथमिकता दी गई।
- सिंहली भाषा को देश की एकमात्र राजभाषा घोषित कर दिया गया।
- इन निर्णयों के कारण तमिल समुदाय की उपेक्षा हुई और उनके बीच असंतोष बढ़ गया।
श्रीलंका के समाज की जातीय बनावट:-
श्रीलंका एक द्वीपीय देश है जहाँ विभिन्न जातीय और भाषाई समूहों के लोग रहते हैं, जिसके कारण वहाँ का समाज विविधता से भरा हुआ है।
- श्रीलंका भारत के दक्षिण तट के पास स्थित एक द्वीपीय देश है।
- इसकी कुल जनसंख्या लगभग दो करोड़ के आसपास है, जो लगभग हरियाणा राज्य के बराबर मानी जाती है।
- देश की लगभग 74% आबादी सिंहली (Sinhala) समुदाय की है।
- लगभग 18% लोग तमिल समुदाय से संबंधित हैं।
- शेष जनसंख्या में अन्य छोटे जातीय समूह, जैसे मुसलमान और ईसाई शामिल हैं।
श्रीलंका में टकराव:-
श्रीलंका में विभिन्न जातीय समुदायों के बीच मतभेद के कारण राजनीतिक और सामाजिक तनाव बढ़ गया, जिससे देश में लंबे समय तक संघर्ष की स्थिति बनी रही।
- श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी क्षेत्र में तमिल समुदाय की संख्या अधिक है।
- देश के अधिकांश अन्य भागों में सिंहली समुदाय बहुसंख्यक है।
- यदि सभी समुदाय मिलकर समाधान खोजते, तो स्थिति बेल्जियम की तरह शांतिपूर्ण हो सकती थी।
- लेकिन सिंहली बहुसंख्यक समुदाय ने अपने प्रभुत्व को अन्य समुदायों पर लागू करने का प्रयास किया।
- इसके कारण सिंहली और तमिल समुदायों के बीच तनाव और संघर्ष बढ़ गया, जो आगे चलकर गृहयुद्ध (Civil War) का कारण बना।
1.3 बेल्जियम ने समझदारी से समस्या का समाधान कैसे किया
बेल्जियम की समझदारी:-
बेल्जियम में अलग-अलग भाषा और संस्कृति वाले समुदाय रहते थे, जिसके कारण कई बार उनके बीच राजनीतिक और सांस्कृतिक तनाव उत्पन्न हो गया। लेकिन बेल्जियम के लोगों ने समझदारी दिखाते हुए ऐसी शासन व्यवस्था अपनाई, जिससे सभी समुदायों को समान अधिकार मिल सके।
- भाषाई विविधता के कारण वहाँ सांस्कृतिक और राजनीतिक विवाद उत्पन्न होने लगे थे।
- 1950–1960 के दशक में फ्रेंच और डच भाषी समुदायों के बीच तनाव बढ़ गया।
- डच भाषी लोग देश में बहुसंख्यक थे, लेकिन राजधानी ब्रसेल्स में अल्पसंख्यक थे।
- इन समस्याओं को दूर करने के लिए बेल्जियम ने नई प्रकार की शासन व्यवस्था अपनाई।
- 1970 से 1993 के बीच संविधान में चार संशोधन किए गए।
- इन संशोधनों का उद्देश्य यह था कि किसी भी समुदाय को अलगाव या बेगानेपन का अनुभव न हो।
- इस व्यवस्था से सभी लोग मिल-जुलकर रहने लगे और देश में शांति बनी रही।
बेल्जियम के समाज की जातीय बनावट:-
बेल्जियम यूरोप का एक छोटा देश है, लेकिन इसके समाज की संरचना काफी जटिल है क्योंकि यहाँ अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले लोग रहते हैं।
- बेल्जियम यूरोप का एक छोटा देश है।
- इसकी जनसंख्या भारत के हरियाणा राज्य से भी लगभग आधी है।
- यहाँ की लगभग 59% आबादी डच भाषा बोलती है।
- लगभग 40% लोग फ्रेंच भाषा बोलते हैं।
- लगभग 1% लोग जर्मन भाषा बोलते हैं।
- बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में लगभग 80% लोग फ्रेंच भाषा बोलते हैं, वहीं 20% लोग डच भाषा बोलते हैं।
- यहाँ फ्रेंच भाषी अल्पसंख्यक लोग आर्थिक और राजनीतिक रूप से अधिक शक्तिशाली रहे हैं।
बेल्जियम में टकराव को रोकने के उपाय:-
बेल्जियम में विभिन्न भाषाई समुदायों के बीच मतभेद को कम करने और शांति बनाए रखने के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए।
- केंद्र सरकार में डच और फ्रेंच भाषी मंत्रियों की संख्या समान रखी गई।
