CLASS 10 HISTORY NOTES IN HINDI CHAPTER - 4
औद्योगीकरण का युग / The Age of Industrialisation
| Textbook | NCERT |
|---|---|
| Class | Class 10 |
| Subject | History |
| Chapter | Chapter 4 |
| Chapter Name | औद्योगीकरण का युग |
| Medium | Hindi |
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
4.1 औद्योगिक क्रांति से पहले उत्पादन व्यवस्था कैसी थी
औद्योगीकरण का युग:-
वह युग जिसमें हस्तनिर्मित वस्तुओं का निर्माण घट गया और फैक्ट्रियों, मशीनों तथा तकनीक का तेजी से विकास हुआ, उसे औद्योगीकरण का युग कहते हैं। इस समय खेती करने वाला समाज औद्योगिक समाज में परिवर्तित हो गया।
- हस्तनिर्मित वस्तुओं की जगह मशीनों से वस्तुएँ बनने लगीं।
- तकनीकी विकास के कारण उत्पादन में तेजी आई।
- समाज की संरचना कृषि आधारित से औद्योगिक रूप में बदल गई।
- यह काल लगभग 1760 से 1840 तक माना जाता है।
पूर्व औद्योगीकरण:-
यूरोप में औद्योगीकरण शुरू होने से पहले के समय को पूर्व औद्योगीकरण का काल कहा जाता है। जब यूरोप में अभी कारखाने स्थापित नहीं हुए थे और वस्तुओं का निर्माण गाँवों में होता था, उसी अवधि को पूर्व औद्योगीकरण कहा जाता है।
- यह काल कारखानों के बनने से पहले का था।
- उत्पादन गाँवों में कारीगरों और बुनकरों द्वारा किया जाता था।
- व्यापारी इन वस्तुओं को खरीदकर बाजार में बेचते थे।
आद्य औद्योगीकरण:-
इंग्लैंड और यूरोप में फैक्ट्रियों की स्थापना से पहले भी जब अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन किया जाने लगा था, उस काल को आद्य औद्योगीकरण कहा जाता है। इस समय उत्पादन फैक्ट्रियों में नहीं, बल्कि लोगों के घरों और छोटी कार्यशालाओं में होता था।
- यह काल फैक्ट्री व्यवस्था से पहले का औद्योगिक चरण था।
- उत्पादन बड़े पैमाने पर परंतु घरों और कार्यशालाओं में होता था।
- इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए वस्तुएँ तैयार करना था।
- इतिहासकार इस काल को "आद्य-औद्योगीकरण" कहते हैं क्योंकि इसने आगे चलकर फैक्ट्री आधारित औद्योगीकरण की नींव रखी।
व्यापारियों ने गाँवों की ओर ध्यान क्यों दिया:-
शहरों में गिल्ड और क्राफ्ट गिल्ड बहुत शक्तिशाली थे, जो प्रतिस्पर्धा और कीमतों पर नियंत्रण रखते थे। ये संगठन नए व्यापारियों को बाजार में प्रवेश नहीं करने देते थे, इसलिए व्यापारियों ने गाँवों की ओर ध्यान देना शुरू किया।
- शहरों में गिल्ड और क्राफ्ट गिल्ड बहुत प्रभावशाली थे।
- गिल्ड संगठन प्रतिस्पर्धा और कीमतों को नियंत्रित करते थे।
- नए व्यापारियों को बाजार में काम शुरू करने से रोका जाता था।
- गाँवों में ऐसी पाबंदियाँ नहीं थीं, इसलिए व्यापारी वहाँ चले गए।
स्टेपलर:-
वह व्यक्ति जो ऊन को उसके रेशों की गुणवत्ता और लंबाई के अनुसार छाँटता या वर्गीकृत करता है, उसे स्टेपलर कहा जाता है।
- स्टेपलर ऊन के रेशों को अलग-अलग श्रेणियों में बाँटता है।
- यह कार्य वस्त्र उद्योग में कच्चे माल की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है।
फुलर:-
वह व्यक्ति जो कपड़े को 'फुल' करता है यानी चुन्नटों या अन्य तरीकों से कपड़े को समेटकर मजबूत और चिकना बनाता है, उसे फुलर कहा जाता है।
- फुलर कपड़े को समेटने और चिकना बनाने का कार्य करता है।
- यह प्रक्रिया कपड़े की मजबूती और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए की जाती है।
