Class 9 history NOTES IN HINDI CHAPTER 5
Chapter 5: Pastoralists in the Modern World
Chapter Introduction:
This chapter explains the lives of pastoral communities and how modern laws and colonial policies affected them. It highlights the challenges faced by nomadic groups in different regions.
FAQ
Ques. Are case-study questions asked from this chapter?
Ans. Yes, this chapter often includes case-study and descriptive questions.
CLASS 9 HISTORY NOTES IN HINDI
CHAPTER 5 : आधुनिक विश्व में चरवाहे
प्रश्न :- घुमंतू किसे कहते हैं?
उत्तर :- घुमंतू :- वे लोग होते हैं जो किसी एक स्थान पर स्थायी रूप से नहीं रहते। वे जीविका की तलाश में लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं। ये लोग अक्सर शिकार, पशुपालन, संग्रहण या व्यापार जैसे कार्यों से जीवन यापन करते हैं।
उदाहरण :-
राजस्थान के बंजारा और मध्य भारत के गोंड समुदाय पारंपरिक रूप से घुमंतू जनजातियाँ मानी जाती हैं।
प्रश्न :- चरवाहे किसे कहते हैं?
उत्तर :- चरवाहे :- वे लोग होते हैं जो गाय, भेड़, बकरी, ऊँट आदि मवेशियों को पालकर अपना जीवन यापन करते हैं। ये अपने पशुओं को चरागाहों में घास चराने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं। चरवाहे समाज में दूध, ऊन, चमड़ा और खाद जैसी वस्तुएँ उपलब्ध कराते हैं।
उदाहरण :-
राजस्थान के राइका (रेबारी) और हिमालय क्षेत्र के गुज्जर-बकरवाल प्रसिद्ध चरवाहे समुदाय हैं।
प्रश्न :- घुमंतू चरवाहे किसे कहते हैं?
उत्तर :- घुमंतू चरवाहे :- वे लोग होते हैं जो अपने मवेशियों के लिए चारा और पानी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान तक घूमते रहते हैं। ये किसी एक स्थान पर स्थायी रूप से नहीं रहते, बल्कि मौसम और घास की उपलब्धता के अनुसार अपने पशुओं के साथ घूमते रहते हैं। इनका जीवन पशुपालन और पशु-आधारित उत्पादों पर निर्भर करता है, जैसे दूध, ऊन और चमड़ा।
उदाहरण :-
राजस्थान के राइका (रेबारी) और हिमालय के गुज्जर-बकरवाल प्रमुख घुमंतू चरवाहे हैं।
प्रश्न :- भाबर किसे कहा जाता है?
उत्तर :- भाबर :- गढ़वाल और कुमाऊँ के इलाके में पहाड़ियों के निचले भाग के आसपास पाया जाने वाला सूखे जंगलों का क्षेत्र होता है। यह इलाका पत्थरीली और जल-निष्कासन वाली भूमि वाला होता है, जहाँ नदियों का पानी नीचे जमीन में समा जाता है। इस क्षेत्र में पेड़-पौधे कम घने और सूखे प्रकार के होते हैं।
उदाहरण :-
उत्तराखंड राज्य के नैनीताल और पौड़ी गढ़वाल जिलों के निचले क्षेत्रों में भाबर पाया जाता है।
प्रश्न :- बुग्याल किसे कहा जाता है?
उत्तर :- बुग्याल :- ऊँचे पहाड़ों पर पाए जाने वाले प्राकृतिक घास के मैदान होते हैं। ये मैदान सर्दियों में बर्फ से ढक जाते हैं और गर्मियों में यहाँ हरी घास उग आती है। इनका उपयोग स्थानीय लोग अपने मवेशियों के चरने के लिए करते हैं। ये क्षेत्र अत्यंत सुंदर और हरे-भरे होते हैं, जो पहाड़ी पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
उदाहरण :-
उत्तराखंड के औली, दयारा, और बगजी बुग्याल प्रसिद्ध बुग्याल हैं।
प्रश्न :- खरीफ फसल किसे कहा जाता है?
