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CLASS IX SCIENCE NOTES IN HINDI CHAPTER - 3

क्रियाशील ऊतक

TextbookNCERT (अन्वेषण)
ClassClass IX
SubjectScience
ChapterChapter 3
Chapter Nameक्रियाशील ऊतक
MediumHindi

3.1 पादप और जंतु ऊतक भिन्न क्यों हैं?

ऊतक (Tissue):-

समान संरचना वाली कोशिकाओं का समूह है जो एक विशिष्ट कार्य के लिए मिलकर कार्य करता है। समान प्रकार की कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं, एक से अधिक प्रकार के ऊतक मिलकर अंग बनाते हैं, विभिन्न अंग मिलकर अंग तंत्र बनाते हैं तथा अंग तंत्रों से मिलकर एक जीव बनता है। विभिन्न प्रकार के ऊतकों का निर्माण श्रम विभाजन की ओर ले जाता है जिससे शरीर की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।

पादप और जंतु ऊतकों में अंतर के कारण:-

  1. अधिकांश पादप एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैं और उन्हें अवलंब (सहारा) की आवश्यकता होती है — पादप कोशिकाओं में कोशिका भित्ति होती है जो दृढ़ता व अनम्यता प्रदान करती है। जंतु सामान्यतः गतिशील होते हैं और दृढ़ कोशिका भित्ति के अभाव में जंतु कोशिकाएँ सरलता से आकार बदल सकती हैं।
  2. पोषण की विधि भिन्न होती है — जंतुओं में पाचन हेतु ऊतक होते हैं जबकि पादपों में प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन संश्लेषित करने वाले ऊतक होते हैं।
  3. वृद्धि के पैटर्न भी भिन्न होते हैं क्योंकि वृद्धि के लिए उत्तरदायी ऊतकों की संरचना व प्रकार्यों में विभिन्नता होती है।

3.2 पादपों में वृद्धि के लिए ऊतक

विभज्योतक (Meristematic tissue):-

पादप तीन प्रकार से वृद्धि करते हैं — लंबाई में (तने की ऊँचाई और जड़ों की गहराई), तने की मोटाई (परिधि) में, और शाखाओं को काटने या चरने के पश्चात पुनःवृद्धि द्वारा। इस वृद्धि के लिए सक्रिय रूप से विभाजित होने वाली कोशिकाओं की आवश्यकता होती है जो सामूहिक रूप से एक विशेष ऊतक बनाती हैं जिसे विभज्योतक (Meristematic) ऊतक कहा जाता है।

नोट:- विभज्योतकी ऊतकों की कोशिकाएँ छोटी होती हैं, कोशिका भित्ति पतली होती है, केंद्रक बड़ा और सुस्पष्ट होता है, कोशिकाद्रव्य सघन होता है तथा रसधानियाँ सामान्यतः अनुपस्थित होती हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण इनमें निरंतर व तीव्र कोशिका विभाजन होता है।

3.2.1 शीर्षस्थ विभज्योतक — पौधे लंबाई में किस प्रकार वृद्धि करते हैं?

शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical meristem):-

जड़ों और प्ररोहों के अग्रभाग पर उपस्थित वृद्धि क्षेत्र हैं जो पौधों की लंबाई में वृद्धि करने में सहायता करते हैं। मूलाग्र (जड़ के सिरे) में सक्रिय रूप से विभाजित होने वाली कोशिकाएँ होती हैं जो समसूत्री विभाजन करती हैं।

उदाहरण:- क्रियाकलाप 3.1 में प्याज के शल्क कंद की जड़ों में वृद्धि का अध्ययन दर्शाता है कि जार 'क' की जड़ें लंबाई में वृद्धि करती रहती हैं, जबकि जार 'ख' के मूलाग्र काटे जाने के पश्चात जड़ें वृद्धि करना बंद कर देती हैं — इससे सिद्ध होता है कि जड़ें केवल अपने मूलाग्रों से वृद्धि करती हैं।

3.2.2 पार्श्व विभज्योतक — पौधे परिधि में किस प्रकार वृद्धि करते हैं?

