CLASS 9 HISTORY NOTES IN HINDI CHAPTER - 4
वन समाज और उपनिवेशवाद
| Textbook | NCERT |
|---|---|
| Class | Class 9 |
| Subject | History |
| Chapter | Chapter 4 |
| Chapter Name | वन समाज और उपनिवेशवाद |
| Medium | Hindi |
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे?
4.1 वनों का विनाश क्यों हुआ?
वनों से प्राप्त लाभ:-
वन हमारे जीवन की अनेक दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करते हैं और हमें कई प्रकार की उपयोगी वस्तुएँ प्रदान करते हैं।
- डाई (रंग) — पेड़ों की छाल, पत्तियों और फूलों से प्राकृतिक रंग प्राप्त होते हैं।
- इमारती लकड़ियाँ — सागौन, साल, देवदार जैसी लकड़ियाँ घर, फर्नीचर और नाव बनाने में काम आती हैं।
- दवाइयाँ — नीम, तुलसी, सिनकोना जैसे पौधों से औषधियाँ तैयार की जाती हैं।
- मसाले — लौंग, दालचीनी, इलायची आदि वनों से ही प्राप्त होते हैं।
- शहद, चाय और कॉफी — मधुमक्खियों से शहद तथा पौधों से चाय-कॉफी की पत्तियाँ प्राप्त होती हैं।
- गोंद और रबड़ — पेड़ों से गोंद और रबड़ जैसी उपयोगी वस्तुएँ मिलती हैं।
- धार्मिक उपयोग — पूजा-अर्चना में प्रयोग होने वाली लकड़ी, फूल और पत्तियाँ वनों से प्राप्त होती हैं।
वनोन्मूलन (Deforestation):-
वृक्षों या वनों की बड़े पैमाने पर कटाई को वनोन्मूलन कहा जाता है। यह प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ने वाली एक गंभीर प्रक्रिया है। औपनिवेशिक काल में अंग्रेज़ों ने रेल, जहाज और उद्योगों के लिए लकड़ी की भारी माँग बढ़ा दी, जिससे वनों की कटाई तेज़ी से बढ़ी।
वनोन्मूलन के प्रमुख कारण:-
- ईंधन के लिए — ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में जलावन के रूप में लकड़ी की अधिक माँग हुई।
- खेती योग्य भूमि की आवश्यकता — जनसंख्या बढ़ने से अधिक भूमि की जरूरत पड़ी, जिसके लिए जंगल काटे गए।
- व्यापारिक कृषि को बढ़ावा — चाय, कॉफी और रबड़ जैसी फसलों की खेती के लिए बड़े पैमाने पर वनों की सफाई की गई।
- वैज्ञानिक वानिकी — प्राकृतिक वनों की जगह एक ही प्रकार के पेड़ लगाए गए।
- रेलवे निर्माण — रेल पटरियों के स्लीपर बनाने के लिए लाखों पेड़ काटे गए।
- उद्योगों की आवश्यकता — इमारती लकड़ी, गोंद, रबड़, दवाइयाँ, डाई आदि के लिए वनों का दोहन हुआ।
भारत में वन विनाश के प्रमुख कारण:-
- बढ़ती आबादी और खाद्य पदार्थों की माँग — नई कृषि भूमि की जरूरत ने जंगलों की कटाई बढ़ाई।
- रेलवे लाइनों का विस्तार — स्लीपरों और ईंधन के लिए लकड़ी की भारी माँग रही।
- व्यापारिक फसलों की खेती — यूरोप में चाय, कॉफी, रबड़ की माँग पूरी करने के लिए बागान बनाए गए।
- औद्योगिक विस्तार — इमारती लकड़ी, कोयला, गोंद और रेज़िन जैसे उत्पादों की माँग बढ़ी।
- औपनिवेशिक नीतियाँ — ब्रिटिश सरकार ने वनों को नियंत्रण में लेकर व्यावसायिक दृष्टि से दोहन किया।
भारत का पहला वन महानिदेशक — डायट्रिक ब्रैंडिस:-
डायट्रिक ब्रैंडिस (Dietrich Brandis) भारत के पहले वन महानिदेशक (Inspector General of Forests) थे। उन्होंने भारत में वैज्ञानिक वानिकी (Scientific Forestry) की शुरुआत की, वनों के प्रबंधन व संरक्षण के लिए नियम-कानून बनाए और वन विभाग की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारतीय वन सेवा (Indian Forest Service):-
भारतीय वन सेवा का उद्देश्य भारत के वनों का संरक्षण, विकास और प्रबंधन करना था। इसी सेवा के माध्यम से वैज्ञानिक वानिकी की शुरुआत हुई और वनों के संगठन, सर्वेक्षण व नीति-निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई गई।
वन अधिनियम (Forest Act):-
1865 ईस्वी में भारत में पहला वन अधिनियम बनाया गया। 1878 में इस अधिनियम को संशोधित कर जंगलों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया।
| श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| आरक्षित वन | ग्रामीणों को लकड़ी, चराई या शिकार की कोई अनुमति नहीं |
| सुरक्षित वन | सीमित मात्रा में लकड़ी या अन्य वन उपज लेने की अनुमति |
| ग्रामीण वन | दैनिक कार्यों के लिए उपयोग, वह भी सरकार की अनुमति से |
4.1.1 जमीन की बेहतरी के नाम पर क्या परिवर्तन किए गए?