- वस्त्र उद्योग में फुलर का काम खास महत्व रखता था।
कार्डिंग:-
वह प्रक्रिया जिसमें कपास, ऊन या अन्य रेशों को कताई के लिए तैयार किया जाता है, उसे कार्डिंग कहते हैं।
- कार्डिंग रेशों को अलग-अलग करके उन्हें सीधा और चिकना बनाती है।
- यह कताई की तैयारी का महत्वपूर्ण चरण है।
- वस्त्र उद्योग में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कार्डिंग आवश्यक है।
4.2 कारखानों का उदय कैसे हुआ
कारखानों की शुरुआत:-
सबसे पहले इंग्लैंड में 1730 के दशक में कारखाने बनना शुरू हुए। अठारहवीं सदी के अंत तक पूरे इंग्लैंड में जगह-जगह कारखाने दिखाई देने लगे। इस नए युग का पहला प्रतीक कपास था, और उन्नीसवीं सदी के अंत तक कपास के उत्पादन में भारी बढ़ोतरी हुई।
- 1760 में ब्रिटेन में 2.5 मिलियन पाउंड कपास का आयात हुआ।
- 1787 तक यह मात्रा बढ़कर 22 मिलियन पाउंड हो गई।
- कारखाने उद्योग और कपास उत्पादन में नए युग की शुरुआत का प्रतीक बने।
कारखानों से हुए लाभ:-
कारखानों के खुलने से कई फायदे हुए। श्रमिकों की कार्यकुशलता बढ़ गई और नई मशीनों की सहायता से प्रति श्रमिक अधिक मात्रा में और बेहतर उत्पाद बनने लगे।
- श्रमिकों की कार्यकुशलता में वृद्धि हुई।
- मशीनों के कारण उत्पादन की मात्रा और गुणवत्ता दोनों बढ़ीं।
- औद्योगीकरण की शुरुआत सूती कपड़ा उद्योग से हुई।
- कारखानों में श्रमिकों की निगरानी और प्रबंधन आसान हुआ।
4.3 औद्योगिक परिवर्तन की रफ्तार कैसी थी
औद्योगिक परिवर्तन की रफ्तार:-
औद्योगीकरण का मतलब केवल फैक्ट्री उद्योग का विकास नहीं था। कपास और सूती वस्त्र उद्योग, साथ ही लोहा और स्टील उद्योग में भी बदलाव तेजी से हुए। औद्योगीकरण के पहले दौर में (1840 के दशक तक) सूती कपड़ा उद्योग अग्रणी क्षेत्रक था। रेलवे के प्रसार के बाद लोहा-इस्पात उद्योग में तेजी आई — इंग्लैंड में रेल का प्रसार 1840 के दशक में हुआ और उपनिवेशों में 1860 के दशक में।
- औद्योगीकरण सिर्फ फैक्ट्री उद्योग तक सीमित नहीं था।
- सूती कपड़ा उद्योग पहले दौर में अग्रणी था।
- रेलवे के प्रसार से लोहा और स्टील उद्योग तेजी से विकसित हुए।
- 1873 में लोहा-इस्पात का निर्यात सूती कपड़े के निर्यात से दोगुना था (77 मिलियन पाउंड)।
- रोजगार पर औद्योगीकरण का प्रभाव सीमित था; अधिकांश कामगार पारंपरिक उद्योगों में ही थे (उन्नीसवीं सदी के अंत तक 20% से भी कम कामगार तकनीकी रूप से उन्नत औद्योगिक क्षेत्र में नियोजित थे)।
नए उद्योगपति परंपरागत उद्योगों की जगह क्यों नहीं ले सके:-
- औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों की संख्या कम थी।
- प्रौद्योगिकी का बदलाव धीरे-धीरे हो रहा था।
- कपड़ा उद्योग गतिशील और प्रतिस्पर्धात्मक था।
- तकनीकी उपकरण महँगे थे।
- अधिकांश उत्पादन अभी भी घरों में ही होता था।
4.3.1 हाथ का श्रम और वाष्प शक्ति का क्या महत्व था
हाथ के श्रम और वाष्प शक्ति का उपयोग उस समय भिन्न क्यों था:-
उस समय श्रमिकों की कोई कमी नहीं थी, इसलिए महंगी मशीनों में पूंजी लगाने की बजाय श्रमिकों से काम लेना बेहतर समझा जाता था। मशीन से बनी चीजें हाथ से बनी चीजों की गुणवत्ता और सुंदरता का मुकाबला नहीं कर सकती थीं। लेकिन उन्नीसवीं सदी के अमेरिका में श्रमिकों की कमी के कारण मशीनीकरण ही एकमात्र विकल्प था।
- श्रमिकों की कोई कमी नहीं थी।
- महंगी मशीनों में पूंजी लगाने की बजाय श्रमिकों से काम लेना आसान था।