पार्श्व विभज्योतक (Lateral meristem):-

एक वलय के रूप में व्यवस्थित सक्रिय रूप से विभाजित होने वाली कोशिकाओं की उपस्थिति के कारण तने की परिधि में वृद्धि होती है। ये कोशिकाएँ विभाजित होकर संकेंद्री रूप से भीतर और बाहर की ओर नई कोशिकाएँ निर्मित करती हैं जिससे तने के व्यास में वृद्धि होती है।

नोट:- लकड़ी की कटी हुई सतह पर दिखने वाले वलयाकार पैटर्न वार्षिक वृद्धि वलय कहलाते हैं। वैज्ञानिक इन वलयों को गिनकर वृक्ष की आयु का अनुमान लगा सकते हैं और उन जलवायु परिस्थितियों को भी समझ सकते हैं जिनमें उसकी वृद्धि हुई।

3.2.3 अंतर्वेशी विभज्योतक — काट दिए जाने के पश्चात पादप किस प्रकार वृद्धि करते हैं?

अंतर्वेशी विभज्योतक (Intercalary meristems):-

पर्व के आधार पर या पर्वसंधि के ठीक ऊपर स्थित होता है। पर्वसंधि तने का वह बिंदु है जहाँ से शाखाएँ या पत्तियाँ निकलती हैं; तने की दो पर्वसंधियों के मध्य का भाग पर्व कहलाता है। यदि युवा तने का अग्रभाग काट दिया जाए तो तना लंबाई में वृद्धि करना बंद कर देता है, किंतु तने की पर्वसंधि से नई शाखाएँ निकलती हैं।

उदाहरण:- उद्यान की बाड़ की छँटाई करने पर अधिक शाखाएँ आ जाती हैं जिससे बाड़ घनी दिखाई देती है। घास काटने या जंतुओं द्वारा चरने के पश्चात घास पुनः उगना भी तने के पर्वों पर विभज्योतक की उपस्थिति के कारण होता है।

इस प्रकार पौधों में तीन प्रकार के विभज्योतकी ऊतक होते हैं — शीर्षस्थ, पार्श्व और अंतर्वेशी। जिन कोशिकाओं में विभाजन की क्षमता समाप्त हो जाती है, उनकी संरचना व प्रकार्यों में परिवर्तन होकर वे स्थायी ऊतक (permanent tissue) में परिवर्तित हो जाती हैं — इस प्रक्रिया को विभेदन (differentiation) कहते हैं।

3.2.4 स्थायी ऊतक

स्थायी ऊतक (Permanent tissue):-

विभेदन के फलस्वरूप बनने वाले वे ऊतक हैं जिनकी कोशिकाएँ एक विशिष्ट कार्य के लिए विशेषीकृत हो जाती हैं। स्थायी ऊतक सरल (केवल एक प्रकार की कोशिकाओं से बने) या जटिल (एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से बने) हो सकते हैं।

(i) सुरक्षात्मक ऊतक — बाह्यत्वचा

बाह्यत्वचा (Epidermis):-

पादप काया की सबसे बाहरी परत बनाती है। यह संहत, चपटी व आयताकार कोशिकाओं की एकल परत से बनी होती है और पौधे के सभी भागों की सुरक्षा करती है। ये कोशिकाएँ क्यूटिन नामक मोमी परत — उपत्वचा (cuticle) — से ढकी होती हैं।

नोट:- जड़ों की बाह्यत्वचीय कोशिकाओं से बाल जैसे उभार (मूलरोम) निकलते हैं जो मृदा से जल व खनिजों के अवशोषण हेतु सतह क्षेत्रफल बढ़ाते हैं। पत्तियों की बाह्यत्वचा में रंध्र (stomata) होते हैं जो गैसीय विनिमय और वाष्पोत्सर्जन में सहायता करते हैं — वाष्पोत्सर्जन जाइलम में एक अभिकर्ष उत्पन्न करके जल परिवहन में सहायता करता है।

(ii) सहायक ऊतक — सरल स्थायी ऊतक

मृदूतक (Parenchyma):-

पतली भित्तियों वाली सजीव कोशिकाएँ, विरल रूप से व्यवस्थित (अंतरा कोशिकीय अवकाश सहित)। मुख्यतः भोजन का भंडारण करने के साथ-साथ हरित भागों में प्रकाश-संश्लेषण भी करता है। जलीय पादपों में विशेषीकृत मृदूतक वायु गुहिकाएँ बनाते हैं जो तैरने में सहायता करती हैं।

श्लेषोतक (Collenchyma):-

सजीव कोशिकाओं से बना, जिनके कोने पेक्टिन (लचीलापन देने वाला रसायन) के निक्षेपण से असमान रूप से स्थूलित (मोटे) होते हैं। यह पादप के तने व प्रतान जैसे भागों को सहारा व लचीलापन प्रदान करता है जिससे वे बिना टूटे झुक सकते हैं।