उत्तर :- खरीफ फसल :- वे फसलें होती हैं जो वर्षा ऋतु की शुरुआत (जून-जुलाई) में बोई जाती हैं। इन फसलों की कटाई शीत ऋतु की शुरुआत (अक्टूबर-नवंबर) में की जाती है। इन फसलों की वृद्धि के लिए अधिक वर्षा और गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है।
उदाहरण :-
चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, कपास, अरहर, मूँगफली आदि खरीफ फसलें हैं।
प्रश्न :- रबी फसल किसे कहा जाता है?
उत्तर :- रबी फसल :- वे फसलें होती हैं जो शीत ऋतु की शुरुआत (अक्टूबर-नवंबर) में बोई जाती हैं। इनकी कटाई ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत (मार्च-अप्रैल) में की जाती है। इन फसलों की वृद्धि के लिए कम तापमान और सिंचाई का पानी आवश्यक होता है।
उदाहरण :-
गेहूँ, जौ, चना, मटर, सरसों, मसूर आदि रबी फसलें हैं।
प्रश्न :- भारत में पाए जाने वाले प्रमुख घुमंतु चरवाहे कौन-कौन से हैं और वे कहाँ रहते हैं?
उत्तर :- भारत के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों से घुमंतु चरवाहे पाए जाते हैं। वे अपने मवेशियों के साथ चारे और पानी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं।
क्र. | घुमंतु चरवाहों के नाम | प्रमुख स्थान |
1. | गुज्जर-बकरवाल | जम्मू और कश्मीर |
2. | गद्दी | हिमाचल प्रदेश |
3. | भोटिया | उत्तराखंड |
4. | राइका | राजस्थान |
5. | बंजारा | राजस्थान, मध्य प्रदेश |
6. | मलधारी | गुजरात |
7. | धंगर | महाराष्ट्र |
8. | कुसमा, कुरूवा, गोल्ला | कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना |
9. | मोनपा | अरुणाचल प्रदेश |
उदाहरण :-
जम्मू-कश्मीर के गुज्जर-बकरवाल अपने भेड़-बकरियों को लेकर गर्मियों में ऊँचाई वाले इलाकों और सर्दियों में निचले मैदानों की ओर चले जाते हैं।
प्रश्न :- विश्व में पाए जाने वाले प्रमुख घुमंतु चरवाहे कौन-कौन से हैं और वे कहाँ पाए जाते हैं?
उत्तर :- विश्व के विभिन्न देशों में घुमंतु चरवाहे अपने मवेशियों के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर चारा और पानी की खोज में घूमते रहते हैं।
क्र. | घुमंतु चरवाहों के नाम | प्रमुख स्थान |
1. | मसाई | केन्या, तंजानिया |
2. | बेदुइन | उत्तरी अफ्रीका |
3. | बरबेर्स | उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका |
4. | तुर्काना | उगांडा |
5. | बोरान | कीनिया |
6. | मूर्स | मॉरिटानिया |
7. | सोमाली | सोमालिया |
8. | नाम, जुलू | दक्षिण अफ्रीका |
9. | बेजा | मिस्र, सूडान |
उदाहरण :-
अफ्रीका के मसाई चरवाहे अपने मवेशियों के साथ वर्ष भर केन्या और तंजानिया के मैदानों में घूमते रहते हैं और दूध तथा मांस से अपना जीवन-यापन करते हैं।
प्रश्न :- घुमंतु चरवाहे एक स्थान से दूसरे स्थान तक क्यों घूमते हैं?
