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CLASS 10 HISTORY NOTES IN HINDI CHAPTER - 5

मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया / Print Culture and the Modern World

TextbookNCERT
ClassClass 10
SubjectHistory
ChapterChapter 5
Chapter Nameमुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया
MediumHindi

5.1 शुरुआती छपी किताबें

छपाई तकनीक की शुरुआत:-

ब्लॉक प्रिंटिंग तकनीक सबसे पहले चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई।

  1. चीन में 594 ईस्वी से लकड़ी के ब्लॉक पर स्याही लगाकर काग़ज़ पर छपाई की जाती थी।
  2. उस समय का काग़ज़ पतला और छिद्रदार होता था, इसलिए दोनों तरफ छपाई संभव नहीं थी।
  3. काग़ज़ के दोनों किनारों को सिलकर, बाकी हिस्से को मोड़कर 'एकॉर्डियन' शैली की किताब बनाई जाती थी।

प्रारंभिक छपाई का उद्देश्य:-

शुरुआती दौर में छपाई मुख्यतः शैक्षिक और प्रशासनिक ज़रूरतों के लिए होती थी।

  1. मुख्य रूप से पाठ्यपुस्तकें छपती थीं, जो सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए थीं।
  2. चीन का राजतंत्र लंबे समय तक छपे हुए सामान का सबसे बड़ा उत्पादक रहा।
नोट:- 16वीं सदी में सिविल सेवा परीक्षा में उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने से किताबों की छपाई की गति भी बढ़ गई।

17वीं सदी में छपाई का विस्तार:-

17वीं सदी तक चीन में छपाई का उपयोग विद्वानों तक सीमित न रहकर व्यक्तिगत और व्यावसायिक कार्यों में भी होने लगा।

  1. व्यापारी रोज़मर्रा के व्यापार से जुड़े आंकड़े और रिकॉर्ड रखने के लिए छपाई का इस्तेमाल करने लगे।
  2. कहानी, कविता, जीवनी और आत्मकथाएँ भी छपने लगीं, जिन्हें पढ़ने के शौकीन लोग पढ़ते थे।
  3. खाली समय में पढ़ना फैशन बन गया; रईस महिलाओं में भी अपनी रचनाएँ छपवाने का शौक बढ़ा।

5.1.1 जापान में मुद्रण का विकास

जापान में छपाई का आगमन:-

जापान में बौद्ध धर्म के प्रचारकों के ज़रिए छपाई तकनीक पहुँची और प्रारंभिक छपी किताबें बौद्ध विषयों पर आधारित थीं।

  1. ब्लॉक प्रिंटिंग तकनीक जापान में लगभग 768-770 ईस्वी में बौद्ध धर्म-प्रचारकों द्वारा लाई गई।
  2. 868 ईस्वी में छपा 'डायमंड सूत्र' (Diamond Sutra) जापान की सबसे पुरानी छपी किताब मानी जाती है।
  3. पुस्तकालयों और किताबों की दुकानों में हाथ से छपी किताबें रखी जाती थीं।
  4. शुरुआती किताबें महिलाओं की गाइडबुक, संगीत, हिसाब-किताब, चाय अनुष्ठान, फूलसज्जा और शिष्टाचार जैसे विविध विषयों पर उपलब्ध थीं।

5.2 यूरोप में मुद्रण का आगमन

यूरोप में मुद्रण का आगमन:-

यूरोप में मुद्रण चीनी काग़ज़ और मुद्रण तकनीक के माध्यम से पहुँचा, लेकिन शुरुआती दौर में पुस्तकों की माँग पूरी करना कठिन था।

  1. रेशम मार्ग (सिल्क रूट) के ज़रिए 11वीं शताब्दी में चीनी काग़ज़ यूरोप पहुँचा।
  2. मार्को पोलो चीन से मुद्रण का ज्ञान लेकर इटली लाया।
  3. बढ़ती माँग पूरी करने के लिए पुस्तक-विक्रेता सुलेखकों (scribe) को रोज़गार देने लगे।
  4. हस्तलिखित पांडुलिपियों के ज़रिए किताबों की भारी माँग पूरी करना लगभग असंभव था।
उदाहरण:- 13वीं शताब्दी तक यूरोप के पुस्तकालयों में अधिकांश किताबें हस्तलिखित पांडुलिपियाँ ही थीं, जिन्हें लिखने में महीनों लग जाते थे।