दृढ़ोतक (Sclerenchyma):-

लिग्निन के निक्षेपण के कारण मोटी भित्ति वाली कोशिकाएँ, जिनमें से अधिकांश मृत होती हैं। लिग्निन इन्हें कठोर व सुदृढ़ बनाता है। यह तनों, पर्ण शिराओं और बीजों/गिरियों के कठोर आवरणों (जैसे नारियल के रेशे, अखरोट के छिलके) में पाया जाता है।

(iii) संवहन ऊतक — जटिल स्थायी ऊतक

जाइलम (Xylem):-

वह ऊतक है जो जल और खनिजों का जड़ों से पादप के अन्य भागों तक परिवहन करता है और पादप को दृढ़ता भी प्रदान करता है। इसमें वाहिनिकाएँ, वाहिकाएँ, जाइलम मृदूतक और जाइलम तंतु होते हैं। जाइलम मृदूतक इसका एकमात्र जीवित घटक है; शेष घटक प्राथमिक रूप से दृढ़ोतकीय होते हैं।

फ्लोएम (Phloem):-

अधिकांशतः सजीव कोशिकाओं से बना होता है और पत्तियों से पादप के अन्य भागों तक भोजन का परिवहन करता है। इसमें चालनी नलिकाएँ (sieve tubes), सहचर कोशिकाएँ (companion cells), फ्लोएम मृदूतक और फ्लोएम तंतु होते हैं। सहचर कोशिकाएँ चालनी नलिकाओं में शर्करा के भारण-अभारण का अनुवीक्षण करती हैं।

पादप ऊतक तंत्र (तीन प्रकार):-

  1. त्वचीय ऊतक तंत्र:- पौधे का बाहरी आवरण बनाता है, आंतरिक भागों की रक्षा करता है और जल-हानि कम करता है।
  2. भरण ऊतक तंत्र:- त्वचीय व संवहन ऊतकों के मध्य मुख्य पादप काया बनाता है (मृदूतक, श्लेषोतक, दृढ़ोतक)।
  3. संवहन ऊतक तंत्र:- जाइलम और फ्लोएम से मिलकर बनता है।

3.3 जंतु ऊतक

जंतु ऊतकों के प्रकार:-

पौधों के समान, जंतु कोशिकाएँ भी समूहित होकर विशेषीकृत रूप से विभिन्न कार्य करती हैं। जंतु ऊतक मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं — उपकला, संयोजी, पेशी और तंत्रिका ऊतक।

3.3.1 उपकला ऊतक — संरचना और प्रकार्य

उपकला ऊतक (Epithelial tissue):-

शरीर के बाहरी आवरण (त्वचा) का निर्माण करता है और आंतरिक अंगों (मुँह, फेफड़ों, रक्त वाहिकाओं, आँत) का आस्तर भी बनाता है। यह बहुत कम अंतराल वाली संहत रूप से व्यवस्थित कोशिकाओं से बना होता है, जो रोगाणुओं के प्रवेश को रोकता है, जल-हानि कम करता है और अवशोषण, स्रवण व गति में सहायता करता है।

प्रकार्यसंरचनाशरीर में स्थान
विनिमयपतली, चपटी कोशिकाओं की एकल परतरक्त वाहिकाओं व फेफड़ों का आस्तर
सुरक्षाकोशिकाओं की अनेक परतें, चपटी व संहतत्वचा, मुँह, ग्रासनली
स्रवणघनाकार/स्तंभाकार विशेषीकृत कोशिकाएँलार ग्रंथियाँ, स्वेद ग्रंथियाँ, आमाशय
संवेदीपक्ष्माभ (cilia) वाली ग्राही कोशिकाएँनासाछिद्र, स्वाद-कलिकाएँ, आंतर कर्ण
अवशोषणलंबी, स्तंभ जैसी कोशिकाओं की एकल परत (रोम सहित)छोटी आँत का आस्तर

3.3.2 हमारे शरीर के विभिन्न भाग किस प्रकार जुड़े होते हैं?

