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CLASS 10 HISTORY NOTES IN HINDI CHAPTER - 1

यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय / The Rise of Nationalism in Europe

TextbookNCERT
ClassClass 10
SubjectHistory
ChapterChapter 1
Chapter Nameयूरोप में राष्ट्रवाद का उदय
MediumHindi

1.1 फ्रांसीसी क्रांति और राष्ट्र का विचार

राष्ट्र:-

अरनेस्ट रेनन के अनुसार राष्ट्र वह समूह है, जो समान भाषा, नस्ल और धर्म से जुड़ा होता है। एक राष्ट्र लंबे प्रयासों, त्याग और निष्ठा का परिणाम होता है।

  1. राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा से नहीं बनता।
  2. इसमें लोगों की साझा भाषा, संस्कृति, धर्म और इतिहास महत्त्वपूर्ण होते हैं।
  3. राष्ट्र बनने के लिए लोगों में एकता, त्याग और समर्पण की भावना होनी चाहिए।
  4. यह जनमानस की सामूहिक इच्छा का परिणाम होता है।

राष्ट्रवाद:-

अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना को राष्ट्रवाद कहते हैं। यह वह विचार है, जो लोगों को अपने देश की स्वतंत्रता, एकता और विकास के लिए प्रेरित करता है।

  1. राष्ट्रवाद में अपने राष्ट्र के प्रति गर्व की भावना होती है।
  2. यह लोगों को स्वतंत्रता और आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करने की शक्ति देता है।
  3. राष्ट्रवाद लोगों को सांस्कृतिक और ऐतिहासिक एकता का बोध कराता है।
  4. इससे समाज में त्याग, बलिदान और समर्पण की भावना उत्पन्न होती है।
उदाहरण:- भारत में स्वतंत्रता संग्राम के समय महात्मा गांधी के नेतृत्व में जागा हुआ स्वदेश प्रेम राष्ट्रवाद का उत्कृष्ट उदाहरण है।

नेपोलियन बोनापार्ट:-

फ्रांस का एक प्रसिद्ध शासक और सेनापति था। उसका जन्म 15 अगस्त 1769 को हुआ था। उसने अपने साहस और नेतृत्व क्षमता के बल पर यूरोप के इतिहास को गहराई से प्रभावित किया।

  1. नेपोलियन ने बहुत कम उम्र में ही सेना में महत्वपूर्ण पद प्राप्त कर लिया।
  2. 24 वर्ष की आयु में वह सेनापति बन गया।
  3. उसने फ्रांसीसी सेना को कई युद्धों में विजय दिलाई।
  4. उसकी सफलताओं ने उसे लोकप्रिय बनाया और अंततः वह फ्रांस का सम्राट बन गया।
नोट:- नेपोलियन ने 1799 में फ्रांस की सत्ता अपने हाथ में ली और आने वाले वर्षों में यूरोप के बड़े हिस्से पर प्रभुत्व स्थापित किया, जिसे इतिहास में "नेपोलियन युग" कहा जाता है।

उदारवाद:-

उदारवाद या Liberalism शब्द लैटिन भाषा के "Liber" शब्द से बना है, जिसका अर्थ है स्वतंत्रता। यह विचारधारा व्यक्ति की आज़ादी और कानून के समक्ष समानता पर आधारित है।

  1. उदारवाद का अर्थ है व्यक्ति को स्वतंत्रता प्रदान करना।
  2. इसके अनुसार सभी को कानून के समक्ष समान अधिकार मिलने चाहिए।
  3. यह शासन में निरंकुशता के विरुद्ध और लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में खड़ा होता है।
  4. नए मध्यम वर्ग के लिए उदारवाद का विशेष महत्व था, क्योंकि वे समान अवसर और अधिकार चाहते थे।

निरंकुशवाद:-

एक ऐसी शासन व्यवस्था है, जिसमें शासक की सत्ता पर किसी प्रकार का नियंत्रण या प्रतिबंध नहीं होता।

  1. इसमें शासक के आदेश को सर्वोच्च माना जाता है।
  2. जनता को शासन में भागीदारी का अधिकार नहीं मिलता।
  3. कानून और नियम शासक की इच्छा पर निर्भर होते हैं।
  4. यह व्यवस्था लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत मानी जाती है।
उदाहरण:- फ्रांस के लुई चौदहवें का शासन निरंकुशवाद का प्रसिद्ध उदाहरण है, जहाँ उसने स्वयं को "मैं ही राज्य हूँ" कहकर अपनी असीमित सत्ता को व्यक्त किया था।

जनमत संग्रह:-

एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें किसी क्षेत्र की पूरी जनता से प्रत्यक्ष मतदान कराकर यह निर्णय लिया जाता है कि किसी प्रस्ताव को स्वीकार किया जाए या अस्वीकार।

  1. यह लोकतंत्र की प्रत्यक्ष भागीदारी का उदाहरण है।
  2. इसमें जनता स्वयं किसी प्रस्ताव पर अपनी राय देती है।
  3. जनमत संग्रह के परिणाम को अंतिम माना जाता है।
  4. इससे जनता की इच्छा को स्पष्ट रूप से जाना जा सकता है।
उदाहरण:- 2016 में ब्रिटेन में आयोजित जनमत संग्रह में जनता ने "ब्रेग्ज़िट" यानी यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के पक्ष में मतदान किया।