कृषि विस्तार:-
औपनिवेशिक काल में जमीन की बेहतरी के नाम पर खेती का क्षेत्र लगातार बढ़ाया गया, ताकि ब्रिटिश व्यापारिक लाभ के लिए अधिक कच्चा माल मिल सके।
- सन् 1600 में भारत के कुल भूभाग के लगभग छठे हिस्से पर खेती होती थी, जो समय के साथ बढ़कर आधे हिस्से तक पहुँच गई।
- बढ़ती जनसंख्या के साथ खाद्य पदार्थों की माँग भी बढ़ती गई।
- खेती का क्षेत्र बढ़ाने के लिए किसानों को जंगल साफ करने पड़े।
- अंग्रेज़ों ने पटसन, गन्ना, कपास जैसी व्यावसायिक फसलों को प्रोत्साहन दिया ताकि उनके उद्योगों के लिए कच्चा माल मिल सके।
4.1.2 रेलवे के लिए स्लीपरों की आवश्यकता ने वनों को कैसे प्रभावित किया?
रेलवे और वनों का विनाश:-
- 1850 के दशक में रेलवे नेटवर्क के विस्तार ने लकड़ी की भारी माँग पैदा कर दी।
- इंजनों को चलाने के लिए ईंधन तथा रेल पटरियों को जोड़ने के लिए 'स्लीपर' के रूप में लकड़ी चाहिए थी।
- एक मील लंबी पटरी के लिए लगभग 1760 से 2000 स्लीपरों की आवश्यकता पड़ती थी।
- सरकार ने लकड़ी की आपूर्ति के लिए ठेकेदारों को अनुमति दी, जिन्होंने बिना सोचे-समझे पेड़ काटना शुरू कर दिया।
4.1.3 बागानों के विस्तार से वनों पर क्या प्रभाव पड़ा?
बागान प्रणाली (Plantation System):-
- यूरोप में चाय, कॉफी और रबड़ की माँग तेजी से बढ़ी, जिसे पूरा करने के लिए भारत जैसे देशों में बागानों की स्थापना की गई।
- बागानों के लिए बड़ी मात्रा में प्राकृतिक जंगलों को साफ किया गया।
- ब्रिटिश सरकार ने जंगलों को नियंत्रण में लेकर यूरोपीय बागान मालिकों को सस्ती दरों पर भूमि सौंप दी।
- बागानों से तैयार चाय-कॉफी यूरोप निर्यात की जाती थी, जिससे अंग्रेज़ों को भारी लाभ हुआ।
4.2 व्यवसायिक वानिकी की शुरुआत कैसे हुई?
वैज्ञानिक वानिकी (Scientific Forestry):-
वैज्ञानिक वानिकी एक ऐसी पद्धति थी जिसमें प्राकृतिक वनों की कटाई कर उनके स्थान पर एक ही प्रजाति के पेड़ कतारबद्ध तरीके से लगाए जाते थे। इसका उद्देश्य लकड़ी का उत्पादन बढ़ाना और वनों का नियंत्रित दोहन करना था।
- शुरू में इसे "वैज्ञानिक" कहा गया, लेकिन बाद में यह अवैज्ञानिक सिद्ध हुई।
- इससे जैव विविधता घट गई क्योंकि केवल एक ही प्रजाति के पेड़ लगाए गए।
- कई जंगली जानवरों और पौधों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो गए।
भारत में व्यवसायिक वानिकी की शुरुआत:-
- जर्मन विशेषज्ञ डायट्रिक ब्रैंडिस ने भारत में यह विचार प्रस्तुत किया कि वनों का वैज्ञानिक प्रबंधन आवश्यक है।
- जंगलों के प्रबंधन के लिए एक संगठित व कानूनी तंत्र बनाया गया, जिससे कटाई, चराई और अन्य उपयोगों पर नियंत्रण रखा जा सके।
- अनियंत्रित कटाई करने वालों को दंडित करने की व्यवस्था बनाई गई।
- अलग-अलग प्रजातियों वाले प्राकृतिक वनों को काटकर उनकी जगह एक ही प्रजाति के पेड़ लगाए गए, जिसे "बागान प्रणाली" कहा गया।
4.2.1 लोगों का जीवन कैसे प्रभावित हुआ?