संयोजी ऊतक (Connective tissue):-

वह ऊतक है जो अन्य ऊतकों को जोड़ता और सहारा देता है। रक्त और अस्थियाँ दोनों संयोजी ऊतक हैं, परंतु संयोजन व संगतता में भिन्न होते हैं — यह अंतर आधात्री (matrix) के कारण है, जो रक्त में जलीय व जेली जैसी होती है किंतु अस्थियों में कठोर, ठोस व दृढ़ होती है।

संयोजी ऊतकसंरचनाप्रकार्य
अस्थिकठोर व दृढ़ संरचनासुदृढ़ता, अवलंब और सुरक्षा देती है
उपास्थिनरम, लचीली, पुनः आकार लेने वालीलचीलापन, अस्थियों के सिरों को गद्दीदार बनाती है
कंडरासुदृढ़ पट्टियाँमाँसपेशी को अस्थि से जोड़ती है
स्नायुसुदृढ़ पट्टियाँअस्थि को अस्थि से जोड़ता है, गति सीमित करता है
नोट:- रक्त का लाल रंग हीमोग्लोबिन (लौह-समृद्ध प्रोटीन) के कारण होता है। लाल रक्त कोशिकाएँ लगभग 4 महीने जीवित रहती हैं। बिंबाणु (platelets) रक्त का थक्का बनाने में सहायता करते हैं। श्वेत रक्त कोशिकाएँ संक्रमित क्षेत्रों में एकत्र होकर मवाद व शोथ का कारण बनती हैं।

3.3.3 क्या हम अपने शरीर में गति को नियंत्रित कर सकते हैं?

ऐच्छिक गतियाँ (Voluntary movements) — कंकाल पेशी:-

हमारे सचेत नियंत्रण में होने वाली गतियाँ (जैसे दौड़ना, लिखना) कंकाल पेशियों द्वारा संपन्न होती हैं जो कंकाल से जुड़ी होती हैं। इनकी कोशिकाएँ लंबी, बेलनाकार, अशाखित, बहुकेंद्रकी (अनेक केंद्रक वाले) और रेखित (धारियों वाली) होती हैं।

अनैच्छिक गतियाँ (Involuntary movements) — चिकनी और हृद पेशी:-

चिकनी पेशियाँ (smooth muscles) आमाशय व आँत जैसे अंगों में पाई जाती हैं — तर्कुरूप, एकल केंद्रक वाली, बिना धारियों के; पाचन जैसी धीमी, सतत गतियों में सहायक। हृदय पेशियाँ (cardiac muscles) केवल हृदय में पाई जाती हैं — बेलनाकार, शाखित, एकल केंद्रक व हल्की धारियों वाली; अथक व लयबद्ध रूप से कार्य करती हैं।

3.3.4 शरीर किस प्रकार संवेदन, संप्रेषण और अनुक्रिया करता है?

तंत्रिका ऊतक (Nervous tissue):-

शरीर का नियंत्रण और समन्वय संजाल बनाता है। मस्तिष्क नियंत्रण केंद्र के रूप में कार्य करता है। इसकी कोशिकाओं को न्यूरॉन (neuron) कहते हैं जो संदेशों को ग्रहण, संसाधित और प्रेषित करने के लिए विशेषीकृत होती हैं। प्रत्येक न्यूरॉन के तीन मुख्य भाग होते हैं:

  1. कोशिका-काय:- जिसमें केंद्रक होता है और कोशिकीय गतिविधियाँ नियंत्रित होती हैं।
  2. द्रुमिका:- जो अन्य न्यूरॉन से संकेत प्राप्त करती है।
  3. तंत्रिकाक्ष (Axon):- एक लंबा तंतु जो कोशिका से संदेश ले जाकर एक्सॉन टर्मिनल पर समाप्त होता है, जो अन्य कोशिकाओं तक संदेश पहुँचाता है।

3.4 पेशी-कंकाल तंत्र

पेशी-कंकाल तंत्र (Musculoskeletal system):-

अस्थियों, पेशियों, संधियों, उपास्थियों, कंडराओं और स्नायुओं से मिलकर बना होता है। यह सीधे खड़े होने, गति करने, मुद्रा बनाए रखने और कोमल अंगों की रक्षा में सहायता करता है और तंत्रिका तंत्र के नियंत्रण में कार्य करता है। मांसपेशियाँ गति उत्पन्न करने के लिए अस्थियों को खींचती हैं — वे कंडरा नामक सुदृढ़, लचीली पट्टियों द्वारा अस्थियों से जुड़ी होती हैं।

नोट:- औसतन वयस्क पुरुषों में लगभग 40–50 प्रतिशत और वयस्क महिलाओं में लगभग 30–40 प्रतिशत मांसपेशी होती है, जबकि सभी वयस्कों में अस्थि द्रव्यमान लगभग 12–15 प्रतिशत होता है।