यूटोपिया (कल्पनादर्श):-

एक ऐसे समाज की कल्पना है, जो पूरी तरह आदर्श और उत्तम हो, लेकिन वास्तविक जीवन में उसका साकार होना लगभग असंभव होता है।

  1. इसमें समाज को बिना किसी कमी या दोष के सोचा जाता है।
  2. यह केवल कल्पना पर आधारित होता है।
  3. यूटोपिया का विचार लोगों को बेहतर समाज बनाने की प्रेरणा देता है।
  4. इसे व्यवहारिक रूप से लागू करना बहुत कठिन होता है।
नोट:- थॉमस मूर की पुस्तक "यूटोपिया" (1516 ई.) में एक ऐसे आदर्श समाज का वर्णन मिलता है, जहाँ सब समान और सुखी होते हैं।

रूमानीवाद:-

एक सांस्कृतिक आंदोलन था, जिसका उद्देश्य लोगों में विशेष प्रकार की राष्ट्रीय भावना और सांस्कृतिक एकता का विकास करना था।

  1. इसमें कला, साहित्य और संगीत के माध्यम से राष्ट्रप्रेम को जागृत किया गया।
  2. यह आंदोलन भावनाओं और कल्पनाओं को महत्व देता था।
  3. रूमानीवाद ने इतिहास और लोक-संस्कृति के गौरव को सामने लाने का काम किया।
  4. इसने यूरोप में राष्ट्रवाद की भावना को बल प्रदान किया।

जुंकर्स:-

प्रशा की एक सामाजिक श्रेणी थी, जिसमें बड़े-बड़े ज़मींदार शामिल थे। वे समाज और राजनीति दोनों में प्रभावशाली माने जाते थे।

  1. जुंकर्स मुख्य रूप से भूमि के मालिक और धनवान वर्ग थे।
  2. इनका प्रशा की राजनीति और सेना पर गहरा प्रभाव था।
  3. यह वर्ग परंपरागत और रूढ़िवादी विचारधारा का समर्थक था।
  4. जुंकर्स ने प्रशा को एक सशक्त साम्राज्य बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नोट:- 19वीं शताब्दी में प्रशा के जुंकर्स वर्ग ने बिस्मार्क जैसे नेताओं को सहयोग देकर जर्मनी के एकीकरण में योगदान दिया।

राष्ट्रवाद के उदय के प्रमुख कारण:-

  1. निरंकुश शासन व्यवस्था – शासकों की असीमित सत्ता ने जनता में असंतोष पैदा किया।
  2. उदारवादी विचारों का प्रसार – स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग ने राष्ट्रवाद को बल दिया।
  3. स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व का नारा – फ्रांसीसी क्रांति के नारों ने पूरे यूरोप को प्रभावित किया।
  4. नवोदित मध्य वर्ग की भूमिका – इस वर्ग ने राष्ट्रवाद के लिए संगठित आंदोलनों और विचारधारा का नेतृत्व किया।

1.2 यूरोप में राष्ट्रवाद का निर्माण

यूरोप में राष्ट्रवाद का क्रमिक विकास:-

  1. फ्रांसीसी क्रांति (1789) – स्वतंत्रता और समानता के विचारों का प्रसार।
  2. नागरिक संहिता (1804) – कानून के समक्ष समानता को स्थापित करना।
  3. वियना संधि (1815) – यूरोप में राजनीतिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास।
  4. उदारवादियों की क्रांतियाँ (1848) – लोगों में लोकतांत्रिक अधिकारों और राष्ट्रीय चेतना का विकास।
  5. जर्मनी का एकीकरण (1866-1871) – भिन्न राज्यों का एक राष्ट्र में समेकन।
  6. इटली का एकीकरण (1859-1871) – विभाजित राज्यों का एकीकृत राष्ट्र में रूपांतरण।

यूरोप में राष्ट्रवाद का निर्माण कैसे हुआ:-

किसी भी राष्ट्र के निर्माण के लिए लोगों में सामूहिक पहचान, संस्कृति और परंपराओं की समानता आवश्यक होती है। यूरोप में भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग समाज और भाषाएँ थीं, जिससे राष्ट्रवादी चेतना विकसित करने में समय लगा।

  1. यूरोप में कई अलग-अलग समाज मौजूद थे, जिनकी भाषा और संस्कृति भिन्न थी।
  2. इस विविधता के बावजूद लोग राष्ट्रवादी विचारधारा के माध्यम से एक साझा पहचान की ओर बढ़े।
उदाहरण:- हैब्सबर्ग साम्राज्य में जर्मन, अंग्रेज़ी, फ्रेंच, इटैलियन जैसी भिन्न भाषाएँ बोली जाती थीं, फिर भी जर्मन राष्ट्रवाद ने उन्हें सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से एकजुट करने का प्रयास किया।

19वीं शताब्दी से पहले यूरोपीय समाज की संरचना:-

19वीं शताब्दी से पहले यूरोपीय समाज मुख्य रूप से असमान रूप से दो प्रमुख वर्गों में विभाजित था।