- केंद्र सरकार की कई शक्तियाँ देश के दो क्षेत्रों की क्षेत्रीय सरकारों को दे दी गईं।
- ब्रसेल्स में अलग क्षेत्रीय सरकार बनाई गई, जिसमें दोनों भाषाई समुदायों को समान प्रतिनिधित्व दिया गया।
- सामुदायिक सरकार (Community Government) का निर्माण किया गया, जिसका चुनाव उसी भाषा समुदाय के लोग करते हैं।
- इस सरकार को सांस्कृतिक, शैक्षिक और भाषा से जुड़े मामलों की शक्तियाँ दी गई हैं।
गृहयुद्ध:-
जब किसी देश में सरकार और सरकार-विरोधी समूहों के बीच हिंसक संघर्ष इतना बढ़ जाए कि वह युद्ध जैसा रूप ले ले, तो उसे गृहयुद्ध कहा जाता है।
- यह संघर्ष एक ही देश के भीतर होता है।
- इसमें सरकार और विरोधी समूहों के बीच हिंसक लड़ाई होती है।
- जब यह संघर्ष बहुत अधिक बढ़ जाता है, तो वह युद्ध जैसा रूप ले लेता है।
- इससे देश में अशांति, जान-माल की हानि और विकास में बाधा उत्पन्न होती है।
1.4 सत्ता की साझेदारी क्यों जरूरी है?
सत्ता की साझेदारी का महत्व:-
सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र में बहुत महत्वपूर्ण होती है। यह समाज में समान भागीदारी, शांति और स्थिरत्व बनाए रखने में मदद करती है। इसके समर्थन में दो प्रकार के तर्क दिए जाते हैं।
- विवेकपरक तर्क (हानि या लाभ के परिणामों पर आधारित):- इससे विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच टकराव की संभावना कम हो जाती है और यह राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता के लिए लाभदायक होती है।
- नैतिक तर्क (नैतिकता और मूल्यों पर आधारित):- सत्ता की साझेदारी को लोकतंत्र की आत्मा माना जाता है। इसमें लोगों की भागीदारी आवश्यक होती है और नागरिकों का यह अधिकार होता है कि शासन के तरीके के बारे में उनसे सलाह ली जाए।
सत्ता की साझेदारी की आवश्यकता:-
लोकतंत्र में समाज में शांति, सौहार्द और समान भागीदारी बनाए रखने के लिए सत्ता की साझेदारी आवश्यक होती है।
- समाज में सौहार्द और शांति बनाए रखने के लिए सत्ता की साझेदारी आवश्यक है।
- इससे विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच टकराव कम करने में सहायता मिलती है।
- किसी भी समाज में बहुसंख्यक के आतंक का खतरा बना रहता है, जो अल्पसंख्यक समूह को नुकसान पहुँचा सकता है।
- सत्ता की साझेदारी के माध्यम से बहुसंख्यक के आतंक को रोका जा सकता है।
- लोकतांत्रिक सरकार की नींव लोगों की आवाज और भागीदारी पर आधारित होती है।
भारत में सत्ता की साझेदारी:-
भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है, जिसमें नागरिकों को शासन में भाग लेने का अधिकार प्राप्त है। लोग मताधिकार के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं, और यही प्रतिनिधि सरकार बनाकर देश का शासन चलाते हैं।
- भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था लागू है।
- यहाँ के नागरिक प्रत्यक्ष मताधिकार के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं।
- चुने हुए प्रतिनिधि मिलकर सरकार का गठन करते हैं।
- सरकार देश का दैनिक प्रशासन चलाती है तथा नए कानून बनाती है या पुराने कानूनों में संशोधन करती है।
- लोग स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के माध्यम से भी शासन में भाग लेते हैं।
- एक सच्चे लोकतंत्र में समाज के सभी वर्गों और विचारों को सम्मान दिया जाता है।
1.5 सत्ता की साझेदारी के विभिन्न रूप
सत्ता की साझेदारी के विभिन्न रूप:-
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता को विभिन्न स्तरों, संस्थाओं तथा सामाजिक समूहों के बीच बाँटा जाता है, जिससे शासन में सभी की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
- सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Distribution):- इसमें सरकार के अलग-अलग स्तरों के बीच सत्ता का बँटवारा किया जाता है। यह व्यवस्था संघीय शासन प्रणाली की विशेषता होती है। इसके अंतर्गत तीन स्तर होते हैं — केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार तथा स्थानीय निकाय (पंचायत और नगरपालिकाएँ)।
- सत्ता का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution):- इसमें सरकार के विभिन्न अंगों — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता का विभाजन किया जाता है, जिससे किसी एक संस्था के हाथ में अत्यधिक शक्ति नहीं जाती।
- सामाजिक समूहों के बीच सत्ता का वितरण:- इसमें भाषायी, धार्मिक या सांस्कृतिक समुदायों को शासन में भागीदारी दी जाती है, जिससे समाज में समानता और संतुलन बना रहता है।
- राजनीतिक दलों और दबाव समूहों के बीच सत्ता का वितरण:- लोकतंत्र में राजनीतिक दल, दबाव समूह और संगठन भी नीतियों और निर्णयों को प्रभावित करते हैं, जिससे सत्ता केवल सरकार तक सीमित नहीं रहती बल्कि समाज के विभिन्न समूहों तक फैलती है।
सत्ता का क्षैतिज वितरण:-
क्षैतिज वितरण वह व्यवस्था है जिसमें सरकार के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का बँटवारा किया जाता है, ताकि कोई भी संस्था अत्यधिक शक्तिशाली न हो सके और सभी एक-दूसरे पर नियंत्रण बनाए रखें।
- विधायिका (Legislature):- इसका मुख्य कार्य कानून बनाना होता है। भारत में इसके प्रमुख अंग हैं — लोकसभा, राज्यसभा तथा राष्ट्रपति।
- कार्यपालिका (Executive):- इसका मुख्य कार्य कानूनों का क्रियान्वयन और प्रशासन चलाना होता है। इसके प्रमुख भाग हैं — प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद तथा नौकरशाही (प्रशासनिक अधिकारी)।
- न्यायपालिका (Judiciary):- इसका मुख्य कार्य कानूनों की व्याख्या करना और न्याय प्रदान करना होता है। इसके अंतर्गत आते हैं — सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय तथा जिला और सत्र न्यायालय।
सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण:-
ऊर्ध्वाधर वितरण वह व्यवस्था है जिसमें सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच सत्ता का बँटवारा किया जाता है, ताकि देश के अलग-अलग स्तरों पर प्रशासन सुचारु रूप से चल सके।
- केंद्रीय सरकार:- यह पूरे देश के स्तर पर शासन करती है।
- राज्य / प्रांतीय सरकार:- यह राज्यों के स्तर पर प्रशासन का कार्य करती है।
- स्थानीय स्वशासन:- यह स्थानीय स्तर पर शासन और विकास कार्यों को संचालित करता है। इसके प्रमुख अंग हैं — ग्राम पंचायत, ब्लॉक समिति तथा जिला परिषद।
सत्ता के ऊर्ध्वाधर वितरण और क्षैतिज वितरण में अंतर
| आधार | ऊर्ध्वाधर वितरण | क्षैतिज वितरण |
|---|---|---|
| अर्थ | सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच सत्ता का बँटवारा होता है | सरकार के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का बँटवारा होता है |
| स्तर | केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकार जैसे अलग-अलग स्तर | विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे अंग |
| संरचना | उच्चतर और निम्नतर स्तर की सरकारें होती हैं | सभी अंग एक ही स्तर पर कार्य करते हैं |
| संबंध | निम्न स्तर की सरकारें उच्च स्तर के अधीन कार्य करती हैं | प्रत्येक अंग एक-दूसरे पर नियंत्रण और संतुलन बनाए रखते हैं |