उत्तर :- घुमंतु चरवाहों के भ्रमण (यात्रा) के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं :-
1. कृषि भूमि की कमी :- जहाँ सालों भर खेती योग्य भूमि उपलब्ध नहीं होती, वहाँ लोग मवेशी पालन के लिए घूमते रहते हैं।
2. चारे और पानी की खोज :- मवेशियों के लिए हरियाली और पानी की तलाश में वे मौसम के अनुसार स्थान बदलते हैं।
3. मौसमी परिस्थितियाँ :- ठंड, गर्मी या वर्षा के अत्यधिक प्रभाव से बचने के लिए वे ऊँचे या निचले इलाकों की ओर जाते हैं।
4. व्यापारिक उद्देश्य :- अपने दूध, ऊन, मांस आदि उत्पादों को बेचने के लिए भी वे विभिन्न स्थानों की यात्रा करते हैं।
उदाहरण :-
राजस्थान के राइका चरवाहे गर्मियों में अपने ऊँटों के साथ सूखे क्षेत्रों से हरे-भरे इलाकों की ओर चले जाते हैं और सर्दियों में वापस लौट आते हैं।
प्रश्न :- औपनिवेशिक काल में घुमंतु चरवाहों के जीवन में क्या परिवर्तन आए?
उत्तर :- औपनिवेशिक काल में घुमंतु चरवाहों के जीवन में निम्नलिखित परिवर्तन आए :-
1. अंग्रेज़ों ने भूमिकर बढ़ाने के लिए कई चारागाह भूमि को खेती योग्य भूमि में बदल दिया।
2. वन कानूनों के तहत जंगलों को आरक्षित, संरक्षित और खुले वर्गों में बाँटा गया जिससे चरवाहों की आवाजाही सीमित हो गई।
3. 1871 में अपराधी जनजाति अधिनियम लागू किया गया, जिसके तहत कई घुमंतु जनजातियों को “अपराधी” घोषित कर दिया गया।
4. सरकार ने अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए भूमि, नहर, नमक, व्यापार और यहाँ तक कि जानवरों पर भी कर (टैक्स) लगा दिया।
प्रश्न :- औपनिवेशिक काल में घुमंतु चरवाहों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर :- औपनिवेशिक काल में घुमंतु चरवाहों के जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े:-
1. मवेशियों की संख्या घट गई क्योंकि चारे और चारागाहों की कमी हो गई।
2. स्वतंत्र आवाजाही पर रोक लगा दी गई — बिना परमिट आने-जाने पर जुर्माने का प्रावधान किया गया।
3. कई जनजातियों को “अपराधी” घोषित कर दिया गया और उन्हें एक निश्चित क्षेत्र में ही रहने का आदेश दिया गया।
4. स्थानीय पुलिस की सख्त निगरानी में ही उनका आवागमन संभव था।
5. पास प्रणाली लागू की गई — प्रत्येक समूह को अपने मवेशियों की संख्या के अनुसार पास दिखाना अनिवार्य था।
6. भारी टैक्स व्यवस्था ने उनका जीवन और अधिक कठिन बना दिया।
उदाहरण :-
हिमालय के गद्दी चरवाहों को ऊँचाई वाले चारागाहों तक जाने के लिए परमिट लेना अनिवार्य कर दिया गया, जिससे उनकी पारंपरिक जीवनशैली पर गंभीर असर पड़ा।
प्रश्न :- औपनिवेशिक काल में घुमंतु चरवाहों ने बदलावों का सामना कैसे किया?
उत्तर :- औपनिवेशिक काल में घुमंतु चरवाहों ने बदलावों का सामना निम्नलिखित तरीके से किया :-
1. जानवरों की संख्या घटाई ताकि कम चारे में उनका पालन हो सके।
2. नए चारागाहों की खोज की, जहाँ जंगल कानूनों का दबाव कम था।
3. कई चरवाहों ने जमीन खरीदकर स्थायी रूप से बसना शुरू किया और खेती करने लगे।
4. कुछ लोगों ने चरवाही छोड़कर मजदूरी का काम अपनाया।
5. कुछ ने व्यापारिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू किया जैसे ऊन, दूध या पशुओं का व्यापार।
6. अपनी आवाजाही की दिशा और समय में भी परिवर्तन किया ताकि सरकारी नियंत्रण से बच सकें।
उदाहरण :-
राजस्थान के राइका चरवाहों ने सूखे के समय में अपने झुंडों को गुजरात के चारागाहों की ओर ले जाना शुरू किया, जिससे उन्हें नए रास्तों से गुजरना पड़ा।
प्रश्न :- पहाड़ों में घुमंतु चरवाहों की आवाजाही कैसी होती थी?