5.2.1 गुटेनबर्ग और प्रिंटिंग प्रेस

गुटेनबर्ग का प्रिंटिंग प्रेस:-

योहान गुटेनबर्ग ने 15वीं शताब्दी में प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किया, जिससे पुस्तकों का उत्पादन तेज़ और सस्ता हो गया।

  1. गुटेनबर्ग तेल और जैतून पेरने की मशीनें देखते हुए बड़ा हुआ था और उसने पत्थर पॉलिश करने व सुनारी में महारत हासिल की थी।
  2. उसने जैतून प्रेस को आदर्श मानकर प्रिंटिंग प्रेस विकसित किया; धातुई अक्षर ढालने के लिए साँचे का प्रयोग किया गया।
  3. 1448 तक गुटेनबर्ग ने अपना यंत्र तैयार कर लिया; इस प्रेस से छपी पहली किताब बाइबिल थी।
  4. शुरुआती छपी किताबें रंग-रूप में हस्तलिखित किताबों जैसी ही होती थीं।
  5. 1440 से 1550 के बीच यूरोप के अधिकांश देशों में छापेखाने स्थापित हो गए।

प्लेटन:-

लेटरप्रेस छपाई में प्लेटन वह बोर्ड होता था जिससे काग़ज़ के पीछे दबाकर अक्षरों की छाप ली जाती थी।

  1. प्रारंभ में प्लेटन लकड़ी का होता था, बाद में इसे धातु से बनाया जाने लगा।
  2. प्लेटन की मदद से छपाई समान, साफ और अधिक कुशल हो पाती थी।

5.3 मुद्रण क्रांति और उसका असर

5.3.1 नया पाठक वर्ग

मुद्रण क्रांति:-

छापेखानों के आने से पुस्तक-निर्माण और वितरण में आए बड़े परिवर्तन को मुद्रण क्रांति कहा जाता है, जिसने पढ़ने-लिखने की संस्कृति को बढ़ावा दिया।

  1. छापेखानों के आने से एक नया पाठक वर्ग पैदा हुआ।
  2. छपाई में लगने वाली लागत और श्रम कम हो गया, जिससे किताबों की कीमतें घट गईं।
  3. बाज़ार किताबों से भर गया और पाठक वर्ग व्यापक हो गया।
  4. पहले जनता मुख्यतः श्रोता थी, अब वह स्वयं पढ़ने वाली पाठक बन गई।

5.3.2 धार्मिक विवाद और प्रिंट का डर

धार्मिक विवाद और सेंसरशिप का डर:-

मुद्रण के आगमन से धार्मिक-सामाजिक स्तर पर डर पैदा हुआ कि अनियंत्रित छपाई से विद्रोही और अधार्मिक विचार फैल सकते हैं।

  1. धर्मसुधारक मार्टिन लूथर ने अपने लेखों से कैथोलिक चर्च की कुरीतियों को उजागर किया।
  2. लूथर के 'न्यू टेस्टामेंट' के अनुवाद से चर्च में विभाजन हुआ और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार आंदोलन की शुरुआत हुई।
  3. रोमन चर्च ने धर्म-विरोधी लेखन पर रोक हेतु इंक्विज़िशन शुरू किया।
उदाहरण:- 1558 में रोमन चर्च ने प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची (Index of Prohibited Books) प्रकाशित की।

5.4 पढ़ने का जुनून

साक्षरता और पढ़ने में वृद्धि:-

17वीं और 18वीं सदी में यूरोप में साक्षरता का स्तर काफी बढ़ गया, जिससे पढ़ने का जुनून बढ़ने लगा।