- मशीन से बनी वस्तुएँ हाथ से बनी वस्तुओं की गुणवत्ता और सुंदरता नहीं पा सकती थीं।
- उच्च वर्ग हाथ से बनी चीजों को पसंद करते थे।
- अमेरिका में श्रमिकों की कमी के कारण मशीनीकरण आवश्यक था।
19वीं शताब्दी में यूरोप के उद्योगपति मशीनों की अपेक्षा हाथ के श्रम को अधिक क्यों पसंद करते थे:-
- ब्रिटेन में मानव श्रम की कोई कमी नहीं थी।
- मशीनों में अधिक पूँजी निवेश करनी पड़ती थी।
- मौसमी उद्योगों में हाथ के श्रम को उचित माना जाता था।
- विशेष डिज़ाइन और आकार वाली चीजें हस्तकौशल पर निर्भर होती थीं।
4.3.2 मजदूरों की जिंदगी कैसी थी
मजदूरों की जिंदगी:-
कुल मिलाकर मजदूरों का जीवन दयनीय था। श्रम की बहुतायत के कारण नौकरियों की भारी कमी थी। नौकरी मिलने की संभावना अक्सर दोस्ती, कुनबे या जान-पहचान पर निर्भर करती थी। मजदूरों की आय का वास्तविक मूल्य कम होने के कारण उनकी स्थिति गरीबीपूर्ण थी।
- मजदूरों का जीवन दयनीय और कठिन था।
- नौकरियों की कमी थी और रोजगार जान-पहचान पर निर्भर था।
- मौसमी काम के कारण बीच-बीच में बेरोजगारी होती थी।
- आय का वास्तविक मूल्य कम होने के कारण गरीबी थी।
4.4 उपनिवेशों में औद्योगीकरण कैसे हुआ
स्पिनिंग जेनी:-
एक सूत कातने की मशीन है, जिसे जेम्स हारग्रीव्स ने 1764 में बनाया था।
- यह मशीन सूत कातने और कताई की प्रक्रिया को तेज करती थी।
- एक मशीन से एक समय में कई सूत बनाए जा सकते थे।
- इसने कपड़ा उद्योग में उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद की।
स्पिनिंग जेनी मशीन का मजदूरों ने विरोध क्यों किया:-
उन्नीसवीं सदी के मध्य तक शहरों की आबादी का लगभग 10% अत्यंत गरीब था। आर्थिक मंदी में बेरोजगारी 35% से 75% तक बढ़ जाती थी। बेरोजगारी की आशंका के कारण मजदूर नई प्रौद्योगिकी से नाराज़ होने लगे। जब ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी मशीन का इस्तेमाल शुरू हुआ, तो मजदूरों ने मशीनों पर हमला करना शुरू कर दिया।
- शहरों में गरीबी और आर्थिक असुरक्षा।
- मंदी में बेरोजगारी का उच्च स्तर।
- नई प्रौद्योगिकी, जैसे स्पिनिंग जेनी, से मजदूरों का विरोध।
- 1840 के बाद रेलवे और सड़क निर्माण से रोजगार में वृद्धि।
4.4.1 भारतीय कपड़े का युग क्या था
मशीन उद्योग से पहले भारत में कपड़ा उद्योग की स्थिति:-
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रभुत्व – भारत के रेशमी और सूती वस्त्रों का विश्व बाजार में दबदबा था।
- विदेशी व्यापार – आर्मीनियन और फारसी सौदागर भारत से कपड़े अफगानिस्तान, पूर्वी फारस और मध्य एशिया तक ले जाते थे।
- मुख्य बंदरगाह – सूरत, हुगली और मसुलीपट्टनम प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह थे।
- व्यापार नेटवर्क – भारतीय व्यापारी और बैंकर इस व्यापार नेटवर्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
- व्यापारियों के प्रकार – दो प्रकार के व्यापारी होते थे: आपूर्ति सौदागर और निर्यात सौदागर।
मशीन उद्योग के बाद भारत के कपड़ा उद्योग में हुए परिवर्तन:-
- भारतीय नियंत्रण का अंत – 1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों के नियंत्रण वाला व्यापार नेटवर्क टूटने लगा।
- यूरोपीय कंपनियों का प्रभाव – यूरोपीय कंपनियों की शक्ति और प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा।