उत्तर :- जम्मू और कश्मीर के गुज्जर-बकरवाल समुदाय मुख्य रूप से घुमंतु चरवाहे थे, जो मवेशियों के लिए चारा और पानी की तलाश में लगातार घूमते रहते थे।
पहाड़ों में घुमंतु चरवाहों की आवाजाही मौसमी होती थी :-
1. सर्दियों में — जब ऊँचे पहाड़ बर्फ से ढक जाते थे, तो ये चरवाहे निचले इलाकों (भाबर क्षेत्र) में आकर डेरा डालते थे।
2. गर्मियों में — जैसे ही बर्फ पिघलती है और पहाड़ों पर हरियाली छा जाती थी, वे अपने झुंडों के साथ ऊँचे बुग्यालों (घास के मैदानों) की ओर लौट जाते थे।
कारण :-
इस तरह की मौसमी आवाजाही से उनके मवेशियों को साल भर हरा चारा और ठंडा वातावरण मिलता रहता था।
उदाहरण :-
गुज्जर-बकरवाल चरवाहे सर्दियों में जम्मू क्षेत्र में रहते थे और गर्मियों में कश्मीर घाटी या ऊँचे हिमालयी चारागाहों में चले जाते थे।
प्रश्न :- गद्दी चरवाहों की आवाजाही कैसी होती थी?
उत्तर :- गद्दी समुदाय हिमाचल प्रदेश का एक प्रसिद्ध घुमंतु चरवाहा समुदाय थे। यह लोग भेड़-बकरियाँ पालकर अपना जीवन यापन करते थे।
गद्दी चरवाहों की आवाजाही मौसमी होती थी :-
1. गर्मी के मौसम में — अप्रैल के आसपास गद्दी चरवाहे उत्तर दिशा की ओर (स्पीति क्षेत्र) की तरफ निकल जाते थे, जहाँ गर्मियों में घास के मैदान (बुग्याल) मिलते थे।
2. सर्दियों के मौसम में — सितंबर आते-आते वे वापस निचले पहाड़ी इलाकों की ओर लौट आते थे। लौटते समय वे स्पीति के गाँवों में कुछ समय रुकते थे और फिर अपने स्थायी निवास स्थानों की ओर जाते थे।
कारण :-
इनकी यह मौसमी यात्रा अपने मवेशियों के लिए चारा और उपयुक्त मौसम की खोज में की जाती थी।
उदाहरण :-
गद्दी चरवाहे धर्मशाला और चंबा के निचले इलाकों से निकलकर गर्मियों में स्पीति घाटी तक पहुँचते थे और सर्दियों में वापस लौट आते थे।
प्रश्न :- पठारों, मैदानों और रेगिस्तानों में घुमंतू चरवाहे कहाँ पाए जाते थे और वे क्यों घूमते रहते थे?