  1. उच्च वर्ग (कुलीन वर्ग) – इसमें राजा, रईस और अमीर ज़मींदार शामिल थे।
  2. निम्न वर्ग (कृषक वर्ग) – इसमें सामान्य लोग, मजदूर और किसानों का समूह था।

1.2.1 कुलीन वर्ग और नया मध्यवर्ग

उच्च वर्ग (कुलीन वर्ग):-

इसे कुलीन वर्ग भी कहा जाता था, समाज में सबसे अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली वर्ग था।

  1. उच्च वर्ग की जनसंख्या कम थी।
  2. यह वर्ग समाज में वर्चस्व जमाने वाला था।
  3. इसमें ज़मींदार शामिल थे, जो बड़े-बड़े खेतों और संपत्ति के मालिक होते थे।
  4. उन्हें समाज और शासन में सभी अधिकार प्राप्त थे।

निम्न वर्ग (कृषक वर्ग):-

इसे कृषक वर्ग कहा जाता था, समाज का बड़ा और कमज़ोर हिस्सा था।

  1. इस वर्ग की जनसंख्या अधिक थी।
  2. इसमें ज़मीनहीन लोग शामिल थे, जो या तो जमीन के किनारे रहते थे या किराए पर खेती करते थे।
  3. उन्हें समाज और शासन में कोई विशेष अधिकार नहीं दिए जाते थे।
  4. यूरोपीय समाज असमान रूप से विभाजित था।
  5. कृषक वर्ग के लोग ज़मीन के मालिक नहीं होते थे और कुलीन वर्ग के अधीन रहते थे।

नया मध्यवर्ग:-

19वीं सदी में यूरोप में उभरा और इसमें मुख्य रूप से पढ़े-लिखे लोग शामिल थे।

  1. इसमें शिक्षक, डॉक्टर, उद्योगपति, व्यापारी और अन्य शिक्षित पेशेवर शामिल थे।
  2. पढ़े-लिखे होने के कारण उन्होंने समान कानून और न्याय की मांग की।
  3. इस वर्ग ने उदारवादी और राष्ट्रवादी विचारों का समर्थन किया।
  4. नया मध्यवर्ग समाज में राजनीतिक और आर्थिक बदलावों का प्रमुख प्रेरक बन गया।

1.2.2 उदारवादी राष्ट्रवाद के मायने

उदारवादी राष्ट्रवाद:-

एक ऐसा विचार था जिसने समान अधिकार, स्वतंत्रता और कानून के समक्ष समानता की भावना को बढ़ावा दिया। इसके चलते राष्ट्रवाद के विचार पूरे यूरोप में फैलने लगे और कई राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक सुधार हुए।

  1. 1789 में फ्रांस की क्रांति उदारवादी राष्ट्रवाद के प्रभाव से हुई।
  2. राज्य के अंदर नियंत्रण (वस्तुओं और पूंजी के आगमन पर) को खत्म कर दिया गया।
  3. अलग-अलग राज्यों के बीच सीमा शुल्क (कस्टम्स) को समाप्त करने के लिए "जॉलवेराइन" (Zollverein) संगठन बनाया गया।
  4. शुल्क अवरोध हटाकर आर्थिक एकता को बढ़ावा दिया गया।
  5. मुद्राओं की संख्या को घटाकर दो कर दिया गया, जबकि पहले 30 से अधिक मुद्राएँ थीं।
  6. नेपोलियन के समय केवल धनवान पुरुष ही मतदान कर सकते थे।

जॉलवेराइन (Zollverein):-

एक जर्मन शुल्क संघ था, जिसमें अधिकतर जर्मन राज्य शामिल थे। इसे 1834 में प्रशा की पहल पर स्थापित किया गया। इसका उद्देश्य राज्यों के बीच आर्थिक अवरोधों को हटाना और व्यापार को सरल बनाना था।

  1. यह संघ जर्मनी के अधिकांश राज्यों को जोड़ता था।
  2. इसमें भिन्न-भिन्न राज्यों के बीच सीमा शुल्क और अन्य आर्थिक अवरोधों को समाप्त कर दिया गया।
  3. मुद्राओं की संख्या घटाकर दो कर दी गई, जब पहले 20 से अधिक मुद्राएँ प्रचलित थीं।
  4. जॉलवेराइन जर्मनी के आर्थिक एकीकरण का प्रतीक बना।

यूरोप में राष्ट्रवाद की शुरुआत:-

  1. 1789 की फ्रांसीसी क्रांति ने राष्ट्रवाद की नींव रखी।
  2. इस क्रांति से "स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व" का नारा पूरे यूरोप में फैल गया।
  3. इसने नागरिकों को समान अधिकार दिए और सामंती विशेषाधिकार समाप्त कर दिए।
  4. बाद में फ्रांसीसी सेनाएँ जब अन्य देशों में गईं तो वे अपने साथ राष्ट्रवाद का विचार भी ले गईं।
  5. इससे यूरोप के अलग-अलग देशों में स्वतंत्रता और एकता की मांग उठने लगी।

1789 की फ्रांसीसी क्रांति को राष्ट्रवाद की शुरुआत माना जाना:-

चूँकि 1789 की फ्रांसीसी क्रांति राष्ट्रवाद की स्पष्ट तथा पहली अभिव्यक्ति थी। इससे फ्रांस और पूरे यूरोप में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ। इसलिए इसे राष्ट्रवाद की शुरुआत माना जाता है।