वन कानूनों का स्थानीय लोगों पर प्रभाव:-
- दैनिक जीवन पर रोक — लकड़ी काटना, पशु चराना, कंद-मूल व फल इकट्ठा करना गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।
- वन रक्षकों की मनमानी — वन अधिकारियों की सख्ती और मनमानी बढ़ गई, जिससे ग्रामीणों को परेशानियाँ झेलनी पड़ीं।
- घुमंतू खेती पर रोक — झूम खेती करने वाले जनजातीय समुदायों की खेती पर रोक लगा दी गई।
- चरवाहों पर प्रतिबंध — घुमंतू चरवाहों की आवाजाही सीमित कर दी गई।
- निर्भरता और अपमान — गाँववाले अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए वन रक्षकों की दया पर निर्भर हो गए।
- आजीविका का संकट — आदिवासी और वनवासी समुदायों को जंगल से बेदखल होना पड़ा।
4.2.2 वनों के नियमन से खेती कैसे प्रभावित हुई?
वन अधिनियम लागू होने के बाद जीवन पर प्रभाव:-
- ग्रामीणों की जरूरतों (ईंधन, चारा, कंदमूल, बाँस) और वन विभाग (केवल इमारती लकड़ी पर ध्यान) के हितों में टकराव हुआ।
- लकड़ी काटना, पशु चराना, फल बटोरना और जलावन एकत्र करना गैरकानूनी हो गया।
- जंगल से लकड़ी या चारा लेने पर ग्रामीणों को वन रक्षकों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था, और कई बार अधिकारी रिश्वत व दमन करने लगे।
- जंगलों से बेदखल होने के कारण लोगों की आजीविका खत्म हो गई, और वे गरीबी व शोषण के शिकार बन गए।
4.2.3 शिकार की आजादी किसे थी?
शिकार पर प्रतिबंध और असमानता:-
- जंगलों में रहने वाले लोग पहले हिरण, तीतर जैसे छोटे जानवरों का शिकार करके जीवन-यापन करते थे, परंतु नए वन कानूनों के बाद यह प्रथा गैरकानूनी घोषित कर दी गई।
- शिकार करते पकड़े जाने पर सामान्य लोगों को कड़ी सजा दी जाती थी।
- अंग्रेज़ अफसरों और नवाबों को शिकार की पूरी छूट दी गई थी।
- अंग्रेज़ अफसर शिकार को अपनी शक्ति और प्रभुता जताने का माध्यम मानते थे।
4.3 वन विद्रोह क्यों हुए?
वन विद्रोह:-
अंग्रेज़ों द्वारा बनाए गए वन कानूनों ने जंगलों में रहने वाले लोगों की आजीविका छीन ली। उनके लिए लकड़ी काटना, चराई करना और शिकार करना अपराध बन गया, जिसके विरोध में देश के अलग-अलग इलाकों में वन्य समुदायों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन किए — इन्हें "वन विद्रोह" कहा गया।
भारत के प्रमुख वन विद्रोह:-
- बस्तर विद्रोह (1908 ई.) — छत्तीसगढ़ में वन कानूनों और ब्रिटिश अत्याचारों के विरोध में हुआ।
- असम का विद्रोह — गारो और खासी जनजातियों ने वनों पर कब्जे के खिलाफ विद्रोह किया।
- ओडिशा का विद्रोह — कोंध जनजाति ने जंगलों पर अपने अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बगावत की।
- मध्य भारत का विद्रोह — भील और गोंड समुदायों ने जमीन-जंगल से बेदखली के विरोध में आंदोलन चलाया।
वन विद्रोहों के कारण और परिणाम:-
- वनवासियों को उनके पारंपरिक अधिकारों (लकड़ी, चारा, शिकार) से वंचित किया गया।
- अंग्रेज़ों की वन नीतियाँ और कठोर कानून उनके जीवन के लिए खतरा बन गए।
- इन विद्रोहों को अंग्रेज़ों ने बलपूर्वक दबा दिया, लेकिन इन्होंने सिद्ध कर दिया कि वन्य समाज अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित और दृढ़ है।
- आगे चलकर इन विद्रोहों ने स्वतंत्रता आंदोलन को भी प्रेरणा दी।
4.3.1 बस्तर के लोगों ने विरोध क्यों किया?