उत्तर :- घुमंतू चरवाहे केवल पहाड़ी क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि पठारों, मैदानों और रेगिस्तानों में भी बड़ी संख्या में पाए जाते थे। ये लोग अपने मवेशियों (भेड़, बकरी, ऊँट, गाय) के लिए चारे और पानी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान तक घूमते रहते थे।
वे निम्नलिखित कारणों से घूमते रहते थे :-
1. विभिन्न क्षेत्रों में मौसमी परिवर्तन होते थे।
2. कुछ स्थानों पर गर्मी और सूखे के कारण घास नहीं उगती थी।
3. इस कारण ये लोग उपजाऊ भूमि या हरियाली वाले क्षेत्रों की ओर चले जाते थे।
4. इनकी आवाजाही का मुख्य उद्देश्य अपने मवेशियों को पर्याप्त चारा और पानी उपलब्ध कराना था ताकि वे जीवित रह सकें और दूध, ऊन आदि से आजीविका चलती रहे।
उदाहरण :-
महाराष्ट्र के धंगर, राजस्थान के राइका, और गुजरात के मलधारी ऐसे प्रमुख घुमंतू चरवाहे हैं जो मौसम और चारे के अनुसार अपनी रहन-सहन की जगह बदलते रहते थे।
प्रश्न :- धंगर कौन थे और उनकी जीवन शैली कैसी थी?
उत्तर :- धंगर :- महाराष्ट्र का एक प्रसिद्ध घुमंतू चरवाहा समुदाय था।
धंगर के विषय में कुछ मुख्य तथ्य निम्नलिखित है :-
1. आबादी :- बीसवीं सदी की शुरुआत में इनकी आबादी लगभग 4,67,000 थी।
2. आजीविका :- अधिकांश धंगर भेड़-बकरियाँ पालते थे। कुछ लोग कंबल और चादर बुनने का काम करते थे। कुछ भैंस पालन भी करते थे।
3. निवास क्षेत्र :- बरसात के मौसम में धंगर महाराष्ट्र के सूखे पठारी इलाकों में रहते थे। यहाँ कम बारिश और कम उपजाऊ मिट्टी होती थी, जहाँ सिर्फ कटीली झाड़ियाँ और बाजरा जैसी सूखी फसलें उगती थीं।
4. मौसमी यात्रा :- अक्टूबर में बाजरा काटने के बाद धंगर कोंकण क्षेत्र की ओर चल पड़ते थे। वहाँ की उपजाऊ भूमि और अच्छी वर्षा उनके मवेशियों के लिए उपयुक्त थी। किसान भी उनका स्वागत करते थे क्योंकि उनकी भेड़ों का गोबर खेतों की उर्वरता बढ़ाता था।
5. वापसी :- जब बरसात शुरू होती, तो धंगर तटीय इलाकों को छोड़कर सूखे पठारों में लौट जाते थे, क्योंकि भेड़ें गीले वातावरण को सहन नहीं कर पातीं।
उदाहरण :-
धंगरों की यह मौसमी यात्रा “चरागाहों की खोज और मवेशियों की सुरक्षा” के लिए होती थी — यही उनकी जीवन शैली का प्रमुख हिस्सा था।
प्रश्न :- बंजारा जनजाति कौन थी और उनका जीवन कैसा था?
उत्तर :- बंजारा जनजाति :- बंजारे भारत के प्रसिद्ध घुमंतू चरवाहों और व्यापारी समुदायों में से एक थे।
बंजारा जनजाति के जीवन के विषय में कुछ मुख्य तथ्य निम्नलिखित है :-
1. निवास क्षेत्र :- यह जनजाति मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में पाई जाती थी।
2. जीवन शैली :- बंजारे लोग अपने मवेशियों के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक घूमते रहते थे। वे लंबी यात्राएँ करते थे और व्यापारिक कार्यों में भी संलग्न रहते थे।
3. व्यापारिक भूमिका :- यात्रा के दौरान वे अनाज और चारे के बदले में गाँव वालों को खेत जोतने वाले जानवर और दैनिक उपयोग की वस्तुएँ बेचते थे। इस तरह वे गाँवों के बीच वस्तु-विनिमय प्रणाली को बनाए रखते थे।
4. महत्व :- बंजारे न केवल चरवाहे थे, बल्कि व्यापार और परिवहन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
उदाहरण :-
बंजारे अपने बैलगाड़ियों के लंबे काफिलों के साथ चलते थे और भारत के विभिन्न हिस्सों में अनाज, नमक, कपड़ा, तेल और पशु जैसी वस्तुएँ पहुँचाते थे।
प्रश्न :- औपनिवेशिक शासन में चरवाहों के जीवन में क्या परिवर्तन हुए?