  1. इस क्रांति ने फ्रांस में राजतंत्र समाप्त कर दिया और सत्ता नागरिकों को सौंप दी।
  2. क्रांति से पहले फ्रांस में पूरे राज्य पर एक निरंकुश राजा का शासन था।
  3. क्रांतिकारियों ने ऐसे कदम उठाए जिससे फ्रांसीसी लोगों में सामूहिक पहचान (राष्ट्रवाद) की भावना विकसित हुई।
  4. नेपोलियन ने प्रशासनिक क्षेत्र में सुधार किए, जिन्हें 1804 की नागरिक संहिता (नेपोलियन संहिता) कहा जाता है।
  5. उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में यूरोप में राष्ट्रीय एकता के विचार उदारवाद से जुड़े हुए थे।

सामूहिक पहचान बनाने के लिए फ्रांस में उठाए गए कदम:-

  1. प्रत्येक राज्य से एक स्टेट जनरल चुनकर तथा उसका नाम बदलकर नेशनल असेंबली रखा गया।
  2. फ्रेंच भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया।
  3. एक नई प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई, ताकि सबको समान कानून का अनुभव हो।
  4. आंतरिक आयात-निर्यात और सीमा शुल्क समाप्त कर दिए गए तथा भार और माप की एक समान व्यवस्था लागू की गई।
  5. स्कूल और कॉलेज की छात्र-छात्राओं ने समर्थन के लिए क्लब बनाए, जिन्हें जैकोबिन क्लब कहा गया।
  6. फ्रांस की आर्मी को विदेशी क्षेत्र में भेजा गया, जिससे राष्ट्रवादी भावना और मज़बूत हुई।

फ्रांस में फ्रांसीसी क्रांति एवं राष्ट्रवाद के प्रभाव:-

  1. संविधान आधारित शासन व्यवस्था लागू हुई।
  2. समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे विचार प्रमुख बने।
  3. नया फ्रांसीसी तिरंगा झंडा अपनाया गया।
  4. नेशनल असेंबली का गठन किया गया।
  5. आंतरिक आयात-निर्यात शुल्क समाप्त कर दिए गए।
  6. माप-तौल की एक समान व्यवस्था लागू की गई।
  7. फ्रेंच भाषा को राष्ट्र की साझा भाषा घोषित किया गया।

नेपोलियन का शासनकाल:-

फ्रांस और यूरोप के लिए एक महत्वपूर्ण दौर था। उसने प्रजातंत्र को हटाकर राजतंत्र स्थापित किया, लेकिन साथ ही प्रशासनिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में कई बदलाव भी किए।

  1. नेपोलियन ने फ्रांस में प्रजातंत्र समाप्त कर राजतंत्र को स्थापित किया।
  2. उसके समय व्यापार, आवागमन और संचार के साधनों का विकास हुआ।
  3. राष्ट्रीयता के विचार को फैलाने के लिए उसने कई विदेशी क्षेत्रों पर कब्ज़ा किया।
  4. जनता पर अधिक कर लगाए और सेना में जबरन भर्ती जैसे कानून लागू किए।
  5. 1804 में नेपोलियन संहिता बनाई गई, जिसने समान नागरिक अधिकार और प्रशासनिक सुधार दिए।

1804 की नेपोलियन संहिता (नागरिक संहिता):-

1804 में लागू की गई नेपोलियन संहिता एक महत्वपूर्ण कानूनी सुधार था। इसने जन्म आधारित विशेषाधिकारों को समाप्त किया और सभी नागरिकों के लिए समानता सुनिश्चित की।

  1. जन्म पर आधारित विशेषाधिकारों की समाप्ति की गई।
  2. सभी को कानून के सामने समानता दी गई और संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित किया गया।
  3. प्रशासनिक विभाजनों को सरल और व्यवस्थित किया गया।
  4. सामंती व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया।
  5. किसानों को भू-दासत्व और जागीरदारी शुल्कों से मुक्ति मिली।
  6. शहरों में कारीगरों के श्रेणी संघों (Guilds) के नियंत्रण समाप्त कर दिए गए।

जागीरदारी:-

एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें किसान, ज़मींदारों और उद्योगपतियों द्वारा तैयार किए गए सामान या उपज का एक हिस्सा कर के रूप में सरकार या शासक वर्ग को देते थे।

  1. किसान ज़मींदारों की ज़मीन पर काम करते थे।
  2. उन्हें अपनी उपज का एक भाग कर या शुल्क के रूप में देना पड़ता था।
  3. यह व्यवस्था किसानों पर भारी बोझ बन गई थी।
  4. जागीरदारी प्रणाली से समाज में असमानता और शोषण बढ़ा।

1.3 1815 के बाद एक नया रूढ़िवाद

रूढ़िवाद:-

एक राजनीतिक विचारधारा है जो परंपरा, स्थापित संस्थानों और रिवाजों को महत्व देती है। यह अचानक बदलावों के बजाय धीरे-धीरे और क्रमिक विकास को प्राथमिकता देती है।