- पुराने बंदरगाहों का पतन – सूरत और हुगली जैसे पुराने बंदरगाह कमजोर पड़ गए।
- नए बंदरगाहों का विकास – बंबई (मुंबई) और कलकत्ता (कोलकाता) नए प्रमुख बंदरगाहों के रूप में उभरे।
- व्यापार पर यूरोपीय नियंत्रण – अब व्यापार यूरोपीय कंपनियों के हाथों में चला गया।
4.4.2 बुनकरों का क्या हुआ
यूरोपीय कंपनियों के आने से भारतीय बुनकरों की स्थिति में परिवर्तन:-
- यूरोपीय नियंत्रण की शुरुआत – जैसे-जैसे यूरोपीय कंपनियों का प्रभाव बढ़ा, उन्होंने बुनकरों पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया।
- स्वतंत्रता की हानि – अब बुनकरों को कंपनी के आदेश पर ही काम करना पड़ता था और उन्हें अपनी मर्जी से कपड़ा बेचने की अनुमति नहीं थी।
- आर्थिक स्थिति का बिगड़ना – कंपनी द्वारा तय की गई कम कीमतों पर सामान बेचने के कारण बुनकरों की आय घट गई।
ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के बाद भारतीय बुनकरों की स्थिति:-
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा सत्ता स्थापित करने के बाद (1760 के बाद) भारतीय बुनकरों की स्थिति अत्यंत खराब हो गई।
- व्यापार पर एकाधिकार – ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय कपड़ा व्यापार पर पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया।
- स्थानीय व्यापारियों का अंत – कंपनी ने कपड़ा व्यापार में सक्रिय भारतीय व्यापारियों और दलालों को हटाकर सीधे बुनकरों पर नियंत्रण किया।
- अन्य खरीदारों पर रोक – बुनकरों को किसी अन्य व्यापारी या खरीदार को कपड़ा बेचने की अनुमति नहीं थी।
- गुमाश्तों की नियुक्ति – कंपनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने के लिए गुमाश्ता नामक वेतनभोगी कर्मचारियों को नियुक्त किया।
- टकराव और शोषण – गुमाश्तों के कठोर व्यवहार के कारण बुनकरों और कंपनी कर्मचारियों के बीच अक्सर टकराव होता था।
- कम कीमतों का दबाव – कंपनी बुनकरों से बहुत कम दाम पर कपड़ा खरीदती थी, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई।
4.4.3 भारत में मैनचेस्टर का आना भारतीय उद्योगों को कैसे प्रभावित करता है
भारत में मैनचेस्टर के आने से भारतीय कपड़ा उद्योग पर प्रभाव:-
उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में मैनचेस्टर के कपड़ों के भारत में आने से भारतीय कपड़ा उद्योग को भारी नुकसान हुआ।
- भारतीय कपड़ों के निर्यात में गिरावट – 1811-12 में भारत से निर्यात होने वाले सूती कपड़ों की हिस्सेदारी 33% थी, जो 1850-51 तक घटकर मात्र 3% रह गई।
- ब्रिटिश सरकार द्वारा आयात शुल्क – ब्रिटेन के उद्योगपतियों के दबाव में सरकार ने भारतीय कपड़ों पर आयात शुल्क लगा दी।
- ईस्ट इंडिया कंपनी पर दबाव – कंपनी पर यह दबाव डाला गया कि वह भारत में ब्रिटेन में बने कपड़ों की बिक्री बढ़ाए।
- भारत में विदेशी कपड़ों की बाढ़ – 1850 तक कुल आयात में सूती कपड़ों का हिस्सा 31% हो गया और 1870 के दशक तक यह बढ़कर 50% से अधिक पहुँच गया।
- भारतीय उद्योगों पर प्रभाव – विदेशी मशीनों से बने सस्ते कपड़ों की वजह से भारतीय बुनकरों और कारीगरों की माँग घट गई।
मैनचेस्टर के आगमन से भारतीय बुनकरों के सामने आई समस्याएँ:-
- विदेशी बाजार का ढह जाना – यूरोप और इंग्लैंड में भारतीय कपड़ों की माँग बहुत घट गई, जिससे विदेशी बाजार पूरी तरह टूट गया।
- स्थानीय बाजार का संकुचित होना – भारत के भीतर भी ब्रिटेन से आयातित सस्ते कपड़ों की बाढ़ आ गई।