  1. 18वीं सदी के अंत तक यूरोप के कुछ हिस्सों में 60 से 80 प्रतिशत तक लोग पढ़-लिख सकते थे।
  2. सबसे ज़्यादा बिकने वाली किताबों में पत्रिकाएँ, उपन्यास और पंचांग शामिल थे।
  3. छपाई से वैज्ञानिकों व तर्कशीलों के नए विचार आम लोगों तक पहुँचने लगे, जिससे नए विचारों पर बहस संभव हुई।

5.4.1 मुद्रण संस्कृति और फ्रांसीसी क्रांति

फ्रांसीसी क्रांति पर मुद्रण संस्कृति का प्रभाव:-

मुद्रण संस्कृति ने विचारों के व्यापक प्रसार और वाद-विवाद को बढ़ावा देकर फ्रांसीसी क्रांति की नींव तैयार की।

  1. छपाई के कारण परंपरा, अंधविश्वास और निरंकुशवाद की आलोचना करने वाले विचारों का तेज़ी से प्रसार हुआ।
  2. रीति-रिवाज़ों की जगह विवेक और तर्क के शासन पर बल दिया गया।
  3. चर्च की धार्मिक सत्ता और राज्य की निरंकुश सत्ता दोनों पर सवाल उठे।
  4. छपाई ने एक नई वाद-विवाद संस्कृति को जन्म दिया, जिससे जनता में विचारों की स्वतंत्रता बढ़ी।

उन्नीसवीं सदी में यूरोप में पढ़ने-लिखने की स्थिति:-

19वीं सदी में साक्षरता में वृद्धि और नए पाठक वर्ग के उदय से पढ़ाई-लिखाई तथा किताबों का स्वरूप बदल गया।

  1. नया पाठक वर्ग उभरा जिसमें बच्चे, महिलाएँ और मज़दूर भी शामिल थे।
  2. बच्चों की उम्र और समझ को ध्यान में रखकर अलग से किताबें लिखी जाने लगीं, और कई लोककथाओं को सरल रूप में ढाला गया।
  3. कई महिलाएँ पाठिका के साथ-साथ लेखिका भी बन गईं।
  4. 17वीं सदी से प्रचलित किराए के पुस्तकालय अब मज़दूरों और निम्न वर्ग के लोगों के लिए भी उपलब्ध हो गए।

5.5 उन्नीसवीं सदी में मुद्रण संस्कृति का विकास

मुद्रण तकनीक में सुधार:-

19वीं और 20वीं सदी में मुद्रण तकनीक में कई सुधार हुए, जिससे छपाई की गति और गुणवत्ता दोनों बेहतर हुईं।

  1. न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम. हो ने भाप से चलने वाला बेलनाकार प्रेस बनाया, जिससे एक घंटे में 8,000 पेज छापे जा सकते थे।
  2. 19वीं सदी के अंत तक ऑफसेट प्रिंटिंग विकसित हुई, जिससे एक ही बार में छह रंगों में छपाई संभव हो गई।
  3. 20वीं सदी में बिजली से चलने वाले प्रेस इस्तेमाल में आए, जिससे छपाई तेज़ और कुशल हो गई।

किताबें बेचने के नए तरीके:-

19वीं और 20वीं सदी में किताबों की बिक्री बढ़ाने के लिए कई नए तरीके अपनाए गए।

  1. धारावाहिक प्रकाशन: कई पत्रिकाओं में उपन्यासों को कड़ियों में छापा गया, जिससे पाठक अगला अंक खरीदने को प्रेरित होते थे।
  2. जिल्द (हार्ड बाइंडिंग) लगाने की प्रथा 20वीं सदी में शुरू हुई, जो किताबों को सुरक्षित और आकर्षक बनाती थी।
  3. 1930 के दशक की महामंदी के दौरान सस्ता पेपरबैक संस्करण लाया गया, जिससे अधिक लोग किताबें खरीद सके।
उदाहरण:- 1920 के दशक में इंग्लैंड में लोकप्रिय साहित्य को 'पेंग्विन सीरीज़' के नाम से सस्ते दाम पर बेचा गया।