  1. परंपरा और स्थापित संस्थानों का सम्मान करना।
  2. समाज और शासन में अचानक बदलावों से बचना।
  3. धीरे-धीरे सुधार और विकास को महत्व देना।
  4. सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना।

1815 के उपरांत यूरोप में रूढ़िवाद:-

1815 में नेपोलियन की हार के बाद यूरोप की अधिकांश सरकारों ने रूढ़िवाद की नीति अपनाई। उन्होंने पारंपरिक संस्थाओं और पूर्ववर्ती ढांचे को बनाए रखने का प्रयास किया और नेपोलियन के समय हुए कई बदलावों को वापस लिया।

  1. नेपोलियन की हार के बाद यूरोप में सरकारों का झुकाव रूढ़िवाद की ओर बढ़ गया।
  2. पारंपरिक संस्थाओं और पूर्ववर्ती ढांचे को बनाए रखने की कोशिश की गई।
  3. नेपोलियन द्वारा किए गए कई सुधारों और बदलावों को समाप्त किया गया।
  4. इसे लागू करने के लिए देशों के बीच वियना समझौता (वियना संधि) किया गया।

वियना कांग्रेस:-

1815 में नेपोलियन की हार के बाद यूरोप की प्रमुख शक्तियों — ब्रिटेन, प्रशा, रूस और ऑस्ट्रिया — के प्रतिनिधि एक समझौता तैयार करने के लिए वियना में इकट्ठे हुए। इसे ही वियना कांग्रेस के नाम से जाना जाता है। इसका उद्देश्य यूरोप में राजनीतिक संतुलन और स्थिरता स्थापित करना था।

  1. वियना कांग्रेस 1815 में आयोजित की गई थी।
  2. इसमें नेपोलियन को हराने वाली प्रमुख यूरोपीय शक्तियाँ शामिल थीं — ब्रिटेन, प्रशा, रूस और ऑस्ट्रिया।
  3. सम्मेलन का उद्देश्य यूरोप में राजनीतिक संतुलन और स्थिरता सुनिश्चित करना था।
  4. इसकी अध्यक्षता ऑस्ट्रियन चांसलर मेटरनिख ने की।
  5. वियना कांग्रेस ने नेपोलियन के समय हुए कई बदलावों को रद्द कर पारंपरिक शासन और सीमाओं को पुनः स्थापित किया।

वियना संधि के तहत मुख्य निर्णय:-

  1. फ्रांस की सीमाओं पर कई नए राज्य स्थापित किए गए ताकि भविष्य में फ्रांस का विस्तार रोका जा सके।
  2. फ्रांसीसी क्रांति के दौरान हटाए गए बूर्बो वंश को पुनः सत्ता में बहाल किया गया।
  3. राजतंत्र और पारंपरिक शासन व्यवस्था को बनाए रखा गया।

1815 की वियना संधि की मुख्य विशेषताएँ:-

  1. फ्रांस में बूर्बो राजवंश को पुनः सत्ता में बहाल किया गया।
  2. इसका मुख्य उद्देश्य यूरोप में नई रूढ़िवादी व्यवस्था स्थापित करना था।
  3. फ्रांस ने नेपोलियन के समय जितने क्षेत्र जीते थे, उन पर अपना आधिपत्य खो दिया।
  4. फ्रांस के सीमा विस्तार को रोकने के लिए नए राज्यों की स्थापना की गई।

1.4 क्रांतिकारी कौन थे

यूरोप में क्रांतिकारियों का उदय:-

वियना संधि और यूरोप की रूढ़िवादी सरकारों के निर्णयों के विरोध में यूरोप में क्रांतिकारियों का उदय हुआ। उन्होंने गुप्त समाजों का निर्माण कर राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता की भावना फैलाने का प्रयास किया।

  1. क्रांतिकारियों का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना था।
  2. वे वियना संधि और उसके निर्णयों का विरोध करते थे।
  3. उनका प्रयास था स्वतंत्रता और समानता की रक्षा करना।
  4. उन्होंने गुप्त समाजों और संगठनों के माध्यम से क्रांतिकारी गतिविधियाँ कीं।

1.5 क्रांतियों का युग (1830–1848)

1.5.1 भूख, कठिनाइयाँ और जन-विद्रोह

1830 में यूरोप में भूख, कठिनाई और जन-विद्रोह के कारण:-

1830 को यूरोप में कठिनाइयों और जन-विद्रोह का वर्ष माना जाता है। इस दौरान बढ़ती जनसंख्या, बेरोजगारी, गरीबी और फसल की खराबी के कारण लोग सरकार के विरोध में सड़कों पर उतर आए थे।

  1. जबरदस्त जनसंख्या वृद्धि हुई, जिससे संसाधनों पर दबाव बढ़ा।
  2. लोग गांव से शहरों की ओर पलायन करने लगे। बेरोजगारी और गरीबी बढ़ गई। फसल बर्बाद होने के कारण खाने-पीने की चीज़ों की कीमतें बढ़ गईं और छोटी फैक्ट्रियाँ बंद हो गईं।
  3. खाने की कमी और व्यापक बेरोजगारी के कारण लोग सरकार के खिलाफ विद्रोह करने लगे।
  4. यह आंदोलन कृषक विद्रोह के नाम से जाना गया।
  5. परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में यूरोपीय सरकारों ने गणतंत्र राज्य घोषित किए।
नोट:- फ्रांस में 1830 की जुलाई क्रांति इसी जन-विद्रोह और सामाजिक असंतोष का परिणाम थी, जिसने चार्ल्स X की सत्ता को समाप्त कर दिया।