बस्तर के लोग और उनका जीवन:-
- स्थिति — बस्तर छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी भाग में स्थित है, जिसकी सीमाएँ आंध्र प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र से जुड़ी हैं। यहाँ से इंद्रावती नदी पूरब से पश्चिम की ओर बहती है।
- निवासी — यहाँ माड़िया, मुरिया, भतरा, हलबा जैसे कई आदिवासी समुदाय रहते हैं, जो अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं पर रीति-रिवाज व विश्वास समान हैं।
- धार्मिक विश्वास — बस्तर के लोग धरती को "धरती माँ" मानते हैं और नदियों, जंगलों व पहाड़ों की आत्माओं की भी पूजा करते हैं।
- सामुदायिक व्यवस्था — दूसरे गाँव के जंगल से लकड़ी लेने पर एक छोटा शुल्क अदा किया जाता है, और जंगल की सुरक्षा के लिए चौकीदार रखे जाते हैं।
ब्लेंडोंग डिएंस्ट (Blandongdiensten):-
डचों ने जंगलों में खेती करने वालों पर जमीन का लगान लगा दिया था। बाद में कुछ गाँवों को इस लगान से मुक्त कर दिया गया, परंतु शर्त रखी गई कि वे सामूहिक रूप से पेड़ काटने और लकड़ी ढोने के लिए भैंसे उपलब्ध कराएँ। इस मुफ़्त श्रम व पशु-सहायता वाली व्यवस्था को ब्लेंडोंग डिएंस्ट कहा गया।
4.4 जावा के जंगलों में क्या बदलाव हुए?
जावा के जंगलों में बदलाव:-
- जावा आज इंडोनेशिया का प्रमुख चावल उत्पादक क्षेत्र माना जाता है।
- भारत और इंडोनेशिया के वन कानूनों में कई समानताएँ थीं — दोनों जगह सरकार ने जंगलों पर नियंत्रण किया।
- सन् 1600 में जावा की आबादी लगभग 34 लाख थी।
- बाद में डच शासन के दौरान घुमंतू खेती पर पाबंदी लगाई गई और व्यावसायिक लकड़ी उत्पादन के लिए जंगलों को साफ किया गया।
4.4.1 जावा के लकड़हारों की भूमिका क्या थी?
जावा के लकड़हारों का विद्रोह:-
- जावा के लकड़हारे सागौन जैसे कीमती पेड़ों की कटाई में बहुत निपुण थे, जिनके बिना राजाओं के महल बनाना लगभग असंभव था।
- 18वीं सदी में जब डचों ने जंगलों पर नियंत्रण स्थापित करना शुरू किया, तो उन्होंने लकड़हारों के पारंपरिक अधिकार छीन लिए।
- इस अन्याय के खिलाफ लकड़हारों ने विद्रोह किया और डच शिविरों पर हमला किया।
- डच सरकार ने बलपूर्वक इस विद्रोह को दबा दिया और जंगलों पर अपना नियंत्रण बनाए रखा।
4.4.2 डच वैज्ञानिक वानिकी क्या थी?
डच वन कानूनों का ग्रामीणों पर प्रभाव:-
- ग्रामीणों का वनों में प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया, जिससे वे अपने पारंपरिक संसाधनों से वंचित हो गए।
- लकड़ी की कटाई केवल विशेष अनुमति से — वह भी सीमित कार्यों (नाव या घर बनाने) के लिए — की जा सकती थी।
- मवेशियों का चरना बिना अनुमति गैरकानूनी घोषित कर दिया गया, और नियमों के उल्लंघन पर दंड का प्रावधान था।
- इन नियमों से ग्रामीणों की आजीविका कमजोर हो गई और वे डच अधिकारियों की दया पर निर्भर हो गए।
4.4.3 सामीन की चुनौती क्या थी?
सामीनों का विद्रोह:-
जावा (इंडोनेशिया) में डचों के वन कानूनों के खिलाफ हुए इस विद्रोह का नेतृत्व सुरोंतिको सामीन ने किया। सामीन का मानना था कि राज्य को जंगल, धरती, हवा और पानी पर कर लगाने का अधिकार नहीं है, क्योंकि इन्हें प्रकृति ने बनाया है, न कि सरकार ने।
- सामीनों ने अहिंसात्मक तरीकों से डचों का विरोध किया।
- वे सर्वेक्षण करने आए अधिकारियों के सामने जमीन पर लेट जाते थे ताकि वे भूमि की माप न कर सकें।
- उन्होंने लगान व जुर्माना भरने और बेगार (मुफ़्त मजदूरी) करने से इंकार कर दिया।
- बाद में जब जापानियों ने जावा पर कब्ज़ा किया, तो उन्होंने वनवासियों को जबरन जंगल काटने के लिए बाध्य किया।