- कपास की कमी – ब्रिटिश उद्योगपतियों ने भारत से कच्चे कपास का भारी निर्यात शुरू कर दिया, जिसके कारण भारतीय बुनकरों को अच्छी गुणवत्ता की कपास नहीं मिल पाती थी।
- ऊँची कीमत पर कपास खरीदने की मजबूरी – कपास के निर्यात से उसकी कीमतें बढ़ गईं।
- मशीनों से बनी वस्तुओं की प्रतिस्पर्धा – उन्नीसवीं सदी के अंत तक भारत में फैक्ट्रियाँ स्थापित हो गईं और सस्ते मशीनी कपड़ों की बाढ़ आने से हाथ के बने कपड़ों की माँग और घट गई।
4.5 भारत में फैक्ट्रियों का आगमन कैसे हुआ
भारत में कारखानों की शुरुआत:-
भारत में औद्योगीकरण की शुरुआत 19वीं सदी के मध्य में हुई जब विभिन्न शहरों में सूती और जूट मिलों की स्थापना की गई।
| शहर | वर्ष | उद्योग |
|---|---|---|
| बम्बई (मुंबई) | 1854 (स्थापना), 1856 (उत्पादन शुरू) | पहला सूती कपड़ा मिल — भारत के आधुनिक औद्योगीकरण की शुरुआत |
| बंगाल | 1850 का दशक | जूट मिलें — बंगाल जूट उद्योग का प्रमुख केंद्र बना |
| कानपुर | 1860 का दशक | एल्गिन मिल — मुख्यतः ऊनी कपड़ा |
| अहमदाबाद | इसी अवधि में | पहली सूती मिल — आगे चलकर "भारत का मैनचेस्टर" कहलाया |
| मद्रास (चेन्नई) | 1874 | पहली सूती मिल में उत्पादन आरंभ |
4.5.1 प्रारंभिक उद्यमी कौन थे
भारत में प्रारंभिक उद्यमी:-
- द्वारकानाथ टैगोर (बंगाल) – इन्होंने चीन के साथ व्यापार किया तथा 6 संयुक्त उद्यम कंपनियाँ (Joint Stock Companies) स्थापित कीं।
- दिनशॉ पेटिट और जे. एन. टाटा (बम्बई) – सूती वस्त्र उद्योग के प्रमुख उद्योगपति बने। टाटा ने आगे चलकर इस्पात उद्योग की नींव रखी।
- सेठ हुकुमचंद (कलकत्ता) – भारत में पहली जूट मिल की स्थापना की। इन्हें "भारत के जूट राजा" के रूप में भी जाना जाता था।
- जी. डी. बिड़ला – इन्होंने वस्त्र उद्योग में प्रवेश किया और बाद में अन्य उद्योगों में भी विस्तार किया।
- दक्षिण भारत के व्यापारी (मद्रास) – वर्मा, मध्य पूर्व और पूर्वी अफ्रीका के साथ व्यापार करते थे।
4.5.2 मजदूर कहाँ से आए
भारत के कारखानों में मजदूर कहाँ से आते थे:-
- आसपास के जिलों से मजदूरों का आगमन – अधिकांश मजदूर उसी क्षेत्र या पास के जिलों से आते थे जहाँ कारखाने स्थापित हुए थे।
- किसान और कारीगर वर्ग – जो किसान खेती में जीविका नहीं चला पाते थे या जिन कारीगरों का पारंपरिक काम बंद हो गया था, वे कारखानों की ओर गए।
- अस्थायी प्रवासन – यह मजदूर अस्थायी रूप से शहरों में काम करने आते थे और कृषि मौसम में गाँव लौट जाते थे।
19वीं सदी में भारतीय मजदूरों की दशा:-
- मजदूरों की संख्या – 1901 में भारतीय फैक्ट्रियों में लगभग 5,84,000 मजदूर काम करते थे। 1946 तक यह संख्या बढ़कर 24,36,000 हो गई।
- अस्थायी रोजगार – अधिकांश मजदूर केवल अस्थायी तौर पर रखे जाते थे। फसल की कटाई के समय मजदूर गाँव लौट जाते थे।
- रोज़गार की कठिनाई – नौकरी पाना मुश्किल था और स्थायी रोजगार दुर्लभ था।
- कड़ी निगरानी – जॉबर (Jobber) मजदूरों की पूरी तरह से जिंदगी और काम को नियंत्रित करते थे।
जॉबर कौन थे:-
जॉबर एक पुराना और विश्वस्त कर्मचारी होता था, जिसे उद्योगपतियों ने मजदूरों की भर्ती और प्रबंधन के लिए रखा था।
- नियुक्ति – उद्योगपतियों द्वारा मजदूरों की भर्ती के लिए नियुक्त किया जाता था।
- मजदूरों की व्यवस्था – गाँव से मजदूरों को शहर लाना, काम का भरोसा दिलाना और शहर में बसने में मदद करना।