गणतंत्र के बाद कानून में बदलाव:-

गणतंत्र स्थापित होने के बाद यूरोप में कई सुधार किए गए, जिससे नागरिकों को अधिकार और रोजगार की गारंटी मिली और सामाजिक स्थिति सुधरी।

  1. 21 साल से अधिक उम्र के लोगों को वोट डालने का अधिकार मिला।
  2. सभी नागरिकों को काम के अधिकार की गारंटी दी गई।
  3. रोजगार उपलब्ध कराने के लिए कारखाने और उद्योग स्थापित किए गए।
  4. इन सुधारों से धीरे-धीरे गरीबी और बेरोजगारी कम होने लगी।

नारीवाद (स्त्रीवाद):-

एक ऐसी विचारधारा है जो महिलाओं को पुरुषों के समान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकार दिलाने की बात करती है।

  1. नारी और पुरुष को समान अधिकार मिलने की मांग।
  2. समाज में महिलाओं की स्थिति सुधारने का प्रयास।
  3. शिक्षा, रोजगार और राजनीति में समान अवसर की वकालत।
  4. महिलाओं के प्रति भेदभाव और अन्याय का विरोध।

विचारधारा:-

एक विशेष प्रकार की सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि को दर्शाने वाले विचारों का समूह होती है।

  1. यह किसी समाज या राष्ट्र की सोच और नीति को दिशा देती है।
  2. इससे व्यक्ति या समूह के कार्यों और उद्देश्यों का निर्धारण होता है।
  3. अलग-अलग विचारधाराएँ समाज में भिन्न दृष्टिकोण पैदा करती हैं।
  4. जैसे – उदारवाद, रूढ़िवाद, समाजवाद आदि प्रमुख विचारधाराएँ हैं।

1.6 जर्मनी और इटली का निर्माण

1.6.1 जर्मनी – क्या सेना राष्ट्र की निर्माता हो सकती है

जर्मनी का एकीकरण:-

एक लंबी राजनीतिक और सैन्य प्रक्रिया थी, जिसमें प्रशा (Prussia) ने मुख्य भूमिका निभाई।

  1. 1848 में यूरोपीय सरकारों ने जर्मनी को एकीकृत करने का प्रयास किया, परंतु राजशाही और सेना की ताकत से यह प्रयास विफल हो गया।
  2. इसके बाद प्रशा ने जर्मनी के एकीकरण की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली।
  3. प्रशा का मुख्यमंत्री ऑटो फॉन बिस्मार्क था, जिसे जर्मनी के एकीकरण का जनक माना जाता है।
  4. बिस्मार्क ने "लोहा और रक्त" की नीति अपनाते हुए ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस के साथ तीन युद्ध लड़े।
  5. सात वर्षों में इन तीनों युद्धों में प्रशा की विजय हुई और एकीकरण की प्रक्रिया पूरी हुई।
  6. 1871 ई. में कैसर विलियम प्रथम को नए जर्मन साम्राज्य का सम्राट घोषित किया गया।
  7. एकीकृत जर्मनी में मुद्रा, बैंकिंग और न्यायिक व्यवस्थाओं का आधुनिकीकरण किया गया।
नोट:- 1871 में फ्रांस पर विजय के बाद जर्मनी का एकीकरण पूर्ण हुआ और प्रशा यूरोप की एक प्रमुख महाशक्ति बन गया।

1.6.2 इटली का एकीकरण कैसे हुआ

इटली का एकीकरण:-

एक लंबी और कठिन प्रक्रिया थी, जिसमें कई क्रांतिकारी नेताओं और युद्धों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

  1. इटली सात स्वतंत्र राज्यों में बँटा हुआ था।
  2. 1830 के दशक में ज्यूसेपे मेत्सिनी ने "यंग इटली" नामक संगठन बनाकर एकीकृत इटली का विचार प्रस्तुत किया।
  3. 1830 और 1848 के क्रांतिकारी विद्रोह असफल रहे, परंतु इन्होंने एकीकरण की नींव रखी।
  4. 1859 में सार्डिनिया-पीडमॉण्ट ने फ्रांस के साथ एक चतुर कूटनीतिक संधि की और ऑस्ट्रियाई सेना को हरा दिया।
  5. 1861 में विक्टर इमेनुएल द्वितीय को एकीकृत इटली का राजा घोषित किया गया।
नोट:- 1861 में विक्टर इमेनुएल द्वितीय के नेतृत्व में इटली एकीकृत हुआ और रोम को राजधानी बनाकर इटली एक स्वतंत्र राष्ट्र बना। इटली के एकीकरण में तीन प्रमुख व्यक्तियों — ज्यूसेपे मेत्सिनी, काउंट कैवूर और ज्यूसेपे गैरीबाल्डी — की भूमिका प्रमुख रही।