5.6 भारत का मुद्रण संसार

भारत में मुद्रण संस्कृति का आगमन:-

मुद्रण संस्कृति 16वीं सदी में भारत में आई और धीरे-धीरे विकसित हुई।

  1. प्रिंटिंग प्रेस 16वीं सदी में गोवा में पुर्तगाली धर्म-प्रचारकों के साथ आया; 1674 तक कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं।
  2. कैथोलिक पुजारियों द्वारा 1579 में कोचीन में पहली तमिल पुस्तक और 1713 में पहली मलयालम पुस्तक छपी।
  3. 1780 में जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने साप्ताहिक पत्रिका 'बंगाल गज़ट' का संपादन शुरू किया, जिसे पहला भारतीय अखबार माना जाता है।

5.6.1 मुद्रण-युग से पहले की पांडुलिपियाँ

पूर्व-औपनिवेशिक शिक्षा और पांडुलिपियाँ:-

भारत में मुद्रण से पहले भी शिक्षा-साक्षरता की समृद्ध परंपरा थी, लेकिन किताबें हस्तलिखित पांडुलिपियों के रूप में होती थीं।

  1. संस्कृत, अरबी, फ़ारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्तों या हाथ से बने काग़ज़ पर लिखी जाती थीं।
  2. बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में पाठशालाओं का जाल था, जहाँ विद्यार्थी आमतौर पर किताबें नहीं पढ़ते थे बल्कि गुरु की सुनाई बातें लिखते थे।

पांडुलिपि:-

हाथों से लिखी गई पुस्तकों को पांडुलिपि कहा जाता है, जो ताड़ के पत्तों, हस्तनिर्मित काग़ज़ या अन्य सामग्री पर लिखी जाती थीं और जिल्दों में बाँधकर सुरक्षित रखी जाती थीं।

पांडुलिपियों की सीमाएँ:-

  1. किताबों की बढ़ती माँग पांडुलिपियों से पूरी नहीं हो पाती थी।
  2. पांडुलिपियों की नकल उतारना महँगा और समय लेने वाला काम था।
  3. पांडुलिपियाँ नाज़ुक होती थीं, जिससे उनका रखरखाव और आदान-प्रदान कठिन था।

5.6.2 भारत में छपाई का विकास

भारत में प्रकाशन के नए रूप:-

19वीं सदी में भारत में प्रकाशन के नए रूप और विधाएँ सामने आईं, जिससे पाठकों का जुड़ाव बढ़ा।

  1. शुरू में यूरोपीय परिवेश पर आधारित उपन्यास पढ़े जाते थे; बाद में भारतीय परिवेश पर लिखने वाले लेखक सामने आए।
  2. गीत, लघुकथा, राजनैतिक और सामाजिक निबंध जैसी नई साहित्यिक विधाएँ प्रचलित हुईं।
  3. प्रिंटिंग प्रेस से चित्रों की नकलें बड़े पैमाने पर छपने लगीं; राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों की कलाकृतियाँ आम जनता तक पहुँचीं।
  4. 1870 के आसपास पत्रिकाओं और अखबारों में सामाजिक-राजनैतिक मुद्दों पर कार्टून छपने लगे।

5.7 धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहस में मुद्रण की भूमिका

5.7.1 प्रकाशन के नए रूप

धार्मिक व सामाजिक बहसों पर मुद्रण का प्रभाव:-

प्रिंट संस्कृति के आने से भारत में धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक बहसों को मज़बूती मिली और जानकारी आम जनता तक पहुँचने लगी।

  1. राममोहन राय ने 1821 से 'संवाद कौमुदी' प्रकाशित की, जिसमें हिंदू धर्म के रूढ़िवादी विचारों की आलोचना होती थी; इसके जवाब में रूढ़िवादियों ने 'समाचार चंद्रिका' शुरू की।
  2. 1810 में कलकत्ता में तुलसीदास की रामचरितमानस छपी; 1880 के दशक से नवल किशोर प्रेस (लखनऊ) और श्री वेंकटेश्वर प्रेस (बंबई) ने आम बोलचाल की भाषाओं में धार्मिक ग्रंथ छापे।