4.5.3 औद्योगिक विकास का अनूठापन क्या था
भारत में औद्योगिक विकास का अनूठापन:-
- यूरोपीय एजेंसियों का नियंत्रण – भारत में औद्योगिक उत्पादन पर यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियों का वर्चस्व था। इनका मुख्य ध्यान निर्यात योग्य वस्तुओं पर था, जैसे चाय, कॉफी, नील, जूट और खनन उत्पाद।
- स्वदेशी व्यवसायियों की रणनीति – भारतीय व्यवसायियों ने ऐसे उद्योग लगाए जो मैनचेस्टर उत्पादों से प्रतिस्पर्धा नहीं करते थे, जैसे धागे का उत्पादन।
- स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव – 20वीं सदी के पहले दशक में स्वदेशी आंदोलन ने लोगों को विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया, जिससे भारत में कपड़ा उत्पादन बढ़ा।
- औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि – 1900-1912 के बीच सूती कपड़े का उत्पादन दुगुना हो गया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान नई फैक्ट्रियों की स्थापना हुई क्योंकि ब्रिटिश उद्योग युद्ध के लिए उत्पादन में व्यस्त थे।
4.5.4 लघु उद्योगों की बहुतायत क्यों बनी रही
19वीं और 20वीं सदी में भारत में लघु उद्योगों की स्थिति:-
- बड़े उद्योगों का सीमित हिस्सा – लगभग 67% बड़े उद्योग केवल बंगाल और बम्बई में स्थित थे। देश के अन्य हिस्सों में लघु उद्योग प्रमुख थे।
- कामगारों की संख्या – रजिस्टर्ड कंपनियों में काम करने वाले मजदूर बहुत कम थे। 1911 में यह 5% और 1931 में 10% था।
- हथकरघा उद्योग में सुधार – 20वीं सदी में हाथ से बनने वाले उत्पादों में वृद्धि हुई। बुनकरों ने अपने करघों में फ्लाई शटल का उपयोग शुरू किया।
- फ्लाई शटल का प्रसार – 1941 तक भारत के 35% से अधिक हथकरघों में फ्लाई शटल लग चुका था। त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचीन और बंगाल जैसे क्षेत्रों में 70-80% हथकरघों में फ्लाई शटल इस्तेमाल हो रहा था।
फ्लाई शटल:-
एक यांत्रिक औजार है जिसका उपयोग बुनाई (टेक्सटाइल) में किया जाता है।
- कार्यप्रणाली – यह रस्सी और पुलियों के जरिए चलता है।
- उद्देश्य – बुनाई की गति और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
- औद्योगिक महत्व – हथकरघा उद्योग में फ्लाई शटल के उपयोग से उत्पादन तेजी से बढ़ा और गुणवत्ता सुधरी।
4.5.5 वस्तुओं के लिए बाजार का विस्तार कैसे हुआ
19वीं सदी में उत्पादक ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अपनाए गए तरीके:-
- विज्ञापन का प्रयोग – उत्पादक अपने उत्पादों पर लेबल लगाते थे। मैनचेस्टर के उत्पादक अपने लेबल पर उत्पादन का स्थान दिखाते थे। 'Made in Manchester' का लेबल गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता था।
- लेबल पर चित्र – लेबल पर सुंदर चित्र होते थे, अक्सर भारतीय देवी-देवताओं की तस्वीर। इससे स्थानीय लोगों से संबंध बनाने में मदद मिलती थी।
- कैलेंडर वितरण – 19वीं सदी के उत्तरार्ध में उत्पादक अपने उत्पादों को प्रसिद्ध बनाने के लिए कैलेंडर बाँटने लगे। कैलेंडर की शेल्फ लाइफ लंबी होती थी और यह पूरे साल ब्रांड रिमाइंडर का काम करता था।
- राष्ट्रवादी संदेश – भारतीय उत्पादक अपने विज्ञापनों में राष्ट्रवादी संदेश प्रमुखता से देते थे, जिससे वे अपने ग्राहकों से सीधे तौर पर भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखते थे।