संधि दो या अधिक अस्थियों के बीच का जोड़ है — यह गति को संभव बनाती है किंतु स्वयं अस्थियों को गति नहीं दे सकती।

3.5 संधियों के प्रकार

कंदुक-खल्लिका संधि (Ball and socket joint):-

ऊपरी भुजा की अस्थि का गोलाकार शीर्ष कंधे की अस्थि के उथले गड्ढे में फिट होता है। कंधा जत्रुकास्थि (collarbone) के साथ मिलकर कंधे की मेखला बनाता है। यह संधि अग्र, पश्च, पार्श्व और गोलाकार गति संभव बनाती है।

कोर संधि (Hinge joint):-

कोहनी एक दरवाजे के कब्जे की तरह केवल एक दिशा में मुड़ती और सीधी होती है। घुटने में भी इसी प्रकार की कोर संधि होती है जहाँ जानुफलक (kneecap/patella) नामक छोटी अस्थि संधि की रक्षा करती है।

धुराग्र संधि (Pivot joint):-

खोपड़ी एक धुराग्र संधि के माध्यम से मेरुदंड से जुड़ी होती है जो सिर की ऊपर-नीचे और दाएँ-बाएँ गति संभव बनाती है (जैसे 'नहीं' की मुद्रा में सिर हिलाना)।

अचल संधियाँ (Fixed joints):-

खोपड़ी की चपटी अस्थियाँ आपस में अचल संधियों से जुड़ी होती हैं जिसका अर्थ है कि ये गति नहीं कर सकतीं — यह मस्तिष्क, आँखों और कानों को सुरक्षित रखता है।

नोट:- अस्थि मज्जा (bone marrow) में मूल (stem) कोशिकाएँ होती हैं जो विभाजित होकर नई कोशिकाएँ बना सकती हैं। अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण में स्वस्थ व्यक्ति की मूल कोशिकाएँ रक्त कैंसर (ल्यूकेमिया) या रक्त विकार (थैलेसीमिया) से ग्रस्त रोगियों को दी जाती हैं।

3.6 कंकाल तंत्र

कंकाल तंत्र (Skeletal system):-

अस्थियों का एक ऐसा ढाँचा है जो शरीर को दृढ़ता प्रदान करता है और कोमल आंतरिक अंगों की रक्षा करता है। इसमें खोपड़ी (skull), कशेरुक दंड/मेरुदंड (vertebral column) और पसली पिंजर (rib cage) सम्मिलित हैं।

  1. मेरुदंड (Backbone):- कशेरुका (vertebrae) नामक छोटी हड्डियों की श्रृंखला से बना, जो शरीर को सहारा देता है। दो कशेरुकाओं के बीच उपास्थि चक्रिका (cartilage disc) गद्दी का कार्य कर लचीलापन देती है, जिससे मेरुरज्जु को चोट पहुँचाए बिना झुक सकते हैं।
  2. पसली पिंजर (Rib cage):- पसलियों के 12 जोड़े मिलकर हृदय व फेफड़ों की रक्षा करने वाला सुरक्षात्मक पिंजर बनाते हैं। पसलियाँ पीछे मेरुदंड से व सामने उरोस्थि से लचीली उपास्थि द्वारा जुड़ी होती हैं, जिससे श्वसन के दौरान पिंजर फैलता व संकुचित होता है और वक्ष गुहा में परिवर्तन से फेफड़ों में वायु का आवागमन होता है।
उदाहरण:- प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वर्णित योग में शारीरिक आसन, श्वास और ध्यान सम्मिलित हैं। योग लचीलेपन, मुद्रा व श्वसन में सुधार करता है, तनाव कम करता है और जीवनशैली संबंधी रोगों को रोकने में सहायता करता है। हर वर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है।
नोट:- 1958 में एफ.सी. स्टीवर्ड ने प्रदर्शित किया कि गाजर के फ्लोएम की एक कोशिका में भी पूर्ण पादप को पुनरुद्भूत करने की क्षमता (पूर्णशक्तता/totipotency) होती है — पहले निर्विभेदित होकर एक अविभेदित पिंड बनाती है, फिर उचित पोषक तत्वों व वृद्धि रसायनों की उपस्थिति में पुनःविभेदित होकर जड़, प्ररोह और अंततः पूर्ण पादप बनाती है।
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