उत्तर :- औपनिवेशिक शासन के दौरान चरवाहों के जीवन में अनेक गहरे परिवर्तन आए। ब्रिटिश सरकार की नीतियों ने उनकी स्वतंत्रता, आजीविका और जीवनशैली को पूरी तरह बदल दिया।
औपनिवेशिक शासन में चरवाहों के जीवन में निम्नलिखित मुख्य चार परिवर्तन हुए :-
1. पहली बात :- चरागाहों को खेती की जमीन में बदलना : अंग्रेज सरकार का उद्देश्य था कि अधिक भूमि पर खेती हो, ताकि लगान (tax) से अधिक आमदनी प्राप्त हो। उन्होंने चरागाहों को कृषि भूमि में बदल दिया, जिससे चरवाहों के मवेशियों के लिए चारे की कमी होने लगी। अंग्रेजों को बिना खेती की जमीन व्यर्थ लगती थी, इसलिए उन्होंने भूमि विकास के नए नियम बनाए।
2. दूसरी बात :- वन कानूनों का बनना : 19वीं सदी के मध्य तक वन अधिनियम (Forest Acts) पारित किए गए। कई जंगलों को आरक्षित वन घोषित कर दिया गया। चरवाहों का जंगलों में प्रवेश निषिद्ध कर दिया गया, जबकि पहले वही उनके मवेशियों के चारे के मुख्य स्रोत थे। जिन क्षेत्रों में प्रवेश की अनुमति थी, वहाँ भी कड़ी निगरानी और परमिट प्रणाली लागू की गई।
3. तीसरी बात :- अपराधी जनजाति अधिनियम (1871) : अंग्रेज अफसर घुमंतू समुदायों को संदिग्ध और अस्थिर मानते थे। 1871 में Criminal Tribes Act लागू किया गया। इस कानून के तहत कई चरवाहा और व्यापारी समुदायों को अपराधी घोषित किया गया। उन्हें विशेष बस्तियों में बसने का आदेश दिया गया और बिना परमिट घूमने पर रोक लगा दी गई।
4. चौथी बात :- टैक्स और लगान की व्यवस्था : सरकार ने आमदनी बढ़ाने के लिए टैक्स की नई प्रणाली लागू की। अब टैक्स जमीन, नहर, नमक, व्यापार और मवेशियों पर भी लगने लगा। प्रति मवेशी टैक्स वसूला जाने लगा और बिना टैक्स चुकाए चारागाहों में प्रवेश निषिद्ध था। टैक्स वसूली का काम ठेकेदारों को सौंपा जाता था, जिससे चरवाहों की कठिनाइयाँ और बढ़ गईं।
उदाहरण :-
धंगर, गुज्जर, गद्दी और बकरवाल जैसे समुदायों को अब वनों में प्रवेश के लिए परमिट लेना पड़ता था, और हर जानवर पर टैक्स देना अनिवार्य कर दिया गया था।
चरवाहों पर प्रभाव :- उनकी आवाजाही की स्वतंत्रता समाप्त हो गई। आर्थिक स्थिति कमजोर होती गई। चारे की कमी और टैक्स के बोझ से उनका जीवन अत्यंत कठिन हो गया।
इस प्रकार औपनिवेशिक शासन ने चरवाहों की स्वतंत्र और स्वावलंबी जीवनशैली को बंधन और करों से जकड़ दिया।
प्रश्न :- इन बदलावों ने चरवाहों की जिंदगी को किस प्रकार प्रभावित किया?