मुस्लिम समाज और मुद्रण संस्कृति:-

मुस्लिम समाज ने मुद्रण संस्कृति को जल्दी अपनाया और इसे धार्मिक-सामाजिक शिक्षा के प्रसार के लिए इस्तेमाल किया।

  1. 1822 में फ़ारसी में 'जाम-ए-जहाँनामा' और 'शम्सुल अखबार' छापे गए; उसी साल गुजराती अखबार 'बम्बई समाचार' भी प्रकाशित हुआ।
  2. उत्तर भारत के उलेमाओं ने सस्ते लिथोग्राफी प्रेस से उर्दू और फ़ारसी में धर्मग्रंथों के अनुवाद छापे।
  3. 1867 में देवबंद सेमिनरी की स्थापना हुई, जिसने मुसलमानों के आचार-विचार से जुड़े हज़ारों फ़तवे छापने शुरू किए।

5.7.2 महिलाएँ और मुद्रण

स्त्री जीवन पर मुद्रण संस्कृति का प्रभाव:-

प्रिंट संस्कृति ने महिलाओं की सोच, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

  1. जेन ऑस्टेन, ब्रॉण्टे बहनों और जॉर्ज एलियट जैसी लेखिकाओं के लेखन से मज़बूत, समझदार और स्वतंत्र इच्छाशक्ति वाली 'नई नारी' की छवि उभरी।
  2. 1876 में रश्मसुंदरी देवी की आत्मकथा 'आमार जीवन' प्रकाशित हुई; 1880 में ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई ने उच्च जाति की महिलाओं की दयनीय स्थिति पर रोष व्यक्त किया।
  3. 1871 में ज्योतिबा फुले ने अपनी पुस्तक 'गुलामगिरी' में जाति-प्रथा के अत्याचारों पर लिखा।

5.7.3 प्रिंट और गरीब जनता

मुद्रण संस्कृति और गरीब जनता:-

प्रिंट संस्कृति ने गरीब जनता तक किताबों की पहुँच बढ़ाई और उनकी शिक्षा व जागरूकता में योगदान दिया।

  1. मद्रास के शहरों में 19वीं सदी में सस्ती और छोटी किताबें चौराहों पर बिकने लगीं, जिन्हें गरीब लोग भी खरीद सकते थे।
  2. 20वीं सदी की शुरुआत में सार्वजनिक पुस्तकालय शुरू हुए, जिससे किताबों की पहुँच और पढ़ने की आदत दोनों बढ़ीं।
उदाहरण:- कानपुर के मिल मज़दूर काशीबाबा ने 1938 में "छोटे और बड़े का सवाल" लिखी, जिसमें जातीय व वर्गीय शोषण के रिश्ते को समझाने की कोशिश की गई।

5.7.4 प्रिंट और प्रतिबंध

मुद्रण और औपनिवेशिक प्रतिबंध:-

औपनिवेशिक शासन ने प्रिंट मीडिया पर नियंत्रण और सेंसर लगाकर अपने शासन को सुरक्षित रखने की कोशिश की।

  1. 1798 से पहले औपनिवेशिक शासक सेंसर के प्रति गंभीर नहीं थे; शुरुआती नियंत्रण भारत में रहने वाले उन अंग्रेज़ों पर लगाए गए जो कंपनी की नीतियों की आलोचना करते थे।
  2. 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ी हुकूमत का प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति रवैया सख़्त हो गया।
उदाहरण:- वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट, 1878 के तहत सरकार को वर्नाक्युलर अख़बारों में सेंसर लगाने की व्यापक शक्ति मिली; राजद्रोही रिपोर्ट छपने पर अखबार को चेतावनी दी जाती थी और असर न होने पर प्रेस ज़ब्त की जा सकती थी।
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