ज्यूसेपे मेत्सिनी:-

इटली के महान राष्ट्रवादी नेता और स्वतंत्रता संग्राम के प्रेरणास्रोत थे। उन्होंने इटली को एकीकृत राष्ट्र बनाने के लिए युवाओं को संगठित किया और क्रांतिकारी विचार फैलाए।

  1. इनका जन्म 1807 ई. में जेनोआ (इटली) में हुआ था।
  2. युवावस्था में वे कार्बोनारी नामक गुप्त संगठन के सदस्य बने।
  3. 1831 में विद्रोह करने के प्रयास के कारण उन्हें देश से निकाला गया।
  4. निर्वासन के दौरान उन्होंने दो महत्वपूर्ण गुप्त संगठनों की स्थापना की — "यंग इटली" (मार्सेई में) और "यंग यूरोप" (बर्न में)।
  5. उन्होंने राजतंत्र का विरोध किया और प्रजातंत्र एवं राष्ट्रीय एकता का समर्थन किया।
  6. उनके विचारों और आंदोलनों से इटली के युवाओं में स्वतंत्रता की भावना जागी।

काउंट कैवूर:-

इटली के एकीकरण के प्रमुख निर्माता माने जाते हैं। उन्होंने अपने कूटनीतिक कौशल और राजनीतिक समझ से इटली को एकजुट करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

  1. कैवूर सार्डिनिया-पीडमॉण्ट का प्रमुख मंत्री था।
  2. उसने इटली के भिन्न प्रदेशों को एकजुट करने वाले आंदोलन का नेतृत्व किया।
  3. कैवूर स्वयं न तो क्रांतिकारी था, न ही लोकतंत्र में विश्वास रखने वाला, बल्कि एक व्यवहारिक राजनीतिज्ञ था।
  4. उसने फ्रांस के साथ एक चतुर कूटनीतिक संधि की, जिसके परिणामस्वरूप ऑस्ट्रिया की हार हुई।
  5. उसकी नीतियों और रणनीतियों के कारण इटली के एकीकरण की राह आसान हुई।

ज्यूसेपे गैरीबाल्डी:-

इटली के एकीकरण के महान जननायक थे। उन्होंने अपने साहस और नेतृत्व से इटली को एक राष्ट्र के रूप में एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

  1. गैरीबाल्डी नियमित सेना का हिस्सा नहीं थे, बल्कि उन्होंने स्वयंसेवक सैनिकों का नेतृत्व किया।
  2. 1860 में उन्होंने दक्षिणी इटली और दोनों सिसिलियों के राज्य में प्रवेश किया।
  3. उन्होंने स्पेनी शासकों को हटाने के लिए स्थानीय किसानों का समर्थन प्राप्त किया।
  4. विजय के बाद उन्होंने दक्षिणी इटली और सिसिली को राजा विक्टर इमेनुएल द्वितीय को सौंप दिया।
  5. उनके त्याग और वीरता के कारण इटली का एकीकरण संभव हुआ।

1.7 ब्रिटेन की अजीब दास्तान

ब्रिटेन में राष्ट्रवाद का विकास:-

ब्रिटेन में राष्ट्रवाद किसी अचानक हुई क्रांति का परिणाम नहीं था, बल्कि यह एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम था। औद्योगिक क्रांति के बाद ब्रिटेन की आर्थिक शक्ति बढ़ने से राष्ट्रवाद की भावना धीरे-धीरे विकसित हुई।

  1. 18वीं शताब्दी से पहले ब्रिटेन एक एकीकृत राष्ट्र नहीं था, बल्कि इसमें अंग्रेज़, वेल्श, स्कॉट और आयरिश जैसी भिन्न नृजातीय समूह रहते थे।
  2. 1688 में संसद ने राजतंत्र से शक्तियाँ छीन लीं, जिससे लोकतांत्रिक शासन की नींव पड़ी।
  3. 1707 में इंग्लैंड और स्कॉटलैंड को मिलाकर यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन का गठन किया गया।
  4. 1798 में आयरलैंड के असफल विद्रोह के बाद, 1801 में उसे बलपूर्वक ब्रिटेन में शामिल कर दिया गया।
  5. नए ब्रिटेन की पहचान मजबूत करने के लिए झंडा, राष्ट्रगान और सेना जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों को प्रोत्साहित किया गया।

1.8 राष्ट्र की दृश्य-कल्पना

राज्य की दृश्य कल्पना:-

18वीं और 19वीं शताब्दी में कलाकारों ने राष्ट्र को अमूर्त विचार से जोड़कर नारी रूप में चित्रित किया, जिससे राष्ट्र का ठोस और दृश्य रूप सामने आया।

  1. राष्ट्र को नारी भेष में प्रस्तुत किया जाता था।
  2. इस नारी का रूप किसी वास्तविक महिला से नहीं, बल्कि राष्ट्र के अमूर्त विचार को ठोस रूप देने के लिए चुना गया।
  3. यह तरीका राष्ट्रवादी भावना को सजग और प्रेरक बनाने में मदद करता था। उदाहरण के रूप में फ्रांस में मारिआना को जनता और राष्ट्र का प्रतीक माना गया।
  4. जर्मनी में जर्मेनिया का रूपक जर्मन राष्ट्र का प्रतीक बना।