उत्तर :- औपनिवेशिक काल के दौरान किए गए बदलावों से चरवाहों का जीवन बहुत कठिन हो गया। इन बदलावों का असर उनके चारे, चरागाहों और मवेशियों पर पड़ा।
1. चरागाहों की कमी :- खेती के विस्तार और भूमि विकास के कारण चरागाह क्षेत्रों में कमी आ गई। पहले जो जमीन चरने के काम आती थी, वह अब खेती योग्य भूमि में बदल दी गई।
2. जानवरों की बढ़ती संख्या :- कम चरागाह बचने से वहां मवेशियों की भीड़ बढ़ गई। सीमित जमीन पर ज्यादा जानवरों के कारण घास जल्दी खत्म होने लगी।
3. चरागाहों की गुणवत्ता में गिरावट :- अत्यधिक चराई (Overgrazing) से घास और पौधों का विकास रुक गया। धीरे-धीरे चरागाह बंजर और अनुपजाऊ होते चले गए।
4. जानवरों के स्वास्थ्य पर असर :- चारे की कमी से मवेशी कमजोर और बीमार पड़ने लगे। उनकी संख्या में लगातार कमी आने लगी।
5. अकाल और भूखमरी का संकट :- अकाल पड़ने पर जब घास नहीं उगती थी, तो जानवर भूख से मरने लगते थे। कई चरवाहे अपने पारंपरिक पशुपालन कार्य से वंचित हो गए।
उदाहरण :-
राजस्थान और महाराष्ट्र के धंगर तथा राइका चरवाहों के क्षेत्र में चरागाहों की कमी और सूखे के कारण हजारों मवेशियों की मौत हुई और कई परिवारों को अपना व्यवसाय छोड़ना पड़ा।
इस प्रकार, अंग्रेजों की नीतियों और भूमि परिवर्तन के कारण चरवाहों का जीवन संकटग्रस्त हो गया।
प्रश्न :- चरवाहों ने औपनिवेशिक काल में हुए बदलावों का सामना कैसे किया?
उत्तर :- औपनिवेशिक शासन के दौरान जब चरागाहों में कमी, टैक्स और कानूनों की सख्ती बढ़ी, तब चरवाहों ने अपने जीवन को बचाने के लिए कई उपाय अपनाए।
1. जानवरों की संख्या कम करना :- चारे की कमी के कारण चरवाहों ने अपने मवेशियों की संख्या घटा दी। इससे उन्हें सीमित घास पर जानवरों को पालना आसान हुआ।
2. नए चरागाहों की खोज :- चरवाहे नई जगहों की तलाश में निकल पड़े। कुछ लोग हरियाणा के खेतों में जाने लगे, जहाँ फसल की कटाई के बाद खाली पड़े खेतों में जानवरों को चरा सकते थे।
3. स्थायी रूप से बसना :- कुछ अमीर चरवाहों ने जमीन खरीदकर वहीं बसना शुरू कर दिया। वे खेती करने लगे और धीरे-धीरे घुमंतू जीवन छोड़ दिया।
4. व्यापार या मजदूरी अपनाना :- कई चरवाहे जिन्होंने चरागाह खो दिए, वे मजदूरी या छोटे व्यापार में लग गए। कुछ ने पशु उत्पादों (दूध, ऊन, चमड़ा) का व्यापार शुरू कर दिया।
5. आर्थिक कठिनाइयों का सामना :- जिनके पास धन नहीं था, उन्हें ऋण लेकर जीवन चलाना पड़ा। धीरे-धीरे कई चरवाहे कर्ज़ और गरीबी के जाल में फँस गए।
उदाहरण :-
महाराष्ट्र के धंगर चरवाहे सूखे के मौसम में हरियाणा और कोंकण के इलाकों में जाकर मवेशियों को चराने लगे, जबकि कुछ ने खेती शुरू कर दी।
इस प्रकार, चरवाहों ने परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालकर अपने अस्तित्व को बनाए रखा।