राष्ट्रवाद के उदय में महिलाओं का योगदान:-

राष्ट्रवाद के उदय में महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया और राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक माध्यमों से राष्ट्रवादी चेतना फैलाने में मदद की।

  1. राजनैतिक संगठनों का निर्माण कर आंदोलन को संगठित किया।
  2. समाचार पत्रों का प्रकाशन कर राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार किया।
  3. मताधिकार प्राप्ति हेतु संघर्ष किया और समान अधिकारों की मांग की।
  4. राजनैतिक बैठकों और प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और आंदोलन को मजबूती दी।

विभिन्न राष्ट्रवादी प्रतीक चिन्ह और उनके अर्थ:-

18वीं और 19वीं शताब्दी में राष्ट्रवादी आंदोलनों में अलग-अलग प्रतीक चिन्हों का प्रयोग किया जाता था, जिनके माध्यम से राष्ट्रवादी विचार और भावनाएँ व्यक्त की जाती थीं।

प्रतीक चिन्हअर्थ
टूटी हुई बेड़ियाँआजादी मिलना
बाज़ छाप वाला कवचजर्मन समुदाय की प्रतीक शक्ति
बलूत पत्तियों का मुकुटवीरता
तलवारमुकाबले की तैयारी
तलवार पर लिपटी जैतून की डालीशांति की चाह
काला, लाल और सुनहरा तिरंगाउदारवादी राष्ट्रवादियों का झंडा
उगते सूर्य की किरणेंएक नए युग की शुरुआत

रूपक:-

वह साहित्यिक उपकरण है जिसमें किसी अमूर्त विचार (जैसे: लालच, स्वतंत्रता, ईर्ष्या, मुक्ति) को किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना के माध्यम से व्यक्त किया जाता है।

  1. अमूर्त विचारों को सजीव और समझने योग्य रूप में प्रस्तुत करता है।
  2. 18वीं और 19वीं शताब्दी में राष्ट्रवादी भावना को बढ़ाने के लिए इसका व्यापक प्रयोग किया गया।
  3. यह विचारों और भावनाओं को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने में मदद करता है।
  4. साहित्य और राजनीतिक संदेशों में प्रेरणा और चेतना जगाने का साधन होता है।
उदाहरण:- किसी कविता में स्वतंत्रता को "उड़ती हुई पक्षी" के रूप में दिखाना एक रूपक है, जो लोगों में राष्ट्रवादी भावना को प्रेरित करता है।

1.9 राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद का संबंध

बाल्कन समस्या:-

यूरोप के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित बाल्कन क्षेत्र में बढ़ते राष्ट्रवादी संघर्षों और यूरोपीय शक्तियों की प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न हुई थी। यह समस्या इतनी गंभीर हो गई कि अंततः प्रथम विश्व युद्ध का कारण बनी।

  1. भौगोलिक और नृजातीय विविधता वाला क्षेत्र — बाल्कन में आधुनिक रूमानिया, बल्गारिया, अल्बेनिया, ग्रीस, मकदूनिया, क्रोएशिया, स्लोवाकिया और सर्बिया जैसे देश शामिल थे।
  2. इन क्षेत्रों के मूल निवासी स्लाव कहलाते थे, और अधिकांश क्षेत्र पर ऑटोमन साम्राज्य का नियंत्रण था।
  3. रूमानी राष्ट्रवाद के प्रसार और ऑटोमन साम्राज्य के पतन से बाल्कन में स्वतंत्रता आंदोलनों की लहर उठी।
  4. विभिन्न स्लाव जातियाँ अपने स्वतंत्र राष्ट्र बनाने और अधिक क्षेत्र प्राप्त करने की चाह में आपसी टकराव में उतर आईं।
  5. यूरोपीय शक्तियाँ जैसे — इंग्लैंड, रूस, ऑस्ट्रिया आदि — इस क्षेत्र पर नियंत्रण के लिए प्रतिस्पर्धा करने लगीं, जिससे तनाव और बढ़ गया।
उदाहरण:- सर्बिया और ऑस्ट्रिया के बीच बढ़ता टकराव और ऑस्ट्रिया के युवराज फर्डिनेंड की हत्या (1914) ने बाल्कन विवाद को भड़का दिया, जो आगे चलकर प्रथम विश्व युद्ध का मुख्य कारण बना।

साम्राज्यवाद:-

वह नीति है जिसमें कोई देश अपनी शक्ति और प्रभाव बढ़ाने के लिए सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक साधनों का प्रयोग करता है और अन्य देशों या क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित करता है।

  1. यह देश की शक्ति और प्रभुत्व बढ़ाने की नीति है।
  2. इसमें सैन्य शक्ति, आर्थिक साधन और राजनीतिक दबाव का प्रयोग होता है।
  3. इसका उद्देश्य अन्य देशों या क्षेत्रों पर नियंत्रण और प्रभुत्व स्थापित करना होता है।
  4. साम्राज्यवाद अक्सर औपनिवेशिक विस्तार और संसाधनों पर कब्जे के रूप में दिखाई देता है।
उदाहरण:- 19वीं और 20वीं शताब्दी में ब्रिटेन और फ्रांस ने एशिया और अफ्रीका में अपने साम्राज्यवाद के तहत कई क्षेत्रों पर कब्जा किया।
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